{"count":56,"next":null,"previous":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/posts/?format=json&page=4","results":[{"id":4866,"title":"रश्मिरथी षष्ठ सर्ग","content":"<p>नरता कहते हैं जिसे, सत्तव<br />क्या वह केवल लड़ने में है ?<br />पौरूष क्या केवल उठा खड्ग<br />मारने और मरने में है ?<br />तब उस गुण को क्या कहें<br />मनुज जिससे न मृत्यु से डरता है ?<br />लेकिन, तक भी मारता नहीं,<br />वह स्वंय विश्व-हित मरता है।</p>\r\n<p>है वन्दनीय नर कौन ? विजय-हित<br />जो करता है प्राण हरण ?<br />या सबकी जान बचाने को<br />देता है जो अपना जीवन ?<br />चुनता आया जय-कमल आज तक<br />विजयी सदा कृपाणों से,<br />पर, आह निकलती ही आयी<br />हर बार मनुज के प्राणों से।</p>\r\n<p>आकुल अन्तर की आह मनुज की<br />इस चिन्ता से भरी हुई,<br />इस तरह रहेगी मानवता<br />कब तक मनुष्य से डरी हुई ?<br />पाशविक वेग की लहर लहू में<br />कब तक धूम मचायेगी ?<br />कब तक मनुष्यता पशुता के<br />आगे यों झुकती जायेगी ?</p>\r\n<p>यह ज़हर ने छोड़ेगा उभार ?<br />अंगार न क्या बूझ पायेंगे ?<br />हम इसी तरह क्या हाय, सदा<br />पशु के पशु ही रह जायेंगे ?<br />किसका सिंगार ? किसकी सेवा ?<br />नर का ही जब कल्याण नहीं ?<br />किसके विकास की कथा ? जनों के<br />ही रक्षित जब प्राण नहीं ?</p>\r\n<p>इस विस्मय का क्या समाधान ?<br />रह-रह कर यह क्या होता है ?<br />जो है अग्रणी वही सबसे<br />आगे बढ़ धीरज खोता है।<br />फिर उसकी क्रोधाकुल पुकार<br />सबको बेचैन बनाती है,<br />नीचे कर क्षीण मनुजता को<br />ऊपर पशुत्व को लाती है।</p>\r\n<p>हाँ, नर के मन का सुधाकुण्ड<br />लघु है, अब भी कुछ रीता है,<br />वय अधिक आज तक व्यालों के<br />पालन-पोषण में बीता है।<br />ये व्याल नहीं चाहते, मनुज<br />भीतर का सुधाकुण्ड खोले,<br />जब ज़हर सभी के मुख में हो<br />तब वह मीठी बोली बोले।</p>\r\n<p>थोड़ी-सी भी यह सुधा मनुज का<br />मन शीतल कर सकती है,<br />बाहर की अगर नहीं, पीड़ा<br />भीतर की तो हर सकती है।<br />लेकिन धीरता किसे ? अपने<br />सच्चे स्वरूप का ध्यान करे,<br />जब ज़हर वायु में उड़ता हो<br />पीयूष-विन्दू का पान करे।</p>\r\n<p>पाण्डव यदि पाँच ग्राम<br />लेकर सुख से रह सकते थे,<br />तो विश्व-शान्ति के लिए दुःख<br />कुछ और न क्या कह सकते थे ?<br />सुन कुटिल वचन दुर्योधन का<br />केशव न क्यों यह का नहीं-<br />\"हम तो आये थे शान्ति हेतु,<br />पर, तुम चाहो जो, वही सही।</p>\r\n<p>\"तुम भड़काना चाहते अनल<br />धरती का भाग जलाने को,<br />नरता के नव्य प्रसूनों को<br />चुन-चुन कर क्षार बनाने को।<br />पर, शान्ति-सुन्दरी के सुहाग<br />पर आग नहीं धरने दूँगा,<br />जब तक जीवित हूँ, तुम्हें<br />बान्धवों से न युद्ध करने दूँगा।</p>\r\n<p>\"लो सुखी रहो, सारे पाण्डव<br />फिर एक बार वन जायेंगे,<br />इस बार, माँगने को अपना<br />वे स्वत्तव न वापस आयेंगे।<br />धरती की शान्ति बचाने को<br />आजीवन कष्ट सहेंगे वे,<br />नूतन प्रकाश फैलाने को<br />तप में मिल निरत रहेंगे वे।</p>\r\n<p>शत लक्ष मानवों के सम्मुख<br />दस-पाँच जनों का सुख क्या है ?<br />यदि शान्ति विश्व की बचती हो,<br />वन में बसने में दुख क्या है ?<br />सच है कि पाण्डूनन्दन वन में<br />सम्राट् नहीं कहलायेंगे,<br />पर, काल-ग्रन्थ में उससे भी<br />वे कहीं श्रेष्ठ पद पायेंगे।</p>\r\n<p>\"होकर कृतज्ञ आनेवाला युग<br />मस्तक उन्हें झुकायेगा,<br />नवधर्म-विधायक की प्रशस्ति<br />संसार युगों तक गायेगा।<br />सीखेगा जग, हम दलन युद्ध का<br />कर सकते, त्यागी होकर,<br />मानव-समाज का नयन मनुज<br />कर सकता वैरागी होकर।\"</p>\r\n<p>पर, नहीं, विश्व का अहित नहीं<br />होता क्या ऐसा कहने से ?<br />प्रतिकार अनय का हो सकता।<br />क्या उसे मौन हो सहने से ?<br />क्या वही धर्म, लौ जिसकी<br />दो-एक मनों में जलती है।<br />या वह भी जो भावना सभी<br />के भीतर छिपी मचलती है।</p>\r\n<p>सबकी पीड़ा के साथ व्यथा<br />अपने मन की जो जोड़ सके,<br />मुड़ सके जहाँ तक समय, उसे<br />निर्दिष्ट दिशा में मोड़ सके।<br />युगपुरूष वही सारे समाज का<br />विहित धर्मगुरू होता है,<br />सबके मन का जो अन्धकार<br />अपने प्रकाश से धोता है।</p>\r\n<p>द्वापर की कथा बड़ी दारूण,<br />लेकिन, कलि ने क्या दान दिया ?<br />नर के वध की प्रक्रिया बढ़ी<br />कुछ और उसे आसान किया।<br />पर, हाँ, जो युद्ध स्वर्गमुख था,<br />वह आज निन्द्य-सा लगता है।<br />बस, इसी मन्दता के विकास का<br />भाव मनुज में जगता है।</p>\r\n<p>धीमी कितनी गति है ? विकास<br />कितना अदृश्य हो चलता है ?<br />इस महावृक्ष में एक पत्र<br />सदियों के बाद निकलता है।<br />थे जहाँ सहस्त्रों वर्ष पूर्व,<br />लगता है वहीं खड़े हैं हम।<br />है वृथा वर्ग, उन गुफावासियों से<br />कुछ बहुत बड़े हैं हम।</p>\r\n<p>अनगढ़ पत्थर से लड़ो, लड़ो<br />किटकिटा नखों से, दाँतों से,<br />या लड़ो ऋक्ष के रोमगुच्छ-पूरित<br />वज्रीकृत हाथों से;<br />या चढ़ विमान पर नर्म मुट्ठियों से<br />गोलों की वृष्टि करो,<br />आ जाय लक्ष्य में जो कोई,<br />निष्ठुर हो सबके प्राण हरो।</p>\r\n<p>ये तो साधन के भेद, किन्तु<br />भावों में तत्व नया क्या है ?<br />क्या खुली प्रेम आँख अधिक ?<br />भतीर कुछ बढ़ी दया क्या है ?<br />झर गयी पूँछ, रोमान्त झरे,<br />पशुता का झरना बाकी है;<br />बाहर-बाहर तन सँवर चुका,<br />मन अभी सँवरना बाकी है।</p>\r\n<p>देवत्व अल्प, पशुता अथोर,<br />तमतोम प्रचुर, परिमित आभा,<br />द्वापर के मन पर भी प्रसरित<br />थी यही, आज वाली, द्वाभा।<br />बस, इसी तरह, तब भी ऊपर<br />उठने को नर अकुलाता था,<br />पर पद-पद पर वासना-जाल में<br />उलझ-उलझ रह जाता था।</p>\r\n<p>औ&rsquo; जिस प्रकार हम आज बेल-<br />बूटों के बीच खचित करके,<br />देते हैं रण को रम्य रूप<br />विप्लवी उमंगों में भरके;<br />कहते, अनीतियों के विरूद्ध<br />जो युद्ध जगत में होता है,<br />वह नहीं ज़हर का कोष, अमृत का<br />बड़ा सलोना सोता है।</p>\r\n<p>बस, इसी तरह, कहता होगा<br />द्वाभा-शासित द्वापर का नर,<br />निष्ठुरताएँ हों भले, किन्तु,<br />है महामोक्ष का द्वार समर।<br />सत्य ही, समुन्नति के पथ पर<br />चल रहा चतुर मानव प्रबुद्ध,<br />कहता है क्रान्ति उसे, जिसको<br />पहले कहता था धर्मयुद्ध।</p>\r\n<p>सो, धर्मयुद्ध छिड़ गया, स्वर्ग<br />तक जाने के सोपान लगे,<br />सद्गतिकामी नर-वीर खड्ग से<br />लिपट गँवाने प्राण लगे।<br />छा गया तिमिर का सघन जाल,<br />मुँद गये मनुज के ज्ञान-नेत्र,<br />द्वाभा की गिरा पुकार उठी,<br />\"जय धर्मक्षेत्र ! जय कुरूक्षेत्र !\"</p>\r\n<p>हाँ, धर्मक्षेत्र इसलिए कि बन्धन<br />पर अबन्ध की जीत हुई,<br />कत्र्तव्यज्ञान पीछे छूटा,<br />आगे मानव की प्रीत हुई।<br />प्रेमातिरेक में केशव ने<br />प्रण भूल चक्र सन्धान किया,<br />भीष्म ने शत्रु को बड़े प्रेम से<br />अपना जीवन दान दिया।</p>\r\n<p>2<br />गिरि का उदग्र गौरवाधार<br />गिर जाय श्रृंग ज्यों महाकार,<br />अथवा सूना कर आसमान<br />ज्यों गिरे टूट रवि भासमान,<br />कौरव-दल का कर तेज हरण<br />त्यों गिरे भीष्म आलोकवरण।</p>\r\n<p>कुरूकुल का दीपित ताज गिरा,<br />थक कर बूढ़ा जब बाज़ गिरा,<br />भूलूठित पितामह को विलोक,<br />छा गया समर में महाशोक।<br />कुरूपति ही धैर्य न खोता था,<br />अर्जुन का मन भी रोता था।</p>\r\n<p>रो-धो कर तेज नया चमका,<br />दूसरा सूर्य सिर पर चमका,<br />कौरवी तेज दुर्जेय उठा,<br />रण करने को राधेय उठा,<br />सबके रक्षक गुरू आर्य हुए,<br />सेना-नायक आचार्य हुए।</p>\r\n<p>राधेय, किन्तु जिनके कारण,<br />था अब तक किये मौन धारण,<br />उनका शुभ आशिष पाने को,<br />अपना सद्धर्म निभाने को,<br />वह शर-शय्या की ओर चला,<br />पग-पग हो विनय-विभोर चला।</p>\r\n<p>छू भीष्मदेव के चरण युगल,<br />बोला वाणी राधेय सरल,<br />\"हे तात ! आपका प्रोत्साहन,<br />पा सका नहीं जो लान्छित जन,<br />यह वही सामने आया है,<br />उपहार अश्रु का लाया है।</p>\r\n<p>\"आज्ञा हो तो अब धनुष धरूँ,<br />रण में चलकर कुछ काम करूँ,<br />देखूँ, है कौन प्रलय उतरा,<br />जिससे डगमग हो रही धरा।<br />कुरूपति को विजय दिलाऊँ मैं,<br />या स्वयं विरगति पाऊँ मैं।</p>\r\n<p>\"अनुचर के दोष क्षमा करिये,<br />मस्तक पर वरद पाणि धरिये,<br />आखिरी मिलन की वेला है,<br />मन लगता बड़ा अकेला है।<br />मद-मोह त्यागने आया हूँ,<br />पद-धूलि माँगने आया हूँ।\"</p>\r\n<p>भीष्म ने खोल निज सजल नयन,<br />देखे कर्ण के आर्द्र लोचन<br />बढ़ खींच पास में ला करके,<br />छाती से उसे लगा करके,<br />बोले-\"क्या तत्व विशेष बचा ?<br />बेटा, आँसू ही शेष बचा।</p>\r\n<p>\"मैं रहा रोकता ही क्षण-क्षण,<br />पर हाय, हठी यह दुर्योधन,<br />अंकुश विवेक का सह न सका,<br />मेरे कहने में रह न सका,<br />क्रोधान्ध, भ्रान्त, मद में विभोर,<br />ले ही आया संग्राम घोर।</p>\r\n<p>\"अब कहो, आज क्या होता है ?<br />किसका समाज यह रोता है ?<br />किसका गौरव, किसका सिंगार,<br />जल रहा पंक्ति के आर-पार ?<br />किसका वन-बाग़ उजड़ता है?<br />यह कौन मारता-मरता है ?</p>\r\n<p>\"फूटता द्रोह-दव का पावक,<br />हो जाता सकल समाज नरक,<br />सबका वैभव, सबका सुहाग,<br />जाती डकार यह कुटिल आग।<br />जब बन्धु विरोधी होते हैं,<br />सारे कुलवासी रोते हैं।</p>\r\n<p>\"इसलिए, पुत्र ! अब भी रूककर,<br />मन में सोचो, यह महासमर,<br />किस ओर तुम्हें ले जायेगा ?<br />फल अलभ कौन दे पायेगा ?<br />मानवता ही मिट जायेगी,<br />फिर विजय सिद्धि क्या लायेगी ?</p>\r\n<p>\"ओ मेरे प्रतिद्वन्दी मानी !<br />निश्छल, पवित्र, गुणमय, ज्ञानी !<br />मेरे मुख से सुन परूष वचन,<br />तुम वृथा मलिन करते थे मन।<br />मैं नहीं निरा अवशंसी था,<br />मन-ही-मन बड़ा प्रशंसी था।</p>\r\n<p>\"सो भी इसलिए कि दुर्योधन,<br />पा सदा तुम्हीं से आश्वासन,<br />मुझको न मानकर चलता था,<br />पग-पग पर रूठ मचलता था।<br />अन्यथा पुत्र ! तुमसे बढ़कर<br />मैं किसे मानता वीर प्रवर ?</p>\r\n<p>\"पार्थोपम रथी, धनुर्धारी,<br />केशव-समान रणभट भारी,<br />धर्मज्ञ, धीर, पावन-चरित्र,<br />दीनों-दलितों के विहित मित्र,<br />अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे,<br />तुम मिले कौरवों को वैसे।</p>\r\n<p>\"पर हाय, वीरता का सम्बल,<br />रह जायेगा धनु ही केवल ?<br />या शान्ति हेतु शीतल, शुचि श्रम,<br />भी कभी करेंगे वीर परम ?<br />ज्वाला भी कभी बुझायेंगे ?<br />या लड़कर ही मर जायेंगे ?</p>\r\n<p>\"चल सके सुयोधन पर यदि वश,<br />बेटा ! लो जग में नया सुयश,<br />लड़ने से बढ़ यह काम करो,<br />आज ही बन्द संग्राम करो।<br />यदि इसे रोक तुम पाओगे,<br />जग के त्राता कहलाओगे।</p>\r\n<p>\"जा कहो वीर दुर्योधन से,<br />कर दूर द्वेष-विष को मन से,<br />वह मिल पाण्डवों से जाकर,<br />मरने दे मुझे शान्ति पाकर।<br />मेरा अन्तिम बलिदान रहे,<br />सुख से सारी सन्तान रहे।\"</p>\r\n<p>\"हे पुरूष सिंह !\" कर्ण ने कहा,<br />\"अब और पन्थ क्या शेष रहा ?<br />सकंटापन्न जीवन समान,<br />है बीच सिन्धु में महायान;<br />इस पार शान्ति, उस पार विजय<br />अब क्या हो भला नया निश्चय ?</p>\r\n<p>\"जय मिले बिना विश्राम नहीं,<br />इस समय सन्धि का नाम नहीं,<br />आशिष दीजिये, विजय कर रण,<br />फिर देख सकूँ ये भव्य चरण;<br />जलयान सिन्धु से तार सकूँ;<br />सबको मैं पार उतार सकूँ।</p>\r\n<p>\"कल तक था पथ शान्ति का सुगम,<br />पर, हुआ आज वह अति दुर्गम,<br />अब उसे देख ललचाना क्या ?<br />पीछे को पाँव हठाना क्या ?<br />जय को कर लक्ष्य चलेंगे हम,<br />अरि-दल को गर्व दलेंगे हम।</p>\r\n<p>\"हे महाभाग, कुछ दिन जीकर,<br />देखिये और यह महासमर,<br />मुझको भी प्रलय मचाना है,<br />कुछ खेल नया दिखलाना है;<br />इस दम तो मुख मोडि़ये नहीं;<br />मेरी हिम्मत तोडि़ये नहीं।</p>\r\n<p>करने दीजिये स्वव्रत पालन,<br />अपने महान् प्रतिभट से रण,<br />अर्जुन का शीश उड़ाना है,<br />कुरूपति का हृदय जुड़ाना है।<br />करने को पिता अमर मुझको,<br />है बुला रहा संगर मुझको।\"</p>\r\n<p>गांगेय निराशा में भर कर,<br />बोले-\"तब हे नरवीर प्रवर !<br />जो भला लगे, वह काम करो,<br />जाओ, रण में लड़ नाम करो।<br />भगवान्् शमित विष तूर्ण करें;<br />अपनी इच्छाएँ पूर्ण करें।\"</p>\r\n<p>भीष्म का चरण-वन्दन करके,<br />ऊपर सूर्य को नमन करके,<br />देवता वज्र-धनुधारी सा,<br />केसरी अभय मगचारी-सा,<br />राधेय समर की ओर चला,<br />करता गर्जन घनघोर चला।</p>\r\n<p>पाकर प्रसन्न आलोक नया,<br />कौरव-सेना का शोक गया,<br />आशा की नवल तरंग उठी,<br />जन-जन में नयी उमंग उठी,<br />मानों, बाणों का छोड़ शयन,<br />आ गये स्वयं गंगानन्दन।</p>\r\n<p>सेना समग्र हुकांर उठी,<br />&lsquo;जय-जय राधेय !&rsquo; पुकार उठी,<br />उल्लास मुक्त हो छहर उठा,<br />रण-जलधि घोष में घहर उठा,<br />बज उठी समर-भेरी भीषण,<br />हो गया शुरू संग्राम गहन।</p>\r\n<p>सागर-सा गर्जित, क्षुभित घोर,<br />विकराल दण्डधर-सा कठोर,<br />अरिदल पर कुपित कर्ण टूटा,<br />धनु पर चढ़ महामरण छूटा।<br />ऐसी पहली ही आग चली,<br />पाण्डव की सेना भाग चली।</p>\r\n<p>झंझा की घोर झकोर चली,<br />डालों को तोड़-मरोड़ चली,<br />पेड़ों की जड़ टूटने लगी,<br />हिम्मत सब की छूटने लगी,<br />ऐसा प्रचण्ड तूफान उठा,<br />पर्वत का भी हिल प्राण उठा।</p>\r\n<p>प्लावन का पा दुर्जय प्रहार,<br />जिस तरह काँपती है कगार,<br />या चक्रवात में यथा कीर्ण,<br />उड़ने लगते पत्ते विशीर्ण,<br />त्यों उठा काँप थर-थर अरिदल,<br />मच गयी बड़ी भीषण हलचल।</p>\r\n<p>सब रथी व्यग्र बिललाते थे,<br />कोलाहल रोक न पाते थे।<br />सेना का यों बेहाल देख,<br />सामने उपस्थित काल देख,<br />गरजे अधीर हो मधुसूदन,<br />बोले पार्थ से निगूढ़ वचन।</p>\r\n<p>\"दे अचिर सैन्य का अभयदान,<br />अर्जुन ! अर्जुन ! हो सावधान,<br />तू नहीं जानता है यह क्या ?<br />करता न शत्रु पर कर्ण दया ?<br />दाहक प्रचण्ड इसका बल है,<br />यह मनुज नहीं, कालानल है।</p>\r\n<p>\"बड़वानल, यम या कालपवन,<br />करते जब कभी कोप भीषण<br />सारा सर्वस्व न लेते हैं,<br />उच्छिष्ट छोड़ कुछ देते हैं।<br />पर, इसे क्रोध जब आता है;<br />कुछ भी न शेष रह पाता है।</p>\r\n<p>बाणों का अप्रतिहत प्रहार,<br />अप्रतिम तेज, पौरूष अपार,<br />त्यों गर्जन पर गर्जन निर्भय,<br />आ गया स्वयं सामने प्रलय,<br />तू इसे रोक भी पायेगा ?<br />या खड़ा मूक रह जायेगा।</p>\r\n<p>&lsquo;यह महामत्त मानव-कुञ्जर,<br />कैसे अशंक हो रहा विचर,<br />कर को जिस ओर बढ़ाता है?<br />पथ उधर स्वयं बन जाता है।<br />तू नहीं शरासन तानेगा,<br />अंकुश किसका यह मानेगा ?</p>\r\n<p>&lsquo;अर्जुन ! विलम्ब पातक होगा,<br />शैथिल्य प्राण-घातक होगा,<br />उठ जाग वीर ! मूढ़ता छोड़,<br />धर धनुष-बाण अपना कठोर।<br />तू नहीं जोश में आयेगा<br />आज ही समर चुक जायेगा।\"</p>\r\n<p>केशव का सिंह दहाड़ उठा,<br />मानों चिग्घार पहाड़ उठा।<br />बाणों की फिर लग गयी झड़ी,<br />भागती फौज हो गयी खड़ी।<br />जूझने लगे कौन्तेय-कर्ण,<br />ज्यों लड़े परस्पर दो सुपर्ण।</p>\r\n<p>एक ही वृम्त के को कुड्मल, एक की कुक्षि के दो कुमार,<br />एक ही वंश के दो भूषण, विभ्राट, वीर, पर्वताकार।<br />बेधने परस्पर लगे सहज-सोदर शरीर में प्रखर बाण,<br />दोनों की किंशुक देह हुई, दोनों के पावक हुए प्राण।</p>\r\n<p>अन्धड़ बन कर उन्माद उठा,<br />दोनों दिशि जयजयकार हुई।<br />दोनों पक्षों के वीरों पर,<br />मानो, भैरवी सवार हुई।<br />कट-कट कर गिरने लगे क्षिप्र,<br />रूण्डों से मुण्ड अलग होकर,<br />बह चली मनुज के शोणित की<br />धारा पशुओं के पग धोकर।</p>\r\n<p>लेकिन, था कौन, हृदय जिसका,<br />कुछ भी यह देख दहलता था ?<br />थो कौन, नरों की लाशों पर,<br />जो नहीं पाँव धर चलता था ?<br />तन्वी करूणा की झलक झीन<br />किसको दिखलायी पड़ती थी ?<br />किसको कटकर मरनेवालों की<br />चीख सुनायी पड़ती थी ?</p>\r\n<p>केवल अलात का घूर्णि-चक्र,<br />केवल वज्रायुध का प्रहार,<br />केवल विनाशकारी नत्र्तन,<br />केवल गर्जन, केवल पुकार।<br />है कथा, द्रोण की छाया में<br />यों पाँच दिनों तक युद्ध चला,<br />क्या कहें, धर्म पर कौन रहा,<br />या उसके कौन विरूद्ध चला ?</p>\r\n<p>था किया भीष्म पर पाण्डव ने,<br />जैसे छल-छद्मों से प्रहार,<br />कुछ उसी तरह निष्ठुरता से<br />हत हुआ वीर अर्जुन-कुमार !<br />फिर भी, भावुक कुरूवृद्ध भीष्म,<br />थे युग पक्षों के लिए शरण,<br />कहते हैं, होकर विकल,<br />मृत्यु का किया उन्होंने स्वयं वरण।</p>\r\n<p>अर्जुन-कुमार की कथा, किन्तु<br />अब तक भी हृदय हिलाती है,<br />सभ्यता नाम लेकर उसका<br />अब भी रोती, पछताती है।<br />पर, हाय, युद्ध अन्तक-स्वरूप,<br />अन्तक-सा ही दारूण कठोर,<br />देखता नहीं ज्यायान्-युवा,<br />देखता नहीं बालक-किशोर।</p>\r\n<p>सुत के वध की सुन कथा पार्थ का,<br />दहक उठा शोकात्र्त हृदय,<br />फिर किया क्रुद्ध होकर उसने,<br />तब महा लोम-हर्षक निश्चय,<br />&lsquo;कल अस्तकाल के पूर्व जयद्रथ<br />को न मार यदि पाऊँ मैं,<br />सौगन्ध धर्म की मुझे, आग में<br />स्वयं कूद जल जाऊँ मैं।&rsquo;</p>\r\n<p>तब कहते हैं अर्जुन के हित,<br />हो गया प्रकृति-क्रम विपर्यस्त,<br />माया की सहसा शाम हुई,<br />असमय दिनेश हो गये अस्त।<br />ज्यों त्यों करके इस भाँति वीर<br />अर्जुन का वह प्रण पूर्ण हुआ,<br />सिर कटा जयद्रथ का, मस्तक<br />निर्दोष पिता का चुर्ण हुआ।</p>\r\n<p>हाँ, यह भी हुआ कि सात्यकि से,<br />जब निपट रहा था भूरिश्रवा,<br />पार्थ ने काट ली, अनाहूत,<br />शर से उसकी दाहिनी भुजा।<br />औ&lsquo; भूरिश्रवा अनशन करके,<br />जब बैठ गया लेकर मुनि-व्रत,<br />सात्यकि ने मस्तक काट लिया,<br />जब था वह निश्चल, योग-निरत।</p>\r\n<p>है वृथा धर्म का किसी समय,<br />करना विग्रह के साथ ग्रथन,<br />करूणा से कढ़ता धर्म विमल,<br />है मलिन पुत्र हिंसा का रण।<br />जीवन के परम ध्येय-सुख-को<br />सारा समाज अपनाता है,<br />देखना यही है कौन वहाँ<br />तक किस प्रकार से जाता है ?</p>\r\n<p>है धर्म पहुँचना नहीं, धर्म तो<br />जीवन भर चलने में है।<br />फैला कर पथ पर स्निग्ध ज्योति<br />दीपक समान जलने में है।<br />यदि कहें विजय, तो विजय प्राप्त<br />हो जाती परतापी को भी,<br />सत्य ही, पुत्र, दारा, धन, जन;<br />मिल जाते है पापी को भी।</p>\r\n<p>इसलिए, ध्येय में नहीं, धर्म तो<br />सदा निहित, साधन में है,<br />वह नहीं सिकी भी प्रधन-कर्म,<br />हिंसा, विग्रह या रण में है।<br />तब भी जो नर चाहते, धर्म,<br />समझे मनुष्य संहारों को,<br />गूँथना चाहते वे, फूलों के<br />साथ तप्त अंगारों को।</p>\r\n<p>हो जिसे धर्म से प्रेम कभी<br />वह कुत्सित कर्म करेगा क्या ?<br />बर्बर, कराल, दंष्ट्री बन कर<br />मारेगा और मरेगा क्या ?<br />पर, हाय, मनुज के भाग्य अभी<br />तक भी खोटे के खोटे हैं,<br />हम बढ़े बहुत बाहर, भीतर<br />लेकिन, छोटे के छोटे हैं।</p>\r\n<p>संग्राम धर्मगुण का विशेष्य<br />किस तरह भला हो सकता है ?<br />कैसे मनुष्य अंगारों से<br />अपना प्रदाह धो सकता है ?<br />सर्पिणी-उदर से जो निकला,<br />पीयूष नहीं दे पायेगा,<br />निश्छल होकर संग्राम धर्म का<br />साथ न कभी निभायेगा।</p>\r\n<p>मानेगा यह दंष्ट्री कराल<br />विषधर भुजंग किसका यन्त्रण ?<br />पल-पल अति को कर धर्मसिक्त<br />नर कभी जीत पाया है रण ?<br />जो ज़हर हमें बरबस उभार,<br />संग्राम-भूमि में लाता है,<br />सत्पथ से कर विचलित अधर्म<br />की ओर वही ले जाता है।</p>\r\n<p>साधना को भूल सिद्धि पर जब<br />टकटकी हमारी लगती है,<br />फिर विजय छोड़ भावना और<br />कोई न हृदय में जगती है।<br />तब जो भी आते विघ्न रूप,<br />हो धर्म, शील या सदाचार,<br />एक ही सदृश हम करते हैं<br />सबके सिर पर पाद-प्रहार।</p>\r\n<p>उतनी ही पीड़ा हमें नहीं,<br />होती है इन्हें कुचलने में,<br />जितनी होती है रोज़ कंकड़ो<br />के ऊपर हो चलने में।<br />सत्य ही, ऊध्र्व-लोचन कैसे<br />नीचे मिट्टी का ज्ञान करे ?<br />जब बड़ा लक्ष्य हो खींच रहा,<br />छोटी बातों का ध्यान करे ?</p>\r\n<p>चलता हो अन्ध ऊध्र्व-लोचन,<br />जानता नहीं, क्या करता है,<br />नीच पथ में है कौन ? पाँव<br />जिसके मस्तक पर धरता है।<br />काटता शत्रु को वह लेकिन,<br />साथ ही धर्म कट जाता है,<br />फाड़ता विपक्षी को अन्तर<br />मानवता का फट जाता है।</p>\r\n<p>वासना-वह्नि से जो निकला,<br />कैसे हो वह संयुग कोमल ?<br />देखने हमें देगा वह क्यों,<br />करूणा का पन्थ सुगम शीतल ?<br />जब लोभ सिद्धि का आँखों पर,<br />माँड़ी बन कर छा जाता है<br />तब वह मनुष्य से बड़े-बड़े<br />दुश्चिन्त्य कृत्य करवाता है।</p>\r\n<p>फिर क्या विस्मय, कौरव-पाण्डव<br />भी नहीं धर्म के साथ रहे ?<br />जो रंग युद्ध का है, उससे,<br />उनके भी अलग न हाथ रहे।<br />दोनों ने कालिख छुई शीश पर,<br />जय का तिलक लगाने को,<br />सत्पथ से दोनों डिगे, दौड़कर,<br />विजय-विन्दु तक जाने को।</p>\r\n<p>इस विजय-द्वन्द्व के बीच युद्ध के<br />दाहक कई दिवस बीते;<br />पर, विजय किसे मिल सकती थी,<br />जब तक थे द्रोण-कर्ण जीते ?<br />था कौन सत्य-पथ पर डटकर,<br />जो उनसे योग्य समर करता ?<br />धर्म से मार कर उन्हें जगत् में,<br />अपना नाम अमर करता ?</p>\r\n<p>था कौन, देखकर उन्हें समर में<br />जिसका हृदय न कँपता था ?<br />मन ही मन जो निज इष्ट देव का<br />भय से नाम न जपता था ?<br />कमलों के वन को जिस प्रकार<br />विदलित करते मदकल कुज्जर,<br />थे विचर रहे पाण्डव-दल में<br />त्यों मचा ध्वंस दोनों नरवर।</p>\r\n<p>संग्राम-बुभुक्षा से पीडि़त,<br />सारे जीवन से छला हुआ,<br />राधेय पाण्डवों के ऊपर<br />दारूण अमर्ष से जला हुआ;<br />इस तरह शत्रुदल पर टूटा,<br />जैसे हो दावानल अजेय,<br />या टूट पड़े हों स्वयं स्वर्ग से<br />उतर मनुज पर कात्र्तिकेय।</p>\r\n<p>संघटित या कि उनचास मरूत<br />कर्ण के प्राण में छाये हों,<br />या कुपित सूय आकाश छोड़<br />नीचे भूतल पर आये हों।<br />अथवा रण में हो गरज रहा<br />धनु लिये अचल प्रालेयवान,<br />या महाकाल बन टूटा हो<br />भू पर ऊपर से गरूत्मान।</p>\r\n<p>बाणों पर बाण सपक्ष उड़े,<br />हो गया शत्रुदल खण्ड-खण्ड,<br />जल उठी कर्ण के पौरूष की<br />कालानल-सी ज्वाला प्रचण्ड।<br />दिग्गज-दराज वीरों की भी<br />छाती प्रहार से उठी हहर,<br />सामने प्रलय को देख गये<br />गजराजों के भी पाँव उखड़।</p>\r\n<p>जन-जन के जीवन पर कराल,<br />दुर्मद कृतान्त जब कर्ण हुआ,<br />पाण्डव-सेना का हृास देख<br />केशव का वदन विवर्ण हुआ।<br />सोचने लगे, छूटेंगे क्या<br />सबके विपन्न आज ही प्राण ?<br />सत्य ही, नहीं क्या है कोई<br />इस कुपित प्रलय का समाधान ?</p>\r\n<p>\"है कहाँ पार्थ ? है कहाँ पार्थ ?\"<br />राधेय गरजता था क्षण-क्षण।<br />\"करता क्यों नही प्रकट होकर,<br />अपने कराल प्रतिभट से रण ?<br />क्या इन्हीं मूलियों से मेरी<br />रणकला निबट रह जायेगी ?<br />या किसी वीर पर भी अपना,<br />वह चमत्कार दिखलायेगी ?</p>\r\n<p>\"हो छिपा जहाँ भी पार्थ, सुने,<br />अब हाथ समेटे लेता हूँ,<br />सबके समक्ष द्वैरथ-रण की,<br />मैं उसे चुनौती देता हूँ।<br />हिम्मत हो तो वह बढ़े,<br />व्यूह से निकल जरा सम्मुख आये,<br />दे मुझे जन्म का लाभ और<br />साहस हो तो खुद भी पाये।\"</p>\r\n<p>पर, चतुर पार्थ-सारथी आज,<br />रथ अलग नचाये फिरते थे,<br />कर्ण के साथ द्वैरथ-रण से,<br />शिष्य को बचाये फिरते थे।<br />चिन्ता थी, एकघ्नी कराल,<br />यदि द्विरथ-युद्ध में छूटेगी,<br />पार्थ का निधन होगा, किस्मत,<br />पाण्डव-समाज की फूटेगी।</p>\r\n<p>नटनागर ने इसलिए, युक्ति का<br />नया योग सन्धान किया,<br />एकघ्नि-हव्य के लिए घटोत्कच<br />का हरि ने आह्वान किया।<br />बोले, \"बेटा ! क्या देख रहा ?<br />हाथ से विजय जाने पर है,<br />अब सबका भाग्य एक तेरे<br />कुछ करतब दिखलाने पर है।</p>\r\n<p>\"यह देख, कर्ण की विशिख-वृष्टि<br />कैस कराल झड़ लाती है ?<br />गो के समान पाण्डव-सेना<br />भय-विकल भागती जाती है।<br />तिल पर भी भूिम न कहीं खड़े<br />हों जहाँ लोग सुस्थिर क्षण-भर,<br />सारी रण-भू पर बरस रहे<br />एक ही कर्ण के बाण प्रखर।</p>\r\n<p>\"यदि इसी भाँति सब लोग<br />मृत्यु के घाट उतरते जायेंगे,<br />कल प्रात कौन सेना लेकर<br />पाण्डव संगर में आयेंगे ?<br />है विपद् की घड़ी,<br />कर्ण का निर्भय, गाढ़, प्रहार रोक।<br />बेटा ! जैसे भी बने, पाण्डवी<br />सेना का संहार रोक।\"</p>\r\n<p>फूटे ज्यों वह्निमुखी पर्वत,<br />ज्यों उठे सिन्धु में प्रलय-ज्वार,<br />कूदा रण में त्यों महाघोर<br />गर्जन कर दानव किमाकार।<br />सत्य ही, असुर के आते ही<br />रण का वह क्रम टूटने लगा,<br />कौरवी अनी भयभीत हुई;<br />धीरज उसका छूटने लगा।</p>\r\n<p>है कथा, दानवों के कर में<br />थे बहुत-बहुत साधन कठोर,<br />कुछ ऐसे भी, जिनपर, मनुष्य का<br />चल पाता था नहीं जोर।<br />उन अगम साधनों के मारे<br />कौरव सेना चिग्घार उठी,<br />ले नाम कर्ण का बार-बार,<br />व्याकुल कर हाहाकार उठी।</p>\r\n<p>लेकिन, अजस्त्र-शर-वृष्टि-निरत,<br />अनवरत-युद्ध-रत, धीर कर्ण,<br />मन-ही-मन था हो रहा स्वयं,<br />इस रण से कुछ विस्मित, विवर्ण।<br />बाणों से तिल-भर भी अबिद्ध,<br />था कहीं नहीं दानव का तन;<br />पर, हुआ जा रहा था वह पशु,<br />पल-पल कुछ और अधिक भीषण।</p>\r\n<p>जब किसी तरह भी नहीं रूद्ध,<br />हो सकी महादानव की गति,<br />सारी सेना को विकल देख,<br />बोला कर्ण से स्वयं कुरूपति,<br />\"क्या देख रहे हो सखे ! दस्यु<br />ऐसे क्या कभी मरेगा यह ?<br />दो घड़ी और जो देर हुई,<br />सबका संहार करेगा यह।</p>\r\n<p>\"हे वीर ! विलपते हुए सैन्य का,<br />अचिर किसी विधि त्राण करो।<br />अब नहीं अन्य गति; आँख मूँद,<br />एकघ्नी का सन्धान करो।<br />अरि का मस्तक है दूर, अभी<br />अपनों के शीश बचाओ तो,<br />जो मरण-पाश है पड़ा, प्रथम,<br />उसमें से हमें छुड़ाओ तो।\"</p>\r\n<p>सुन सहम उठा राधेय, मित्र की<br />ओर फेर निज चकित नयन,<br />झुक गया विवशता में कुरूपति का<br />अपराधी, कातर आनन।<br />मन-ही-मन बोला कर्ण, \"पार्थ !<br />तू वय का बड़ा बली निकला,<br />या यह कि आज फिर एक बार,<br />मेरा ही भाग्य छली निकला।\"</p>\r\n<p>रहता आया था मुदित कर्ण<br />जिसका अजेय सम्बल लेकर,<br />था किया प्राप्त जिसको उसने,<br />इन्द्र को कवच-कुण्डल देकर,<br />जिसकी करालता में जय का,<br />विश्वास अभय हो पलता था,<br />केवल अर्जुन के लिए उसे,<br />राधेय जुगाये चलता था।</p>\r\n<p>वह काल-सर्पिणी की जिह्वा,<br />वह अटल मृत्यु की सगी स्वसा,<br />घातकता की वाहिनी, शक्ति<br />यम की प्रचण्ड, वह अनल-रसा,<br />लपलपा आग-सी एकघ्नी<br />तूणीर छोड़ बाहर आयी,<br />चाँदनी मन्द पड़ गयी, समर में<br />दाहक उज्जवलता छायी।</p>\r\n<p>कर्ण ने भाग्य को ठोंक उसे,<br />आखिर दानव पर छोड़ दिया,<br />विह्ल हो कुरूपति को विलोक,<br />फिर किसी ओर मुख मोड़ लिया।<br />उस असुर-प्राण को बेध, दृष्टि<br />सबकी क्षर भर त्रासित करके,<br />एकघ्नी ऊपर लीन हुई,<br />अम्बर को उद्धभासित करके।</p>\r\n<p>पा धमक, धरा धँस उछल पड़ी,<br />ज्यों गिरा दस्यु पर्वताकार,<br />\"हा ! हा !\" की चारों ओर मची,<br />पाण्डव दल में व्याकुल पुकार।<br />नरवीर युधिष्ठिर, नकुल, भीम<br />रह सके कहीं कोई न धीर,<br />जो जहाँ खड़े थे, लगे वहीं<br />करने कातर क्रन्दन गंभीर।</p>\r\n<p>सारी सेना थी चीख रही,<br />सब लोग व्यग्र बिलखाते थे;<br />पर बड़ी विलक्षण बात !<br />हँसी नटनागर रोक न पाते थे।<br />टल गयी विपद् कोई सिर से,<br />या मिली कहीं मन-ही-मन जय,<br />क्या हुई बात ? क्या देख हुए<br />केशव इस तरह विगत-संशय ?</p>\r\n<p>लेकिन समर को जीत कर,<br />निज वाहिनी को प्रीत कर,<br />वलयित गहन गुन्जार से,<br />पूजित परम जयकार से,<br />राधेग संगर से चला, मन में कहीं खोया हुआ,<br />जय-घोष की झंकार से आगे कहीं सोया हुआ</p>\r\n<p>हारी हुई पाण्डव-चमू में हँस रहे भगवान् थे,<br />पर जीत कर भी कर्ण के हारे हुए-से प्राण थे<br />क्या, सत्य ही, जय के लिए केवल नहीं बल चाहिए<br />कुछ बुद्धि का भी घात; कुछ छल-छद्म-कौशल चाहिए</p>\r\n<p>क्या भाग्य का आघात है ;!<br />कैसी अनोखी बात है ;?<br />मोती छिपे आते किसी के आँसुओं के तार में,<br />हँसता कहीं अभिशाप ही आनन्द के उच्चार में।</p>\r\n<p>मगर, यह कर्ण की जीवन-कथा है,<br />नियति का, भाग्य का इंगित वृथा है।<br />मुसीबत को नहीं जो झेल सकता,<br />निराशा से नहीं जो खेल सकता,<br />पुरूष क्या, श्रृंखला को तोड़ करके,<br />चले आगे नहीं जो जोर करके ?</p>\r\n<p>&nbsp;</p>","raw_content":"नरता कहते हैं जिसे, सत्तव क्या वह केवल लड़ने में है ? पौरूष क्या केवल उठा खड्ग मारने और मरने में है ? तब उस गुण को क्या कहें मनुज जिससे न मृत्यु से डरता है ? लेकिन, तक भी मारता नहीं, वह स्वंय विश्व-हित मरता है।   है वन्दनीय नर कौन ? विजय-हित जो करता है प्राण हरण ? या सबकी जान बचाने को देता है जो अपना जीवन ? चुनता आया जय-कमल आज तक विजयी सदा कृपाणों से, पर, आह निकलती ही आयी हर बार मनुज के प्राणों से।   आकुल अन्तर की आह मनुज की इस चिन्ता से भरी हुई, इस तरह रहेगी मानवता कब तक मनुष्य से डरी हुई ? पाशविक वेग की लहर लहू में कब तक धूम मचायेगी ? कब तक मनुष्यता पशुता के आगे यों झुकती जायेगी ?   यह ज़हर ने छोड़ेगा उभार ? अंगार न क्या बूझ पायेंगे ? हम इसी तरह क्या हाय, सदा पशु के पशु ही रह जायेंगे ? किसका सिंगार ? किसकी सेवा ? नर का ही जब कल्याण नहीं ? किसके विकास की कथा ? जनों के ही रक्षित जब प्राण नहीं ?   इस विस्मय का क्या समाधान ? रह-रह कर यह क्या होता है ? जो है अग्रणी वही सबसे आगे बढ़ धीरज खोता है। फिर उसकी क्रोधाकुल पुकार सबको बेचैन बनाती है, नीचे कर क्षीण मनुजता को ऊपर पशुत्व को लाती है।   हाँ, नर के मन का सुधाकुण्ड लघु है, अब भी कुछ रीता है, वय अधिक आज तक व्यालों के पालन-पोषण में बीता है। ये व्याल नहीं चाहते, मनुज भीतर का सुधाकुण्ड खोले, जब ज़हर सभी के मुख में हो तब वह मीठी बोली बोले।   थोड़ी-सी भी यह सुधा मनुज का मन शीतल कर सकती है, बाहर की अगर नहीं, पीड़ा भीतर की तो हर सकती है। लेकिन धीरता किसे ? अपने सच्चे स्वरूप का ध्यान करे, जब ज़हर वायु में उड़ता हो पीयूष-विन्दू का पान करे।   पाण्डव यदि पाँच ग्राम लेकर सुख से रह सकते थे, तो विश्व-शान्ति के लिए दुःख कुछ और न क्या कह सकते थे ? सुन कुटिल वचन दुर्योधन का केशव न क्यों यह का नहीं- \"हम तो आये थे शान्ति हेतु, पर, तुम चाहो जो, वही सही।   \"तुम भड़काना चाहते अनल धरती का भाग जलाने को, नरता के नव्य प्रसूनों को चुन-चुन कर क्षार बनाने को। पर, शान्ति-सुन्दरी के सुहाग पर आग नहीं धरने दूँगा, जब तक जीवित हूँ, तुम्हें बान्धवों से न युद्ध करने दूँगा।   \"लो सुखी रहो, सारे पाण्डव फिर एक बार वन जायेंगे, इस बार, माँगने को अपना वे स्वत्तव न वापस आयेंगे। धरती की शान्ति बचाने को आजीवन कष्ट सहेंगे वे, नूतन प्रकाश फैलाने को तप में मिल निरत रहेंगे वे।   शत लक्ष मानवों के सम्मुख दस-पाँच जनों का सुख क्या है ? यदि शान्ति विश्व की बचती हो, वन में बसने में दुख क्या है ? सच है कि पाण्डूनन्दन वन में सम्राट् नहीं कहलायेंगे, पर, काल-ग्रन्थ में उससे भी वे कहीं श्रेष्ठ पद पायेंगे।   \"होकर कृतज्ञ आनेवाला युग मस्तक उन्हें झुकायेगा, नवधर्म-विधायक की प्रशस्ति संसार युगों तक गायेगा। सीखेगा जग, हम दलन युद्ध का कर सकते, त्यागी होकर, मानव-समाज का नयन मनुज कर सकता वैरागी होकर।\"   पर, नहीं, विश्व का अहित नहीं होता क्या ऐसा कहने से ? प्रतिकार अनय का हो सकता। क्या उसे मौन हो सहने से ? क्या वही धर्म, लौ जिसकी दो-एक मनों में जलती है। या वह भी जो भावना सभी के भीतर छिपी मचलती है।   सबकी पीड़ा के साथ व्यथा अपने मन की जो जोड़ सके, मुड़ सके जहाँ तक समय, उसे निर्दिष्ट दिशा में मोड़ सके। युगपुरूष वही सारे समाज का विहित धर्मगुरू होता है, सबके मन का जो अन्धकार अपने प्रकाश से धोता है।   द्वापर की कथा बड़ी दारूण, लेकिन, कलि ने क्या दान दिया ? नर के वध की प्रक्रिया बढ़ी कुछ और उसे आसान किया। पर, हाँ, जो युद्ध स्वर्गमुख था, वह आज निन्द्य-सा लगता है। बस, इसी मन्दता के विकास का भाव मनुज में जगता है।   धीमी कितनी गति है ? विकास कितना अदृश्य हो चलता है ? इस महावृक्ष में एक पत्र सदियों के बाद निकलता है। थे जहाँ सहस्त्रों वर्ष पूर्व, लगता है वहीं खड़े हैं हम। है वृथा वर्ग, उन गुफावासियों से कुछ बहुत बड़े हैं हम।   अनगढ़ पत्थर से लड़ो, लड़ो किटकिटा नखों से, दाँतों से, या लड़ो ऋक्ष के रोमगुच्छ-पूरित वज्रीकृत हाथों से; या चढ़ विमान पर नर्म मुट्ठियों से गोलों की वृष्टि करो, आ जाय लक्ष्य में जो कोई, निष्ठुर हो सबके प्राण हरो।   ये तो साधन के भेद, किन्तु भावों में तत्व नया क्या है ? क्या खुली प्रेम आँख अधिक ? भतीर कुछ बढ़ी दया क्या है ? झर गयी पूँछ, रोमान्त झरे, पशुता का झरना बाकी है; बाहर-बाहर तन सँवर चुका, मन अभी सँवरना बाकी है।   देवत्व अल्प, पशुता अथोर, तमतोम प्रचुर, परिमित आभा, द्वापर के मन पर भी प्रसरित थी यही, आज वाली, द्वाभा। बस, इसी तरह, तब भी ऊपर उठने को नर अकुलाता था, पर पद-पद पर वासना-जाल में उलझ-उलझ रह जाता था।   औ’ जिस प्रकार हम आज बेल- बूटों के बीच खचित करके, देते हैं रण को रम्य रूप विप्लवी उमंगों में भरके; कहते, अनीतियों के विरूद्ध जो युद्ध जगत में होता है, वह नहीं ज़हर का कोष, अमृत का बड़ा सलोना सोता है।   बस, इसी तरह, कहता होगा द्वाभा-शासित द्वापर का नर, निष्ठुरताएँ हों भले, किन्तु, है महामोक्ष का द्वार समर। सत्य ही, समुन्नति के पथ पर चल रहा चतुर मानव प्रबुद्ध, कहता है क्रान्ति उसे, जिसको पहले कहता था धर्मयुद्ध।   सो, धर्मयुद्ध छिड़ गया, स्वर्ग तक जाने के सोपान लगे, सद्गतिकामी नर-वीर खड्ग से लिपट गँवाने प्राण लगे। छा गया तिमिर का सघन जाल, मुँद गये मनुज के ज्ञान-नेत्र, द्वाभा की गिरा पुकार उठी, \"जय धर्मक्षेत्र ! जय कुरूक्षेत्र !\"   हाँ, धर्मक्षेत्र इसलिए कि बन्धन पर अबन्ध की जीत हुई, कत्र्तव्यज्ञान पीछे छूटा, आगे मानव की प्रीत हुई। प्रेमातिरेक में केशव ने प्रण भूल चक्र सन्धान किया, भीष्म ने शत्रु को बड़े प्रेम से अपना जीवन दान दिया।   2 गिरि का उदग्र गौरवाधार गिर जाय श्रृंग ज्यों महाकार, अथवा सूना कर आसमान ज्यों गिरे टूट रवि भासमान, कौरव-दल का कर तेज हरण त्यों गिरे भीष्म आलोकवरण।   कुरूकुल का दीपित ताज गिरा, थक कर बूढ़ा जब बाज़ गिरा, भूलूठित पितामह को विलोक, छा गया समर में महाशोक। कुरूपति ही धैर्य न खोता था, अर्जुन का मन भी रोता था।   रो-धो कर तेज नया चमका, दूसरा सूर्य सिर पर चमका, कौरवी तेज दुर्जेय उठा, रण करने को राधेय उठा, सबके रक्षक गुरू आर्य हुए, सेना-नायक आचार्य हुए।   राधेय, किन्तु जिनके कारण, था अब तक किये मौन धारण, उनका शुभ आशिष पाने को, अपना सद्धर्म निभाने को, वह शर-शय्या की ओर चला, पग-पग हो विनय-विभोर चला।   छू भीष्मदेव के चरण युगल, बोला वाणी राधेय सरल, \"हे तात ! आपका प्रोत्साहन, पा सका नहीं जो लान्छित जन, यह वही सामने आया है, उपहार अश्रु का लाया है।   \"आज्ञा हो तो अब धनुष धरूँ, रण में चलकर कुछ काम करूँ, देखूँ, है कौन प्रलय उतरा, जिससे डगमग हो रही धरा। कुरूपति को विजय दिलाऊँ मैं, या स्वयं विरगति पाऊँ मैं।   \"अनुचर के दोष क्षमा करिये, मस्तक पर वरद पाणि धरिये, आखिरी मिलन की वेला है, मन लगता बड़ा अकेला है। मद-मोह त्यागने आया हूँ, पद-धूलि माँगने आया हूँ।\"   भीष्म ने खोल निज सजल नयन, देखे कर्ण के आर्द्र लोचन बढ़ खींच पास में ला करके, छाती से उसे लगा करके, बोले-\"क्या तत्व विशेष बचा ? बेटा, आँसू ही शेष बचा।   \"मैं रहा रोकता ही क्षण-क्षण, पर हाय, हठी यह दुर्योधन, अंकुश विवेक का सह न सका, मेरे कहने में रह न सका, क्रोधान्ध, भ्रान्त, मद में विभोर, ले ही आया संग्राम घोर।   \"अब कहो, आज क्या होता है ? किसका समाज यह रोता है ? किसका गौरव, किसका सिंगार, जल रहा पंक्ति के आर-पार ? किसका वन-बाग़ उजड़ता है? यह कौन मारता-मरता है ?   \"फूटता द्रोह-दव का पावक, हो जाता सकल समाज नरक, सबका वैभव, सबका सुहाग, जाती डकार यह कुटिल आग। जब बन्धु विरोधी होते हैं, सारे कुलवासी रोते हैं।   \"इसलिए, पुत्र ! अब भी रूककर, मन में सोचो, यह महासमर, किस ओर तुम्हें ले जायेगा ? फल अलभ कौन दे पायेगा ? मानवता ही मिट जायेगी, फिर विजय सिद्धि क्या लायेगी ?   \"ओ मेरे प्रतिद्वन्दी मानी ! निश्छल, पवित्र, गुणमय, ज्ञानी ! मेरे मुख से सुन परूष वचन, तुम वृथा मलिन करते थे मन। मैं नहीं निरा अवशंसी था, मन-ही-मन बड़ा प्रशंसी था।   \"सो भी इसलिए कि दुर्योधन, पा सदा तुम्हीं से आश्वासन, मुझको न मानकर चलता था, पग-पग पर रूठ मचलता था। अन्यथा पुत्र ! तुमसे बढ़कर मैं किसे मानता वीर प्रवर ?   \"पार्थोपम रथी, धनुर्धारी, केशव-समान रणभट भारी, धर्मज्ञ, धीर, पावन-चरित्र, दीनों-दलितों के विहित मित्र, अर्जुन को मिले कृष्ण जैसे, तुम मिले कौरवों को वैसे।   \"पर हाय, वीरता का सम्बल, रह जायेगा धनु ही केवल ? या शान्ति हेतु शीतल, शुचि श्रम, भी कभी करेंगे वीर परम ? ज्वाला भी कभी बुझायेंगे ? या लड़कर ही मर जायेंगे ?   \"चल सके सुयोधन पर यदि वश, बेटा ! लो जग में नया सुयश, लड़ने से बढ़ यह काम करो, आज ही बन्द संग्राम करो। यदि इसे रोक तुम पाओगे, जग के त्राता कहलाओगे।   \"जा कहो वीर दुर्योधन से, कर दूर द्वेष-विष को मन से, वह मिल पाण्डवों से जाकर, मरने दे मुझे शान्ति पाकर। मेरा अन्तिम बलिदान रहे, सुख से सारी सन्तान रहे।\"   \"हे पुरूष सिंह !\" कर्ण ने कहा, \"अब और पन्थ क्या शेष रहा ? सकंटापन्न जीवन समान, है बीच सिन्धु में महायान; इस पार शान्ति, उस पार विजय अब क्या हो भला नया निश्चय ?   \"जय मिले बिना विश्राम नहीं, इस समय सन्धि का नाम नहीं, आशिष दीजिये, विजय कर रण, फिर देख सकूँ ये भव्य चरण; जलयान सिन्धु से तार सकूँ; सबको मैं पार उतार सकूँ।   \"कल तक था पथ शान्ति का सुगम, पर, हुआ आज वह अति दुर्गम, अब उसे देख ललचाना क्या ? पीछे को पाँव हठाना क्या ? जय को कर लक्ष्य चलेंगे हम, अरि-दल को गर्व दलेंगे हम।   \"हे महाभाग, कुछ दिन जीकर, देखिये और यह महासमर, मुझको भी प्रलय मचाना है, कुछ खेल नया दिखलाना है; इस दम तो मुख मोडि़ये नहीं; मेरी हिम्मत तोडि़ये नहीं।   करने दीजिये स्वव्रत पालन, अपने महान् प्रतिभट से रण, अर्जुन का शीश उड़ाना है, कुरूपति का हृदय जुड़ाना है। करने को पिता अमर मुझको, है बुला रहा संगर मुझको।\"   गांगेय निराशा में भर कर, बोले-\"तब हे नरवीर प्रवर ! जो भला लगे, वह काम करो, जाओ, रण में लड़ नाम करो। भगवान्् शमित विष तूर्ण करें; अपनी इच्छाएँ पूर्ण करें।\"   भीष्म का चरण-वन्दन करके, ऊपर सूर्य को नमन करके, देवता वज्र-धनुधारी सा, केसरी अभय मगचारी-सा, राधेय समर की ओर चला, करता गर्जन घनघोर चला।   पाकर प्रसन्न आलोक नया, कौरव-सेना का शोक गया, आशा की नवल तरंग उठी, जन-जन में नयी उमंग उठी, मानों, बाणों का छोड़ शयन, आ गये स्वयं गंगानन्दन।   सेना समग्र हुकांर उठी, ‘जय-जय राधेय !’ पुकार उठी, उल्लास मुक्त हो छहर उठा, रण-जलधि घोष में घहर उठा, बज उठी समर-भेरी भीषण, हो गया शुरू संग्राम गहन।   सागर-सा गर्जित, क्षुभित घोर, विकराल दण्डधर-सा कठोर, अरिदल पर कुपित कर्ण टूटा, धनु पर चढ़ महामरण छूटा। ऐसी पहली ही आग चली, पाण्डव की सेना भाग चली।   झंझा की घोर झकोर चली, डालों को तोड़-मरोड़ चली, पेड़ों की जड़ टूटने लगी, हिम्मत सब की छूटने लगी, ऐसा प्रचण्ड तूफान उठा, पर्वत का भी हिल प्राण उठा।   प्लावन का पा दुर्जय प्रहार, जिस तरह काँपती है कगार, या चक्रवात में यथा कीर्ण, उड़ने लगते पत्ते विशीर्ण, त्यों उठा काँप थर-थर अरिदल, मच गयी बड़ी भीषण हलचल।   सब रथी व्यग्र बिललाते थे, कोलाहल रोक न पाते थे। सेना का यों बेहाल देख, सामने उपस्थित काल देख, गरजे अधीर हो मधुसूदन, बोले पार्थ से निगूढ़ वचन।   \"दे अचिर सैन्य का अभयदान, अर्जुन ! अर्जुन ! हो सावधान, तू नहीं जानता है यह क्या ? करता न शत्रु पर कर्ण दया ? दाहक प्रचण्ड इसका बल है, यह मनुज नहीं, कालानल है।   \"बड़वानल, यम या कालपवन, करते जब कभी कोप भीषण सारा सर्वस्व न लेते हैं, उच्छिष्ट छोड़ कुछ देते हैं। पर, इसे क्रोध जब आता है; कुछ भी न शेष रह पाता है।   बाणों का अप्रतिहत प्रहार, अप्रतिम तेज, पौरूष अपार, त्यों गर्जन पर गर्जन निर्भय, आ गया स्वयं सामने प्रलय, तू इसे रोक भी पायेगा ? या खड़ा मूक रह जायेगा।   ‘यह महामत्त मानव-कुञ्जर, कैसे अशंक हो रहा विचर, कर को जिस ओर बढ़ाता है? पथ उधर स्वयं बन जाता है। तू नहीं शरासन तानेगा, अंकुश किसका यह मानेगा ?   ‘अर्जुन ! विलम्ब पातक होगा, शैथिल्य प्राण-घातक होगा, उठ जाग वीर ! मूढ़ता छोड़, धर धनुष-बाण अपना कठोर। तू नहीं जोश में आयेगा आज ही समर चुक जायेगा।\"   केशव का सिंह दहाड़ उठा, मानों चिग्घार पहाड़ उठा। बाणों की फिर लग गयी झड़ी, भागती फौज हो गयी खड़ी। जूझने लगे कौन्तेय-कर्ण, ज्यों लड़े परस्पर दो सुपर्ण।   एक ही वृम्त के को कुड्मल, एक की कुक्षि के दो कुमार, एक ही वंश के दो भूषण, विभ्राट, वीर, पर्वताकार। बेधने परस्पर लगे सहज-सोदर शरीर में प्रखर बाण, दोनों की किंशुक देह हुई, दोनों के पावक हुए प्राण।   अन्धड़ बन कर उन्माद उठा, दोनों दिशि जयजयकार हुई। दोनों पक्षों के वीरों पर, मानो, भैरवी सवार हुई। कट-कट कर गिरने लगे क्षिप्र, रूण्डों से मुण्ड अलग होकर, बह चली मनुज के शोणित की धारा पशुओं के पग धोकर।   लेकिन, था कौन, हृदय जिसका, कुछ भी यह देख दहलता था ? थो कौन, नरों की लाशों पर, जो नहीं पाँव धर चलता था ? तन्वी करूणा की झलक झीन किसको दिखलायी पड़ती थी ? किसको कटकर मरनेवालों की चीख सुनायी पड़ती थी ?   केवल अलात का घूर्णि-चक्र, केवल वज्रायुध का प्रहार, केवल विनाशकारी नत्र्तन, केवल गर्जन, केवल पुकार। है कथा, द्रोण की छाया में यों पाँच दिनों तक युद्ध चला, क्या कहें, धर्म पर कौन रहा, या उसके कौन विरूद्ध चला ?   था किया भीष्म पर पाण्डव ने, जैसे छल-छद्मों से प्रहार, कुछ उसी तरह निष्ठुरता से हत हुआ वीर अर्जुन-कुमार ! फिर भी, भावुक कुरूवृद्ध भीष्म, थे युग पक्षों के लिए शरण, कहते हैं, होकर विकल, मृत्यु का किया उन्होंने स्वयं वरण।   अर्जुन-कुमार की कथा, किन्तु अब तक भी हृदय हिलाती है, सभ्यता नाम लेकर उसका अब भी रोती, पछताती है। पर, हाय, युद्ध अन्तक-स्वरूप, अन्तक-सा ही दारूण कठोर, देखता नहीं ज्यायान्-युवा, देखता नहीं बालक-किशोर।   सुत के वध की सुन कथा पार्थ का, दहक उठा शोकात्र्त हृदय, फिर किया क्रुद्ध होकर उसने, तब महा लोम-हर्षक निश्चय, ‘कल अस्तकाल के पूर्व जयद्रथ को न मार यदि पाऊँ मैं, सौगन्ध धर्म की मुझे, आग में स्वयं कूद जल जाऊँ मैं।’   तब कहते हैं अर्जुन के हित, हो गया प्रकृति-क्रम विपर्यस्त, माया की सहसा शाम हुई, असमय दिनेश हो गये अस्त। ज्यों त्यों करके इस भाँति वीर अर्जुन का वह प्रण पूर्ण हुआ, सिर कटा जयद्रथ का, मस्तक निर्दोष पिता का चुर्ण हुआ।   हाँ, यह भी हुआ कि सात्यकि से, जब निपट रहा था भूरिश्रवा, पार्थ ने काट ली, अनाहूत, शर से उसकी दाहिनी भुजा। औ‘ भूरिश्रवा अनशन करके, जब बैठ गया लेकर मुनि-व्रत, सात्यकि ने मस्तक काट लिया, जब था वह निश्चल, योग-निरत।   है वृथा धर्म का किसी समय, करना विग्रह के साथ ग्रथन, करूणा से कढ़ता धर्म विमल, है मलिन पुत्र हिंसा का रण। जीवन के परम ध्येय-सुख-को सारा समाज अपनाता है, देखना यही है कौन वहाँ तक किस प्रकार से जाता है ?   है धर्म पहुँचना नहीं, धर्म तो जीवन भर चलने में है। फैला कर पथ पर स्निग्ध ज्योति दीपक समान जलने में है। यदि कहें विजय, तो विजय प्राप्त हो जाती परतापी को भी, सत्य ही, पुत्र, दारा, धन, जन; मिल जाते है पापी को भी।   इसलिए, ध्येय में नहीं, धर्म तो सदा निहित, साधन में है, वह नहीं सिकी भी प्रधन-कर्म, हिंसा, विग्रह या रण में है। तब भी जो नर चाहते, धर्म, समझे मनुष्य संहारों को, गूँथना चाहते वे, फूलों के साथ तप्त अंगारों को।   हो जिसे धर्म से प्रेम कभी वह कुत्सित कर्म करेगा क्या ? बर्बर, कराल, दंष्ट्री बन कर मारेगा और मरेगा क्या ? पर, हाय, मनुज के भाग्य अभी तक भी खोटे के खोटे हैं, हम बढ़े बहुत बाहर, भीतर लेकिन, छोटे के छोटे हैं।   संग्राम धर्मगुण का विशेष्य किस तरह भला हो सकता है ? कैसे मनुष्य अंगारों से अपना प्रदाह धो सकता है ? सर्पिणी-उदर से जो निकला, पीयूष नहीं दे पायेगा, निश्छल होकर संग्राम धर्म का साथ न कभी निभायेगा।   मानेगा यह दंष्ट्री कराल विषधर भुजंग किसका यन्त्रण ? पल-पल अति को कर धर्मसिक्त नर कभी जीत पाया है रण ? जो ज़हर हमें बरबस उभार, संग्राम-भूमि में लाता है, सत्पथ से कर विचलित अधर्म की ओर वही ले जाता है।   साधना को भूल सिद्धि पर जब टकटकी हमारी लगती है, फिर विजय छोड़ भावना और कोई न हृदय में जगती है। तब जो भी आते विघ्न रूप, हो धर्म, शील या सदाचार, एक ही सदृश हम करते हैं सबके सिर पर पाद-प्रहार।   उतनी ही पीड़ा हमें नहीं, होती है इन्हें कुचलने में, जितनी होती है रोज़ कंकड़ो के ऊपर हो चलने में। सत्य ही, ऊध्र्व-लोचन कैसे नीचे मिट्टी का ज्ञान करे ? जब बड़ा लक्ष्य हो खींच रहा, छोटी बातों का ध्यान करे ?   चलता हो अन्ध ऊध्र्व-लोचन, जानता नहीं, क्या करता है, नीच पथ में है कौन ? पाँव जिसके मस्तक पर धरता है। काटता शत्रु को वह लेकिन, साथ ही धर्म कट जाता है, फाड़ता विपक्षी को अन्तर मानवता का फट जाता है।   वासना-वह्नि से जो निकला, कैसे हो वह संयुग कोमल ? देखने हमें देगा वह क्यों, करूणा का पन्थ सुगम शीतल ? जब लोभ सिद्धि का आँखों पर, माँड़ी बन कर छा जाता है तब वह मनुष्य से बड़े-बड़े दुश्चिन्त्य कृत्य करवाता है।   फिर क्या विस्मय, कौरव-पाण्डव भी नहीं धर्म के साथ रहे ? जो रंग युद्ध का है, उससे, उनके भी अलग न हाथ रहे। दोनों ने कालिख छुई शीश पर, जय का तिलक लगाने को, सत्पथ से दोनों डिगे, दौड़कर, विजय-विन्दु तक जाने को।   इस विजय-द्वन्द्व के बीच युद्ध के दाहक कई दिवस बीते; पर, विजय किसे मिल सकती थी, जब तक थे द्रोण-कर्ण जीते ? था कौन सत्य-पथ पर डटकर, जो उनसे योग्य समर करता ? धर्म से मार कर उन्हें जगत् में, अपना नाम अमर करता ?   था कौन, देखकर उन्हें समर में जिसका हृदय न कँपता था ? मन ही मन जो निज इष्ट देव का भय से नाम न जपता था ? कमलों के वन को जिस प्रकार विदलित करते मदकल कुज्जर, थे विचर रहे पाण्डव-दल में त्यों मचा ध्वंस दोनों नरवर।   संग्राम-बुभुक्षा से पीडि़त, सारे जीवन से छला हुआ, राधेय पाण्डवों के ऊपर दारूण अमर्ष से जला हुआ; इस तरह शत्रुदल पर टूटा, जैसे हो दावानल अजेय, या टूट पड़े हों स्वयं स्वर्ग से उतर मनुज पर कात्र्तिकेय।   संघटित या कि उनचास मरूत कर्ण के प्राण में छाये हों, या कुपित सूय आकाश छोड़ नीचे भूतल पर आये हों। अथवा रण में हो गरज रहा धनु लिये अचल प्रालेयवान, या महाकाल बन टूटा हो भू पर ऊपर से गरूत्मान।   बाणों पर बाण सपक्ष उड़े, हो गया शत्रुदल खण्ड-खण्ड, जल उठी कर्ण के पौरूष की कालानल-सी ज्वाला प्रचण्ड। दिग्गज-दराज वीरों की भी छाती प्रहार से उठी हहर, सामने प्रलय को देख गये गजराजों के भी पाँव उखड़।   जन-जन के जीवन पर कराल, दुर्मद कृतान्त जब कर्ण हुआ, पाण्डव-सेना का हृास देख केशव का वदन विवर्ण हुआ। सोचने लगे, छूटेंगे क्या सबके विपन्न आज ही प्राण ? सत्य ही, नहीं क्या है कोई इस कुपित प्रलय का समाधान ?   \"है कहाँ पार्थ ? है कहाँ पार्थ ?\" राधेय गरजता था क्षण-क्षण। \"करता क्यों नही प्रकट होकर, अपने कराल प्रतिभट से रण ? क्या इन्हीं मूलियों से मेरी रणकला निबट रह जायेगी ? या किसी वीर पर भी अपना, वह चमत्कार दिखलायेगी ?   \"हो छिपा जहाँ भी पार्थ, सुने, अब हाथ समेटे लेता हूँ, सबके समक्ष द्वैरथ-रण की, मैं उसे चुनौती देता हूँ। हिम्मत हो तो वह बढ़े, व्यूह से निकल जरा सम्मुख आये, दे मुझे जन्म का लाभ और साहस हो तो खुद भी पाये।\"   पर, चतुर पार्थ-सारथी आज, रथ अलग नचाये फिरते थे, कर्ण के साथ द्वैरथ-रण से, शिष्य को बचाये फिरते थे। चिन्ता थी, एकघ्नी कराल, यदि द्विरथ-युद्ध में छूटेगी, पार्थ का निधन होगा, किस्मत, पाण्डव-समाज की फूटेगी।   नटनागर ने इसलिए, युक्ति का नया योग सन्धान किया, एकघ्नि-हव्य के लिए घटोत्कच का हरि ने आह्वान किया। बोले, \"बेटा ! क्या देख रहा ? हाथ से विजय जाने पर है, अब सबका भाग्य एक तेरे कुछ करतब दिखलाने पर है।   \"यह देख, कर्ण की विशिख-वृष्टि कैस कराल झड़ लाती है ? गो के समान पाण्डव-सेना भय-विकल भागती जाती है। तिल पर भी भूिम न कहीं खड़े हों जहाँ लोग सुस्थिर क्षण-भर, सारी रण-भू पर बरस रहे एक ही कर्ण के बाण प्रखर।   \"यदि इसी भाँति सब लोग मृत्यु के घाट उतरते जायेंगे, कल प्रात कौन सेना लेकर पाण्डव संगर में आयेंगे ? है विपद् की घड़ी, कर्ण का निर्भय, गाढ़, प्रहार रोक। बेटा ! जैसे भी बने, पाण्डवी सेना का संहार रोक।\"   फूटे ज्यों वह्निमुखी पर्वत, ज्यों उठे सिन्धु में प्रलय-ज्वार, कूदा रण में त्यों महाघोर गर्जन कर दानव किमाकार। सत्य ही, असुर के आते ही रण का वह क्रम टूटने लगा, कौरवी अनी भयभीत हुई; धीरज उसका छूटने लगा।   है कथा, दानवों के कर में थे बहुत-बहुत साधन कठोर, कुछ ऐसे भी, जिनपर, मनुष्य का चल पाता था नहीं जोर। उन अगम साधनों के मारे कौरव सेना चिग्घार उठी, ले नाम कर्ण का बार-बार, व्याकुल कर हाहाकार उठी।   लेकिन, अजस्त्र-शर-वृष्टि-निरत, अनवरत-युद्ध-रत, धीर कर्ण, मन-ही-मन था हो रहा स्वयं, इस रण से कुछ विस्मित, विवर्ण। बाणों से तिल-भर भी अबिद्ध, था कहीं नहीं दानव का तन; पर, हुआ जा रहा था वह पशु, पल-पल कुछ और अधिक भीषण।   जब किसी तरह भी नहीं रूद्ध, हो सकी महादानव की गति, सारी सेना को विकल देख, बोला कर्ण से स्वयं कुरूपति, \"क्या देख रहे हो सखे ! दस्यु ऐसे क्या कभी मरेगा यह ? दो घड़ी और जो देर हुई, सबका संहार करेगा यह।   \"हे वीर ! विलपते हुए सैन्य का, अचिर किसी विधि त्राण करो। अब नहीं अन्य गति; आँख मूँद, एकघ्नी का सन्धान करो। अरि का मस्तक है दूर, अभी अपनों के शीश बचाओ तो, जो मरण-पाश है पड़ा, प्रथम, उसमें से हमें छुड़ाओ तो।\"   सुन सहम उठा राधेय, मित्र की ओर फेर निज चकित नयन, झुक गया विवशता में कुरूपति का अपराधी, कातर आनन। मन-ही-मन बोला कर्ण, \"पार्थ ! तू वय का बड़ा बली निकला, या यह कि आज फिर एक बार, मेरा ही भाग्य छली निकला।\"   रहता आया था मुदित कर्ण जिसका अजेय सम्बल लेकर, था किया प्राप्त जिसको उसने, इन्द्र को कवच-कुण्डल देकर, जिसकी करालता में जय का, विश्वास अभय हो पलता था, केवल अर्जुन के लिए उसे, राधेय जुगाये चलता था।   वह काल-सर्पिणी की जिह्वा, वह अटल मृत्यु की सगी स्वसा, घातकता की वाहिनी, शक्ति यम की प्रचण्ड, वह अनल-रसा, लपलपा आग-सी एकघ्नी तूणीर छोड़ बाहर आयी, चाँदनी मन्द पड़ गयी, समर में दाहक उज्जवलता छायी।   कर्ण ने भाग्य को ठोंक उसे, आखिर दानव पर छोड़ दिया, विह्ल हो कुरूपति को विलोक, फिर किसी ओर मुख मोड़ लिया। उस असुर-प्राण को बेध, दृष्टि सबकी क्षर भर त्रासित करके, एकघ्नी ऊपर लीन हुई, अम्बर को उद्धभासित करके।   पा धमक, धरा धँस उछल पड़ी, ज्यों गिरा दस्यु पर्वताकार, \"हा ! हा !\" की चारों ओर मची, पाण्डव दल में व्याकुल पुकार। नरवीर युधिष्ठिर, नकुल, भीम रह सके कहीं कोई न धीर, जो जहाँ खड़े थे, लगे वहीं करने कातर क्रन्दन गंभीर।   सारी सेना थी चीख रही, सब लोग व्यग्र बिलखाते थे; पर बड़ी विलक्षण बात ! हँसी नटनागर रोक न पाते थे। टल गयी विपद् कोई सिर से, या मिली कहीं मन-ही-मन जय, क्या हुई बात ? क्या देख हुए केशव इस तरह विगत-संशय ?   लेकिन समर को जीत कर, निज वाहिनी को प्रीत कर, वलयित गहन गुन्जार से, पूजित परम जयकार से, राधेग संगर से चला, मन में कहीं खोया हुआ, जय-घोष की झंकार से आगे कहीं सोया हुआ   हारी हुई पाण्डव-चमू में हँस रहे भगवान् थे, पर जीत कर भी कर्ण के हारे हुए-से प्राण थे क्या, सत्य ही, जय के लिए केवल नहीं बल चाहिए कुछ बुद्धि का भी घात; कुछ छल-छद्म-कौशल चाहिए   क्या भाग्य का आघात है ;! कैसी अनोखी बात है ;? मोती छिपे आते किसी के आँसुओं के तार में, हँसता कहीं अभिशाप ही आनन्द के उच्चार में।   मगर, यह कर्ण की जीवन-कथा है, नियति का, भाग्य का इंगित वृथा है। मुसीबत को नहीं जो झेल सकता, निराशा से नहीं जो खेल सकता, पुरूष क्या, श्रृंखला को तोड़ करके, चले आगे नहीं जो जोर करके ?    ","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_post/Ramdhari-Singh-Dinkar.webp","slug":"rasmirathi-sastha-sarga","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/rasmirathi-sastha-sarga","readtime":"26 min read","audio_url":"","created":"2024-02-02T16:10:53.693600","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":4,"liked_by":[38108],"bookmarked_by":[38108],"category":[],"tag":[{"id":749,"name":"प्रकृति ","slug":"prakrti","url":"/tags/prakrti"},{"id":1037,"name":"माँ 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सप्तम सर्ग","content":"<p></p>\r\n<p>निशा बीती, गगन का रूप दमका,<br />किनारे पर किसी का चीर चमका।<br />क्षितिज के पास लाली छा रही है,<br />अतल से कौन ऊपर आ रही है ?</p>\r\n<p>संभाले शीश पर आलोक-मंडल<br />दिशाओं में उड़ाती ज्योतिरंचल,<br />किरण में स्निग्ध आतप फेंकती-सी,<br />शिशिर कम्पित द्रुमों को सेंकती-सी,</p>\r\n<p>खगों का स्पर्श से कर पंख-मोचन<br />कुसुम के पोंछती हिम-सिक्त लोचन,<br />दिवस की स्वामिनी आई गगन में,<br />उडा कुंकुम, जगा जीवन भुवन में ।</p>\r\n<p>मगर, नर बुद्धि-मद से चूर होकर,<br />अलग बैठा हुआ है दूर होकर,<br />उषा पोंछे भला फिर आँख कैसे ?<br />करे उन्मुक्त मन की पाँख कैसे ?</p>\r\n<p>मनुज विभ्राट् ज्ञानी हो चुका है,<br />कुतुक का उत्स पानी हो चुका है,<br />प्रकृति में कौन वह उत्साह खोजे ?<br />सितारों के हृदय में राह खोजे ?</p>\r\n<p>विभा नर को नहीं भरमायगी यह है ?<br />मनस्वी को कहाँ ले जायगी यह ?<br />कभी मिलता नहीं आराम इसको,<br />न छेड़ो, है अनेकों काम इसको ।</p>\r\n<p>महाभारत मही पर चल रहा है,<br />भुवन का भाग्य रण में जल रहा है।<br />मनुज ललकारता फिरता मनुज को,<br />मनुज ही मारता फिरता मनुज को ।</p>\r\n<p>पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है,<br />सहेली सर्पिणी की हो चुकी है,<br />न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह,<br />निगल ही जायगी सद्धर्म को वह ।</p>\r\n<p>मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें,<br />पिता के प्राण सुत के साथ छूटें,<br />मचे घनघोर हाहाकार जग में,<br />भरे वैधव्य की चीत्कार जग में,</p>\r\n<p>मगर, पत्थर हुआ मानव- हृदय है,<br />फकत, वह खोजता अपनी विजय है,<br />नहीं ऊपर उसे यदि पायगा वह,<br />पतन के गर्त में भी जायगा वह ।</p>\r\n<p>पड़े सबको लिये पाण्डव पतन में,<br />गिरे जिस रोज होणाचार्य रण में,<br />बड़े धर्मिंष्ठ, भावुक और भोले,<br />युधिष्ठिर जीत के हित झूठ बोले ।</p>\r\n<p>नहीं थोड़े बहुत का मेद मानो,<br />बुरे साधन हुए तो सत्य जानो,<br />गलेंगे बर्फ में मन भी, नयन भी,<br />अँगूठा ही नहीं, संपूर्ण तन भी ।</p>\r\n<p>नमन उनको, गये जो स्वर्ग मर कर,<br />कलंकित शत्रु को, निज को अमर कर,<br />नहीं अवसर अधिक दुख-दैन्य का है,<br />हुआ राधेय नायक सैन्य का है ।</p>\r\n<p>जगा लो वह निराशा छोड़ करके,<br />द्विधा का जाल झीना तोड़ करके,<br />गरजता ज्योति-के आधार ! जय हो,<br />चरम आलोक मेरा भी उदय हो ।</p>\r\n<p>बहुत धुधुआ चुकी, अब आग फूटे,<br />किरण सारी सिमट कर आज छुटे ।<br />छिपे हों देवता ! अंगार जो भी,\"<br />दबे हों प्राण में हुंकार जो भी,</p>\r\n<p>उन्हें पुंजित करो, आकार दो हे !<br />मुझे मेरा ज्वलित श्रृंगार दो हे !<br />पवन का वेग दो, दुर्जय अनल दो,<br />विकर्तन ! आज अपना तेज-बल हूँ दो !</p>\r\n<p>मही का सूर्य होना चाहता हूँ,<br />विभा का तूर्य होना चाहता हूँ।<br />समय को चाहता हूँ दास करना,<br />अभय हो मृत्यु का उपहास करना ।</p>\r\n<p>भुजा की थाह पाना चाहता हूँ,<br />हिमालय को उठाना चाहता हूँ,<br />समर के सिन्धु को मथ कर शरों से,<br />धरा हूँ चाहता श्री को करों से ।</p>\r\n<p>ग्रहों को खींच लाना चाहता हूँ,<br />हथेली पर नचाना चाहता हूँ ।<br />मचलना चाहता हूँ धार पर मैं,<br />हँसा हूँ चाहता अंगार पर मैं।</p>\r\n<p>समूचा सिन्धु पीना चाहता हूँ,<br />धधक कर आज जीना चाहता हूँ,<br />समय को बन्द करके एक क्षण में,<br />चमकना चाहता हूँ हो सघन मैं ।</p>\r\n<p>असंभव कल्पना साकार होगी,<br />पुरुष की आज जयजयकार होगी।<br />समर वह आज ही होगा मही पर,<br />न जैसा था हुआ पहले कहीं पर ।</p>\r\n<p>चरण का भार लो, सिर पर सँभालो;<br />नियति की दूतियो ! मस्तक झुका लो ।<br />चलो, जिस भाँति चलने को कहूँ मैं,<br />ढलो, जिस माँति ढलने को कहूँ मैं ।</p>\r\n<p>न कर छल-छद्म से आघात फूलो,<br />पुरुष हूँ मैं, नहीं यह बात भूलो ।<br />कुचल दूँगा, निशानी मेट दूँगा,<br />चढा दुर्जय भुजा की भेंट दूँगा ।</p>\r\n<p>अरी, यों भागती कबतक चलोगी ?<br />मुझे ओ वंचिके ! कबतक छलोगी ?<br />चुराओगी कहाँ तक दाँव मेरा ?<br />रखोगी रोक कबतक पाँव मेरा ?</p>\r\n<p>अभी भी सत्त्व है उद्दाम तुमसे,<br />हृदय की भावना निष्काम तुमसे,<br />चले संघर्ष आठों याम तुमसे,<br />करूँगा अन्त तक संग्राम तुमसे ।</p>\r\n<p>कहाँ तक शक्ति से वंचित करोगी ?<br />कहाँ तक सिद्धियां मेरी हरोगी ?<br />तुम्हारा छद्म सारा शेष होगा,<br />न संचय कर्ण का नि:शेष होगा ।</p>\r\n<p>कवच-कुण्डल गया; पर, प्राण तो हैं,<br />भुजा में शक्ति, धनु पर बाण तो हैं,<br />गई एकघ्नि तो सब कुछ गया क्या ?<br />बचा मुझमें नहीं कुछ भी नया क्या ?</p>\r\n<p>समर की सूरता साकार हूँ मैं,<br />महा मार्तण्ड का अवतार हूँ मैं।<br />विभूषण वेद-भूषित कर्म मेरा,<br />कवच है आज तक का धर्म मेरा ।</p>\r\n<p>तपस्याओ ! उठो, रण में गलो तुम,<br />नई एकघ्नियां वन कर ढलो तुम,<br />अरी ओ सिद्धियों की आग, आओ;<br />प्रलय का तेज बन मुझमें समाओ ।</p>\r\n<p>कहाँ हो पुण्य ? बाँहों में भरो तुम,<br />अरी व्रत-साधने ! आकार लो तुम ।<br />हमारे योग की पावन शिखाओ,<br />समर में आज मेरे साथ आओ ।</p>\r\n<p>उगी हों ज्योतियां यदि दान से भी,<br />मनुज-निष्ठा, दलित-कल्याण से भी,<br />चलें वे भी हमारे साथ होकर,<br />पराक्रम-शौर्य की ज्वाला संजो कर ।</p>\r\n<p>हृदय से पूजनीया मान करके,<br />बड़ी ही भक्ति से सम्मान करके,<br />सुवामा-जाति को सुख दे सका हूँ,<br />अगर आशीष उनसे ले सका हूँ,</p>\r\n<p>समर में तो हमारा वर्म हो वह,<br />सहायक आज ही सत्कर्म हो वह ।<br />सहारा, माँगता हूँ पुण्य-बल का,<br />उजागर धर्म का, निष्ठा अचल का।</p>\r\n<p>प्रवंचित हूँ, नियति की दृष्टि में दोषी बड़ा हूँ,<br />विधाता से किये विद्रोह जीवन में खड़ा हूँ ।<br />स्वयं भगवान मेरे शत्रु को ले चल रहे हैं,<br />अनेकों भाँति से गोविन्द मुझको छल रहे हैं।</p>\r\n<p>मगर, राधेय का स्यन्दन नहीं तब भी रुकेगा,<br />नहीं गोविन्द को भी युध्द में मस्तक झुकेगा,<br />बताऊँगा उन्हें मैं आज, नर का धर्म क्या है,<br />समर कहते किसे हैं और जय का मर्म क्या है ।</p>\r\n<p>बचा कर पाँव धरना, थाहते चलना समर को,<br />'बनाना ग्रास अपनी मृत्यु का योद्धा अपर को,<br />पुकारे शत्रु तो छिप व्यूह में प्रच्छन्न रहना,<br />सभी के सामने ललकार को मन मार सहना ।</p>\r\n<p>प्रकट होना विपद के बीच में प्रतिवीर हो जब,<br />धनुष ढीला, शिथिल उसका जरा कुछ तीर हो जब ।<br />कहाँ का धर्म ? कैसी भर्त्सना की बात है यह ?<br />नहीं यह वीरता, कौटिल्य का अपघात है यह ।</p>\r\n<p>समझ में कुछ न आता, कृष्ण क्या सिखला रहे हैं,<br />जगत को कौन नूतन पुण्य-पथ दिखला रहे हैं ।<br />हुआ वध द्रोण का कल जिस तरह वह धर्म था क्या ?<br />समर्थन-योग्य केशव के लिए वह कर्म था क्या ?</p>\r\n<p>यही धर्मिष्ठता ? नय-नीति का पालन यही है ?<br />मनुज मलपुंज के मालिन्य का क्षालन यही है ?<br />यही कुछ देखकर संसार क्या आगे बढ़ेगा ?<br />जहाँ गोविन्द हैं, उस श्रृंग के ऊपर चढ़ेगा ?</p>\r\n<p>करें भगवान जो चाहें, उन्हें सब क्वा क्षमा है,<br />मगर क्या वज्र का विस्फोट छींटों से थमा है ?<br />चलें वे बुद्धि की ही चाल, मैं बल से चलूंगा ?<br />न तो उनको, न होकर जिह्न अपने को छलूंगा ।</p>\r\n<p>डिगाना घर्म क्या इस चार बित्त्रों की मही को ?<br />भुलाना क्या मरण के बादवाली जिन्दगी को ?<br />बसाना एक पुर क्या लाख जन्मों को जला कर !<br />मुकुट गढ़ना भला क्या पुण्य को रण में गला कर ?</p>\r\n<p>नहीं राधेय सत्पथ छोड़ कर अघ-ओक लेगा,<br />विजय पाये न पाये, रश्मियों का लोक लेगा !<br />विजय-गुरु कृष्ण हों, गुरु किन्तु, मैं बलिदान का हूँ;<br />असीसें देह को वे, मैं निरन्तर प्राण का हूँ ।</p>\r\n<p>जगी, वलिदान की पावन शिखाओ,<br />समर में आज कुछ करतब दिखाओ ।<br />नहीं शर ही, सखा सत्कर्म भी हो,<br />धनुष पर आज मेरा धर्म भी हो ।</p>\r\n<p>मचे भूडोल प्राणों के महल में,<br />समर डूबे हमारे बाहु-बल में ।<br />गगन से वज्र की बौछार छूटे,<br />किरण के तार से झंकार फूटे ।</p>\r\n<p>चलें अचलेश, पारावार डोले;<br />मरण अपनी पुरी का द्वार खोले ।<br />समर में ध्वंस फटने जा रहा है,<br />महीमंडल उलटने जा रहा है ।</p>\r\n<p>अनूठा कर्ण का रण आज होगा,<br />जगत को काल-दर्शन आज होगा ।<br />प्रलय का भीम नर्तन आज होगा,<br />वियद्व्यापी विवर्तन आज होगा ।</p>\r\n<p>विशिख जब छोड़ कर तरकस चलेगा,<br />नहीं गोविन्द का भी बस चलेगा ।<br />गिरेगा पार्थ का सिर छिन्न धड़ से,<br />जयी कुरुराज लौटेगा समर से ।</p>\r\n<p>बना आनन्द उर में छा रहा है,<br />लहू में ज्वार उठता जा रहा है ।<br />हुआ रोमांच यह सारे बदन में,<br />उगे हैं या कटीले वृक्ष तन में ।</p>\r\n<p>अहा ! भावस्थ होता जा रहा हूँ,<br />जगा हूँ या कि सोता जा रहा हूँ ?<br />बजाओ, युद्ध के बाजे बजाओ,<br />सजाओ, शल्य ! मेरा रथ सजाओ ।</p>\r\n<p>2<br />रथ सजा, भेरियां घमक उठीं, गहगहा उठा अम्बर विशाल,<br />कूदा स्यन्दन पर गरज कर्ण ज्यों उठे गरज क्रोधान्ध काल ।<br />बज उठे रोर कर पटह-कम्बु, उल्लसित वीर कर उठे हूह,<br />उच्छल सागर-सा चला कर्ण को लिये क्षुब्ध सैनिक-समूह ।</p>\r\n<p>हेषा रथाश्व की, चक्र-रोर, दन्तावल का वृहित अपार,<br />टंकार धुनुर्गुण की भीम, दुर्मद रणशूरों की पुकार ।<br />खलमला उठा ऊपर खगोल, कलमला उठा पृथ्वी का तन,<br />सन-सन कर उड़ने लगे विशिख, झनझना उठी असियाँ झनझन ।</p>\r\n<p>तालोच्च-तरंगावृत बुभुक्षु-सा लहर उठा संगर-समुद्र,<br />या पहन ध्वंस की लपट लगा नाचने समर में स्वयं रुद्र ।<br />हैं कहाँ इन्द्र ? देखें, कितना प्रज्वलित मर्त्य जन होता है ?<br />सुरपति से छले हुए नर का कैसा प्रचण्ड रण होता है ?</p>\r\n<p>अङगार-वृष्टि पा धधक उठ जिस तरह शुष्क कानन का तृण,<br />सकता न रोक शस्त्री की गति पुञ्जित जैसे नवनीत मसृण ।<br />यम के समक्ष जिस तरह नहीं चल पाता बध्द मनुज का वश,<br />हो गयी पाण्डवों की सेना त्योंही बाणों से विध्द, विवश ।</p>\r\n<p>भागने लगे नरवीर छोड वह दिशा जिधर भी झुका कर्ण,<br />भागे जिस तरह लवा का दल सामने देख रोषण सुपर्ण !<br />'रण में क्यों आये आज ?' लोग मन-ही-मन में पछताते थे,<br />दूर से देखकर भी उसको, भय से सहमे सब जाते थे ।</p>\r\n<p>काटता हुआ रण-विपिन क्षुब्ध, राधेय गरजता था क्षण-क्षण ।<br />सुन-सुन निनाद की धमक शत्रु का, व्यूह लरजता था क्षण-क्षण ।<br />अरि की सेना को विकल देख, बढ चला और कुछ समुत्साह;<br />कुछ और समुद्वेलित होकर, उमडा भुज का सागर अथाह ।</p>\r\n<p>गरजा अशङक हो कर्ण, 'शल्य ! देखो कि आज क्या करता हूं,<br />कौन्तेय-कृष्ण, दोनों को ही, जीवित किस तरह पकडता हूं ।<br />बस, आज शाम तक यहीं सुयोधन का जय-तिलक सजा करके,<br />लौटेंगे हम, दुन्दुभि अवश्य जय की, रण-बीच बजा करके ।</p>\r\n<p>इतने में कुटिल नियति-प्रेरित पड ग़ये सामने धर्मराज,<br />टूटा कृतान्त-सा कर्ण, कोक पर पडे टूट जिस तरह बाज ।<br />लेकिन, दोनों का विषम युध्द, क्षण भर भी नहीं ठहर पाया,<br />सह सकी न गहरी चोट, युधिष्ठर की मुनि-कल्प, मृदुल काया ।</p>\r\n<p>भागे वे रण को छोड, क़र्ण ने झपट दौडक़र गहा ग्रीव,<br />कौतुक से बोला, 'महाराज ! तुम तो निकले कोमल अतीव ।<br />हां, भीरु नहीं, कोमल कहकर ही, जान बचाये देता हूं ।<br />आगे की खातिर एक युक्ति भी सरल बताये देता हूं ।</p>\r\n<p>'हैं विप्र आप, सेविये धर्म, तरु-तले कहीं, निर्जन वन में,<br />क्या काम साधुओं का, कहिये, इस महाघोर, घातक रण में ?<br />मत कभी क्षात्रता के धोखे, रण का प्रदाह झेला करिये,<br />जाइये, नहीं फिर कभी गरुड क़ी झपटों से खेला करिये ।'</p>\r\n<p>भागे विपन्न हो समर छोड ग्लानि में निमज्जित धर्मराज,<br />सोचते, \"कहेगा क्या मन में जानें, यह शूरों का समाज ?<br />प्राण ही हरण करके रहने क्यों नहीं हमारा मान दिया ?<br />आमरण ग्लानि सहने को ही पापी ने जीवन-दान दिया ।\"</p>\r\n<p>समझे न हाय, कौन्तेय ! कर्ण ने छोड दिये, किसलिए प्राण,<br />गरदन पर आकर लौट गयी सहसा, क्यों विजयी की कृपाण ?<br />लेकिन, अदृश्य ने लिखा, कर्ण ने वचन धर्म का पाल किया,<br />खड्ग का छीन कर ग्रास, उसे मां के अञ्चल में डाल दिया ।</p>\r\n<p>कितना पवित्र यह शील ! कर्ण जब तक भी रहा खडा रण में,<br />चेतनामयी मां की प्रतिमा घूमती रही तब तक मन में ।<br />सहदेव, युधिष्ठर, नकुल, भीम को बार-बार बस में लाकर,<br />कर दिया मुक्त हंस कर उसने भीतर से कुछ इङिगत पाकर ।</p>\r\n<p>देखता रहा सब श्लय, किन्तु, जब इसी तरह भागे पवितन,<br />बोला होकर वह चकित, कर्ण की ओर देख, यह परुष वचन,<br />'रे सूतपुत्र ! किसलिए विकट यह कालपृष्ठ धनु धरता है ?<br />मारना नहीं है तो फिर क्यों, वीरों को घेर पकडता है ?'</p>\r\n<p>'संग्राम विजय तू इसी तरह सन्ध्या तक आज करेगा क्या ?<br />मारेगा अरियों को कि उन्हें दे जीवन स्वयं मरेगा क्या ?<br />रण का विचित्र यह खेल, मुझे तो समझ नहीं कुछ पडता है,<br />कायर ! अवश्य कर याद पार्थ की, तू मन ही मन डरता है ।'</p>\r\n<p>हंसकर बोला राधेय, 'शल्य, पार्थ की भीति उसको होगी,<br />क्षयमान्, क्षनिक, भंगुर शरीर पर मृषा प्रीति जिसको होगी ।<br />इस चार दिनों के जीवन को, मैं तो कुछ नहीं समझता हूं,<br />करता हूं वही, सदा जिसको भीतर से सही समझता हूं ।</p>\r\n<p>'पर ग्रास छीन अतिशय बुभुक्षु, अपने इन बाणों के मुख से,<br />होकर प्रसन्न हंस देता हूं, चञ्चल किस अन्तर के सुख से;<br />यह कथा नहीं अन्त:पुर की, बाहर मुख से कहने की है,<br />यह व्यथा धर्म के वर-समान, सुख-सहित, मौन सहने की है ।</p>\r\n<p>'सब आंख मूंद कर लडते हैं, जय इसी लोक में पाने को,<br />पर, कर्ण जूझता है कोई, ऊंचा सध्दर्म निभाने को,<br />सबके समेत पङिकल सर में, मेरे भी चरण पडेंग़े क्या ?<br />ये लोभ मृत्तिकामय जग के, आत्मा का तेज हरेंगे क्या ?</p>\r\n<p>यह देह टूटने वाली है, इस मिट्टी का कब तक प्रमाण ?<br />मृत्तिका छोड ऊपर नभ में भी तो ले जाना है विमान ।<br />कुछ जुटा रहा सामान खमण्डल में सोपान बनाने को,<br />ये चार फुल फेंके मैंने, ऊपर की राह सजाने को</p>\r\n<p>ये चार फुल हैं मोल किन्हीं कातर नयनों के पानी के,<br />ये चार फुल प्रच्छन्न दान हैं किसी महाबल दानी के ।<br />ये चार फुल, मेरा अदृष्ट था हुआ कभी जिनका कामी,<br />ये चार फुल पाकर प्रसन्न हंसते होंगे अन्तर्यामी ।'</p>\r\n<p>'समझोगे नहीं शल्य इसको, यह करतब नादानों का हैं,<br />ये खेल जीत से बडे क़िसी मकसद के दीवानों का हैं ।<br />जानते स्वाद इसका वे ही, जो सुरा स्वप्न की पीते हैं,<br />दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग खडे ज़ो जीते हैं ।'</p>\r\n<p>समझा न, सत्य ही, शल्य इसे, बोला 'प्रलाप यह बन्द करो,<br />हिम्मत हो तो लो करो समर,बल हो, तो अपना धनुष धरो ।<br />लो, वह देखो, वानरी ध्वजा दूर से दिखायी पडती है,<br />पार्थ के महारथ की घर्घर आवाज सुनायी पडती है ।'</p>\r\n<p>'क्या वेगवान हैं अश्व ! देख विधुत् शरमायी जाती है,<br />आगे सेना छंट रही, घटा पीछे से छायी जाती है ।<br />राधेय ! काल यह पहंुच गया, शायक सन्धानित तूर्ण करो,<br />थे विकल सदा जिसके हित, वह लालसा समर की पूर्ण करो ।'</p>\r\n<p>पार्थ को देख उच्छल-उमंग-पूरित उर-पारावार हुआ,<br />दम्भोलि-नाद कर कर्ण कुपित अन्तक-सा भीमाकार हुआ ।<br />वोला 'विधि ने जिस हेतु पार्थ ! हम दोनों का निर्माण किया,<br />जिस लिए प्रकृति के अनल-तत्त्व का हम दोनों ने पान किया ।</p>\r\n<p>'जिस दिन के लिए किये आये, हम दोनों वीर अथक साधन,<br />आ गया भाग्य से आज जन्म-जन्मों का निर्धारित वह क्षण ।<br />आओ, हम दोनों विशिख-वह्नि-पूजित हो जयजयकार करें,<br />ममच्छेदन से एक दूसरे का जी-भर सत्कार करें ।'</p>\r\n<p>'पर, सावधान, इस मिलन-बिन्दु से अलग नहीं होना होगा,<br />हम दोनों में से किसी एक को आज यहीं सोना होगा ।<br />हो गया बडा अतिकाल, आज निर्णय अन्तिम कर लेना है,<br />शत्रु का या कि अपना मस्तक, काट कर यहीं धर देना है ।'</p>\r\n<p>कर्ण का देख यह दर्प पार्थ का, दहक उठा रविकान्त-हृदय,<br />बोला, 'रे सारथि-पुत्र ! किया तू ने, सत्य ही योग्य निश्चय ।<br />पर कौन रहेगा यहां ? बात यह अभी बताये देता हूं,<br />धड पर से तेरा सीस मूढ ! ले, अभी हटाये देता हूं ।'</p>\r\n<p>यह कह अर्जुन ने तान कान तक, धनुष-बाण सन्धान किया,<br />अपने जानते विपक्षी को हत ही उसने अनुमान किया ।<br />पर, कर्ण झेल वह महा विशिक्ष, कर उठा काल-सा अट्टहास,<br />रण के सारे स्वर डूब गये, छा गया निनद से दिशाकाश ।</p>\r\n<p>बोला, 'शाबाश, वीर अर्जुन ! यह खूब गहन सत्कार रहा;<br />पर, बुरा न मानो, अगर आन कर मुझ पर वह बेकार रहा ।<br />मत कवच और कुण्डल विहीन, इस तन को मृदुल कमल समझो,<br />साधना-दीप्त वक्षस्थल को, अब भी दुर्भेद्य अचल समझो ।'</p>\r\n<p>'अब लो मेरा उपहार, यही यमलोक तुम्हें पहुंचायेगा,<br />जीवन का सारा स्वाद तुम्हें बस, इसी बार मिल जायेगा ।'<br />कह इस प्रकार राधेय अधर को दबा, रौद्रता में भरके,<br />हुङकार उठा घातिका शक्ति विकराल शरासन पर धरके ।'</p>\r\n<p>संभलें जब तक भगवान्, नचायें इधर-उधर किञ्चित स्यन्दन,<br />तब तक रथ में ही, विकल, विध्द, मूच्र्छित हो गिरा पृथानन्दन ।<br />कर्ण का देख यह समर-शौर्य सङगर में हाहाकार हुआ,<br />सब लगे पूछने, 'अरे, पार्थ का क्या सचमुच संहार हुआ ?'</p>\r\n<p>पर नहीं, मरण का तट छूकर, हो उठा अचिर अर्जुन प्रबुध्द;<br />क्रोधान्ध गरज कर लगा कर्ण के साथ मचाने द्विरथ-युध्द ।<br />प्रावृट्-से गरज-गरज दोनों, करते थे प्रतिभट पर प्रहार,<br />थी तुला-मध्य सन्तुलित खडी, लेकिन दोनों की जीत हार ।</p>\r\n<p>इस ओर कर्ण र्मात्तण्ड-सदृश, उस ओर पार्थ अन्तक-समान,<br />रण के मिस, मानो, स्वयं प्रलय, हो उठा समर में मूर्तिमान ।<br />जूझता एक क्षण छोड, स्वत:, सारी सेना विस्मय-विमुग्ध,<br />अपलक होकर देखने लगी दो शितिकण्ठों का विकट युध्द ।</p>\r\n<p>है कथा, नयन का लोभ नहीं, संवृत कर सके स्वयं सुरगण,<br />भर गया विमानों से तिल-तिल, कुरुभू पर कलकल-नदित-गगन ।<br />थी रुकी दिशा की सांस, प्रकृति के निखिल रुप तन्मय-गभीर,<br />ऊपर स्तम्भित दिनमणि का रथ, नीचे नदियों का अचल नीर ।</p>\r\n<p>अहा ! यह युग्म दो अद्भुत नरों का,<br />महा मदमत्त मानव- कुंजरों का;<br />नृगुण के मूर्तिमय अवतार ये दो,<br />मनुज-कुल के सुभग श्रृंगार ये दो।</p>\r\n<p>परस्पर हो कहीं यदि एक पाते,<br />ग्रहण कर शील की यदि टेक पाते,<br />मनुजता को न क्या उत्थान मिलता ?<br />अनूठा क्या नहीं वरदान मिलता ?</p>\r\n<p>मनुज की जाति का पर शाप है यह,<br />अभी बाकी हमारा पाप है यह,<br />बड़े जो भी कुसुम कुछ फूलते हैं,<br />अहँकृति में भ्रमित हो भूलते हैं ।</p>\r\n<p>नहीं हिलमिल विपिन को प्यार करते,<br />झगड़ कर विश्व का संहार करते ।<br />जगत को डाल कर नि:शेष दुख में,<br />शरण पाते स्वयं भी काल-मुख में ।</p>\r\n<p>चलेगी यह जहर की क्रान्ति कबतक ?<br />रहेगी शक्ति-वंचित शांति कबतक ?<br />मनुज मनुजत्व से कबतक लड़ेगा ?<br />अनल वीरत्व से कबतक झड़ेगा ?</p>\r\n<p>विकृति जो प्राण में अंगार भरती,<br />हमें रण के लिए लाचार करती,<br />घटेगी तीव्र उसका दाह कब तक ?<br />मिलेगी अन्य उसको राह कब तक ?</p>\r\n<p>हलाहल का शमन हम खोजते हैं,<br />मगर, शायद, विमन हम खोजते हैं,<br />बुझाते है दिवस में जो जहर हम,<br />जगाते फूंक उसको रात भर हम ।</p>\r\n<p>किया कुंचित, विवेचन व्यस्त नर का,<br />हृदय शत भीति से संत्रस्त नर का ।<br />महाभारत मही पर चल रहा है,<br />भुवन का भाग्य रण में जल रहा है ।</p>\r\n<p>चल रहा महाभारत का रण,<br />जल रहा धरित्री का सुहाग,<br />फट कुरुक्षेत्र में खेल रही<br />नर के भीतर की कुटिल आग ।<br />बाजियों-गजों की लोथों में<br />गिर रहे मनुज के छिन्न अंग,<br />बह रहा चतुष्पद और द्विपद<br />का रुधिर मिश्र हो एक संग ।</p>\r\n<p>गत्वर, गैरेय, सुघर भूधर-से<br />लिये रक्त-रंजित शरीर,<br />थे जूझ रहे कौन्तेय-कर्ण<br />क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर ।<br />दोनों रणकृशल धनुर्धर नर,<br />दोनों समबल, दोनों समर्थ,<br />दोनों पर दोनों की अमोघ<br />थी विशिख-वृष्टि हो रही व्यर्थ ।</p>\r\n<p>इतने में शर के कर्ण ने देखा जो अपना निषङग,<br />तरकस में से फुङकार उठा, कोई प्रचण्ड विषधर भूजङग,<br />कहता कि 'कर्ण! मैं अश्वसेन विश्रुत भुजंगो का स्वामी हूं,<br />जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूं ।</p>\r\n<p>'बस, एक बार कर कृपा धनुष पर चढ शरव्य तक जाने दे,<br />इस महाशत्रु को अभी तुरत स्यन्दन में मुझे सुलाने दे ।<br />कर वमन गरल जीवन भर का सञ्चित प्रतिशोध उतारूंगा,<br />तू मुझे सहारा दे, बढक़र मैं अभी पार्थ को मारूंगा ।'</p>\r\n<p>राधेय जरा हंसकर बोला, 'रे कुटिल! बात क्या कहता है ?<br />जय का समस्त साधन नर का अपनी बांहों में रहता है ।<br />उस पर भी सांपों से मिल कर मैं मनुज, मनुज से युध्द करूं ?<br />जीवन भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुध्द करूं ?'</p>\r\n<p>'तेरी सहायता से जय तो मैं अनायास पा जाऊंगा,<br />आनेवाली मानवता को, लेकिन, क्या मुख दिखलाऊंगा ?<br />संसार कहेगा, जीवन का सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया;<br />प्रतिभट के वध के लिए सर्प का पापी ने साहाय्य लिया ।'</p>\r\n<p>'रे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी,<br />सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुर-ग्राम-घरों में भी ।<br />ये नर-भुजङग मानवता का पथ कठिन बहुत कर देते हैं,<br />प्रतिबल के वध के लिए नीच साहाय्य सर्प का लेते हैं ।'</p>\r\n<p>'ऐसा न हो कि इन सांपो में मेरा भी उज्ज्वल नाम चढे ।<br />पाकर मेरा आदर्श और कुछ नरता का यह पाप बढे ।<br />अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है,<br />संघर्ष सनातन नहीं, शत्रुता इस जीवन भर ही तो है ।'</p>\r\n<p>'अगला जीवन किसलिए भला, तब हो द्वेषान्ध बिगाडं मैं ?<br />सांपो की जाकर शरण, सर्प बन क्यों मनुष्य को मारूं मैं ?<br />जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता,<br />मैं किसी हेतु भी यह कलङक अपने पर नहीं लगा सकता ।'</p>\r\n<p>काकोदर को कर विदा कर्ण, फिर बढ़ा समर में गर्जमान,<br />अम्बर अनन्त झङकार उठा, हिल उठे निर्जरों के विमान ।<br />तूफ़ान उठाये चला कर्ण बल से धकेल अरि के दल को,<br />जैसे प्लावन की धार बहाये चले सामने के जल को।</p>\r\n<p>पाण्डव-सेना भयभीत भागती हुई जिधर भी जाती थी;<br />अपने पीछे दौडते हुए वह आज कर्ण को पाती थी ।<br />रह गयी किसी के भी मन में जय की किञ्चित भी नहीं आस,<br />आखिर, बोले भगवान् सभी को देख व्याकुल हताश ।</p>\r\n<p>'अर्जुन ! देखो, किस तरह कर्ण सारी सेना पर टूट रहा,<br />किस तरह पाण्डवों का पौरुष होकर अशङक वह लूट रहा ।<br />देखो जिस तरफ़, उधर उसके ही बाण दिखायी पडते हैं,<br />बस, जिधर सुनो, केवल उसके हुङकार सुनायी पडते हैं ।'</p>\r\n<p>'कैसी करालता ! क्या लाघव ! कितना पौरुष ! कैसा प्रहार !<br />किस गौरव से यह वीर द्विरद कर रहा समर-वन में विहार !<br />व्यूहों पर व्यूह फटे जाते, संग्राम उजडता जाता है,<br />ऐसी तो नहीं कमल वन में भी कुञ्जर धूम मचाता है ।'</p>\r\n<p>'इस पुरुष-सिंह का समर देख मेरे तो हुए निहाल नयन,<br />कुछ बुरा न मानो, कहता हूं, मैं आज एक चिर-गूढ वचन ।<br />कर्ण के साथ तेरा बल भी मैं खूब जानता आया हूं,<br />मन-ही-मन तुझसे बडा वीर, पर इसे मानता आया हूं ।'</p>\r\n<p>औ' देख चरम वीरता आज तो यही सोचता हूं मन में,<br />है भी कोई, जो जीत सके, इस अतुल धनुर्धर को रण में ?<br />मैं चक्र सुदर्शन धरूं और गाण्डीव अगर तू तानेगा,<br />तब भी, शायद ही, आज कर्ण आतङक हमारा मानेगा ।'</p>\r\n<p>'यह नहीं देह का बल केवल, अन्तर्नभ के भी विवस्वान्,<br />हैं किये हुए मिलकर इसको इतना प्रचण्ड जाज्वल्यमान ।<br />सामान्य पुरुष यह नहीं, वीर यह तपोनिष्ठ व्रतधारी है;<br />मृत्तिका-पुञ्ज यह मनुज ज्योतियों के जग का अधिकारी है ।'</p>\r\n<p>'कर रहा काल-सा घोर समर, जय का अनन्त विश्वास लिये,<br />है घूम रहा निर्भय, जानें, भीतर क्या दिव्य प्रकाश लिये !<br />जब भी देखो, तब आंख गडी सामने किसी अरिजन पर है,<br />भूल ही गया है, एक शीश इसके अपने भी तन पर है ।'</p>\r\n<p>'अर्जुन ! तुम भी अपने समस्त विक्रम-बल का आह्वान करो,<br />अर्जित असंख्य विद्याओं का हो सजग हृदय में ध्यान करो ।<br />जो भी हो तुममें तेज, चरम पर उसे खींच लाना होगा,<br />तैयार रहो, कुछ चमत्कार तुमको भी दिखलाना होगा ।'</p>\r\n<p>दिनमणि पश्चिम की ओर ढले देखते हुए संग्राम घोर,<br />गरजा सहसा राधेय, न जाने, किस प्रचण्ड सुख में विभोर ।<br />'सामने प्रकट हो प्रलय ! फाड़ तुझको मैं राह बनाऊंगा,<br />जाना है तो तेरे भीतर संहार मचाता जाऊंगा ।'</p>\r\n<p>'क्या धमकाता है काल ? अरे, आ जा, मुट्ठी में बन्द करूं ।<br />छुट्टी पाऊं, तुझको समाप्त कर दूं, निज को स्वच्छन्द करूं ।<br />ओ शल्य ! हयों को तेज करो, ले चलो उड़ाकर शीघ्र वहां,<br />गोविन्द-पार्थ के साथ डटे हों चुनकर सारे वीर जहां ।'</p>\r\n<p>'हो शास्त्रों का झन-झन-निनाद, दन्तावल हों चिंग्घार रहे,<br />रण को कराल घोषित करके हों समरशूर हुङकार रहे,<br />कटते हों अगणित रुण्ड-मुण्ड, उठता होर आर्त्तनाद क्षण-क्षण,<br />झनझना रही हों तलवारें; उडते हों तिग्म विशिख सन-सन ।'</p>\r\n<p>'संहार देह धर खड़ा जहां अपनी पैंजनी बजाता हो,<br />भीषण गर्जन में जहां रोर ताण्डव का डूबा जाता हो ।<br />ले चलो, जहां फट रहा व्योम, मच रहा जहां पर घमासान,<br />साकार ध्वंस के बीच पैठ छोड़ना मुझे है आज प्राण ।'</p>\r\n<p>समझ में शल्य की कुछ भी न आया,<br />हयों को जोर से उसने भगाया ।<br />निकट भगवान् के रथ आन पहुंचा,<br />अगम, अज्ञात का पथ आन पहुंचा ?</p>\r\n<p>अगम की राह, पर, सचमुच, अगम है,<br />अनोखा ही नियति का कार्यक्रम है ।<br />न जानें न्याय भी पहचानती है,<br />कुटिलता ही कि केवल जानती है ?</p>\r\n<p>रहा दीपित सदा शुभ धर्म जिसका,<br />चमकता सूर्य-सा था कर्म जिसका,<br />अबाधित दान का आधार था जो,<br />धरित्री का अतुल श्रृङगार था जो,</p>\r\n<p>क्षुधा जागी उसी की हाय, भू को,<br />कहें क्या मेदिनी मानव-प्रसू को ?<br />रुधिर के पङक में रथ को जकड़ क़र,<br />गयी वह बैठ चक्के को पकड़ क़र ।</p>\r\n<p>लगाया जोर अश्वों ने न थोडा,<br />नहीं लेकिन, मही ने चक्र छोडा ।<br />वृथा साधन हुए जब सारथी के,<br />कहा लाचार हो उसने रथी से ।</p>\r\n<p>'बडी राधेय ! अद्भुत बात है यह ।<br />किसी दु:शक्ति का ही घात है यह ।<br />जरा-सी कीच में स्यन्दन फंसा है,<br />मगर, रथ-चक्र कुछ ऐसा धंसा है;'</p>\r\n<p>'निकाले से निकलता ही नहीं है,<br />हमारा जोर चलता ही नहीं है,<br />जरा तुम भी इसे झकझोर देखो,<br />लगा अपनी भुजा का जोर देखो ।'</p>\r\n<p>हँसा राधेय कर कुछ याद मन में,<br />कहा, 'हां सत्य ही, सारे भुवन में,<br />विलक्षण बात मेरे ही लिए है,<br />नियति का घात मेरे ही लिए है ।</p>\r\n<p>'मगर, है ठीक, किस्मत ही फंसे जब,<br />धरा ही कर्ण का स्यन्दन ग्रसे जब,<br />सिवा राधेय के पौरुष प्रबल से,<br />निकाले कौन उसको बाहुबल से ?'</p>\r\n<p>उछलकर कर्ण स्यन्दन से उतर कर,<br />फंसे रथ-चक्र को भुज-बीच भर कर,<br />लगा ऊपर उठाने जोर करके,<br />कभी सीधा, कभी झकझोर करके ।</p>\r\n<p>मही डोली, सलिल-आगार डोला,<br />भुजा के जोर से संसार डोला<br />न डोला, किन्तु, जो चक्का फंसा था,<br />चला वह जा रहा नीचे धंसा था ।</p>\r\n<p>विपद में कर्ण को यों ग्रस्त पाकर,<br />शरासनहीन, अस्त-व्यस्त पाकर,<br />जगा कर पार्थ को भगवान् बोले _<br />'खडा है देखता क्या मौन, भोले ?'</p>\r\n<p>'शरासन तान, बस अवसर यही है,<br />घड़ी फ़िर और मिलने की नहीं है ।<br />विशिख कोई गले के पार कर दे,<br />अभी ही शत्रु का संहार कर दे ।'</p>\r\n<p>श्रवण कर विश्वगुरु की देशना यह,<br />विजय के हेतु आतुर एषणा यह,<br />सहम उट्ठा जरा कुछ पार्थ का मन,<br />विनय में ही, मगर, बोला अकिञ्चन ।</p>\r\n<p>'नरोचित, किन्तु, क्या</p>\r\n<p>&nbsp;</p>","raw_content":"  निशा बीती, गगन का रूप दमका, किनारे पर किसी का चीर चमका। क्षितिज के पास लाली छा रही है, अतल से कौन ऊपर आ रही है ?   संभाले शीश पर आलोक-मंडल दिशाओं में उड़ाती ज्योतिरंचल, किरण में स्निग्ध आतप फेंकती-सी, शिशिर कम्पित द्रुमों को सेंकती-सी,   खगों का स्पर्श से कर पंख-मोचन कुसुम के पोंछती हिम-सिक्त लोचन, दिवस की स्वामिनी आई गगन में, उडा कुंकुम, जगा जीवन भुवन में ।   मगर, नर बुद्धि-मद से चूर होकर, अलग बैठा हुआ है दूर होकर, उषा पोंछे भला फिर आँख कैसे ? करे उन्मुक्त मन की पाँख कैसे ?   मनुज विभ्राट् ज्ञानी हो चुका है, कुतुक का उत्स पानी हो चुका है, प्रकृति में कौन वह उत्साह खोजे ? सितारों के हृदय में राह खोजे ?   विभा नर को नहीं भरमायगी यह है ? मनस्वी को कहाँ ले जायगी यह ? कभी मिलता नहीं आराम इसको, न छेड़ो, है अनेकों काम इसको ।   महाभारत मही पर चल रहा है, भुवन का भाग्य रण में जल रहा है। मनुज ललकारता फिरता मनुज को, मनुज ही मारता फिरता मनुज को ।   पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है, सहेली सर्पिणी की हो चुकी है, न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह, निगल ही जायगी सद्धर्म को वह ।   मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें, पिता के प्राण सुत के साथ छूटें, मचे घनघोर हाहाकार जग में, भरे वैधव्य की चीत्कार जग में,   मगर, पत्थर हुआ मानव- हृदय है, फकत, वह खोजता अपनी विजय है, नहीं ऊपर उसे यदि पायगा वह, पतन के गर्त में भी जायगा वह ।   पड़े सबको लिये पाण्डव पतन में, गिरे जिस रोज होणाचार्य रण में, बड़े धर्मिंष्ठ, भावुक और भोले, युधिष्ठिर जीत के हित झूठ बोले ।   नहीं थोड़े बहुत का मेद मानो, बुरे साधन हुए तो सत्य जानो, गलेंगे बर्फ में मन भी, नयन भी, अँगूठा ही नहीं, संपूर्ण तन भी ।   नमन उनको, गये जो स्वर्ग मर कर, कलंकित शत्रु को, निज को अमर कर, नहीं अवसर अधिक दुख-दैन्य का है, हुआ राधेय नायक सैन्य का है ।   जगा लो वह निराशा छोड़ करके, द्विधा का जाल झीना तोड़ करके, गरजता ज्योति-के आधार ! जय हो, चरम आलोक मेरा भी उदय हो ।   बहुत धुधुआ चुकी, अब आग फूटे, किरण सारी सिमट कर आज छुटे । छिपे हों देवता ! अंगार जो भी,\" दबे हों प्राण में हुंकार जो भी,   उन्हें पुंजित करो, आकार दो हे ! मुझे मेरा ज्वलित श्रृंगार दो हे ! पवन का वेग दो, दुर्जय अनल दो, विकर्तन ! आज अपना तेज-बल हूँ दो !   मही का सूर्य होना चाहता हूँ, विभा का तूर्य होना चाहता हूँ। समय को चाहता हूँ दास करना, अभय हो मृत्यु का उपहास करना ।   भुजा की थाह पाना चाहता हूँ, हिमालय को उठाना चाहता हूँ, समर के सिन्धु को मथ कर शरों से, धरा हूँ चाहता श्री को करों से ।   ग्रहों को खींच लाना चाहता हूँ, हथेली पर नचाना चाहता हूँ । मचलना चाहता हूँ धार पर मैं, हँसा हूँ चाहता अंगार पर मैं।   समूचा सिन्धु पीना चाहता हूँ, धधक कर आज जीना चाहता हूँ, समय को बन्द करके एक क्षण में, चमकना चाहता हूँ हो सघन मैं ।   असंभव कल्पना साकार होगी, पुरुष की आज जयजयकार होगी। समर वह आज ही होगा मही पर, न जैसा था हुआ पहले कहीं पर ।   चरण का भार लो, सिर पर सँभालो; नियति की दूतियो ! मस्तक झुका लो । चलो, जिस भाँति चलने को कहूँ मैं, ढलो, जिस माँति ढलने को कहूँ मैं ।   न कर छल-छद्म से आघात फूलो, पुरुष हूँ मैं, नहीं यह बात भूलो । कुचल दूँगा, निशानी मेट दूँगा, चढा दुर्जय भुजा की भेंट दूँगा ।   अरी, यों भागती कबतक चलोगी ? मुझे ओ वंचिके ! कबतक छलोगी ? चुराओगी कहाँ तक दाँव मेरा ? रखोगी रोक कबतक पाँव मेरा ?   अभी भी सत्त्व है उद्दाम तुमसे, हृदय की भावना निष्काम तुमसे, चले संघर्ष आठों याम तुमसे, करूँगा अन्त तक संग्राम तुमसे ।   कहाँ तक शक्ति से वंचित करोगी ? कहाँ तक सिद्धियां मेरी हरोगी ? तुम्हारा छद्म सारा शेष होगा, न संचय कर्ण का नि:शेष होगा ।   कवच-कुण्डल गया; पर, प्राण तो हैं, भुजा में शक्ति, धनु पर बाण तो हैं, गई एकघ्नि तो सब कुछ गया क्या ? बचा मुझमें नहीं कुछ भी नया क्या ?   समर की सूरता साकार हूँ मैं, महा मार्तण्ड का अवतार हूँ मैं। विभूषण वेद-भूषित कर्म मेरा, कवच है आज तक का धर्म मेरा ।   तपस्याओ ! उठो, रण में गलो तुम, नई एकघ्नियां वन कर ढलो तुम, अरी ओ सिद्धियों की आग, आओ; प्रलय का तेज बन मुझमें समाओ ।   कहाँ हो पुण्य ? बाँहों में भरो तुम, अरी व्रत-साधने ! आकार लो तुम । हमारे योग की पावन शिखाओ, समर में आज मेरे साथ आओ ।   उगी हों ज्योतियां यदि दान से भी, मनुज-निष्ठा, दलित-कल्याण से भी, चलें वे भी हमारे साथ होकर, पराक्रम-शौर्य की ज्वाला संजो कर ।   हृदय से पूजनीया मान करके, बड़ी ही भक्ति से सम्मान करके, सुवामा-जाति को सुख दे सका हूँ, अगर आशीष उनसे ले सका हूँ,   समर में तो हमारा वर्म हो वह, सहायक आज ही सत्कर्म हो वह । सहारा, माँगता हूँ पुण्य-बल का, उजागर धर्म का, निष्ठा अचल का।   प्रवंचित हूँ, नियति की दृष्टि में दोषी बड़ा हूँ, विधाता से किये विद्रोह जीवन में खड़ा हूँ । स्वयं भगवान मेरे शत्रु को ले चल रहे हैं, अनेकों भाँति से गोविन्द मुझको छल रहे हैं।   मगर, राधेय का स्यन्दन नहीं तब भी रुकेगा, नहीं गोविन्द को भी युध्द में मस्तक झुकेगा, बताऊँगा उन्हें मैं आज, नर का धर्म क्या है, समर कहते किसे हैं और जय का मर्म क्या है ।   बचा कर पाँव धरना, थाहते चलना समर को, 'बनाना ग्रास अपनी मृत्यु का योद्धा अपर को, पुकारे शत्रु तो छिप व्यूह में प्रच्छन्न रहना, सभी के सामने ललकार को मन मार सहना ।   प्रकट होना विपद के बीच में प्रतिवीर हो जब, धनुष ढीला, शिथिल उसका जरा कुछ तीर हो जब । कहाँ का धर्म ? कैसी भर्त्सना की बात है यह ? नहीं यह वीरता, कौटिल्य का अपघात है यह ।   समझ में कुछ न आता, कृष्ण क्या सिखला रहे हैं, जगत को कौन नूतन पुण्य-पथ दिखला रहे हैं । हुआ वध द्रोण का कल जिस तरह वह धर्म था क्या ? समर्थन-योग्य केशव के लिए वह कर्म था क्या ?   यही धर्मिष्ठता ? नय-नीति का पालन यही है ? मनुज मलपुंज के मालिन्य का क्षालन यही है ? यही कुछ देखकर संसार क्या आगे बढ़ेगा ? जहाँ गोविन्द हैं, उस श्रृंग के ऊपर चढ़ेगा ?   करें भगवान जो चाहें, उन्हें सब क्वा क्षमा है, मगर क्या वज्र का विस्फोट छींटों से थमा है ? चलें वे बुद्धि की ही चाल, मैं बल से चलूंगा ? न तो उनको, न होकर जिह्न अपने को छलूंगा ।   डिगाना घर्म क्या इस चार बित्त्रों की मही को ? भुलाना क्या मरण के बादवाली जिन्दगी को ? बसाना एक पुर क्या लाख जन्मों को जला कर ! मुकुट गढ़ना भला क्या पुण्य को रण में गला कर ?   नहीं राधेय सत्पथ छोड़ कर अघ-ओक लेगा, विजय पाये न पाये, रश्मियों का लोक लेगा ! विजय-गुरु कृष्ण हों, गुरु किन्तु, मैं बलिदान का हूँ; असीसें देह को वे, मैं निरन्तर प्राण का हूँ ।   जगी, वलिदान की पावन शिखाओ, समर में आज कुछ करतब दिखाओ । नहीं शर ही, सखा सत्कर्म भी हो, धनुष पर आज मेरा धर्म भी हो ।   मचे भूडोल प्राणों के महल में, समर डूबे हमारे बाहु-बल में । गगन से वज्र की बौछार छूटे, किरण के तार से झंकार फूटे ।   चलें अचलेश, पारावार डोले; मरण अपनी पुरी का द्वार खोले । समर में ध्वंस फटने जा रहा है, महीमंडल उलटने जा रहा है ।   अनूठा कर्ण का रण आज होगा, जगत को काल-दर्शन आज होगा । प्रलय का भीम नर्तन आज होगा, वियद्व्यापी विवर्तन आज होगा ।   विशिख जब छोड़ कर तरकस चलेगा, नहीं गोविन्द का भी बस चलेगा । गिरेगा पार्थ का सिर छिन्न धड़ से, जयी कुरुराज लौटेगा समर से ।   बना आनन्द उर में छा रहा है, लहू में ज्वार उठता जा रहा है । हुआ रोमांच यह सारे बदन में, उगे हैं या कटीले वृक्ष तन में ।   अहा ! भावस्थ होता जा रहा हूँ, जगा हूँ या कि सोता जा रहा हूँ ? बजाओ, युद्ध के बाजे बजाओ, सजाओ, शल्य ! मेरा रथ सजाओ ।   2 रथ सजा, भेरियां घमक उठीं, गहगहा उठा अम्बर विशाल, कूदा स्यन्दन पर गरज कर्ण ज्यों उठे गरज क्रोधान्ध काल । बज उठे रोर कर पटह-कम्बु, उल्लसित वीर कर उठे हूह, उच्छल सागर-सा चला कर्ण को लिये क्षुब्ध सैनिक-समूह ।   हेषा रथाश्व की, चक्र-रोर, दन्तावल का वृहित अपार, टंकार धुनुर्गुण की भीम, दुर्मद रणशूरों की पुकार । खलमला उठा ऊपर खगोल, कलमला उठा पृथ्वी का तन, सन-सन कर उड़ने लगे विशिख, झनझना उठी असियाँ झनझन ।   तालोच्च-तरंगावृत बुभुक्षु-सा लहर उठा संगर-समुद्र, या पहन ध्वंस की लपट लगा नाचने समर में स्वयं रुद्र । हैं कहाँ इन्द्र ? देखें, कितना प्रज्वलित मर्त्य जन होता है ? सुरपति से छले हुए नर का कैसा प्रचण्ड रण होता है ?   अङगार-वृष्टि पा धधक उठ जिस तरह शुष्क कानन का तृण, सकता न रोक शस्त्री की गति पुञ्जित जैसे नवनीत मसृण । यम के समक्ष जिस तरह नहीं चल पाता बध्द मनुज का वश, हो गयी पाण्डवों की सेना त्योंही बाणों से विध्द, विवश ।   भागने लगे नरवीर छोड वह दिशा जिधर भी झुका कर्ण, भागे जिस तरह लवा का दल सामने देख रोषण सुपर्ण ! 'रण में क्यों आये आज ?' लोग मन-ही-मन में पछताते थे, दूर से देखकर भी उसको, भय से सहमे सब जाते थे ।   काटता हुआ रण-विपिन क्षुब्ध, राधेय गरजता था क्षण-क्षण । सुन-सुन निनाद की धमक शत्रु का, व्यूह लरजता था क्षण-क्षण । अरि की सेना को विकल देख, बढ चला और कुछ समुत्साह; कुछ और समुद्वेलित होकर, उमडा भुज का सागर अथाह ।   गरजा अशङक हो कर्ण, 'शल्य ! देखो कि आज क्या करता हूं, कौन्तेय-कृष्ण, दोनों को ही, जीवित किस तरह पकडता हूं । बस, आज शाम तक यहीं सुयोधन का जय-तिलक सजा करके, लौटेंगे हम, दुन्दुभि अवश्य जय की, रण-बीच बजा करके ।   इतने में कुटिल नियति-प्रेरित पड ग़ये सामने धर्मराज, टूटा कृतान्त-सा कर्ण, कोक पर पडे टूट जिस तरह बाज । लेकिन, दोनों का विषम युध्द, क्षण भर भी नहीं ठहर पाया, सह सकी न गहरी चोट, युधिष्ठर की मुनि-कल्प, मृदुल काया ।   भागे वे रण को छोड, क़र्ण ने झपट दौडक़र गहा ग्रीव, कौतुक से बोला, 'महाराज ! तुम तो निकले कोमल अतीव । हां, भीरु नहीं, कोमल कहकर ही, जान बचाये देता हूं । आगे की खातिर एक युक्ति भी सरल बताये देता हूं ।   'हैं विप्र आप, सेविये धर्म, तरु-तले कहीं, निर्जन वन में, क्या काम साधुओं का, कहिये, इस महाघोर, घातक रण में ? मत कभी क्षात्रता के धोखे, रण का प्रदाह झेला करिये, जाइये, नहीं फिर कभी गरुड क़ी झपटों से खेला करिये ।'   भागे विपन्न हो समर छोड ग्लानि में निमज्जित धर्मराज, सोचते, \"कहेगा क्या मन में जानें, यह शूरों का समाज ? प्राण ही हरण करके रहने क्यों नहीं हमारा मान दिया ? आमरण ग्लानि सहने को ही पापी ने जीवन-दान दिया ।\"   समझे न हाय, कौन्तेय ! कर्ण ने छोड दिये, किसलिए प्राण, गरदन पर आकर लौट गयी सहसा, क्यों विजयी की कृपाण ? लेकिन, अदृश्य ने लिखा, कर्ण ने वचन धर्म का पाल किया, खड्ग का छीन कर ग्रास, उसे मां के अञ्चल में डाल दिया ।   कितना पवित्र यह शील ! कर्ण जब तक भी रहा खडा रण में, चेतनामयी मां की प्रतिमा घूमती रही तब तक मन में । सहदेव, युधिष्ठर, नकुल, भीम को बार-बार बस में लाकर, कर दिया मुक्त हंस कर उसने भीतर से कुछ इङिगत पाकर ।   देखता रहा सब श्लय, किन्तु, जब इसी तरह भागे पवितन, बोला होकर वह चकित, कर्ण की ओर देख, यह परुष वचन, 'रे सूतपुत्र ! किसलिए विकट यह कालपृष्ठ धनु धरता है ? मारना नहीं है तो फिर क्यों, वीरों को घेर पकडता है ?'   'संग्राम विजय तू इसी तरह सन्ध्या तक आज करेगा क्या ? मारेगा अरियों को कि उन्हें दे जीवन स्वयं मरेगा क्या ? रण का विचित्र यह खेल, मुझे तो समझ नहीं कुछ पडता है, कायर ! अवश्य कर याद पार्थ की, तू मन ही मन डरता है ।'   हंसकर बोला राधेय, 'शल्य, पार्थ की भीति उसको होगी, क्षयमान्, क्षनिक, भंगुर शरीर पर मृषा प्रीति जिसको होगी । इस चार दिनों के जीवन को, मैं तो कुछ नहीं समझता हूं, करता हूं वही, सदा जिसको भीतर से सही समझता हूं ।   'पर ग्रास छीन अतिशय बुभुक्षु, अपने इन बाणों के मुख से, होकर प्रसन्न हंस देता हूं, चञ्चल किस अन्तर के सुख से; यह कथा नहीं अन्त:पुर की, बाहर मुख से कहने की है, यह व्यथा धर्म के वर-समान, सुख-सहित, मौन सहने की है ।   'सब आंख मूंद कर लडते हैं, जय इसी लोक में पाने को, पर, कर्ण जूझता है कोई, ऊंचा सध्दर्म निभाने को, सबके समेत पङिकल सर में, मेरे भी चरण पडेंग़े क्या ? ये लोभ मृत्तिकामय जग के, आत्मा का तेज हरेंगे क्या ?   यह देह टूटने वाली है, इस मिट्टी का कब तक प्रमाण ? मृत्तिका छोड ऊपर नभ में भी तो ले जाना है विमान । कुछ जुटा रहा सामान खमण्डल में सोपान बनाने को, ये चार फुल फेंके मैंने, ऊपर की राह सजाने को   ये चार फुल हैं मोल किन्हीं कातर नयनों के पानी के, ये चार फुल प्रच्छन्न दान हैं किसी महाबल दानी के । ये चार फुल, मेरा अदृष्ट था हुआ कभी जिनका कामी, ये चार फुल पाकर प्रसन्न हंसते होंगे अन्तर्यामी ।'   'समझोगे नहीं शल्य इसको, यह करतब नादानों का हैं, ये खेल जीत से बडे क़िसी मकसद के दीवानों का हैं । जानते स्वाद इसका वे ही, जो सुरा स्वप्न की पीते हैं, दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग खडे ज़ो जीते हैं ।'   समझा न, सत्य ही, शल्य इसे, बोला 'प्रलाप यह बन्द करो, हिम्मत हो तो लो करो समर,बल हो, तो अपना धनुष धरो । लो, वह देखो, वानरी ध्वजा दूर से दिखायी पडती है, पार्थ के महारथ की घर्घर आवाज सुनायी पडती है ।'   'क्या वेगवान हैं अश्व ! देख विधुत् शरमायी जाती है, आगे सेना छंट रही, घटा पीछे से छायी जाती है । राधेय ! काल यह पहंुच गया, शायक सन्धानित तूर्ण करो, थे विकल सदा जिसके हित, वह लालसा समर की पूर्ण करो ।'   पार्थ को देख उच्छल-उमंग-पूरित उर-पारावार हुआ, दम्भोलि-नाद कर कर्ण कुपित अन्तक-सा भीमाकार हुआ । वोला 'विधि ने जिस हेतु पार्थ ! हम दोनों का निर्माण किया, जिस लिए प्रकृति के अनल-तत्त्व का हम दोनों ने पान किया ।   'जिस दिन के लिए किये आये, हम दोनों वीर अथक साधन, आ गया भाग्य से आज जन्म-जन्मों का निर्धारित वह क्षण । आओ, हम दोनों विशिख-वह्नि-पूजित हो जयजयकार करें, ममच्छेदन से एक दूसरे का जी-भर सत्कार करें ।'   'पर, सावधान, इस मिलन-बिन्दु से अलग नहीं होना होगा, हम दोनों में से किसी एक को आज यहीं सोना होगा । हो गया बडा अतिकाल, आज निर्णय अन्तिम कर लेना है, शत्रु का या कि अपना मस्तक, काट कर यहीं धर देना है ।'   कर्ण का देख यह दर्प पार्थ का, दहक उठा रविकान्त-हृदय, बोला, 'रे सारथि-पुत्र ! किया तू ने, सत्य ही योग्य निश्चय । पर कौन रहेगा यहां ? बात यह अभी बताये देता हूं, धड पर से तेरा सीस मूढ ! ले, अभी हटाये देता हूं ।'   यह कह अर्जुन ने तान कान तक, धनुष-बाण सन्धान किया, अपने जानते विपक्षी को हत ही उसने अनुमान किया । पर, कर्ण झेल वह महा विशिक्ष, कर उठा काल-सा अट्टहास, रण के सारे स्वर डूब गये, छा गया निनद से दिशाकाश ।   बोला, 'शाबाश, वीर अर्जुन ! यह खूब गहन सत्कार रहा; पर, बुरा न मानो, अगर आन कर मुझ पर वह बेकार रहा । मत कवच और कुण्डल विहीन, इस तन को मृदुल कमल समझो, साधना-दीप्त वक्षस्थल को, अब भी दुर्भेद्य अचल समझो ।'   'अब लो मेरा उपहार, यही यमलोक तुम्हें पहुंचायेगा, जीवन का सारा स्वाद तुम्हें बस, इसी बार मिल जायेगा ।' कह इस प्रकार राधेय अधर को दबा, रौद्रता में भरके, हुङकार उठा घातिका शक्ति विकराल शरासन पर धरके ।'   संभलें जब तक भगवान्, नचायें इधर-उधर किञ्चित स्यन्दन, तब तक रथ में ही, विकल, विध्द, मूच्र्छित हो गिरा पृथानन्दन । कर्ण का देख यह समर-शौर्य सङगर में हाहाकार हुआ, सब लगे पूछने, 'अरे, पार्थ का क्या सचमुच संहार हुआ ?'   पर नहीं, मरण का तट छूकर, हो उठा अचिर अर्जुन प्रबुध्द; क्रोधान्ध गरज कर लगा कर्ण के साथ मचाने द्विरथ-युध्द । प्रावृट्-से गरज-गरज दोनों, करते थे प्रतिभट पर प्रहार, थी तुला-मध्य सन्तुलित खडी, लेकिन दोनों की जीत हार ।   इस ओर कर्ण र्मात्तण्ड-सदृश, उस ओर पार्थ अन्तक-समान, रण के मिस, मानो, स्वयं प्रलय, हो उठा समर में मूर्तिमान । जूझता एक क्षण छोड, स्वत:, सारी सेना विस्मय-विमुग्ध, अपलक होकर देखने लगी दो शितिकण्ठों का विकट युध्द ।   है कथा, नयन का लोभ नहीं, संवृत कर सके स्वयं सुरगण, भर गया विमानों से तिल-तिल, कुरुभू पर कलकल-नदित-गगन । थी रुकी दिशा की सांस, प्रकृति के निखिल रुप तन्मय-गभीर, ऊपर स्तम्भित दिनमणि का रथ, नीचे नदियों का अचल नीर ।   अहा ! यह युग्म दो अद्भुत नरों का, महा मदमत्त मानव- कुंजरों का; नृगुण के मूर्तिमय अवतार ये दो, मनुज-कुल के सुभग श्रृंगार ये दो।   परस्पर हो कहीं यदि एक पाते, ग्रहण कर शील की यदि टेक पाते, मनुजता को न क्या उत्थान मिलता ? अनूठा क्या नहीं वरदान मिलता ?   मनुज की जाति का पर शाप है यह, अभी बाकी हमारा पाप है यह, बड़े जो भी कुसुम कुछ फूलते हैं, अहँकृति में भ्रमित हो भूलते हैं ।   नहीं हिलमिल विपिन को प्यार करते, झगड़ कर विश्व का संहार करते । जगत को डाल कर नि:शेष दुख में, शरण पाते स्वयं भी काल-मुख में ।   चलेगी यह जहर की क्रान्ति कबतक ? रहेगी शक्ति-वंचित शांति कबतक ? मनुज मनुजत्व से कबतक लड़ेगा ? अनल वीरत्व से कबतक झड़ेगा ?   विकृति जो प्राण में अंगार भरती, हमें रण के लिए लाचार करती, घटेगी तीव्र उसका दाह कब तक ? मिलेगी अन्य उसको राह कब तक ?   हलाहल का शमन हम खोजते हैं, मगर, शायद, विमन हम खोजते हैं, बुझाते है दिवस में जो जहर हम, जगाते फूंक उसको रात भर हम ।   किया कुंचित, विवेचन व्यस्त नर का, हृदय शत भीति से संत्रस्त नर का । महाभारत मही पर चल रहा है, भुवन का भाग्य रण में जल रहा है ।   चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग, फट कुरुक्षेत्र में खेल रही नर के भीतर की कुटिल आग । बाजियों-गजों की लोथों में गिर रहे मनुज के छिन्न अंग, बह रहा चतुष्पद और द्विपद का रुधिर मिश्र हो एक संग ।   गत्वर, गैरेय, सुघर भूधर-से लिये रक्त-रंजित शरीर, थे जूझ रहे कौन्तेय-कर्ण क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर । दोनों रणकृशल धनुर्धर नर, दोनों समबल, दोनों समर्थ, दोनों पर दोनों की अमोघ थी विशिख-वृष्टि हो रही व्यर्थ ।   इतने में शर के कर्ण ने देखा जो अपना निषङग, तरकस में से फुङकार उठा, कोई प्रचण्ड विषधर भूजङग, कहता कि 'कर्ण! मैं अश्वसेन विश्रुत भुजंगो का स्वामी हूं, जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूं ।   'बस, एक बार कर कृपा धनुष पर चढ शरव्य तक जाने दे, इस महाशत्रु को अभी तुरत स्यन्दन में मुझे सुलाने दे । कर वमन गरल जीवन भर का सञ्चित प्रतिशोध उतारूंगा, तू मुझे सहारा दे, बढक़र मैं अभी पार्थ को मारूंगा ।'   राधेय जरा हंसकर बोला, 'रे कुटिल! बात क्या कहता है ? जय का समस्त साधन नर का अपनी बांहों में रहता है । उस पर भी सांपों से मिल कर मैं मनुज, मनुज से युध्द करूं ? जीवन भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुध्द करूं ?'   'तेरी सहायता से जय तो मैं अनायास पा जाऊंगा, आनेवाली मानवता को, लेकिन, क्या मुख दिखलाऊंगा ? संसार कहेगा, जीवन का सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया; प्रतिभट के वध के लिए सर्प का पापी ने साहाय्य लिया ।'   'रे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी, सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुर-ग्राम-घरों में भी । ये नर-भुजङग मानवता का पथ कठिन बहुत कर देते हैं, प्रतिबल के वध के लिए नीच साहाय्य सर्प का लेते हैं ।'   'ऐसा न हो कि इन सांपो में मेरा भी उज्ज्वल नाम चढे । पाकर मेरा आदर्श और कुछ नरता का यह पाप बढे । अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है, संघर्ष सनातन नहीं, शत्रुता इस जीवन भर ही तो है ।'   'अगला जीवन किसलिए भला, तब हो द्वेषान्ध बिगाडं मैं ? सांपो की जाकर शरण, सर्प बन क्यों मनुष्य को मारूं मैं ? जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता, मैं किसी हेतु भी यह कलङक अपने पर नहीं लगा सकता ।'   काकोदर को कर विदा कर्ण, फिर बढ़ा समर में गर्जमान, अम्बर अनन्त झङकार उठा, हिल उठे निर्जरों के विमान । तूफ़ान उठाये चला कर्ण बल से धकेल अरि के दल को, जैसे प्लावन की धार बहाये चले सामने के जल को।   पाण्डव-सेना भयभीत भागती हुई जिधर भी जाती थी; अपने पीछे दौडते हुए वह आज कर्ण को पाती थी । रह गयी किसी के भी मन में जय की किञ्चित भी नहीं आस, आखिर, बोले भगवान् सभी को देख व्याकुल हताश ।   'अर्जुन ! देखो, किस तरह कर्ण सारी सेना पर टूट रहा, किस तरह पाण्डवों का पौरुष होकर अशङक वह लूट रहा । देखो जिस तरफ़, उधर उसके ही बाण दिखायी पडते हैं, बस, जिधर सुनो, केवल उसके हुङकार सुनायी पडते हैं ।'   'कैसी करालता ! क्या लाघव ! कितना पौरुष ! कैसा प्रहार ! किस गौरव से यह वीर द्विरद कर रहा समर-वन में विहार ! व्यूहों पर व्यूह फटे जाते, संग्राम उजडता जाता है, ऐसी तो नहीं कमल वन में भी कुञ्जर धूम मचाता है ।'   'इस पुरुष-सिंह का समर देख मेरे तो हुए निहाल नयन, कुछ बुरा न मानो, कहता हूं, मैं आज एक चिर-गूढ वचन । कर्ण के साथ तेरा बल भी मैं खूब जानता आया हूं, मन-ही-मन तुझसे बडा वीर, पर इसे मानता आया हूं ।'   औ' देख चरम वीरता आज तो यही सोचता हूं मन में, है भी कोई, जो जीत सके, इस अतुल धनुर्धर को रण में ? मैं चक्र सुदर्शन धरूं और गाण्डीव अगर तू तानेगा, तब भी, शायद ही, आज कर्ण आतङक हमारा मानेगा ।'   'यह नहीं देह का बल केवल, अन्तर्नभ के भी विवस्वान्, हैं किये हुए मिलकर इसको इतना प्रचण्ड जाज्वल्यमान । सामान्य पुरुष यह नहीं, वीर यह तपोनिष्ठ व्रतधारी है; मृत्तिका-पुञ्ज यह मनुज ज्योतियों के जग का अधिकारी है ।'   'कर रहा काल-सा घोर समर, जय का अनन्त विश्वास लिये, है घूम रहा निर्भय, जानें, भीतर क्या दिव्य प्रकाश लिये ! जब भी देखो, तब आंख गडी सामने किसी अरिजन पर है, भूल ही गया है, एक शीश इसके अपने भी तन पर है ।'   'अर्जुन ! तुम भी अपने समस्त विक्रम-बल का आह्वान करो, अर्जित असंख्य विद्याओं का हो सजग हृदय में ध्यान करो । जो भी हो तुममें तेज, चरम पर उसे खींच लाना होगा, तैयार रहो, कुछ चमत्कार तुमको भी दिखलाना होगा ।'   दिनमणि पश्चिम की ओर ढले देखते हुए संग्राम घोर, गरजा सहसा राधेय, न जाने, किस प्रचण्ड सुख में विभोर । 'सामने प्रकट हो प्रलय ! फाड़ तुझको मैं राह बनाऊंगा, जाना है तो तेरे भीतर संहार मचाता जाऊंगा ।'   'क्या धमकाता है काल ? अरे, आ जा, मुट्ठी में बन्द करूं । छुट्टी पाऊं, तुझको समाप्त कर दूं, निज को स्वच्छन्द करूं । ओ शल्य ! हयों को तेज करो, ले चलो उड़ाकर शीघ्र वहां, गोविन्द-पार्थ के साथ डटे हों चुनकर सारे वीर जहां ।'   'हो शास्त्रों का झन-झन-निनाद, दन्तावल हों चिंग्घार रहे, रण को कराल घोषित करके हों समरशूर हुङकार रहे, कटते हों अगणित रुण्ड-मुण्ड, उठता होर आर्त्तनाद क्षण-क्षण, झनझना रही हों तलवारें; उडते हों तिग्म विशिख सन-सन ।'   'संहार देह धर खड़ा जहां अपनी पैंजनी बजाता हो, भीषण गर्जन में जहां रोर ताण्डव का डूबा जाता हो । ले चलो, जहां फट रहा व्योम, मच रहा जहां पर घमासान, साकार ध्वंस के बीच पैठ छोड़ना मुझे है आज प्राण ।'   समझ में शल्य की कुछ भी न आया, हयों को जोर से उसने भगाया । निकट भगवान् के रथ आन पहुंचा, अगम, अज्ञात का पथ आन पहुंचा ?   अगम की राह, पर, सचमुच, अगम है, अनोखा ही नियति का कार्यक्रम है । न जानें न्याय भी पहचानती है, कुटिलता ही कि केवल जानती है ?   रहा दीपित सदा शुभ धर्म जिसका, चमकता सूर्य-सा था कर्म जिसका, अबाधित दान का आधार था जो, धरित्री का अतुल श्रृङगार था जो,   क्षुधा जागी उसी की हाय, भू को, कहें क्या मेदिनी मानव-प्रसू को ? रुधिर के पङक में रथ को जकड़ क़र, गयी वह बैठ चक्के को पकड़ क़र ।   लगाया जोर अश्वों ने न थोडा, नहीं लेकिन, मही ने चक्र छोडा । वृथा साधन हुए जब सारथी के, कहा लाचार हो उसने रथी से ।   'बडी राधेय ! अद्भुत बात है यह । किसी दु:शक्ति का ही घात है यह । जरा-सी कीच में स्यन्दन फंसा है, मगर, रथ-चक्र कुछ ऐसा धंसा है;'   'निकाले से निकलता ही नहीं है, हमारा जोर चलता ही नहीं है, जरा तुम भी इसे झकझोर देखो, लगा अपनी भुजा का जोर देखो ।'   हँसा राधेय कर कुछ याद मन में, कहा, 'हां सत्य ही, सारे भुवन में, विलक्षण बात मेरे ही लिए है, नियति का घात मेरे ही लिए है ।   'मगर, है ठीक, किस्मत ही फंसे जब, धरा ही कर्ण का स्यन्दन ग्रसे जब, सिवा राधेय के पौरुष प्रबल से, निकाले कौन उसको बाहुबल से ?'   उछलकर कर्ण स्यन्दन से उतर कर, फंसे रथ-चक्र को भुज-बीच भर कर, लगा ऊपर उठाने जोर करके, कभी सीधा, कभी झकझोर करके ।   मही डोली, सलिल-आगार डोला, भुजा के जोर से संसार डोला न डोला, किन्तु, जो चक्का फंसा था, चला वह जा रहा नीचे धंसा था ।   विपद में कर्ण को यों ग्रस्त पाकर, शरासनहीन, अस्त-व्यस्त पाकर, जगा कर पार्थ को भगवान् बोले _ 'खडा है देखता क्या मौन, भोले ?'   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सूर्य का ठीक, मगर, तुम इतनी बात नहीं भूलो।   एक सूर्य के ही मारे हम विपद कौन कम सहते हैं, गर्मी भर सारे जलवासी छटपट करते रहते हैं।   अगर सूर्य ने ब्याह किय, दस-पाँच पुत्र जन्माएगा, सोचो, तब उतने सूर्यों का ताप कौन सह पाएगा?   अच्छा है, सूरज क्वाँरा है, वंश विहीन, अकेला है, इस प्रचंड का ब्याह जगत की खातिर बड़ा झमेला है।’","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_post/dinkar.jpg","slug":"suraja-ka-byaha","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/suraja-ka-byaha","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/suraja-ka-byaha.mp3","created":"2024-02-02T16:13:39.084114","author":{"name":"Ramdhari Singh 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इतने में आ गया उधर से कोई एक सिपाही, बोला, ‘‘बेवकूफ! क्या खाकर यों कर रहा तबाही?’’   कहा काबुली ने-‘‘मैं हूँ आदमी न ऐसा-वैसा! जा तू अपनी राह सिपाही, मैं खाता हूँ पैसा।’’","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_post/dinkar.jpg","slug":"mirca-ka-maza","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/mirca-ka-maza","readtime":"2 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/nushoor-wahidi/mirca-ka-maza.mp3","created":"2024-02-02T16:13:39.280640","author":{"name":"Ramdhari Singh 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देखने मैं जाता हूँ दिल्ली। चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,   पहन-ओढ़कर चूहा निकला चुहिया को समझाकर, इधर-उधर आँखें दौड़ाईं बिल से बाहर आकर। कोई कहीं नहीं था, चारों ओर दिशा थी सूनी, शुभ साइत को देख हुई चूहे की हिम्तत दूनी। चला अकड़कर, छड़ी लिये, छाते को सिर पर ताने, मस्ती मन की बढ़ी, लगा चूँ-चूँ करके कुछ गाने! इतने में लो पड़ी दिखाई कहीं दूर पर बिल्ली, चूहेराम भगे पीछे को, दूर रह गई दिल्ली। चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_post/dinkar.jpg","slug":"cuhe-ki-dilli-yatra","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/cuhe-ki-dilli-yatra","readtime":"2 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/cuhe-ki-dilli-yatra.mp3","created":"2024-02-02T16:13:39.461147","author":{"name":"Ramdhari Singh 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