{"count":17752,"next":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=json&page=972","previous":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=json&page=970","results":[{"id":29036,"image":"https://kavishala.blob.core.windows.net/kavishalalabs/kavishala_logo.png","name":"अबुल फैज़ सहर","bio":"","raw_bio":null,"slug":"abula-phaiza-sahara","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/abula-phaiza-sahara","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:43.722630","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29037,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2_%E0%A5%9E%E0%A5%9B%E0%A4%B2_%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%A6%E0%A5%98.png","name":"अबुल फ़ज़ल सिद्दीक़ी","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> अता अहमद</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 04 Sep 1908</bdi> | बदायूँ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 16 Sep 1987</bdi> | कराची, सिंध</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">LCCN :</span><span>n89136663</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  मूल नाम :  अता अहमद   जन्म :  04 Sep 1908  | बदायूँ, उत्तर प्रदेश   निधन :  16 Sep 1987  | कराची, सिंध   LCCN : n89136663      ","slug":"abula-fazala-siddiqi","DOB":"1908-09-04","DateOfDemise":"1987-09-16","location":"कराची, पाकिस्तान","url":"/sootradhar/abula-fazala-siddiqi","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:44.567713","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29038,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2_%E0%A5%9E%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A4%B0_%E0%A5%9B%E0%A4%A6.png","name":"अबुल फ़ितरत मीर ज़ैदी","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 10 Aug 1919</bdi> | मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  जन्म :  10 Aug 1919  | मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश      ","slug":"abula-fitarata-mira-zaidi","DOB":"1919-08-10","DateOfDemise":null,"location":"पाकिस्तान","url":"/sootradhar/abula-fitarata-mira-zaidi","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:47.387146","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29039,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2_%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%98%E0%A5%98.png","name":"अबुल हसनात हक़्क़ी","bio":"","raw_bio":null,"slug":"abula-hasanata-haqqi","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"कानपुर, भारत","url":"/sootradhar/abula-hasanata-haqqi","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:48.397886","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29040,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%AE_%E0%A4%86%E0%A4%9C%E0%A4%A6.png","name":"अबुल कलाम आज़ाद","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'आज़ाद'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> अबुल कलाम मोहिउद्दीन अहमद आज़ाद</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 11 Nov 1888</bdi> | मक्का</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 22 Feb 1958</bdi> | दिल्ली, भारत</span></p>\r\n<p>\r\n</p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">LCCN :</span><span>n50038846</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p>अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 1888 में मक्का शहर में हुआ। उनका असल नाम मुहिउद्दीन अहमद था मगर उनके पिता मौलाना सैयद मुहम्मद ख़ैरुद्दीन बिन अहमद उन्हें फ़िरोज़ बख़्त के नाम से पुकारते थे। अबुल कलाम आज़ाद की माता आलिया बिंत-ए-मुहम्मद का संबन्ध एक शिक्षित परिवार से था। आज़ाद के नाना मदीना के एक प्रतिष्ठित विद्वान थे जिनकी प्रसिद्धी दूर-दूर तक थी। अपने पिता से आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद आज़ाद मिश्र की प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान जामिया अज़हर चले गए जहाँ उन्होंने प्राच्य शिक्षा प्राप्त की।</p><p>अरब से प्रवास करके हिंदुस्तान आए तो कलकत्ता को अपनी कर्मभूमि बनाया। यहीं से उन्होंने अपनी पत्रकारिता और राजनीतिक जीवन का आरंभ किया। कलकत्ता से ही 1912 में ‘अलहिलाल’ के नाम से एक साप्ताहिक निकाला। यह पहला सचित्र राजनैतिक साप्ताहिक था और इसकी मुद्रित प्रतियों की संख्या लगभग 52 हज़ार थी। इस साप्ताहिक में अंग्रेज़ों की नीतियों के विरुद्ध लेख प्रकाशित होते थे, इसलिए अंग्रेज़ी सरंकार ने 1914 में इस साप्ताहिक पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद मौलाना ने ‘अलबलाग़’ नाम से दूसरा अख़बार जारी किया। यह अख़बार भी आज़ाद की अंग्रेज़ विरुद्ध नीति पर अग्रसर रहा।</p><p>मौलाना आज़ाद का उद्देश्य जहां अंग्रेज़ों का विरोध था वहीं राष्ट्रीय मेलजोल और हिंदू-मुस्लिम एकता पर उनका पूरा ज़ोर था। उन्होंने अपने अख़बारों के द्वारा राष्ट्रीय, स्वदेशीय भावनाओं को जागृत करने की कोशिश की। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के ‘पैग़ाम’ और ‘लिसान-उल-सिद्क़’ जैसी पत्र-पत्रिकाएं भी प्रकाशित कीं और विभिन्न अख़बारों से भी के सम्बद्ध रहे जिनमें ‘वकील’ और ‘अमृतसर’ उल्लेखनीय हैं।</p><p>मौलाना अबुल कलाम आज़ाद राजनीतिक क्षेत्र में की सक्रीय रहे। उन्होंने ‘असहयोग आन्दोलन’, ‘हिन्दुस्तान छोड़ो’ और ‘ख़िलाफ़त आन्दोलन’ में भी हिस्सा लिया। महात्मा गांधी, डॉ. मुख़तार अहमद अंसारी, हकीम अजमल ख़ाँ और अली भाइयों के साथ उनके बहुत अच्छे संबन्ध रहे। गाँधी जी के अहिंसा के दर्शन से वह बहुत प्रभावित थे। गांधी जी के नेतृत्व पर उन्हें पूरा विश्वास था। गांधी के चिंतन और सिद्धांतों के प्रसार के लिए उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया।</p><p>मौलाना आज़ाद एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। वह कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें जेल की यात्नाएँ भी सहनी पड़ीं। इस अवसर पर उनकी धर्मपत्नी ज़ुलेख़ा बेगम ने उनका बहुत साथ दिया। ज़ुलेख़ा बेगम भी आज़ादी की जंग मैं मौलाना आज़ाद के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी रहीं। इस लिए उनकी गिनती भी आज़ादी की जाँबाज़ महिलाओं में होती है।<br/>हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद मौलाना आज़ाद देश के शिक्षा मंत्री बनाए गए। उन्होंने शिक्षा मंत्री के रूप में बहुत महत्वपूर्ण काम किये। विश्विद्यालय अनुदान आयोग और दूसरे तकनीकी, अनुसंधात्मक और सांस्कृतिक संस्थाएं उन्हीं की देन हैं।</p><p>मौलाना आज़ाद मात्र एक राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि एक अच्छे साहित्यकार, उत्कृष्ट पत्रकार और टीकाकार भी थे। उन्होंने शायरी भी की, निबंध भी लिखे, विज्ञान से संबंधित आलेख भी लिखे, विद्या-सम्बंधी आलेख भी लिखे, विद्या-सम्बंधी और शोध प्रबंध भी लिखे। क़ुरआन की टीका भी लिखी। ग़ुबार-ए-ख़ातिर, तज़्किरा, तर्जुमान-उल-क़ुरआन उनकी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। ग़ुबार-ए-ख़ातिर उनकी वह पुस्तक है जो क़िला अहमद नगर में क़ैद के दौरान उन्हों लिखी थी। उसमें वह सारे पत्र हैं जो उन्होंने मौलाना हबीबुर्रहमान ख़ाँ शेरवानी के नाम लिखे थे। उसे मालिक राम जैसे शोधकर्ता ने संपादित किया है और यह पुस्तक साहित्य अकादेमी ने प्रकाशित की है। यह मौलाना आज़ाद की ज़िंदगी के हालात और परिस्थितियों को जानने का उत्कृष्ट स्रोत है।<br/>मौलाना आज़ाद  अपने युग के बहुत ही विद्वान व्यक्ति थे जिसे सभी विद्वान स्वीकार करते हैं और इसी प्रतिभा, योग्यता और समग्र सेवाओं की स्वीकृति में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था।<br/>मौलाना आज़ाद का देहांत 02 फ़रवरी 1958 को हुआ। उनका मज़ार उर्दू बाज़ार, जामा मस्जिद देहली के परिसर में है।</p><p style=\"text-align:justify;text-indent:36.0pt;\"> </p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'आज़ाद'   मूल नाम :  अबुल कलाम मोहिउद्दीन अहमद आज़ाद   जन्म :  11 Nov 1888  | मक्का   निधन :  22 Feb 1958  | दिल्ली, भारत       LCCN : n50038846     अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 1888 में मक्का शहर में हुआ। उनका असल नाम मुहिउद्दीन अहमद था मगर उनके पिता मौलाना सैयद मुहम्मद ख़ैरुद्दीन बिन अहमद उन्हें फ़िरोज़ बख़्त के नाम से पुकारते थे। अबुल कलाम आज़ाद की माता आलिया बिंत-ए-मुहम्मद का संबन्ध एक शिक्षित परिवार से था। आज़ाद के नाना मदीना के एक प्रतिष्ठित विद्वान थे जिनकी प्रसिद्धी दूर-दूर तक थी। अपने पिता से आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद आज़ाद मिश्र की प्रसिद्ध शिक्षा संस्थान जामिया अज़हर चले गए जहाँ उन्होंने प्राच्य शिक्षा प्राप्त की। अरब से प्रवास करके हिंदुस्तान आए तो कलकत्ता को अपनी कर्मभूमि बनाया। यहीं से उन्होंने अपनी पत्रकारिता और राजनीतिक जीवन का आरंभ किया। कलकत्ता से ही 1912 में ‘अलहिलाल’ के नाम से एक साप्ताहिक निकाला। यह पहला सचित्र राजनैतिक साप्ताहिक था और इसकी मुद्रित प्रतियों की संख्या लगभग 52 हज़ार थी। इस साप्ताहिक में अंग्रेज़ों की नीतियों के विरुद्ध लेख प्रकाशित होते थे, इसलिए अंग्रेज़ी सरंकार ने 1914 में इस साप्ताहिक पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद मौलाना ने ‘अलबलाग़’ नाम से दूसरा अख़बार जारी किया। यह अख़बार भी आज़ाद की अंग्रेज़ विरुद्ध नीति पर अग्रसर रहा। मौलाना आज़ाद का उद्देश्य जहां अंग्रेज़ों का विरोध था वहीं राष्ट्रीय मेलजोल और हिंदू-मुस्लिम एकता पर उनका पूरा ज़ोर था। उन्होंने अपने अख़बारों के द्वारा राष्ट्रीय, स्वदेशीय भावनाओं को जागृत करने की कोशिश की। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के ‘पैग़ाम’ और ‘लिसान-उल-सिद्क़’ जैसी पत्र-पत्रिकाएं भी प्रकाशित कीं और विभिन्न अख़बारों से भी के सम्बद्ध रहे जिनमें ‘वकील’ और ‘अमृतसर’ उल्लेखनीय हैं। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद राजनीतिक क्षेत्र में की सक्रीय रहे। उन्होंने ‘असहयोग आन्दोलन’, ‘हिन्दुस्तान छोड़ो’ और ‘ख़िलाफ़त आन्दोलन’ में भी हिस्सा लिया। महात्मा गांधी, डॉ. मुख़तार अहमद अंसारी, हकीम अजमल ख़ाँ और अली भाइयों के साथ उनके बहुत अच्छे संबन्ध रहे। गाँधी जी के अहिंसा के दर्शन से वह बहुत प्रभावित थे। गांधी जी के नेतृत्व पर उन्हें पूरा विश्वास था। गांधी के चिंतन और सिद्धांतों के प्रसार के लिए उन्होंने पूरे देश का भ्रमण किया। मौलाना आज़ाद एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे। वह कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें जेल की यात्नाएँ भी सहनी पड़ीं। इस अवसर पर उनकी धर्मपत्नी ज़ुलेख़ा बेगम ने उनका बहुत साथ दिया। ज़ुलेख़ा बेगम भी आज़ादी की जंग मैं मौलाना आज़ाद के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी रहीं। इस लिए उनकी गिनती भी आज़ादी की जाँबाज़ महिलाओं में होती है। हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद मौलाना आज़ाद देश के शिक्षा मंत्री बनाए गए। उन्होंने शिक्षा मंत्री के रूप में बहुत महत्वपूर्ण काम किये। विश्विद्यालय अनुदान आयोग और दूसरे तकनीकी, अनुसंधात्मक और सांस्कृतिक संस्थाएं उन्हीं की देन हैं। मौलाना आज़ाद मात्र एक राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि एक अच्छे साहित्यकार, उत्कृष्ट पत्रकार और टीकाकार भी थे। उन्होंने शायरी भी की, निबंध भी लिखे, विज्ञान से संबंधित आलेख भी लिखे, विद्या-सम्बंधी आलेख भी लिखे, विद्या-सम्बंधी और शोध प्रबंध भी लिखे। क़ुरआन की टीका भी लिखी। ग़ुबार-ए-ख़ातिर, तज़्किरा, तर्जुमान-उल-क़ुरआन उनकी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। ग़ुबार-ए-ख़ातिर उनकी वह पुस्तक है जो क़िला अहमद नगर में क़ैद के दौरान उन्हों लिखी थी। उसमें वह सारे पत्र हैं जो उन्होंने मौलाना हबीबुर्रहमान ख़ाँ शेरवानी के नाम लिखे थे। उसे मालिक राम जैसे शोधकर्ता ने संपादित किया है और यह पुस्तक साहित्य अकादेमी ने प्रकाशित की है। यह मौलाना आज़ाद की ज़िंदगी के हालात और परिस्थितियों को जानने का उत्कृष्ट स्रोत है। मौलाना आज़ाद  अपने युग के बहुत ही विद्वान व्यक्ति थे जिसे सभी विद्वान स्वीकार करते हैं और इसी प्रतिभा, योग्यता और समग्र सेवाओं की स्वीकृति में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था। मौलाना आज़ाद का देहांत 02 फ़रवरी 1958 को हुआ। उनका मज़ार उर्दू बाज़ार, जामा मस्जिद देहली के परिसर में है।    ","slug":"abula-kalama-azada","DOB":"1888-11-11","DateOfDemise":"1958-02-22","location":"दिल्ली, भारत","url":"/sootradhar/abula-kalama-azada","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:49.597032","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29041,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2_%E0%A5%99%E0%A4%B0_%E0%A4%A8%E0%A4%B6%E0%A4%A4%E0%A4%B0.png","name":"अबुल ख़ैर नश्तर","bio":"","raw_bio":null,"slug":"abula-khaira-nastara","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"बेतिया, भारत","url":"/sootradhar/abula-khaira-nastara","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:50.898258","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29042,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2_%E0%A4%B2%E0%A4%B8_%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%A6.png","name":"अबुल लैस जावेद","bio":"","raw_bio":null,"slug":"abula-laisa-javeda","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"दिल्ली, भारत","url":"/sootradhar/abula-laisa-javeda","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:53.110326","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29043,"image":"https://kavishala.blob.core.windows.net/kavishalalabs/kavishala_logo.png","name":"अबुल मोहामिद हामिद","bio":"","raw_bio":null,"slug":"abula-mohamida-hamida","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/abula-mohamida-hamida","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:53.435936","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29045,"image":"https://kavishala.blob.core.windows.net/kavishalalabs/kavishala_logo.png","name":"आचार्या सारथी","bio":"","raw_bio":null,"slug":"acarya-sarathi","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/acarya-sarathi","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:54.082782","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29046,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%85%E0%A4%A6_%E0%A4%9C%E0%A5%9E%E0%A4%B0.png","name":"अदा जाफ़री","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'अदा'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> अज़ीज़ जहाँ</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 22 Aug 1924</bdi> | बदायूँ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 12 Mar 2015</bdi> | कराची, सिंध</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>जदीद शे’र-ओ-अदब के निर्माताओं में अदा जाफ़री एक विशिष्ट स्थान की मालिक हैं । उनको उर्दू शायरी की ख़ातून अव़्वल(प्रथम महिला) कहा जाता है क्योंकि उनकी शायरी ने बीसवीं सदी की मध्य दशक मेंमार्ग दर्शन और प्रभाव के संदर्भ में उर्दू की शायरात के हक़ में वही किरदार अदा किया जो अठारहवीं सदी में वली दकनी ने आम शायरोंके हक़ में अदा किया था। उन्होंने अपने बाद आने वाली शायरात किश्वर नाहीद, परवीन शाकिर और फ़हमीदा रियाज़ वग़ैरा के लिए शायरी का वो रास्ता हमवार किया जिस पर चल कर उन लोगों ने उर्दू में ख़वातीन की शायरी को विश्व मानक तक पहुंचाया।<br/><br/>अदा जाफ़री पारंपरिक होने के बावजूद आधुनिक हैं। बदलती हुई दुनिया और उसके सामाजिक और भावनात्मक तक़ाज़ों को अपनी परंपरा के सकारात्मक सिद्धांतों के साथ सामंजस्य बिठाना अदा जाफ़री का ख़ास कारनामा है। उन्होंने सभ्यता की शालीनता को कभी हाथ से नहीं जाने दिया। शालीनता, वाक्पटुता और ध्वनि-निर्माण का संयोजन उनके शे’री और रचनात्मक सार को अद्वितीय बनाता है। वो शायरात में चेतना और दशा के एक नए सिलसिले की अग्रदूत थीं। विरोध की राहों में बढ़ते हुए भी वो हवा की उन ख़ुशबुओं से मुग्ध रही हैं जिनमें पिछले मौसम-ए-बहार के फूलों की महक बाक़ी है। उन्होंने एक नारी की हैसियत से इंसान की कुछ ऐसी मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक अवस्थाओं को उजागर किया है जो किसी मर्द शायर से मुम्किन नहीं था। इसके साथ उन्होंने स्त्री परिवेश से परे और ज़ात के घेरे से बाहर निकल कर आम इंसानों की समस्याओं को अपनी शायरी का विषय बनाया। वो नारित्व की नरमी को अपनी विशिष्टता नहीं समझतीं। उन्होंने शायर के रूप में कोई रिआयत नहीं चाही। वो सबके लिए अपनी आवाज़ बुलंद करती हैं। उनके यहां मर्द, औरत और एशियाई या अफ़्रीक़ी का भेदभाव नहीं। अदा जाफ़री की शायरी बंधे टके आलोचनात्मक सिद्धांतों के दायरे में क़ैद नहीं हो पाती। उसे समझने और उससे आनंदित होने के लिए स्वस्थ चिंतन और और अच्छे शिष्टाचार का होना ज़रूरी है। अदा जाफ़री बाहरी मानक विचार से ज़्यादा निजी तजुर्बे से हासिल किए गए चेतना पर भरोसा करती हैं। व्यक्तित्व की समग्रता और अखंडता के साथ साथ एहसास की नज़ाकत और उसमें दुख की धीमी धीमी आँच ही उनका व्यक्तित्व है।<br/><br/>अदा जाफ़री का असल नाम अज़ीज़ जहां था, शादी के बाद उन्होंने अदा जाफ़री के नाम से लिखना शुरू किया। वो 1924 ई. में बदायूं के एक ख़ुशहाल घराने में पैदा हुईं। जब उनकी उम्र तीन बरस थी उनके वालिद का स्वर्गवास हो गया। उनका बचपन ननिहाल में गुज़रा। पिता के स्नेह से वंचित का उनके दिल पर गहरा असर हुआ। उनकी शिक्षा घर पर ट्युटर रखकर कराई गई। उन्होंने उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में महारत हासिल की। बाक़ायदा कॉलेज में जा कर शिक्षा प्राप्त न कर पाने का उनको हमेशा मलाल रहा। उनको बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौक़ था। नौ साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला शे’र कहा और डरते डरते माँ को सुनाया तो उन्होंने ख़ुशी का इज़हार किया। उनकी आरंभिक ग़ज़लें और नज़्में 1940 ई. के आस-पास अख़्तर शीरानी की पत्रिका “रूमान” के अलावा उस वक़्त के श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं “शाहकार” और “अदब-ए-लतीफ़” वग़ैरा में प्रकाशित होने लगीं और अदबी दुनिया उनके नाम से परिचित हो गई। उस वक़्त भी उनकी शायरी में आम नारीवादी शायरी से विद्रोह मौजूद था। उनसे पहले की शायरात ने वैचारिक या शारीरिक संघर्ष का हौसला नहीं दिखाया था।1936 ई. में उर्दू साहित्य में शुरू होने वाले नए आंदोलन ने नए सामाजिक रिश्तों का एहसास और नई एतिहासिक चेतना पैदा की तो अदा जाफ़री भी उससे प्रभावित हुईं। वो अलल-ऐलान प्रगतिशील आंदोलन से सम्बद्ध नहीं हुईं लेकिन उन्होंने अप्रचलित और रूढ़िवाद की बेजा बंदिशों से ख़ुद को आज़ाद कर लिया। 1947 ई. में उनकी शादी ब्रिटिश इंडिया के एक उच्च अधिकारी नूर-उल-हसन जाफ़री से हो गई। देश विभाजन के बाद वो पाकिस्तानी हो गए और 1948 ई. में अदा जाफ़री भी पाकिस्तान चली गईं। जिन इलाक़ों में पाकिस्तान बना उनमें सामाजिक बंदिशें हिंदुस्तानी इलाक़ों के मुक़ाबले में सख़्त थीं और वहां उल्लेखनीय लेखिकाओं के उभरने की संभावनाएं नहीं थीं। अदा जाफ़री की पाकिस्तान में अच्छी आव-भगत हुई। दिलचस्प बात ये है कि अफ़साना के चार बड़े नामों, मंटो, इस्मत, बेदी और कृष्ण चंदर में से इस्मत को छोड़कर सबका ताल्लुक़ उस इलाक़े से था जो अब पाकिस्तान है, जबकि शायरात में अदा जाफ़री के साथ साथ परवीन शाकिर, किश्वर नाहीद और फ़हमीदा रियाज़ सबकी जड़ें हिंदुस्तान में हैं। अदा जाफ़री का पहला काव्य संग्रह 1950 ई. में प्रकाशित हुआ और उसकी ख़ूब प्रशंसा हुई। इसके बाद उनके कई संग्रह प्रकाशित हुए और अदा जाफ़री ने शायरात में अपनी मुमताज़ जगह बना ली। उन्होंने जापानी काव्य विधा हाइकू में भी अभ्यास किया और अफ़साने भी लिखे। उन्होंने अपनी आत्मकथा “जो रही सो बेख़बरी रही” के नाम से प्रकाशित कराई। उसके अलावा उन्होंने प्राचीन उर्दू शायरों के हालात भी कलमबंद किए। अदा जाफ़री ने एक भरपूर संतुष्ट ज़िंदगी गुज़ारी। शौहर के साथ दुनिया के विभिन्न देशों की सैर की और उनके राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति का गहरी नज़र से अध्ययन किया। नव्वे साल की ज़िंदगी गुज़ार कर सन् 2014 में उनका देहांत हुआ।<br/><br/>अदा जाफ़री महज़ एक आधुनिक या नारी लहजा की शायरा नहीं हैं। वो अपनी सृजनात्मक प्रक्रिया में अपने माहौल और आसपास से ग़ाफ़िल नहीं रहीं। उनकी नज़्में उनके राजनीतिक और सामाजिक चेतना का प्रतिबिंब हैं। उन नज़्मों में दर्दमंदी और देशभक्ति प्रमुख है। जबकि ग़ज़लों में ताज़गी, चेतना की परिपक्वता और कला पर मज़बूत पकड़ स्पष्ट है। वो व्यक्तिगत और निजी समस्याओं को समग्र मानवीय समस्याओं के एक प्रतिबिंब के रूप में देखती हैं। उनकी शायरी व्यक्तिगत से ज़्यादा सामाजिक है। उनकी आवाज़ में, बहरहाल,दुख-दर्द, ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त, निशात-ओ-मुसर्रत, की एक अपनी दुनिया भी है। वो हर पैराया-ए-इज़हार में सरता सर शायरा रही हैं। ज़िंदगी के प्रमाणिकता का एहसास और ख़्वाबों को वास्तविकता के आईने में संवारने का ढंग अदा जाफ़री का तरीक़ा है और उनकी कला नई उर्दू शायरी के इतिहास का एक चमकता हुआ अध्याय है।<br/></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'अदा'   मूल नाम :  अज़ीज़ जहाँ   जन्म :  22 Aug 1924  | बदायूँ, उत्तर प्रदेश   निधन :  12 Mar 2015  | कराची, सिंध     जदीद शे’र-ओ-अदब के निर्माताओं में अदा जाफ़री एक विशिष्ट स्थान की मालिक हैं । उनको उर्दू शायरी की ख़ातून अव़्वल(प्रथम महिला) कहा जाता है क्योंकि उनकी शायरी ने बीसवीं सदी की मध्य दशक मेंमार्ग दर्शन और प्रभाव के संदर्भ में उर्दू की शायरात के हक़ में वही किरदार अदा किया जो अठारहवीं सदी में वली दकनी ने आम शायरोंके हक़ में अदा किया था। उन्होंने अपने बाद आने वाली शायरात किश्वर नाहीद, परवीन शाकिर और फ़हमीदा रियाज़ वग़ैरा के लिए शायरी का वो रास्ता हमवार किया जिस पर चल कर उन लोगों ने उर्दू में ख़वातीन की शायरी को विश्व मानक तक पहुंचाया। अदा जाफ़री पारंपरिक होने के बावजूद आधुनिक हैं। बदलती हुई दुनिया और उसके सामाजिक और भावनात्मक तक़ाज़ों को अपनी परंपरा के सकारात्मक सिद्धांतों के साथ सामंजस्य बिठाना अदा जाफ़री का ख़ास कारनामा है। उन्होंने सभ्यता की शालीनता को कभी हाथ से नहीं जाने दिया। शालीनता, वाक्पटुता और ध्वनि-निर्माण का संयोजन उनके शे’री और रचनात्मक सार को अद्वितीय बनाता है। वो शायरात में चेतना और दशा के एक नए सिलसिले की अग्रदूत थीं। विरोध की राहों में बढ़ते हुए भी वो हवा की उन ख़ुशबुओं से मुग्ध रही हैं जिनमें पिछले मौसम-ए-बहार के फूलों की महक बाक़ी है। उन्होंने एक नारी की हैसियत से इंसान की कुछ ऐसी मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक अवस्थाओं को उजागर किया है जो किसी मर्द शायर से मुम्किन नहीं था। इसके साथ उन्होंने स्त्री परिवेश से परे और ज़ात के घेरे से बाहर निकल कर आम इंसानों की समस्याओं को अपनी शायरी का विषय बनाया। वो नारित्व की नरमी को अपनी विशिष्टता नहीं समझतीं। उन्होंने शायर के रूप में कोई रिआयत नहीं चाही। वो सबके लिए अपनी आवाज़ बुलंद करती हैं। उनके यहां मर्द, औरत और एशियाई या अफ़्रीक़ी का भेदभाव नहीं। अदा जाफ़री की शायरी बंधे टके आलोचनात्मक सिद्धांतों के दायरे में क़ैद नहीं हो पाती। उसे समझने और उससे आनंदित होने के लिए स्वस्थ चिंतन और और अच्छे शिष्टाचार का होना ज़रूरी है। अदा जाफ़री बाहरी मानक विचार से ज़्यादा निजी तजुर्बे से हासिल किए गए चेतना पर भरोसा करती हैं। व्यक्तित्व की समग्रता और अखंडता के साथ साथ एहसास की नज़ाकत और उसमें दुख की धीमी धीमी आँच ही उनका व्यक्तित्व है। अदा जाफ़री का असल नाम अज़ीज़ जहां था, शादी के बाद उन्होंने अदा जाफ़री के नाम से लिखना शुरू किया। वो 1924 ई. में बदायूं के एक ख़ुशहाल घराने में पैदा हुईं। जब उनकी उम्र तीन बरस थी उनके वालिद का स्वर्गवास हो गया। उनका बचपन ननिहाल में गुज़रा। पिता के स्नेह से वंचित का उनके दिल पर गहरा असर हुआ। उनकी शिक्षा घर पर ट्युटर रखकर कराई गई। उन्होंने उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में महारत हासिल की। बाक़ायदा कॉलेज में जा कर शिक्षा प्राप्त न कर पाने का उनको हमेशा मलाल रहा। उनको बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौक़ था। नौ साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला शे’र कहा और डरते डरते माँ को सुनाया तो उन्होंने ख़ुशी का इज़हार किया। उनकी आरंभिक ग़ज़लें और नज़्में 1940 ई. के आस-पास अख़्तर शीरानी की पत्रिका “रूमान” के अलावा उस वक़्त के श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं “शाहकार” और “अदब-ए-लतीफ़” वग़ैरा में प्रकाशित होने लगीं और अदबी दुनिया उनके नाम से परिचित हो गई। उस वक़्त भी उनकी शायरी में आम नारीवादी शायरी से विद्रोह मौजूद था। उनसे पहले की शायरात ने वैचारिक या शारीरिक संघर्ष का हौसला नहीं दिखाया था।1936 ई. में उर्दू साहित्य में शुरू होने वाले नए आंदोलन ने नए सामाजिक रिश्तों का एहसास और नई एतिहासिक चेतना पैदा की तो अदा जाफ़री भी उससे प्रभावित हुईं। वो अलल-ऐलान प्रगतिशील आंदोलन से सम्बद्ध नहीं हुईं लेकिन उन्होंने अप्रचलित और रूढ़िवाद की बेजा बंदिशों से ख़ुद को आज़ाद कर लिया। 1947 ई. में उनकी शादी ब्रिटिश इंडिया के एक उच्च अधिकारी नूर-उल-हसन जाफ़री से हो गई। देश विभाजन के बाद वो पाकिस्तानी हो गए और 1948 ई. में अदा जाफ़री भी पाकिस्तान चली गईं। जिन इलाक़ों में पाकिस्तान बना उनमें सामाजिक बंदिशें हिंदुस्तानी इलाक़ों के मुक़ाबले में सख़्त थीं और वहां उल्लेखनीय लेखिकाओं के उभरने की संभावनाएं नहीं थीं। अदा जाफ़री की पाकिस्तान में अच्छी आव-भगत हुई। दिलचस्प बात ये है कि अफ़साना के चार बड़े नामों, मंटो, इस्मत, बेदी और कृष्ण चंदर में से इस्मत को छोड़कर सबका ताल्लुक़ उस इलाक़े से था जो अब पाकिस्तान है, जबकि शायरात में अदा जाफ़री के साथ साथ परवीन शाकिर, किश्वर नाहीद और फ़हमीदा रियाज़ सबकी जड़ें हिंदुस्तान में हैं। अदा जाफ़री का पहला काव्य संग्रह 1950 ई. में प्रकाशित हुआ और उसकी ख़ूब प्रशंसा हुई। इसके बाद उनके कई संग्रह प्रकाशित हुए और अदा जाफ़री ने शायरात में अपनी मुमताज़ जगह बना ली। उन्होंने जापानी काव्य विधा हाइकू में भी अभ्यास किया और अफ़साने भी लिखे। उन्होंने अपनी आत्मकथा “जो रही सो बेख़बरी रही” के नाम से प्रकाशित कराई। उसके अलावा उन्होंने प्राचीन उर्दू शायरों के हालात भी कलमबंद किए। अदा जाफ़री ने एक भरपूर संतुष्ट ज़िंदगी गुज़ारी। शौहर के साथ दुनिया के विभिन्न देशों की सैर की और उनके राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति का गहरी नज़र से अध्ययन किया। नव्वे साल की ज़िंदगी गुज़ार कर सन् 2014 में उनका देहांत हुआ। अदा जाफ़री महज़ एक आधुनिक या नारी लहजा की शायरा नहीं हैं। वो अपनी सृजनात्मक प्रक्रिया में अपने माहौल और आसपास से ग़ाफ़िल नहीं रहीं। उनकी नज़्में उनके राजनीतिक और सामाजिक चेतना का प्रतिबिंब हैं। उन नज़्मों में दर्दमंदी और देशभक्ति प्रमुख है। जबकि ग़ज़लों में ताज़गी, चेतना की परिपक्वता और कला पर मज़बूत पकड़ स्पष्ट है। वो व्यक्तिगत और निजी समस्याओं को समग्र मानवीय समस्याओं के एक प्रतिबिंब के रूप में देखती हैं। उनकी शायरी व्यक्तिगत से ज़्यादा सामाजिक है। उनकी आवाज़ में, बहरहाल,दुख-दर्द, ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त, निशात-ओ-मुसर्रत, की एक अपनी दुनिया भी है। वो हर पैराया-ए-इज़हार में सरता सर शायरा रही हैं। ज़िंदगी के प्रमाणिकता का एहसास और ख़्वाबों को वास्तविकता के आईने में संवारने का ढंग अदा जाफ़री का तरीक़ा है और उनकी कला नई उर्दू शायरी के इतिहास का एक चमकता हुआ अध्याय है।  ","slug":"ada-jafari","DOB":"1924-08-22","DateOfDemise":"2015-03-12","location":"कराची, पाकिस्तान","url":"/sootradhar/ada-jafari","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:55.007908","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29047,"image":"https://kavishala.blob.core.windows.net/kavishalalabs/kavishala_logo.png","name":"अदम","bio":"","raw_bio":null,"slug":"adama","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/adama","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:55.363983","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":29048,"image":"https://kavishala.blob.core.windows.net/kavishalalabs/kavishala_logo.png","name":"आदम चुग़ताई","bio":"","raw_bio":null,"slug":"adama-cugatai","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"इंग्लैंड","url":"/sootradhar/adama-cugatai","tags":"","created":"2024-03-07T19:38:55.735522","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21}],"description":"<p style=\"text-align: center; font-size: 24px;\"> The Great Poets and Writers in Indian and World History! </p>","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_description/black.jpg"}