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            "title": "माया के मोहक",
            "content": "<p>माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?<br />भय है, सुन कर हँस दोगे मेरी नादानी परदेशी!<br />सृजन-बीच संहार छिपा, कैसे बतलाऊं परदेशी?<br />सरल कंठ से विषम राग मैं कैसे गाऊँ परदेशी?</p>\r\n<p>एक बात है सत्य कि झर जाते हैं खिलकर फूल यहाँ,<br />जो अनुकूल वही बन जता दुर्दिन में प्रतिकूल यहाँ।<br />मैत्री के शीतल कानन में छिपा कपट का शूल यहाँ,<br />कितने कीटों से सेवित है मानवता का मूल यहाँ?<br />इस उपवन की पगडण्डी पर बचकर जाना परदेशी।<br />यहाँ मेनका की चितवन पर मत ललचाना परदेशी !<br />जगती में मादकता देखी, लेकिन अक्षय तत्त्व नहीं,<br />आकर्षण में तृप्ति उर सुन्दरता में अमरत्व नहीं।<br />यहाँ प्रेम में मिली विकलता, जीवन में परितोष नहीं,<br />बाल-युवतियों के आलिंगन में पाया संतोष नहीं।<br />हमें प्रतीक्षा में न तृप्ति की मिली निशानी परदेशी!<br />माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?</p>\r\n<p>महाप्रलय की ओर सभी को इस मरू में चलते देखा,<br />किस से लिपट जुडाता? सबको ज्वाला में जलते देखा।<br />अंतिम बार चिता-दीपक में जीवन को बलते देखा ;<br />चलत समय सिकंदर -से विजयी को कर मलते देखा।</p>\r\n<p>सबने देकर प्राण मौत की कीमत जानी परदेशी।<br />माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?<br />रोते जग की अनित्यता पर सभी विश्व को छोड़ चले,<br />कुछ तो चढ़े चिता के रथ पर, कुछ क़ब्रों की ओर चले।</p>\r\n<p>रुके न पल-भर मित्र, पुत्र माता से नाता तोड़ चले,<br />लैला रोती रही किन्तु, कितने मजनू मुँह मोड़ चले।</p>\r\n<p>जीवन का मधुमय उल्लास,<br />औ' यौवन का हास विलास,<br />रूप-राशि का यह अभिमान,<br />एक स्वप्न है, स्वप्न अजान।<br />मिटता लोचन -राग यहाँ पर,<br />मुरझाती सुन्दरता प्यारी,<br />एक-एक कर उजड़ रही है<br />हरी-भरी कुसुमों की क्यारी।<br />मैं ना रुकूंगा इस भूतल पर<br />जीवन, यौवन, प्रेम गंवाकर ;<br />वायु, उड़ाकर ले चल मुझको<br />जहाँ-कहीं इस जग से बाहर</p>\r\n<p>मरते कोमल वत्स यहाँ, बचती ना जवानी परदेशी !<br />माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी?</p>\r\n<p>&nbsp;</p>",
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            "content": "<p>धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,<br />कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।<br />कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;<br />मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?<br />दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,<br />बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।<br />प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।<br />चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।</p>\r\n<p>बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,<br />कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?<br />मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?<br />यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?<br />आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,<br />भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।<br />तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।<br />ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।</p>\r\n<p>आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,<br />बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,<br />अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,<br />है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।<br />निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।<br />निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।<br />पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।<br />जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।</p>\r\n<p>मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं,<br />अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं।<br />भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं,<br />सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं।<br />इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,<br />पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।<br />उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।<br />विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।</p>\r\n<p>आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,<br />मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे;<br />फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,<br />हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।<br />आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,<br />अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।<br />विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।<br />बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।</p>\r\n<p>ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,<br />जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।<br />गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे।<br />इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।<br />हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,<br />अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।<br />प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,<br />तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।</p>\r\n<p>&nbsp;</p>",
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            "content": "<p>वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा सम्भालो,<br />चट्टानों की छाती से दूध निकालो,<br />है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो,<br />पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो ।</p>\r\n<p>चढ़ तुँग शैल शिखरों पर सोम पियो रे !<br />योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे !</p>\r\n<p>जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है,<br />चिनगी बन फूलों का पराग जलता है,<br />सौन्दर्य बोध बन नई आग जलता है,<br />ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है ।</p>\r\n<p>अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे !<br />गरजे कृशानु तब कँचन शुद्ध करो रे !</p>\r\n<p>जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है,<br />भामिनी वही तरुणी, नर वही तरुण है,<br />है वही प्रेम जिसकी तरँग उच्छल है,<br />वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है ।</p>\r\n<p>उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है,<br />तलवार प्रेम से और तेज होती है !</p>\r\n<p>छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए,<br />मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाए,<br />दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है,<br />मरता है जो एक ही बार मरता है ।</p>\r\n<p>तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे !<br />जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे !</p>\r\n<p>स्वातन्त्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है,<br />बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है !<br />वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे<br />जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!</p>\r\n<p>जब कभी अहम पर नियति चोट देती है,<br />कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है,<br />नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है,<br />वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है ।</p>\r\n<p>चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे !<br />धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे !</p>\r\n<p>उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है,<br />सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है,<br />विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिन्तन है,<br />जीवन का अन्तिम ध्येय स्वयं जीवन है ।</p>\r\n<p><br />सबसे स्वतन्त्र रस जो भी अनघ पिएगा !<br />पूरा जीवन केवल वह वीर जिएगा !</p>\r\n<p>&nbsp;</p>",
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            "title": "कृष्ण की चेतावनी",
            "content": "<p></p>\r\n<p>वर्षों तक वन में घूम-घूम,<br />बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,<br />सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,<br />पांडव आये कुछ और निखर।<br />सौभाग्य न सब दिन सोता है,<br />देखें, आगे क्या होता है।</p>\r\n<p>मैत्री की राह बताने को,<br />सबको सुमार्ग पर लाने को,<br />दुर्योधन को समझाने को,<br />भीषण विध्वंस बचाने को,<br />भगवान् हस्तिनापुर आये,<br />पांडव का संदेशा लाये।</p>\r\n<p>&lsquo;दो न्याय अगर तो आधा दो,<br />पर, इसमें भी यदि बाधा हो,<br />तो दे दो केवल पाँच ग्राम,<br />रक्खो अपनी धरती तमाम।<br />हम वहीं खुशी से खायेंगे,<br />परिजन पर असि न उठायेंगे!</p>\r\n<p>दुर्योधन वह भी दे ना सका,<br />आशीष समाज की ले न सका,<br />उलटे, हरि को बाँधने चला,<br />जो था असाध्य, साधने चला।<br />जब नाश मनुज पर छाता है,<br />पहले विवेक मर जाता है।</p>\r\n<p>हरि ने भीषण हुंकार किया,<br />अपना स्वरूप-विस्तार किया,<br />डगमग-डगमग दिग्गज डोले,<br />भगवान् कुपित होकर बोले-<br />&lsquo;जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,<br />हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।</p>\r\n<p>यह देख, गगन मुझमें लय है,<br />यह देख, पवन मुझमें लय है,<br />मुझमें विलीन झंकार सकल,<br />मुझमें लय है संसार सकल।<br />अमरत्व फूलता है मुझमें,<br />संहार झूलता है मुझमें।</p>\r\n<p>&lsquo;उदयाचल मेरा दीप्त भाल,<br />भूमंडल वक्षस्थल विशाल,<br />भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,<br />मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।<br />दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,<br />सब हैं मेरे मुख के अन्दर।</p>\r\n<p>&lsquo;दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,<br />मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,<br />चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,<br />नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।<br />शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,<br />शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।</p>\r\n<p>&lsquo;शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,<br />शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,<br />शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,<br />शत कोटि दण्डधर लोकपाल।<br />जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,<br />हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।</p>\r\n<p>&lsquo;भूलोक, अतल, पाताल देख,<br />गत और अनागत काल देख,<br />यह देख जगत का आदि-सृजन,<br />यह देख, महाभारत का रण,<br />मृतकों से पटी हुई भू है,<br />पहचान, इसमें कहाँ तू है।</p>\r\n<p>&lsquo;अम्बर में कुन्तल-जाल देख,<br />पद के नीचे पाताल देख,<br />मुट्ठी में तीनों काल देख,<br />मेरा स्वरूप विकराल देख।<br />सब जन्म मुझी से पाते हैं,<br />फिर लौट मुझी में आते हैं।</p>\r\n<p>&lsquo;जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,<br />साँसों में पाता जन्म पवन,<br />पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,<br />हँसने लगती है सृष्टि उधर!<br />मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,<br />छा जाता चारों ओर मरण।</p>\r\n<p>&lsquo;बाँधने मुझे तो आया है,<br />जंजीर बड़ी क्या लाया है?<br />यदि मुझे बाँधना चाहे मन,<br />पहले तो बाँध अनन्त गगन।<br />सूने को साध न सकता है,<br />वह मुझे बाँध कब सकता है?</p>\r\n<p>&lsquo;हित-वचन नहीं तूने माना,<br />मैत्री का मूल्य न पहचाना,<br />तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,<br />अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।<br />याचना नहीं, अब रण होगा,<br />जीवन-जय या कि मरण होगा।</p>\r\n<p>&lsquo;टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,<br />बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,<br />फण शेषनाग का डोलेगा,<br />विकराल काल मुँह खोलेगा।<br />दुर्योधन! रण ऐसा होगा।<br />फिर कभी नहीं जैसा होगा।</p>\r\n<p>&lsquo;भाई पर भाई टूटेंगे,<br />विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,<br />वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,<br />सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।<br />आखिर तू भूशायी होगा,<br />हिंसा का पर, दायी होगा।&rsquo;</p>\r\n<p>थी सभा सन्न, सब लोग डरे,<br />चुप थे या थे बेहोश पड़े।<br />केवल दो नर ना अघाते थे,<br />धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।<br />कर जोड़ खड़े प्रमुदित,<br />निर्भय, दोनों पुकारते थे &lsquo;जय-जय&rsquo;!</p>",
            "raw_content": "  वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है।   मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये।   ‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे!   दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।   हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- ‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।   यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें।   ‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर, सब हैं मेरे मुख के अन्दर।   ‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख, चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर। शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।   ‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश, शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल। जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें, हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।   ‘भूलोक, अतल, पाताल देख, गत और अनागत काल देख, यह देख जगत का आदि-सृजन, यह देख, महाभारत का रण, मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान, इसमें कहाँ तू है।   ‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख, मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख। सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं।   ‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन, साँसों में पाता जन्म पवन, पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर! मैं जभी मूँदता हूँ लोचन, छा जाता चारों ओर मरण।   ‘बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन। सूने को साध न सकता है, वह मुझे बाँध कब सकता है?   ‘हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ। याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।   ‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर, फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा। दुर्योधन! रण ऐसा होगा। फिर कभी नहीं जैसा होगा।   ‘भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे, वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे। आखिर तू भूशायी होगा, हिंसा का पर, दायी होगा।’   थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े। केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे। कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!",
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