{"count":56,"next":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/posts/?format=json&page=4","previous":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/posts/?format=json&page=2","results":[{"id":1470,"title":"विजयी के सदृश जियो रे","content":"<p><br />वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो<br />चट्टानों की छाती से दूध निकालो<br />है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो<br />पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो</p>\r\n<p>चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे<br />योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे!</p>\r\n<p>जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है<br />चिनगी बन फूलों का पराग जलता है<br />सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है<br />ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है<br />अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे<br />गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे!</p>\r\n<p>जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है<br />भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है<br />है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है<br />वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है</p>\r\n<p>उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है<br />तलवार प्रेम से और तेज होती है!</p>\r\n<p>छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये<br />मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये<br />दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है<br />मरता है जो एक ही बार मरता है</p>\r\n<p>तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे<br />जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!</p>\r\n<p>स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है<br />बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है</p>\r\n<p>वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे<br />जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!</p>\r\n<p>जब कभी अहम पर नियति चोट देती है<br />कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है<br />नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है<br />वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है</p>\r\n<p>चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे<br />धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!</p>\r\n<p>उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है<br />सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है<br />विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है<br />जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है</p>\r\n<p>सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा<br />पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!</p>","raw_content":"वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो चट्टानों की छाती से दूध निकालो है रुकी जहाँ भी धार शिलाएं तोड़ो पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो   चढ़ तुंग शैल शिखरों पर सोम पियो रे योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे!   जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है चिनगी बन फूलों का पराग जलता है सौन्दर्य बोध बन नयी आग जलता है ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे गरजे कृशानु तब कंचन शुद्ध करो रे!   जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है भामिनी वही तरुणी नर वही तरुण है है वही प्रेम जिसकी तरंग उच्छल है वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है   उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है तलवार प्रेम से और तेज होती है!   छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाये दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है मरता है जो एक ही बार मरता है   तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे!   स्वातंत्र्य जाति की लगन व्यक्ति की धुन है बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है   वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे!   जब कभी अहम पर नियति चोट देती है कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है   चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे!   उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिंतन है जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन है   सबसे स्वतंत्र रस जो भी अनघ पियेगा पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा!","image":null,"slug":"vijayi-ke-sadrsa-jiyo-re","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/vijayi-ke-sadrsa-jiyo-re","readtime":"2 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/vijayi-ke-sadrsa-jiyo-re.mp3","created":"2024-02-02T16:02:11.990681","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":3512,"name":"प्रेम","slug":"prema","url":"/tags/prema"},{"id":3723,"name":"लव","slug":"lava","url":"/tags/lava"},{"id":4732,"name":"जीवन","slug":"jivana","url":"/tags/jivana"},{"id":5775,"name":"वीर","slug":"vira","url":"/tags/vira"},{"id":6933,"name":"फूल","slug":"phula","url":"/tags/phula"},{"id":7300,"name":"देश","slug":"desa","url":"/tags/desa"},{"id":7353,"name":"रंग","slug":"ranga","url":"/tags/ranga"},{"id":8080,"name":"धर्म","slug":"dharma","url":"/tags/dharma"},{"id":8317,"name":"दर्शन","slug":"darsana","url":"/tags/darsana"},{"id":8426,"name":"ज्ञान","slug":"jnana","url":"/tags/jnana"},{"id":10531,"name":"बुद्ध","slug":"buddha","url":"/tags/buddha"},{"id":10660,"name":"मृत्यु","slug":"mrtyu","url":"/tags/mrtyu"},{"id":10671,"name":"जन्म","slug":"janma","url":"/tags/janma"},{"id":16518,"name":"सुख","slug":"sukha","url":"/tags/sukha"},{"id":17614,"name":"योग","slug":"yoga","url":"/tags/yoga"},{"id":20413,"name":"विज्ञान","slug":"vijnana","url":"/tags/vijnana"},{"id":23596,"name":"डर","slug":"dara","url":"/tags/dara"},{"id":23848,"name":"नियति","slug":"niyati","url":"/tags/niyati"},{"id":24166,"name":"आग","slug":"aga","url":"/tags/aga"},{"id":50122,"name":"तन","slug":"tana","url":"/tags/tana"},{"id":50379,"name":"लिंग","slug":"linga","url":"/tags/linga"},{"id":51254,"name":"तंत्र","slug":"tantra","url":"/tags/tantra"}],"comments_counts":0,"viewed_by":1081},{"id":1471,"title":"समर शेष है","content":"<p>ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,<br />किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?<br />किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,<br />भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?</p>\r\n<p>कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?<br />तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।</p>\r\n<p>फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !<br />ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!<br />सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,<br />दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।</p>\r\n<p>मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,<br />ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।</p>\r\n<p>वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है<br />जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है<br />देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है<br />माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है</p>\r\n<p>पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज<br />सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?</p>\r\n<p>अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?<br />तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?<br />सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?<br />उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में</p>\r\n<p>समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा<br />और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा</p>\r\n<p>समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा<br />जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा<br />धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं<br />गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं</p>\r\n<p>कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे<br />अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे</p>\r\n<p>समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो<br />शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो<br />पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे<br />समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे</p>\r\n<p>समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर<br />खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर</p>\r\n<p>समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं<br />गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं<br />समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है<br />वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है</p>\r\n<p>समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल<br />विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल</p>\r\n<p>तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना<br />सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना<br />बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे<br />मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे</p>\r\n<p>समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध<br />जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध</p>","raw_content":"ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो , किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो? किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से, भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?   कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान? तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।   फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले ! ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले! सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है, दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।   मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार, ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।   वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है   पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज सात वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?   अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है? तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है? सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में? उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में   समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा   समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं   कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे   समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे   समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर   समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है   समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल   तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे   समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध","image":null,"slug":"samara-sesa-hai","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/samara-sesa-hai","readtime":"3 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/samara-sesa-hai.mp3","created":"2024-02-02T16:02:12.115907","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":1037,"name":"माँ ","slug":"mam","url":"/tags/mam"},{"id":4067,"name":"दिल","slug":"dila","url":"/tags/dila"},{"id":4637,"name":"समय","slug":"samaya","url":"/tags/samaya"},{"id":6933,"name":"फूल","slug":"phula","url":"/tags/phula"},{"id":7020,"name":"भूख","slug":"bhukha","url":"/tags/bhukha"},{"id":7300,"name":"देश","slug":"desa","url":"/tags/desa"},{"id":7353,"name":"रंग","slug":"ranga","url":"/tags/ranga"},{"id":8080,"name":"धर्म","slug":"dharma","url":"/tags/dharma"},{"id":8349,"name":"घर","slug":"ghara","url":"/tags/ghara"},{"id":10228,"name":"मंदिर","slug":"mandira","url":"/tags/mandira"},{"id":10311,"name":"दिन","slug":"dina","url":"/tags/dina"},{"id":10469,"name":"युद्ध","slug":"yuddha","url":"/tags/yuddha"},{"id":11787,"name":"संसार","slug":"sansara","url":"/tags/sansara"},{"id":11887,"name":"जनता","slug":"janata","url":"/tags/janata"},{"id":13673,"name":"शांति","slug":"santi","url":"/tags/santi"},{"id":14843,"name":"गंगा","slug":"ganga","url":"/tags/ganga"},{"id":17350,"name":"दिल्ली","slug":"dilli","url":"/tags/dilli"},{"id":17439,"name":"राह","slug":"raha","url":"/tags/raha"},{"id":18394,"name":"आँख","slug":"amkha","url":"/tags/amkha"},{"id":19322,"name":"प्रकाश","slug":"prakasa","url":"/tags/prakasa"},{"id":23681,"name":"पर्वत","slug":"parvata","url":"/tags/parvata"},{"id":24166,"name":"आग","slug":"aga","url":"/tags/aga"},{"id":24377,"name":"मस्जिद","slug":"masjida","url":"/tags/masjida"},{"id":26667,"name":"यश","slug":"yasa","url":"/tags/yasa"},{"id":28590,"name":"पुत्र","slug":"putra","url":"/tags/putra"},{"id":33020,"name":"क्षितिज","slug":"ksitija","url":"/tags/ksitija"},{"id":33806,"name":"अहंकार","slug":"ahankara","url":"/tags/ahankara"},{"id":50031,"name":"किस","slug":"kisa","url":"/tags/kisa"},{"id":50133,"name":"तीर","slug":"tira","url":"/tags/tira"},{"id":50370,"name":"रौशनी","slug":"rausani","url":"/tags/rausani"}],"comments_counts":0,"viewed_by":9685},{"id":1472,"title":"सूझ","content":"<p><br />एक पढ़क्&zwj;कू बड़े तेज थे, तर्कशास्&zwj;त्र पढ़ते थे,</p>\r\n<p>जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे।</p>\r\n<p><br />एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए,</p>\r\n<p>\"बैल घुमता है कोल्&zwj;हू में कैसे बिना चलाए?\"</p>\r\n<p><br />कई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब है?</p>\r\n<p>सिखा बैल को रक्&zwj;खा इसने, निश्&zwj;चय कोई ढब है।</p>\r\n<p><br />आखिर, एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे,</p>\r\n<p>\"अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे?</p>\r\n<p><br />कोल्&zwj;हू का यह बैल तुम्&zwj;हारा चलता या अड़ता है?</p>\r\n<p>रहता है घूमता, खड़ा हो या पागुर करता है?\"</p>\r\n<p><br />मालिक ने यह कहा, \"अजी, इसमें क्&zwj;या बात बड़ी है?</p>\r\n<p>नहीं देखते क्&zwj;या, गर्दन में घंटी एक पड़ी है?</p>\r\n<p><br />जब तक यह बजती रहती है, मैं न फिक्र करता हूँ,</p>\r\n<p>हाँ, जब बजती नहीं, दौड़कर तनिक पूँछ धरता हूँ\"</p>\r\n<p><br />कहाँ पढ़क्&zwj;कू ने सुनकर, \"तुम रहे सदा के कोरे!</p>\r\n<p>बेवकूफ! मंतिख की बातें समझ सकोगे थाड़ी!</p>\r\n<p><br />अगर किसी दिन बैल तुम्&zwj;हारा सोच-समझ अड़ जाए,</p>\r\n<p>चले नहीं, बस, खड़ा-खड़ा गर्दन को खूब हिलाए।</p>\r\n<p><br />घंटी टून-टून खूब बजेगी, तुम न पास आओगे,</p>\r\n<p>मगर बूँद भर तेल साँझ तक भी क्&zwj;या तुम पाओगे?</p>\r\n<p><br />मालिक थोड़ा हँसा और बोला पढ़क्&zwj;कू जाओ,</p>\r\n<p>सीखा है यह ज्ञान जहाँ पर, वहीं इसे फैलाओ।</p>\r\n<p><br />यहाँ सभी कुछ ठीक-ठीक है, यह केवल माया है,</p>\r\n<p>बैल हमारा नहीं अभी तक मंतिख पढ़ पाया है।</p>\r\n<p>&nbsp;</p>","raw_content":"एक पढ़क्‍कू बड़े तेज थे, तर्कशास्‍त्र पढ़ते थे,   जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे।   एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए,   \"बैल घुमता है कोल्‍हू में कैसे बिना चलाए?\"   कई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब है?   सिखा बैल को रक्‍खा इसने, निश्‍चय कोई ढब है।   आखिर, एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे,   \"अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे?   कोल्‍हू का यह बैल तुम्‍हारा चलता या अड़ता है?   रहता है घूमता, खड़ा हो या पागुर करता है?\"   मालिक ने यह कहा, \"अजी, इसमें क्‍या बात बड़ी है?   नहीं देखते क्‍या, गर्दन में घंटी एक पड़ी है?   जब तक यह बजती रहती है, मैं न फिक्र करता हूँ,   हाँ, जब बजती नहीं, दौड़कर तनिक पूँछ धरता हूँ\"   कहाँ पढ़क्‍कू ने सुनकर, \"तुम रहे सदा के कोरे!   बेवकूफ! मंतिख की बातें समझ सकोगे थाड़ी!   अगर किसी दिन बैल तुम्‍हारा सोच-समझ अड़ जाए,   चले नहीं, बस, खड़ा-खड़ा गर्दन को खूब हिलाए।   घंटी टून-टून खूब बजेगी, तुम न पास आओगे,   मगर बूँद भर तेल साँझ तक भी क्‍या तुम पाओगे?   मालिक थोड़ा हँसा और बोला पढ़क्‍कू जाओ,   सीखा है यह ज्ञान जहाँ पर, वहीं इसे फैलाओ।   यहाँ सभी कुछ ठीक-ठीक है, यह केवल माया है,   बैल हमारा नहीं अभी तक मंतिख पढ़ पाया है।    ","image":null,"slug":"sujha","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/sujha","readtime":"2 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/sujha.mp3","created":"2024-02-02T16:02:12.291309","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[49026],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":8426,"name":"ज्ञान","slug":"jnana","url":"/tags/jnana"},{"id":8879,"name":"माया","slug":"maya","url":"/tags/maya"},{"id":10311,"name":"दिन","slug":"dina","url":"/tags/dina"},{"id":11807,"name":"सोच","slug":"soca","url":"/tags/soca"},{"id":11947,"name":"हार","slug":"hara","url":"/tags/hara"},{"id":32209,"name":"मालिक","slug":"malika","url":"/tags/malika"},{"id":50031,"name":"किस","slug":"kisa","url":"/tags/kisa"},{"id":50122,"name":"तन","slug":"tana","url":"/tags/tana"}],"comments_counts":0,"viewed_by":706},{"id":1473,"title":"वीर","content":"<p><br />सच है, विपत्ति जब आती है,<br />कायर को ही दहलाती है,<br />सूरमा नहीं विचलित होते,<br />क्षण एक नहीं धीरज खोते,<br />विघ्नों को गले लगाते हैं,<br />काँटों में राह बनाते हैं।</p>\r\n<p>मुहँ से न कभी उफ़ कहते हैं,<br />संकट का चरण न गहते हैं,<br />जो आ पड़ता सब सहते हैं,<br />उद्योग-निरत नित रहते हैं,<br />शुलों का मूळ नसाते हैं,<br />बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं।</p>\r\n<p>है कौन विघ्न ऐसा जग में,<br />टिक सके आदमी के मग में?<br />ख़म ठोंक ठेलता है जब नर<br />पर्वत के जाते पाव उखड़,<br />मानव जब जोर लगाता है,<br />पत्थर पानी बन जाता है।</p>\r\n<p>गुन बड़े एक से एक प्रखर,<br />हैं छिपे मानवों के भितर,<br />मेंहदी में जैसी लाली हो,<br />वर्तिका-बीच उजियाली हो,<br />बत्ती जो नहीं जलाता है,<br />रोशनी नहीं वह पाता है।</p>","raw_content":"सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।   मुहँ से न कभी उफ़ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं, शुलों का मूळ नसाते हैं, बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं।   है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके आदमी के मग में? ख़म ठोंक ठेलता है जब नर पर्वत के जाते पाव उखड़, मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।   गुन बड़े एक से एक प्रखर, हैं छिपे मानवों के भितर, मेंहदी में जैसी लाली हो, वर्तिका-बीच उजियाली हो, बत्ती जो नहीं जलाता है, रोशनी नहीं वह पाता है।","image":null,"slug":"vira","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/vira","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/vira.mp3","created":"2024-02-02T16:02:12.417097","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[15158,32789],"bookmarked_by":[37767],"category":[],"tag":[{"id":5560,"name":"सच","slug":"saca","url":"/tags/saca"},{"id":8097,"name":"आदमी","slug":"adami","url":"/tags/adami"},{"id":10087,"name":"पानी","slug":"pani","url":"/tags/pani"},{"id":16524,"name":"पत्थर","slug":"patthara","url":"/tags/patthara"},{"id":17439,"name":"राह","slug":"raha","url":"/tags/raha"},{"id":17614,"name":"योग","slug":"yoga","url":"/tags/yoga"},{"id":23681,"name":"पर्वत","slug":"parvata","url":"/tags/parvata"},{"id":25226,"name":"कायर","slug":"kayara","url":"/tags/kayara"},{"id":50215,"name":"पान","slug":"pana","url":"/tags/pana"},{"id":50313,"name":"मेंहदी","slug":"menhadi","url":"/tags/menhadi"}],"comments_counts":0,"viewed_by":624},{"id":1474,"title":"मनुष्यता","content":"<p> <br />है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार;<br />पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार|<br />भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम;<br />बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम|<br />लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?<br />यह नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञानं का श्रम व्यर्थ|<br />यह मनुज, जो ज्ञान का आगार;<br />यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार |<br />छद्म इसकी कल्पना, पाखण्ड इसका ज्ञान;<br />यह मनुष्य, मनुष्यता का घोरतम अपमान|</p>","raw_content":"  है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार; पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार| भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम; बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम| लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ? यह नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञानं का श्रम व्यर्थ| यह मनुज, जो ज्ञान का आगार; यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार | छद्म इसकी कल्पना, पाखण्ड इसका ज्ञान; यह मनुष्य, मनुष्यता का घोरतम अपमान|","image":null,"slug":"manusyata","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/manusyata","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/manusyata.mp3","created":"2024-02-02T16:02:12.591688","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":6205,"name":"मनुष्य","slug":"manusya","url":"/tags/manusya"},{"id":7300,"name":"देश","slug":"desa","url":"/tags/desa"},{"id":8426,"name":"ज्ञान","slug":"jnana","url":"/tags/jnana"},{"id":11787,"name":"संसार","slug":"sansara","url":"/tags/sansara"},{"id":20413,"name":"विज्ञान","slug":"vijnana","url":"/tags/vijnana"},{"id":24166,"name":"आग","slug":"aga","url":"/tags/aga"},{"id":24194,"name":"मनुष्यता","slug":"manusyata","url":"/tags/manusyata"}],"comments_counts":0,"viewed_by":792},{"id":1475,"title":"करघा","content":"<p></p>\r\n<p>हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं<br />दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है।<br />हर ज़िन्दगी किसी न किसी<br />ज़िन्दगी से मिल कर एक हो जाती है ।</p>\r\n<p>ज़िन्दगी ज़िन्दगी से<br />इतनी जगहों पर मिलती है<br />कि हम कुछ समझ नहीं पाते<br />और कह बैठते हैं यह भारी झमेला है।<br />संसार संसार नहीं,<br />बेवकूफ़ियों का मेला है।</p>\r\n<p>हर ज़िन्दगी एक सूत है<br />और दुनिया उलझे सूतों का जाल है।<br />इस उलझन का सुलझाना<br />हमारे लिये मुहाल है ।</p>\r\n<p>मगर जो बुनकर करघे पर बैठा है,<br />वह हर सूत की किस्मत को<br />पहचानता है।<br />सूत के टेढ़े या सीधे चलने का<br />क्या रहस्य है,<br />बुनकर इसे खूब जानता है।<br />&rsquo;हारे को हरिनाम&rsquo; से</p>\r\n<p>&nbsp;</p>","raw_content":"  हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है। हर ज़िन्दगी किसी न किसी ज़िन्दगी से मिल कर एक हो जाती है ।   ज़िन्दगी ज़िन्दगी से इतनी जगहों पर मिलती है कि हम कुछ समझ नहीं पाते और कह बैठते हैं यह भारी झमेला है। संसार संसार नहीं, बेवकूफ़ियों का मेला है।   हर ज़िन्दगी एक सूत है और दुनिया उलझे सूतों का जाल है। इस उलझन का सुलझाना हमारे लिये मुहाल है ।   मगर जो बुनकर करघे पर बैठा है, वह हर सूत की किस्मत को पहचानता है। सूत के टेढ़े या सीधे चलने का क्या रहस्य है, बुनकर इसे खूब जानता है। ’हारे को हरिनाम’ से    ","image":null,"slug":"karagha","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/karagha","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/karagha.mp3","created":"2024-02-02T16:02:12.732144","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":5464,"name":"रात","slug":"rata","url":"/tags/rata"},{"id":8077,"name":"दुनिया","slug":"duniya","url":"/tags/duniya"},{"id":10284,"name":"रहस्य","slug":"rahasya","url":"/tags/rahasya"},{"id":11787,"name":"संसार","slug":"sansara","url":"/tags/sansara"},{"id":11947,"name":"हार","slug":"hara","url":"/tags/hara"},{"id":12976,"name":"नाम","slug":"nama","url":"/tags/nama"},{"id":21045,"name":"पहचान","slug":"pahacana","url":"/tags/pahacana"},{"id":39626,"name":"मेला","slug":"mela","url":"/tags/mela"},{"id":50031,"name":"किस","slug":"kisa","url":"/tags/kisa"},{"id":50122,"name":"तन","slug":"tana","url":"/tags/tana"}],"comments_counts":0,"viewed_by":447},{"id":1476,"title":"हठ कर बैठा चान्द","content":"<p>हठ कर बैठा चान्द एक दिन, माता से यह बोला,<br />सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला ।<br />सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ,<br />ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ ।</p>\r\n<p>आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का,<br />न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का ।<br />बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने`,<br />कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने ।</p>\r\n<p>जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,<br />एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ ।<br />कभी एक अँगुल भर चौड़ा, कभी एक फ़ुट मोटा,<br />बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा ।</p>\r\n<p>घटता-बढ़ता रोज़, किसी दिन ऐसा भी करता है<br />नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है<br />अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज़ लिवाएँ<br />सी दे एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन में आए !</p>\r\n<p>(अब चान्द का जवाब सुनिए।)</p>\r\n<p>हंसकर बोला चान्द, अरे माता, तू इतनी भोली ।<br />दुनिया वालों के समान क्या तेरी मति भी डोली ?<br />घटता-बढ़ता कभी नहीं मैं वैसा ही रहता हूँ ।<br />केवल भ्रमवश दुनिया को घटता-बढ़ता लगता हूंँ ।</p>\r\n<p>आधा हिस्सा सदा उजाला, आधा रहता काला ।<br />इस रहस्य को समझ न पाता भ्रमवश दुनिया वाला ।<br />अपना उजला भाग धरा को क्रमशः दिखलाता हूँ ।<br />एक्कम दूज तीज से बढ़ता पूनम तक जाता हूँ ।</p>\r\n<p>फिर पूनम के बाद प्रकाशित हिस्सा घटता जाता ।<br />पन्द्रहवाँ दिन आते-आते पूर्ण लुप्त हो जाता ।<br />दिखलाई मैं भले पड़ूँ ना यात्रा हरदम जारी ।<br />पूनम हो या रात अमावस चलना ही लाचारी ।</p>\r\n<p>चलता रहता आसमान में नहीं दूसरा घर है ।<br />फ़िक्र नहीं जादू-टोने की सर्दी का, बस, डर है ।<br />दे दे पूनम की ही साइज का कुर्ता सिलवा कर ।<br />आएगा हर रोज़ बदन में इसकी मत चिन्ता कर।</p>\r\n<p>अब तो सर्दी से भी ज़्यादा एक समस्या भारी ।<br />जिसने मेरी इतने दिन की इज़्ज़त सभी उतारी ।<br />कभी अपोलो मुझको रौंदा लूना कभी सताता ।<br />मेरी कँचन-सी काया को मिट्टी का बतलाता ।</p>\r\n<p>मेरी कोमल काया को कहते राकेट वाले<br />कुछ ऊबड़-खाबड़ ज़मीन है, कुछ पहाड़, कुछ नाले ।<br />चन्द्रमुखी सुन कौन करेगी गौरव निज सुषमा पर ?<br />खुश होगी कैसे नारी ऐसी भद्दी उपमा पर ।</p>\r\n<p>कौन पसन्द करेगा ऐसे गड्ढों और नालों को ?<br />किसकी नज़र लगेगी अब चन्दा से मुख वालों को ?<br />चन्द्रयान भेजा अमरीका ने भेद और कुछ हरने ।<br />रही सही जो पोल बची थी उसे उजागर करने ।</p>\r\n<p>एक सुहाना भ्रम दुनिया का क्या अब मिट जाएगा ?<br />नन्हा-मुन्ना क्या चन्दा की लोरी सुन पाएगा ?<br />अब तो तू ही बतला दे माँ कैसे लाज बचाऊँ ?<br />ओढ़ अन्धेरे की चादर क्या सागर में छिप जाऊँ ?</p>","raw_content":"हठ कर बैठा चान्द एक दिन, माता से यह बोला, सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला । सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ, ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ ।   आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का, न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का । बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने`, कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने ।   जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ, एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ । कभी एक अँगुल भर चौड़ा, कभी एक फ़ुट मोटा, बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा ।   घटता-बढ़ता रोज़, किसी दिन ऐसा भी करता है नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज़ लिवाएँ सी दे एक झिंगोला जो हर रोज़ बदन में आए !   (अब चान्द का जवाब सुनिए।)   हंसकर बोला चान्द, अरे माता, तू इतनी भोली । दुनिया वालों के समान क्या तेरी मति भी डोली ? घटता-बढ़ता कभी नहीं मैं वैसा ही रहता हूँ । केवल भ्रमवश दुनिया को घटता-बढ़ता लगता हूंँ ।   आधा हिस्सा सदा उजाला, आधा रहता काला । इस रहस्य को समझ न पाता भ्रमवश दुनिया वाला । अपना उजला भाग धरा को क्रमशः दिखलाता हूँ । एक्कम दूज तीज से बढ़ता पूनम तक जाता हूँ ।   फिर पूनम के बाद प्रकाशित हिस्सा घटता जाता । पन्द्रहवाँ दिन आते-आते पूर्ण लुप्त हो जाता । दिखलाई मैं भले पड़ूँ ना यात्रा हरदम जारी । पूनम हो या रात अमावस चलना ही लाचारी ।   चलता रहता आसमान में नहीं दूसरा घर है । फ़िक्र नहीं जादू-टोने की सर्दी का, बस, डर है । दे दे पूनम की ही साइज का कुर्ता सिलवा कर । आएगा हर रोज़ बदन में इसकी मत चिन्ता कर।   अब तो सर्दी से भी ज़्यादा एक समस्या भारी । जिसने मेरी इतने दिन की इज़्ज़त सभी उतारी । कभी अपोलो मुझको रौंदा लूना कभी सताता । मेरी कँचन-सी काया को मिट्टी का बतलाता ।   मेरी कोमल काया को कहते राकेट वाले कुछ ऊबड़-खाबड़ ज़मीन है, कुछ पहाड़, कुछ नाले । चन्द्रमुखी सुन कौन करेगी गौरव निज सुषमा पर ? खुश होगी कैसे नारी ऐसी भद्दी उपमा पर ।   कौन पसन्द करेगा ऐसे गड्ढों और नालों को ? किसकी नज़र लगेगी अब चन्दा से मुख वालों को ? चन्द्रयान भेजा अमरीका ने भेद और कुछ हरने । रही सही जो पोल बची थी उसे उजागर करने ।   एक सुहाना भ्रम दुनिया का क्या अब मिट जाएगा ? नन्हा-मुन्ना क्या चन्दा की लोरी सुन पाएगा ? अब तो तू ही बतला दे माँ कैसे लाज बचाऊँ ? ओढ़ अन्धेरे की चादर क्या सागर में छिप जाऊँ ?","image":null,"slug":"hatha-kara-baitha-canda","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/hatha-kara-baitha-canda","readtime":"3 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/hatha-kara-baitha-canda.mp3","created":"2024-02-02T16:02:12.928951","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":1037,"name":"माँ ","slug":"mam","url":"/tags/mam"},{"id":3723,"name":"लव","slug":"lava","url":"/tags/lava"},{"id":4300,"name":"मौसम","slug":"mausama","url":"/tags/mausama"},{"id":4975,"name":"यात्रा","slug":"yatra","url":"/tags/yatra"},{"id":5330,"name":"याद","slug":"yada","url":"/tags/yada"},{"id":5464,"name":"रात","slug":"rata","url":"/tags/rata"},{"id":7068,"name":"सफ़र","slug":"safara","url":"/tags/safara"},{"id":8077,"name":"दुनिया","slug":"duniya","url":"/tags/duniya"},{"id":8085,"name":"बच्चे","slug":"bacce","url":"/tags/bacce"},{"id":8091,"name":"सर्दी","slug":"sardi","url":"/tags/sardi"},{"id":8349,"name":"घर","slug":"ghara","url":"/tags/ghara"},{"id":10284,"name":"रहस्य","slug":"rahasya","url":"/tags/rahasya"},{"id":10311,"name":"दिन","slug":"dina","url":"/tags/dina"},{"id":10538,"name":"हवा","slug":"hava","url":"/tags/hava"},{"id":18394,"name":"आँख","slug":"amkha","url":"/tags/amkha"},{"id":19322,"name":"प्रकाश","slug":"prakasa","url":"/tags/prakasa"},{"id":21947,"name":"आसमान","slug":"asamana","url":"/tags/asamana"},{"id":23596,"name":"डर","slug":"dara","url":"/tags/dara"},{"id":24570,"name":"ऊब","slug":"uba","url":"/tags/uba"},{"id":50031,"name":"किस","slug":"kisa","url":"/tags/kisa"},{"id":50122,"name":"तन","slug":"tana","url":"/tags/tana"},{"id":50249,"name":"बदन","slug":"badana","url":"/tags/badana"}],"comments_counts":0,"viewed_by":731},{"id":1477,"title":"भारत","content":"<p> <br />सीखे नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं,<br />जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ;<br />या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो।<br />ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के?</p>\r\n<p>गांधी को उल्&zwj;टा घिसो और जो धूल झरे,<br />उसके प्रलेप से अपनी कुण्&zwj;ठा के मुख पर,<br />ऐसी नक्&zwj;काशी गढो कि जो देखे, बोले,<br />आखिर , बापू भी और बात क्&zwj;या कहते थे?</p>\r\n<p>डगमगा रहे हों पांव लोग जब हंसते हों,<br />मत चिढो,ध्&zwj;यान मत दो इन छोटी बातों पर<br />कल्&zwj;पना जगदगुरु की हो जिसके सिर पर,<br />वह भला कहां तक ठोस कदम धर सकता है?</p>\r\n<p>औ; गिर भी जो तुम गये किसी गहराई में,<br />तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगी<br />यह पतन नहीं, है एक देश पाताल गया,<br />प्&zwj;यासी धरती के लिए अमृतघट लाने को।</p>\r\n<p>&nbsp;</p>","raw_content":"  सीखे नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं, जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ; या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो। ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के?   गांधी को उल्‍टा घिसो और जो धूल झरे, उसके प्रलेप से अपनी कुण्‍ठा के मुख पर, ऐसी नक्‍काशी गढो कि जो देखे, बोले, आखिर , बापू भी और बात क्‍या कहते थे?   डगमगा रहे हों पांव लोग जब हंसते हों, मत चिढो,ध्‍यान मत दो इन छोटी बातों पर कल्‍पना जगदगुरु की हो जिसके सिर पर, वह भला कहां तक ठोस कदम धर सकता है?   औ; गिर भी जो तुम गये किसी गहराई में, तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगी यह पतन नहीं, है एक देश पाताल गया, प्‍यासी धरती के लिए अमृतघट लाने को।    ","image":null,"slug":"bharata","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/bharata","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/bharata.mp3","created":"2024-02-02T16:02:13.121793","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":7300,"name":"देश","slug":"desa","url":"/tags/desa"},{"id":8426,"name":"ज्ञान","slug":"jnana","url":"/tags/jnana"},{"id":8998,"name":"भाषा","slug":"bhasa","url":"/tags/bhasa"},{"id":10531,"name":"बुद्ध","slug":"buddha","url":"/tags/buddha"},{"id":17326,"name":"धूल","slug":"dhula","url":"/tags/dhula"},{"id":24166,"name":"आग","slug":"aga","url":"/tags/aga"},{"id":50031,"name":"किस","slug":"kisa","url":"/tags/kisa"},{"id":50122,"name":"तन","slug":"tana","url":"/tags/tana"},{"id":51209,"name":"गुरु","slug":"guru","url":"/tags/guru"}],"comments_counts":0,"viewed_by":618},{"id":1478,"title":"भगवान के डाकिये","content":"<p> <br />पक्षी और बादल,<br />ये भगवान के डाकिए हैं<br />जो एक महादेश से<br />दूसरें महादेश को जाते हैं।<br />हम तो समझ नहीं पाते हैं<br />मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ<br />पेड़, पौधे, पानी और पहाड़<br />बाँचते हैं।</p>\r\n<p>हम तो केवल यह आँकते हैं<br />कि एक देश की धरती<br />दूसरे देश को सुगंध भेजती है।<br />और वह सौरभ हवा में तैरते हुए<br />पक्षियों की पाँखों पर तिरता है।<br />और एक देश का भाप<br />दूसरे देश में पानी<br />बनकर गिरता है।</p>","raw_content":"  पक्षी और बादल, ये भगवान के डाकिए हैं जो एक महादेश से दूसरें महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं मगर उनकी लाई चिट्ठियाँ पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।   हम तो केवल यह आँकते हैं कि एक देश की धरती दूसरे देश को सुगंध भेजती है। और वह सौरभ हवा में तैरते हुए पक्षियों की पाँखों पर तिरता है। और एक देश का भाप दूसरे देश में पानी बनकर गिरता है।","image":null,"slug":"bhagavana-ke-dakiye","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/bhagavana-ke-dakiye","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/bhagavana-ke-dakiye.mp3","created":"2024-02-02T16:02:13.286667","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":7300,"name":"देश","slug":"desa","url":"/tags/desa"},{"id":10087,"name":"पानी","slug":"pani","url":"/tags/pani"},{"id":10313,"name":"बादल","slug":"badala","url":"/tags/badala"},{"id":10538,"name":"हवा","slug":"hava","url":"/tags/hava"},{"id":50215,"name":"पान","slug":"pana","url":"/tags/pana"}],"comments_counts":0,"viewed_by":537},{"id":1479,"title":"शोक की संतान","content":"<p> <br />हृदय छोटा हो,<br />तो शोक वहां नहीं समाएगा।<br />और दर्द दस्तक दिये बिना<br />दरवाजे से लौट जाएगा।<br />टीस उसे उठती है,<br />जिसका भाग्य खुलता है।<br />वेदना गोद में उठाकर<br />सबको निहाल नहीं करती,<br />जिसका पुण्य प्रबल होता है,<br />वह अपने आसुओं से धुलता है।<br />तुम तो नदी की धारा के साथ<br />दौड़ रहे हो।<br />उस सुख को कैसे समझोगे,<br />जो हमें नदी को देखकर मिलता है।<br />और वह फूल<br />तुम्हें कैसे दिखाई देगा,<br />जो हमारी झिलमिल<br />अंधियाली में खिलता है?<br />हम तुम्हारे लिये महल बनाते हैं<br />तुम हमारी कुटिया को<br />देखकर जलते हो।<br />युगों से हमारा तुम्हारा<br />यही संबंध रहा है।<br />हम रास्ते में फूल बिछाते हैं<br />तुम उन्हें मसलते हुए चलते हो।<br />दुनिया में चाहे जो भी निजाम आए,<br />तुम पानी की बाढ़ में से<br />सुखों को छान लोगे।<br />चाहे हिटलर ही<br />आसन पर क्यों न बैठ जाए,<br />तुम उसे अपना आराध्य<br />मान लोगे।<br />मगर हम?<br />तुम जी रहे हो,<br />हम जीने की इच्छा को तोल रहे हैं।<br />आयु तेजी से भागी जाती है<br />और हम अंधेरे में<br />जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।<br />असल में हम कवि नहीं,<br />शोक की संतान हैं।<br />हम गीत नहीं बनाते,<br />पंक्तियों में वेदना के<br />शिशुओं को जनते हैं।<br />झरने का कलकल,<br />पत्तों का मर्मर<br />और फूलों की गुपचुप आवाज़,<br />ये गरीब की आह से बनते हैं।</p>","raw_content":"  हृदय छोटा हो, तो शोक वहां नहीं समाएगा। और दर्द दस्तक दिये बिना दरवाजे से लौट जाएगा। टीस उसे उठती है, जिसका भाग्य खुलता है। वेदना गोद में उठाकर सबको निहाल नहीं करती, जिसका पुण्य प्रबल होता है, वह अपने आसुओं से धुलता है। तुम तो नदी की धारा के साथ दौड़ रहे हो। उस सुख को कैसे समझोगे, जो हमें नदी को देखकर मिलता है। और वह फूल तुम्हें कैसे दिखाई देगा, जो हमारी झिलमिल अंधियाली में खिलता है? हम तुम्हारे लिये महल बनाते हैं तुम हमारी कुटिया को देखकर जलते हो। युगों से हमारा तुम्हारा यही संबंध रहा है। हम रास्ते में फूल बिछाते हैं तुम उन्हें मसलते हुए चलते हो। दुनिया में चाहे जो भी निजाम आए, तुम पानी की बाढ़ में से सुखों को छान लोगे। चाहे हिटलर ही आसन पर क्यों न बैठ जाए, तुम उसे अपना आराध्य मान लोगे। मगर हम? तुम जी रहे हो, हम जीने की इच्छा को तोल रहे हैं। आयु तेजी से भागी जाती है और हम अंधेरे में जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं। असल में हम कवि नहीं, शोक की संतान हैं। हम गीत नहीं बनाते, पंक्तियों में वेदना के शिशुओं को जनते हैं। झरने का कलकल, पत्तों का मर्मर और फूलों की गुपचुप आवाज़, ये गरीब की आह से बनते हैं।","image":null,"slug":"soka-ki-santana","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/soka-ki-santana","readtime":"2 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/soka-ki-santana.mp3","created":"2024-02-02T16:02:13.447388","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":3459,"name":"कवि","slug":"kavi","url":"/tags/kavi"},{"id":3889,"name":"दर्द","slug":"darda","url":"/tags/darda"},{"id":4685,"name":"गीत","slug":"gita","url":"/tags/gita"},{"id":4732,"name":"जीवन","slug":"jivana","url":"/tags/jivana"},{"id":6933,"name":"फूल","slug":"phula","url":"/tags/phula"},{"id":8077,"name":"दुनिया","slug":"duniya","url":"/tags/duniya"},{"id":10087,"name":"पानी","slug":"pani","url":"/tags/pani"},{"id":11062,"name":"नदी","slug":"nadi","url":"/tags/nadi"},{"id":11947,"name":"हार","slug":"hara","url":"/tags/hara"},{"id":16518,"name":"सुख","slug":"sukha","url":"/tags/sukha"},{"id":17258,"name":"इच्छा","slug":"iccha","url":"/tags/iccha"},{"id":23595,"name":"संबंध","slug":"sambandha","url":"/tags/sambandha"},{"id":49983,"name":"आह","slug":"aha","url":"/tags/aha"},{"id":50215,"name":"पान","slug":"pana","url":"/tags/pana"}],"comments_counts":0,"viewed_by":983},{"id":1480,"title":"जब आग लगे","content":"<p>सीखो नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं,<br />जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ;<br />या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो।<br />ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के?</p>\r\n<p>गांधी को उल्&zwj;टा घिसो और जो धूल झरे,<br />उसके प्रलेप से अपनी कुण्&zwj;ठा के मुख पर,<br />ऐसी नक्&zwj;काशी गढो कि जो देखे, बोले,<br />आखिर , बापू भी और बात क्&zwj;या कहते थे?</p>\r\n<p>डगमगा रहे हों पांव लोग जब हंसते हों,<br />मत चिढो,ध्&zwj;यान मत दो इन छोटी बातों पर<br />कल्&zwj;पना जगदगुरु की हो जिसके सिर पर,<br />वह भला कहां तक ठोस कदम धर सकता है?</p>\r\n<p>औ; गिर भी जो तुम गये किसी गहराई में,<br />तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगी<br />यह पतन नहीं, है एक देश पाताल गया,<br />प्&zwj;यासी धरती के लिए अमृतघट लाने को।</p>\r\n<p>&nbsp;</p>","raw_content":"सीखो नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं, जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ; या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो। ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के?   गांधी को उल्‍टा घिसो और जो धूल झरे, उसके प्रलेप से अपनी कुण्‍ठा के मुख पर, ऐसी नक्‍काशी गढो कि जो देखे, बोले, आखिर , बापू भी और बात क्‍या कहते थे?   डगमगा रहे हों पांव लोग जब हंसते हों, मत चिढो,ध्‍यान मत दो इन छोटी बातों पर कल्‍पना जगदगुरु की हो जिसके सिर पर, वह भला कहां तक ठोस कदम धर सकता है?   औ; गिर भी जो तुम गये किसी गहराई में, तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगी यह पतन नहीं, है एक देश पाताल गया, प्‍यासी धरती के लिए अमृतघट लाने को।    ","image":null,"slug":"jaba-aga-lage","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/jaba-aga-lage","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/jaba-aga-lage.mp3","created":"2024-02-02T16:02:13.639933","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":7300,"name":"देश","slug":"desa","url":"/tags/desa"},{"id":8426,"name":"ज्ञान","slug":"jnana","url":"/tags/jnana"},{"id":8998,"name":"भाषा","slug":"bhasa","url":"/tags/bhasa"},{"id":10531,"name":"बुद्ध","slug":"buddha","url":"/tags/buddha"},{"id":17326,"name":"धूल","slug":"dhula","url":"/tags/dhula"},{"id":24166,"name":"आग","slug":"aga","url":"/tags/aga"},{"id":50031,"name":"किस","slug":"kisa","url":"/tags/kisa"},{"id":50122,"name":"तन","slug":"tana","url":"/tags/tana"},{"id":51209,"name":"गुरु","slug":"guru","url":"/tags/guru"}],"comments_counts":0,"viewed_by":568},{"id":1481,"title":"राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी","content":"<p>राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी<br />लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी<br />राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला<br />रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी</p>\r\n<p>डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने<br />परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने<br />खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई<br />उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने</p>\r\n<p>लेखनी लिखे मन में जो निहित व्यथा है<br />रानी की निशि दिन गीली रही कथा है<br />त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूँ<br />राजा रानी की युग से यही प्रथा है</p>\r\n<p>नृप हुये राम तुमने विपदायें झेलीं<br />थी कीर्ति उन्हें प्रिय तुम वन गयीं अकेली<br />वैदेहि तुम्हें माना कलंकिनी प्रिय ने<br />रानी करुणा की तुम भी विषम पहेली</p>\r\n<p>रो रो राजा की कीर्तिलता पनपाओ<br />रानी आयसु है लिये गर्भ वन जाओ</p>\r\n<p>&nbsp;</p>","raw_content":"राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी राजा के मुख में हँसी कण्ठ में माला रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी   डोलती सुरभि राजा घर कोने कोने परियाँ सेवा में खड़ी सजा कर दोने खोले अंचल रानी व्याकुल सी आई उमड़ी जाने क्या व्यथा लगी वह रोने   लेखनी लिखे मन में जो निहित व्यथा है रानी की निशि दिन गीली रही कथा है त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूँ राजा रानी की युग से यही प्रथा है   नृप हुये राम तुमने विपदायें झेलीं थी कीर्ति उन्हें प्रिय तुम वन गयीं अकेली वैदेहि तुम्हें माना कलंकिनी प्रिय ने रानी करुणा की तुम भी विषम पहेली   रो रो राजा की कीर्तिलता पनपाओ रानी आयसु है लिये गर्भ वन जाओ    ","image":null,"slug":"raja-vasanta-varsa-rtuom-ki-rani","publish":true,"url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/raja-vasanta-varsa-rtuom-ki-rani","readtime":"1 min read","audio_url":"https://kavishala.s3.ap-south-1.amazonaws.com/post_audio/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar/raja-vasanta-varsa-rtuom-ki-rani.mp3","created":"2024-02-02T16:02:13.802203","author":{"name":"Ramdhari Singh Dinkar","slug":"ramdhari-singh-dinkar","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/ramdhari-singh-dinkar_sootradhar.jpg","url":"/sootradhar/ramdhari-singh-dinkar","DOB":"1908-09-23","DateOfDemise":"1974-04-24","location":"Simariya"},"language":null,"liked_by":[],"bookmarked_by":[],"category":[],"tag":[{"id":6741,"name":"राम","slug":"rama","url":"/tags/rama"},{"id":8349,"name":"घर","slug":"ghara","url":"/tags/ghara"},{"id":10087,"name":"पानी","slug":"pani","url":"/tags/pani"},{"id":10311,"name":"दिन","slug":"dina","url":"/tags/dina"},{"id":14746,"name":"हँसी","slug":"hamsi","url":"/tags/hamsi"},{"id":23622,"name":"करुणा","slug":"karuna","url":"/tags/karuna"},{"id":23643,"name":"देह","slug":"deha","url":"/tags/deha"},{"id":23658,"name":"वर्षा","slug":"varsa","url":"/tags/varsa"},{"id":29781,"name":"क्षमा","slug":"ksama","url":"/tags/ksama"},{"id":50122,"name":"तन","slug":"tana","url":"/tags/tana"},{"id":50215,"name":"पान","slug":"pana","url":"/tags/pana"}],"comments_counts":0,"viewed_by":674}]}