{"count":56,"next":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/posts/?page=3","previous":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/posts/","results":[{"id":1458,"title":"ध्वज-वंदना","content":"<p><br />नमो, नमो, नमो...</p>\r\n<p>नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!<br />नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी!<br />नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!<br />प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!<br />नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!<br />नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!<br />नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!</p>\r\n<p>हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार<br />प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार<br />सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु<br />हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु<br />पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!<br />नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!</p>\r\n<p>तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग<br />दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग<br />सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़<br />कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर<br />करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान<br />अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!<br />प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!</p>\r\n<p>नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!</p>","raw_content":"नमो, नमो, नमो...   नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो! नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी! नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी! प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी! नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी! नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो! नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!   हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो! नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!   तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़ कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान! प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!   नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, 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की भीख","content":"<p><br />धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,<br />कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।<br />कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;<br />मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?<br />दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,<br />बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।<br />प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।<br />चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।</p>\r\n<p>बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,<br />कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?<br />मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?<br />यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?<br />आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,<br />भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।<br />तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।<br />ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।</p>\r\n<p>आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,<br />बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,<br />अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,<br />है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।<br />निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।<br />निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।<br />पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।<br 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वरदान माँगता हूँ,<br />तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।</p>","raw_content":"धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है? दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे, बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे। प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ। चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।   बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है, कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है? मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा? यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा? आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा, भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा। तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ। ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।   आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है, बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है, अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है, है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है। निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है। निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है। पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ। जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।   मन की बँधी उमंगें असहाय जल 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था मुझे तुम्हारी साँसों का पवन,<br />जब मैं बालक अबोध अनजान था।</p>\r\n<p>यह पवन तुम्हारी साँस का<br />सौरभ लाता था।<br />उसके कंधों पर चढ़ा<br />मैं जाने कहाँ-कहाँ<br />आकाश में घूम आता था।</p>\r\n<p>सृष्टि शायद तब भी रहस्य थी।<br />मगर कोई परी मेरे साथ में थी;<br />मुझे मालूम तो न था,<br />मगर ताले की कूंजी मेरे हाथ में थी।</p>\r\n<p>जवान हो कर मैं आदमी न रहा,<br />खेत की घास हो गया।</p>\r\n<p>तुम्हारा पवन आज भी आता है<br />और घास के साथ अठखेलियाँ करता है,<br />उसके कानों में चुपके चुपके<br />कोई संदेश भरता है।</p>\r\n<p>घास उड़ना चाहती है<br />और अकुलाती है,<br />मगर उसकी जड़ें धरती में<br />बेतरह गड़ी हुईं हैं।<br />इसलिए हवा के साथ<br />वह उड़ नहीं पाती है।</p>\r\n<p>शक्ति जो चेतन थी,<br />अब जड़ हो गयी है।<br />बचपन में जो कुंजी मेरे पास थी,<br />उम्र बढ़ते बढ़ते<br />वह कहीं खो गयी है।</p>","raw_content":"  घेरे था मुझे तुम्हारी साँसों का पवन, जब मैं बालक अबोध अनजान था।   यह पवन तुम्हारी साँस का सौरभ लाता था। उसके कंधों पर चढ़ा मैं जाने कहाँ-कहाँ आकाश में घूम आता था।   सृष्टि शायद तब भी रहस्य थी। मगर कोई परी मेरे साथ में थी; मुझे मालूम तो न था, मगर ताले की कूंजी मेरे हाथ में थी।   जवान हो कर मैं आदमी न रहा, खेत की घास हो गया।   तुम्हारा पवन आज भी आता है और घास के साथ अठखेलियाँ करता है, उसके कानों में चुपके चुपके कोई संदेश भरता है।   घास उड़ना चाहती है और अकुलाती है, मगर उसकी जड़ें धरती में बेतरह गड़ी हुईं हैं। इसलिए हवा के साथ वह उड़ नहीं पाती है।   शक्ति जो चेतन थी, अब जड़ हो गयी है। बचपन में जो कुंजी मेरे पास थी, उम्र बढ़ते बढ़ते वह कहीं खो गयी है।","image":null,"slug":"kunji","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/kunji","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/kunji.mp3","created":"2024-02-02T16:02:10.353994","author":{"name":"Ramdhari Singh 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कविता","content":"<p> <br />बरसों बाद मिले तुम हमको आओ जरा बिचारें,<br />आज क्या है कि देख कौम को गम है।<br />कौम-कौम का शोर मचा है, किन्तु कहो असल में<br />कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगी लगन है?<br />भूखे, अपढ़, नग्न बच्चे क्या नहीं तुम्हारे घर में?<br />कहता धनी कुबेर किन्तु क्या आती तुम्हें शरम है?<br />आग लगे उस धन में जो दुखियों के काम न आए,<br />लाख लानत जिनका, फटता नही मरम है।<br />दुह-दुह कर जाति गाय की निजतन धन तुम पा लो<br />दो बूँद आँसू न उनको यह भी कोई धरम है?<br />देख रही है राह कौम अपने वैभव वालों की<br />मगर फिकर क्या, उन्हें सोच तो अपन ही हरदम है?<br />हँसते हैं सब लोग जिन्हें गैरत हो वे सरमायें<br />यह महफ़िल कहने वालों को बड़ा भारी विभ्रम है।<br />सेवा व्रत शूल का पथ है गद्दी नहीं कुसुम की!<br />घर बैठो चुपचाप</p>","raw_content":"  बरसों बाद मिले तुम हमको आओ जरा बिचारें, आज क्या है कि देख कौम को गम है। कौम-कौम का शोर मचा है, किन्तु कहो असल में कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगी लगन है? भूखे, अपढ़, नग्न बच्चे क्या नहीं तुम्हारे घर में? कहता धनी कुबेर किन्तु क्या आती 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तोड़ने के लिए भूकम्प लाओ । घुप्प अँधेरे में फिर अपनी मशाल जलाओ । पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर पवनकुमार के समान तरजो । कोई तूफ़ान उठाने को कवि, गरजो, गरजो, गरजो !\"   सोचता हूँ, मैं कब गरजा था ? जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं, वह असल में गाँधी का था, उस गाँधी का था, जिस ने हमें जन्म दिया था ।   तब भी हम ने गाँधी के तूफ़ान को ही देखा, गाँधी को नहीं ।   वे तूफ़ान और गर्जन के पीछे बसते थे । सच तो यह है कि अपनी लीला में तूफ़ान और गर्जन को शामिल होते देख वे हँसते थे ।   तूफ़ान मोटी नहीं, महीन आवाज़ से उठता है । वह आवाज़ जो मोम के दीप के समान एकान्त में जलती है, और बाज नहीं, कबूतर के चाल से चलती है ।   गाँधी तूफ़ान के पिता और बाजों के भी बाज थे । क्योंकि वे नीरवताकी आवाज थे।","image":null,"slug":"gamdhi","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/gamdhi","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/gamdhi.mp3","created":"2024-02-02T16:02:10.902878","author":{"name":"Ramdhari Singh 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क्षमाशील हो रिपु-समक्ष तुम हुये विनत जितना ही दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही।   अत्याचार सहन करने का कुफल यही होता है पौरुष का आतंक मनुज कोमल होकर खोता है।   क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो।   तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिन्धु किनारे, बैठे पढ़ते रहे छन्द अनुनय के प्यारे-प्यारे।   उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से।   सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में चरण पूज दासता ग्रहण की बँधा मूढ़ बन्धन में।   सच पूछो, तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की सन्धि-वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की।   सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।","image":null,"slug":"sakti-aura-ksama","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/sakti-aura-ksama","readtime":"1 min 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अगीत","content":"<p>गीत, अगीत, कौन सुंदर है?<br />गाकर गीत विरह की तटिनी<br />वेगवती बहती जाती है,<br />दिल हलका कर लेने को<br />उपलों से कुछ कहती जाती है।<br />तट पर एक गुलाब सोचता,<br />\"देते स्&zwj;वर यदि मुझे विधाता,<br />अपने पतझर के सपनों का<br />मैं भी जग को गीत सुनाता।\"<br />गा-गाकर बह रही निर्झरी,<br />पाटल मूक खड़ा तट पर है।<br />गीत, अगीत, कौन सुंदर है?<br />बैठा शुक उस घनी डाल पर<br />जो खोंते पर छाया देती।<br />पंख फुला नीचे खोंते में<br />शुकी बैठ अंडे है सेती।<br />गाता शुक जब किरण वसंती<br />छूती अंग पर्ण से छनकर।<br />किंतु, शुकी के गीत उमड़कर<br />रह जाते स्&zwj;नेह में सनकर।<br />गूँज रहा शुक का स्&zwj;वर वन में,<br />फूला मग्&zwj;न शुकी का पर है।<br />गीत, अगीत, कौन सुंदर है?<br />दो प्रेमी हैं यहाँ, एक जब<br />बड़े साँझ आल्&zwj;हा गाता है,<br />पहला स्&zwj;वर उसकी राधा को<br />घर से यहाँ खींच लाता है।<br />चोरी-चोरी खड़ी नीम की<br />छाया में छिपकर सुनती है,<br />'हुई न क्&zwj;यों मैं कड़ी गीत की<br />बिधना', यों मन में गुनती है।<br />वह गाता, पर किसी वेग से<br 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चाँद","content":"<p></p>\r\n<p>रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,<br />आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!<br />उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,<br />और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।</p>\r\n<p>जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?<br />मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;<br />और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी<br />चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।</p>\r\n<p>आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;<br />आज उठता और कल फिर फूट जाता है;<br />किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?<br />बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।</p>\r\n<p>मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,<br />देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?<br />स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?<br />आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?</p>\r\n<p>मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,<br />आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,<br />और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,<br />इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।</p>\r\n<p>मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी<br />कल्पना की जीभ में भी धार होती है,<br />वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,<br />स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।</p>\r\n<p>स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,<br />\"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,<br />रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,<br />स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।\"</p>","raw_content":"  रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।   जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।   आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का; आज उठता और कल फिर फूट जाता है; किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो? बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।   मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू? स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी? आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?   मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ, और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की, इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।   मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी कल्पना की जीभ में भी धार होती है, वाण ही होते विचारों के नहीं केवल, स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।   स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे, \"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे, रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को, स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।\"","image":null,"slug":"rata-yom-kahane-laga-mujhase-gagana-ka-camda","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/rata-yom-kahane-laga-mujhase-gagana-ka-camda","readtime":"2 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/rata-yom-kahane-laga-mujhase-gagana-ka-camda.mp3","created":"2024-02-02T16:02:11.690743","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[4679],"bookmarked_by":[4679],"category":[],"tag":[{"id":552,"name":"कविता 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के मर्द","content":"<p> <br />पुरुष वीर बलवान,<br />देश की शान,<br />हमारे नौजवान<br />घायल होकर आये हैं।</p>\r\n<p>कहते हैं, ये पुष्प, दीप,<br />अक्षत क्यों लाये हो?</p>\r\n<p>हमें कामना नहीं सुयश-विस्तार की,<br />फूलों के हारों की, जय-जयकार की।</p>\r\n<p>तड़प रही घायल स्वदेश की शान है।<br />सीमा पर संकट में हिन्दुस्तान है।</p>\r\n<p>ले जाओ आरती, पुष्प, पल्लव हरे,<br />ले जाओ ये थाल मोदकों ले भरे।</p>\r\n<p>तिलक चढ़ा मत और हृदय में हूक दो,<br />दे सकते हो तो गोली-बन्दूक दो।</p>","raw_content":"  पुरुष वीर बलवान, देश की शान, हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं।   कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों लाये हो?   हमें कामना नहीं सुयश-विस्तार की, फूलों के हारों की, जय-जयकार की।   तड़प रही घायल स्वदेश की शान है। सीमा पर संकट में हिन्दुस्तान है।   ले जाओ आरती, पुष्प, पल्लव हरे, ले जाओ ये थाल मोदकों ले भरे।   तिलक चढ़ा मत और हृदय में हूक दो, दे सकते हो तो गोली-बन्दूक दो।","image":null,"slug":"lohe-ke-marda","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/lohe-ke-marda","readtime":"1 min 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