{"count":17752,"next":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=json&page=953","previous":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=json&page=951","results":[{"id":24607,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"सूरज नारायण मेहर","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मुंशी सूरज नारायण</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 13 Nov 1859</bdi> | दिल्ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 12 May 1932</bdi> | लाहौर, पंजाब</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p style=\"margin-bottom:0cm;margin-bottom:.0001pt;text-align:justify;\"><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">मुंशी सूरज नरायन मेह्र देहलवी दाग़ के समकालिनों में से थे लेकिन वह उन शाइरों में से हैं जिन्होंने दाग़ का अनुसरण नहीं किया हालाँकि उस वक़्त दाग़ के रंग में शेर कहना ही शाइरी का शिखर समझा जाता था. उस वक़्त  मेह्र देहलवी ने दाग़ के रंग में शाइरी की पैरवी करने और आम शाइ</span><span lang=\"EN-US\">’</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">री की रौ में बह जाने के बजाय तसव्वुफ़ का रंग अपनाया और वास्तविकता और ज्ञान के विषयों को ही अपनी शाइरी का विषयवस्तु बनाया. उसी रँगे शाइरी की वजह से उनको </span><span lang=\"EN-US\">“</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">वेदांत रत्न</span><span lang=\"EN-US\">” </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">भी कहा जाता था.</span></p><p style=\"margin-bottom:0cm;margin-bottom:.0001pt;text-align:justify;\"><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">सूरज नरायन मेह्र देहलवी ने कई विधाओं में शाइरी की. उन्होंने बच्चों के लिए भी नज़्में लिखीं. मेह्र के काव्य संग्रह </span><span lang=\"EN-US\">‘</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">कलाम-ए-मेह्र</span><span lang=\"EN-US\">’</span><span lang=\"EN-US\" style=\"font-size:10.0pt;line-height:115%;font-family:'Mangal','serif';\"> </span><span lang=\"EN-US\" style=\"line-height:115%;\">‘</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">रुबाईयाते मेह्र</span><span lang=\"EN-US\">’</span><span lang=\"EN-US\" style=\"font-size:10.0pt;line-height:115%;font-family:'Mangal','serif';\"> </span><span lang=\"EN-US\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">और </span><span lang=\"EN-US\">‘</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">ग़ज़लियात-ए-मेह्र</span><span lang=\"EN-US\">’ </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">के नाम से प्रकाशित हुए. मेह्र का </span><span lang=\"EN-US\">1932</span><span lang=\"EN-US\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">में देहली में देहांत हुआ.</span></p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  मूल नाम :  मुंशी सूरज नारायण   जन्म :  13 Nov 1859  | दिल्ली   निधन :  12 May 1932  | लाहौर, पंजाब     मुंशी सूरज नरायन मेह्र देहलवी दाग़ के समकालिनों में से थे लेकिन वह उन शाइरों में से हैं जिन्होंने दाग़ का अनुसरण नहीं किया हालाँकि उस वक़्त दाग़ के रंग में शेर कहना ही शाइरी का शिखर समझा जाता था. उस वक़्त  मेह्र देहलवी ने दाग़ के रंग में शाइरी की पैरवी करने और आम शाइ ’ री की रौ में बह जाने के बजाय तसव्वुफ़ का रंग अपनाया और वास्तविकता और ज्ञान के विषयों को ही अपनी शाइरी का विषयवस्तु बनाया. उसी रँगे शाइरी की वजह से उनको  “ वेदांत रत्न ”  भी कहा जाता था. सूरज नरायन मेह्र देहलवी ने कई विधाओं में शाइरी की. उन्होंने बच्चों के लिए भी नज़्में लिखीं. मेह्र के काव्य संग्रह  ‘ कलाम-ए-मेह्र ’   ‘ रुबाईयाते मेह्र ’     और  ‘ ग़ज़लियात-ए-मेह्र ’  के नाम से प्रकाशित हुए. मेह्र का  1932   में देहली में देहांत हुआ.  ","slug":"suraja-narayana-mehara","DOB":"1859-11-13","DateOfDemise":"1932-05-12","location":"लाहौर, पाकिस्तान","url":"/sootradhar/suraja-narayana-mehara","tags":null,"created":"2023-10-27T17:05:49.109356","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24608,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A4%AF%E0%A4%A6_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A4%A6_%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A5%98%E0%A4%B8%E0%A4%B0_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A4%B9.png","name":"सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'क़ैसर'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सयय्द महमूद हसन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 19 Aug 1919</bdi> | अमरोहा, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 03 Aug 2011</bdi> | दिल्ली, भारत</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><quillbot-extension-portal></quillbot-extension-portal></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'क़ैसर'   मूल नाम :  सयय्द महमूद हसन   जन्म :  19 Aug 1919  | अमरोहा, उत्तर प्रदेश   निधन :  03 Aug 2011  | दिल्ली, भारत      ","slug":"sayayda-mahamuda-hasana-qaisara-amarohi","DOB":"1919-08-19","DateOfDemise":"2011-08-03","location":"दिल्ली, भारत","url":"/sootradhar/sayayda-mahamuda-hasana-qaisara-amarohi","tags":null,"created":"2023-10-27T17:05:52.114581","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24609,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A4%AF%E0%A4%A6_%E0%A4%A8%E0%A5%9B%E0%A4%B0_%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A4%B8%E0%A5%99_%E0%A4%A6%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A4%B5.png","name":"सय्यद नज़ीर हसन सख़ा देहलवी","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'सख़ा'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सय्यद नज़ीर हसन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>दिल्ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 09 Feb 1933</bdi> | जयपुर, राजस्थान</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> सय्यद ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र (पिता)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'सख़ा'   मूल नाम :  सय्यद नज़ीर हसन   जन्म : दिल्ली   निधन :  09 Feb 1933  | जयपुर, राजस्थान      संबंधी :    सय्यद ज़नफ़र अली ग़ज़नफ़र (पिता)        ","slug":"sayyada-nazira-hasana-sakha-dehalavi","DOB":null,"DateOfDemise":"1933-02-09","location":"हैदराबाद, भारत","url":"/sootradhar/sayyada-nazira-hasana-sakha-dehalavi","tags":null,"created":"2023-10-27T17:05:55.363383","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24610,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%B8%E0%A4%AF%E0%A4%AF%E0%A4%A6_%E0%A4%AF%E0%A4%B8%E0%A4%AB_%E0%A4%85%E0%A4%B2_%E0%A4%96_%E0%A4%A8%E0%A5%9B%E0%A4%AE.png","name":"सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'नाज़िम'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 05 Mar 1816</bdi> | रामपुर, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 21 Apr 1865</bdi> | रामपुर, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> मोमिन ख़ाँ मोमिन (गुरु)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span>नाज़िम, नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ(1816-1865)रियासत रामपुर के नवाब थे। पहले ‘मोमिन’ और फिर ‘ग़ालिब’ के शागिर्द रहे। दिल्ली और लखनऊ के बहुत से शाइ’र उनके दरबार से जुड़े हुए थे। उनकी शाइ’री में रामपुर स्कूल के बहुत से रंग देखे जा सकते हैं।<span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'नाज़िम'   मूल नाम :  नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ   जन्म :  05 Mar 1816  | रामपुर, उत्तर प्रदेश   निधन :  21 Apr 1865  | रामपुर, उत्तर प्रदेश      संबंधी :    मोमिन ख़ाँ मोमिन (गुरु)       नाज़िम, नवाब यूसुफ़ अ’ली ख़ाँ(1816-1865)रियासत रामपुर के नवाब थे। पहले ‘मोमिन’ और फिर ‘ग़ालिब’ के शागिर्द रहे। दिल्ली और लखनऊ के बहुत से शाइ’र उनके दरबार से जुड़े हुए थे। उनकी शाइ’री में रामपुर स्कूल के बहुत से रंग देखे जा सकते हैं।  ","slug":"sayyada-yusufa-ali-kham-nazima","DOB":"1816-03-05","DateOfDemise":"1865-04-21","location":"रामपुर, भारत","url":"/sootradhar/sayyada-yusufa-ali-kham-nazima","tags":null,"created":"2023-10-27T17:05:58.517764","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24611,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%A4%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A4%B6%E0%A4%95_%E0%A4%B2%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%B5.png","name":"तअशशुक़ लखनवी","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'तअशशुक़ लखनवी'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सय्यद मीरजा़ उर्फ़ सय्यद साहब</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 11 Mar 1824</bdi> | लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 12 Apr 1892</bdi> | लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> रशीद लखनवी (Nephew)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span>तअ’श्शुक़ लखनवी, सय्यद मीरजा़ उर्फ़ सय्यद साहब(1824-1892)मर्सिये के सबसे बड़े शाइ’र मीर ‘अनीस’ के पोते थे जिन्होंने मर्सिये और ग़ज़ल दोनों विधाओं में अपनी एक ख़ास पहचान बनाई। उनकी शाइ’री में ज़बान की सफ़ाई और चुस्ती दूर ही से नज़र आती है।<br/><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'तअशशुक़ लखनवी'   मूल नाम :  सय्यद मीरजा़ उर्फ़ सय्यद साहब   जन्म :  11 Mar 1824  | लखनऊ, उत्तर प्रदेश   निधन :  12 Apr 1892  | लखनऊ, उत्तर प्रदेश      संबंधी :    रशीद लखनवी (Nephew)       तअ’श्शुक़ लखनवी, सय्यद मीरजा़ उर्फ़ सय्यद साहब(1824-1892)मर्सिये के सबसे बड़े शाइ’र मीर ‘अनीस’ के पोते थे जिन्होंने मर्सिये और ग़ज़ल दोनों विधाओं में अपनी एक ख़ास पहचान बनाई। उनकी शाइ’री में ज़बान की सफ़ाई और चुस्ती दूर ही से नज़र आती है।  ","slug":"taasasuqa-lakhanavi","DOB":"1824-03-11","DateOfDemise":"1892-04-12","location":"","url":"/sootradhar/taasasuqa-lakhanavi","tags":null,"created":"2023-10-27T17:06:02.664129","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24612,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%A4%E0%A4%B2%E0%A4%AC_%E0%A4%AC%E0%A4%97%E0%A4%AA%E0%A4%A4.png","name":"तालिब बाग़पती","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'तालिब'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> कुंवर लताफ़त अली खां</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 27 Nov 1903</bdi> | बाग़पत, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 26 Jul 1984</bdi></span></p>\r\n<p>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>तालिब बागपती की गिनती क्लासिकी रंग की ग़ज़ल कहनेवाले प्रसिद्ध शायरों और श्रेष्ठ गद्यकारों में होती है. उन्होंने शायरी में जिगर मुरादाबादी और नुदरत मेरठी से लाभ उठाया और इश्क़ के सोज़ व गुदाज़ में डुबी हुई ग़ज़लें और नज़्में कहने लगे.<br/>तालिब का असल नाम कुँवर लताफ़त अली खां था. 27 नवंबर 1903 को बागपत ज़िला मेरठ में पैदा हुए. मेरठ कालेज से एफ़.ए. की शिक्षा प्राप्त की. ‘कोई’ के छद्मनाम से ‘आलमगीर’ में हास्य लेखन किया. उनका यह मसखरापन उनकी शायरी में भी नज़र आता है. तालिब का काव्य संग्रह 1936 में ‘शाख-ए-नबात’ के नाम से प्रकाशित हुआ. 26 जुलाई 1984 को तालिब का देहांत हुआ.<br/></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'तालिब'   मूल नाम :  कुंवर लताफ़त अली खां   जन्म :  27 Nov 1903  | बाग़पत, उत्तर प्रदेश   निधन :  26 Jul 1984         तालिब बागपती की गिनती क्लासिकी रंग की ग़ज़ल कहनेवाले प्रसिद्ध शायरों और श्रेष्ठ गद्यकारों में होती है. उन्होंने शायरी में जिगर मुरादाबादी और नुदरत मेरठी से लाभ उठाया और इश्क़ के सोज़ व गुदाज़ में डुबी हुई ग़ज़लें और नज़्में कहने लगे. तालिब का असल नाम कुँवर लताफ़त अली खां था. 27 नवंबर 1903 को बागपत ज़िला मेरठ में पैदा हुए. मेरठ कालेज से एफ़.ए. की शिक्षा प्राप्त की. ‘कोई’ के छद्मनाम से ‘आलमगीर’ में हास्य लेखन किया. उनका यह मसखरापन उनकी शायरी में भी नज़र आता है. तालिब का काव्य संग्रह 1936 में ‘शाख-ए-नबात’ के नाम से प्रकाशित हुआ. 26 जुलाई 1984 को तालिब का देहांत हुआ.  ","slug":"taliba-bagapati","DOB":"1903-11-27","DateOfDemise":"1984-07-26","location":"बाग़पत, भारत","url":"/sootradhar/taliba-bagapati","tags":null,"created":"2023-10-27T17:06:06.345469","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24613,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"तस्वीर देहलवी","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'तस्वीर देहलवी'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मियां बबन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> अलवर, राजस्थान</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'तस्वीर देहलवी'   मूल नाम :  मियां बबन   निधन :  अलवर, राजस्थान      ","slug":"tasvira-dehalavi","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"अलवर, भारत","url":"/sootradhar/tasvira-dehalavi","tags":null,"created":"2023-10-27T17:06:08.983375","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24614,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"ताैफ़ीक़ हैदराबादी","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सय्यद जलालुद्दीन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>हैदराबाद, तिलंगाना</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 21 Aug 1921</bdi> | हैदराबाद, तिलंगाना</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  मूल नाम :  सय्यद जलालुद्दीन   जन्म : हैदराबाद, तिलंगाना   निधन :  21 Aug 1921  | हैदराबाद, तिलंगाना      ","slug":"taaifiqa-haidarabadi","DOB":null,"DateOfDemise":"1921-08-21","location":"हैदराबाद, भारत","url":"/sootradhar/taaifiqa-haidarabadi","tags":null,"created":"2023-10-27T17:06:11.433235","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24615,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%A6_%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A4%B9%E0%A4%AC%E0%A4%A6.png","name":"वहीद इलाहाबादी","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'वहीद'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> वहीदउद्दीन अहमद</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span><span style=\"font-size:12px;\">वहीद इलाहाबादी, मौलवी वहीदुद्दीन </span><span style=\"font-size:12px;\">(1829-1892) </span><span style=\"font-size:12px;\">मशहूर शाइ’र ‘अकबर’ इलाहाबादी के उस्ताद थे। कहा जाता है कि उनके घर में आग लगी तो उन्हें अपना दीवान याद आया और उसे बचाने के लिए अपने कमरे में गए, लेकिन बाहर नहीं निकल सके। बा’द में उनकी लाश इस तरह मिली कि दीवान उनके हाथ में था।</span><p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\"></span></p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'वहीद'   मूल नाम :  वहीदउद्दीन अहमद   जन्म : इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश   निधन :  इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश     वहीद इलाहाबादी, मौलवी वहीदुद्दीन  (1829-1892)  मशहूर शाइ’र ‘अकबर’ इलाहाबादी के उस्ताद थे। कहा जाता है कि उनके घर में आग लगी तो उन्हें अपना दीवान याद आया और उसे बचाने के लिए अपने कमरे में गए, लेकिन बाहर नहीं निकल सके। बा’द में उनकी लाश इस तरह मिली कि दीवान उनके हाथ में था।  ","slug":"vahida-ilahabadi","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"इलाहाबाद, भारत","url":"/sootradhar/vahida-ilahabadi","tags":null,"created":"2023-10-27T17:06:14.319538","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21},{"id":24616,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%B5%E0%A4%9C%E0%A4%A6_%E0%A4%85%E0%A4%B2_%E0%A4%B6%E0%A4%B9_%E0%A4%85%E0%A4%96%E0%A4%A4%E0%A4%B0.png","name":"वाजिद अली शाह अख़्तर","bio":"<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'अख़्तर'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> अबुल मंसूर मिर्ज़ा मुहम्मद वाजिद अली शाह</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 30 Jul 1823</bdi> | लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 21 Sep 1887</bdi></span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">LCCN :</span><span>n83055474</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span>अवध के आख़िरी ताजदार वाजिद अली शाह अख़तर एक पेचीदा शख़्सियत के मालिक थे और शख़्सियत की इसी पेचीदगी ने उनको विवादित बनाए रखा है। अगर एक तरफ़ अंग्रेज़ों ने अवध पर क़ब्ज़ा करने की ग़रज़ से उन्हें एक अयोग्य और अय्याश शासक घोषित करते हुए उनके चरित्र हनन में कोई कसर न उठा रखी तो दूसरी तरफ़ उनके समर्थक भी उनकी व्यक्तिगत कमज़ोरियों पर पर्दा डालते हुए उनके व्यक्तित्व का वही रुख़ देखने और दिखाने की कोशिश करते हैं जो उनको पसंद है। वाजिद अली शाह के बारे में सिर्फ़ एक बात यक़ीन से कही जा सकती है और वो ये कि अगर वो बादशाह न होते तब भी इतिहास उनको अदब और ललित कला के संरक्षक और उनमें उनके व्यवहारिक रूप से शामिल होने के लिए याद रखता जबकि दूसरी तरफ़ अगर वो अदीब-ओ-फ़नकार न हो कर सिर्फ़ बादशाह होते तो इतिहास के पन्नों में उनके लिए केवल कुछ पंक्तियों से ज़्यादा जगह न निकल पाती।</p><p>वाजिद अली शाह का नाम मिर्ज़ा मुहम्मद वाजिद अली और तख़ल्लुस अख़तर था जिसे वो अपनी ठुमरियों वग़ैरा में \"अख़तर पिया” के तौर पर भी इस्तेमाल करते थे। वे 30 जुलाई 1822  को पैदा हुए। उस वक़्त ग़ाज़ी उद्दीन अवध के बादशाह थे। वाजिद अली की शिक्षा-दीक्षा का ख़ास इंतिज़ाम किया गया। उनके उस्ताद और संरक्षक अमीन उद्दौला इमदाद हसन थे जिनके नाम पर लखनऊ का ख़ास बाज़ार अमीनाबाद आज भी मौजूद है। शिक्षा प्राप्ति के ज़माने में वाजिद अली ने विभिन्न विषयों में महारत हासिल की और निजी अध्ययन से उसे बढ़ाया। उन्होंने 18 साल की उम्र में शे’र कहना आरम्भ कर दिया था और उन्होंने तीन मसनवीयाँ और पहला दीवान अपनी वली अहदी के ज़माने में ही संकलित कर लिया था। वालिद अमजद अली की ताजपोशी के बाद 1842 ई. में वे बाद्शाह के उत्तराधिकरी नामित किए गए थे, हालाँकि उनके एक बड़े भाई मीर मुस्तफ़ा हैदर मौजूद थे। वाजिद अली की साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन का आरम्भ उसी वक़्त से हो गया था जब उनके बादशाह बनने की वैसी कोई संभावना नहीं थी।<br/><br/>बादशाह बनने से बहुत पहले वो अदीब और संगीतकार बन चुके थे। सौन्दर्य उपासना उनके स्वभाव में था और नृत्य-संगीत से उनको स्वभाविक लगाव था... परीचेहरा नाज़नीन उनकी कमज़ोरी थीं और मिज़ाज में जिद्दत पसंदी थी जो उनकी नज़्म-ओ-नस्र, ड्रामों और भवन निर्माण में स्पष्ट दिखाई देता है। वाजिद अली की शादी 15 साल की ही उम्र में नवाब यूसुफ़ अली ख़ान बहादुर समसाम जंग की बेटी से हो गई थी। वली अहदी के ज़माने में शाही क़लमदान की ख़िदमत उनके सपुर्द थी और उनका काम प्रशंसको की अर्ज़ीयां पढ़ना, शाही फ़रमान लागू करना, शहर और दूसरी जगहों की ख़बरों पर नज़र रखना और ग़ल्ला और दूसरे अनाज की क़ीमतें मालूम करना था। बाक़ी वक़्त वो निजी रुचियों में गुज़ारते थे। वली अहदी और उससे पहले का दौर उनकी घरेलू ज़िंदगी का दौर था जिसका ज़्यादा विवरण नहीं मिलता। उन्होंने बहरहाल ख़ुद को सियासत से दूर रखा था। 1847 ई. में वालिद के इंतिक़ाल के बाद वो बादशाह बने और अबुल मुज़फ्फ़र नासिर उद्दीन सिकंदर जाह बादशाह आदिल क़ैसर ज़माँ सुलतान आलम की उपाधि इख़्तियार किया। बादशाह की हैसियत से वाजिद अली शाह ने न्याय और इन्साफ़ से काम लिया और कोई क़दम ऐसा नहीं उठाया जिससे रिआया में कोई भय और आतंक फैले। उन्होंने आम रीति-रिवाज के विपरीत अपने वालिद के ज़माने के अधिकतर ओहदेदारों को उनके ओहदों पर क़ायम रखा बल्कि उनकी तनख़्वाहें बढ़ाईं और सुविधाओं में इज़ाफ़ा किया और रिआया से क़रीब होने की कोशिश की। सल्तनत के दो ही साल हुए थे कि वो सख़्त बीमार हो गए और उनके स्वस्थ होने में दस माह लग गए। चिकित्सकों ने उनको निर्देश दिया कि वे सल्तनत के इंतिज़ाम की व्यस्तताओं को छोड़कर अपना ज़्यादा वक़्त सैर-ओ-तफ़रीह में गुज़ारें। इस तरह वे सल्तनत का कार्य-भार वो अपनी नई बीवी रोशन आरा बेगम के वालिद नवाब अली नक़ी को सौंप कर किताबों के अध्ययन, शायरी, सृजन-संकलन और कलाओं के संरक्षण में व्यस्त हो गए और इतने व्यस्त हुए कि वक़्त ने उनको वो बना दिया जिसके लिए वे मशहूर या बदनाम हैं। <br/><br/>उनके समकालिक अब्दुल हलीम शरर लिखते हैं, “वाजिद अली का इलमी मज़ाक़ निहायत पाकीज़ा और आला दर्जे का था, दर असल उनके दो ही ज़ौक़ थे। एक अदब-ओ-शायरी का और दूसरा मौसीक़ी का। अरबी के विद्वान नहीं थे मगर फ़ारसी में दम-भर में दो-दो,चार- चार बंद की नस्रें लिख डालते। यही हालत नज़्म की थी। तबीयत में इस क़दर रवानी थी कि सैकड़ों मरसिए और सलाम कह डाले और इतनी किताबें नस्र-ओ-नज़्म में लिख डालीं कि उनका शुमार भी आज किसी को न होगा\"। <br/><br/>शरर का ये बयान अपनी जगह,लेकिन ऐतिहासिक घटनाएं गवाह और उनके अपने बयानात साक्षी हैं कि वाजिद अली शाह बीमारी की सीमा तक ख़ूबसूरत औरतों के रसिया थे। कुछ हसीनों पर वो इस क़दर मरते थे कि अपनी बर्ख़ास्तगी के दिनों में, जब वो उनसे मिल नहीं सकते थे, उनकी ख़ास ख़ास चीज़ें मंगवा भेजते थे। दिलदार महल से उनकी मिस्सी मांगी, वो उन्होंने भेज दी, अख़तर महल से उनकी ज़ुल्फ़ों के बाल मांगे, उन्होंने भेज दिए, जिनको वो हमेशा अपने सिरहाने नज़र के सामने रखते और सूँघते। तमाम महजबीनें और नाज़-आफ़रीं दिलरुबाएं मुताह (एक तरह का निकाह) के ज़रिये जाइज़ कर ली थीं... भिश्तन तक नवाब आब-ए-रसां बेगम और मिहतरानी नवाब मसफ़यार बेगम थी। ये बातें ऐसी थीं जिनके लिए वो निंदा के नहीं बल्कि ईलाज के हक़दार थे लेकिन उस ज़माने में उनका ईलाज कौन करता और वो क्यों करवाते, लेकिन आज तो उनसे हमदर्दी बरती ही जा सकती है।<br/><br/>वाजिद अली शाह पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने सारी तवज्जो रहस् बाज़ी, परी ख़ाना, महलात और राग व नृत्य की महफ़िलों पर केन्द्रित कर दी थी लेकिन उनके पास करने को था ही क्या। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरी तरह उनके हाथ बांध रखे थे। वे बस नाम मात्र के बादशाह थे। उनको छोटी से छोटी बात के लिए बी रेज़िडेंट की मंज़ूरी हासिल करनी पड़ती थी। लोगों की नज़र में रेज़िडेंट की ख़ुशी बादशाह की ख़ुशी से बढ़कर थी। सल्तनत की राजनीतिक और आर्थिक हालात अंग्रेज़ों की तरफ़ से जान-बूझ कर ख़राब किए जा रहे थे और वाजिद अली पर इल्ज़ाम था कि उनको गवय्यों और ख़्वाजा सराओं की संगत पसंद है। अमन-ओ-क़ानून की हालत ख़राब थी। अंग्रेज़ सिर्फ़ वक़्त के इंतिज़ार में थे और अख़तर पिया की सरगर्मियों ने रेज़िडेंट को मौक़ा दे दिया कि वो दुर्व्यवस्था का इल्ज़ाम उन पर थोप कर उन्हें पद से हटा दे। इस तरह 1856 में वाजिद अली शाह को अपदस्थ कर दिया गया, वो किसी प्रतिरोध या ख़ूनख़राबे के बिना हुकूमत से अलग हो गए और अपनी ज़िंदगी के आख़िरी 31 साल मटियाबुर्ज में गुज़ारे। 1887 ई. में उनकी मौत हुई।<br/><br/>बर्ख़ास्तगी के बाद वाजिद अली शाह एक बुझे हुए इन्सान थे। लेकिन ज़िंदगी का ये दौर सृजनात्मक रूप से उनके लिए वरदान साबित हुआ। वे उस ज़माने में ज़्यादातर वक़्त सृजन और संकलन में व्यतीत करते। उन्होंने विभिन्न विषयों पर छोटी-बड़ी लगभग सौ किताबें लिखीं, जिनमें छंद जैसे निरस विषय पर भी उनके दो रिसाले मौजूद हैं। कहा जाता है कि उन्होंने इकसठ नई बहरों की खोज की और उनके नाम रखे। लखनऊ के ज़माने में, पारंपरिक छंदोबद कलाम के साथ साथ उन्होंने सैकड़ों गीत बनाए जो घर-घर गाए जाते थे। क्लासिकी संगीत को आसान और आम पसंद बनाना उनका एक बड़ा कारनामा है और लखनवी ठुमरी और भैरवीं की लोकप्रियता में इन ही का एहसान है। उनकी भैरवीं ठुमरी “बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए” अनगिनत गायकों ने गाया है लेकिन कुन्दन लाल सहगल ने इसमें जो दर्द भरा है इसकी कोई मिसाल नहीं है। नाटक के कला पर उनका एहसान संगीत से भी ज़्यादा है। उन्होंने इस कला को जो मुल्क में बिल्कुल अपमानित हो गया था, गलियों से उठा कर महलों तक पहुंचाया। उनके ज़माने तक उर्दू ड्रामे का कोई वुजूद नहीं था। उन्होंने वलीअहदी के ज़माने में ही एक नाटक “राधा-कन्हैया” लिखा था जिसे उर्दू का पहला ड्रामा कहा जाता है। उन्होंने अपनी मसनवियों “अफ़साना-ए-इशक़”, “दरया-ए-ताश्शुक़” और “बह्र-ए-उल्फ़त” के रहस् तैयार किए और उनको दिखने-दिखाने के लिए कैसरबाग, रहस् मंज़िल और दूसरी इमारतें तामीर कराईं। वाजिद अली की इल्म दोस्ती का पता इस बात से चलता है कि उन्होंने शाही कुतुबख़ाने की सूची बनवाई और उसमें इज़ाफ़े के लिए इश्तिहार दे देकर नई किताबें मुँह-माँगे दामों खरीदीं। <br/><br/>वाजिद अली को बर्ख़ास्तगी के बाद 12 लाख रुपये सालाना वज़ीफ़ा मिलता था। उन्होंने मटिया बुर्ज को छोटा लखनऊ बनाने की कोशिश की और लखनऊ की तर्ज़ की इमारतें बनवाईं। इमाम बाड़ा सिब्तैन, रईस मंज़िल, तमाम बाग़ात और इमारतें जिनसे लखनऊ की यादें जुड़ी थीं, मटिया बुर्ज में प्रकट हुईं। मटिया बुर्ज में उनकी रातें मुशायरों, मजलिसों और महफ़िलों को समर्पित थीं। वाजिद अली शाह के आख़िरी पाँच बरसों की कमाई उनकी मसनवी “सबात-उल-क़ुलूब” है जिसमें उनकी सलाहियतें खुल कर सामने आई हैं। वाजिद अली बुनियादी तौर पर मसनवी के शायर थे। उनका दूसरा काम कमीयत और कैफ़ियत दोनों लिहाज़ से मसनवी के मुक़ाबले में कमतर है।</p><p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\"> </span></p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'अख़्तर'   मूल नाम :  अबुल मंसूर मिर्ज़ा मुहम्मद वाजिद अली शाह   जन्म :  30 Jul 1823  | लखनऊ, उत्तर प्रदेश   निधन :  21 Sep 1887   LCCN : n83055474     अवध के आख़िरी ताजदार वाजिद अली शाह अख़तर एक पेचीदा शख़्सियत के मालिक थे और शख़्सियत की इसी पेचीदगी ने उनको विवादित बनाए रखा है। अगर एक तरफ़ अंग्रेज़ों ने अवध पर क़ब्ज़ा करने की ग़रज़ से उन्हें एक अयोग्य और अय्याश शासक घोषित करते हुए उनके चरित्र हनन में कोई कसर न उठा रखी तो दूसरी तरफ़ उनके समर्थक भी उनकी व्यक्तिगत कमज़ोरियों पर पर्दा डालते हुए उनके व्यक्तित्व का वही रुख़ देखने और दिखाने की कोशिश करते हैं जो उनको पसंद है। वाजिद अली शाह के बारे में सिर्फ़ एक बात यक़ीन से कही जा सकती है और वो ये कि अगर वो बादशाह न होते तब भी इतिहास उनको अदब और ललित कला के संरक्षक और उनमें उनके व्यवहारिक रूप से शामिल होने के लिए याद रखता जबकि दूसरी तरफ़ अगर वो अदीब-ओ-फ़नकार न हो कर सिर्फ़ बादशाह होते तो इतिहास के पन्नों में उनके लिए केवल कुछ पंक्तियों से ज़्यादा जगह न निकल पाती। वाजिद अली शाह का नाम मिर्ज़ा मुहम्मद वाजिद अली और तख़ल्लुस अख़तर था जिसे वो अपनी ठुमरियों वग़ैरा में \"अख़तर पिया” के तौर पर भी इस्तेमाल करते थे। वे 30 जुलाई 1822  को पैदा हुए। उस वक़्त ग़ाज़ी उद्दीन अवध के बादशाह थे। वाजिद अली की शिक्षा-दीक्षा का ख़ास इंतिज़ाम किया गया। उनके उस्ताद और संरक्षक अमीन उद्दौला इमदाद हसन थे जिनके नाम पर लखनऊ का ख़ास बाज़ार अमीनाबाद आज भी मौजूद है। शिक्षा प्राप्ति के ज़माने में वाजिद अली ने विभिन्न विषयों में महारत हासिल की और निजी अध्ययन से उसे बढ़ाया। उन्होंने 18 साल की उम्र में शे’र कहना आरम्भ कर दिया था और उन्होंने तीन मसनवीयाँ और पहला दीवान अपनी वली अहदी के ज़माने में ही संकलित कर लिया था। वालिद अमजद अली की ताजपोशी के बाद 1842 ई. में वे बाद्शाह के उत्तराधिकरी नामित किए गए थे, हालाँकि उनके एक बड़े भाई मीर मुस्तफ़ा हैदर मौजूद थे। वाजिद अली की साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन का आरम्भ उसी वक़्त से हो गया था जब उनके बादशाह बनने की वैसी कोई संभावना नहीं थी। बादशाह बनने से बहुत पहले वो अदीब और संगीतकार बन चुके थे। सौन्दर्य उपासना उनके स्वभाव में था और नृत्य-संगीत से उनको स्वभाविक लगाव था... परीचेहरा नाज़नीन उनकी कमज़ोरी थीं और मिज़ाज में जिद्दत पसंदी थी जो उनकी नज़्म-ओ-नस्र, ड्रामों और भवन निर्माण में स्पष्ट दिखाई देता है। वाजिद अली की शादी 15 साल की ही उम्र में नवाब यूसुफ़ अली ख़ान बहादुर समसाम जंग की बेटी से हो गई थी। वली अहदी के ज़माने में शाही क़लमदान की ख़िदमत उनके सपुर्द थी और उनका काम प्रशंसको की अर्ज़ीयां पढ़ना, शाही फ़रमान लागू करना, शहर और दूसरी जगहों की ख़बरों पर नज़र रखना और ग़ल्ला और दूसरे अनाज की क़ीमतें मालूम करना था। बाक़ी वक़्त वो निजी रुचियों में गुज़ारते थे। वली अहदी और उससे पहले का दौर उनकी घरेलू ज़िंदगी का दौर था जिसका ज़्यादा विवरण नहीं मिलता। उन्होंने बहरहाल ख़ुद को सियासत से दूर रखा था। 1847 ई. में वालिद के इंतिक़ाल के बाद वो बादशाह बने और अबुल मुज़फ्फ़र नासिर उद्दीन सिकंदर जाह बादशाह आदिल क़ैसर ज़माँ सुलतान आलम की उपाधि इख़्तियार किया। बादशाह की हैसियत से वाजिद अली शाह ने न्याय और इन्साफ़ से काम लिया और कोई क़दम ऐसा नहीं उठाया जिससे रिआया में कोई भय और आतंक फैले। उन्होंने आम रीति-रिवाज के विपरीत अपने वालिद के ज़माने के अधिकतर ओहदेदारों को उनके ओहदों पर क़ायम रखा बल्कि उनकी तनख़्वाहें बढ़ाईं और सुविधाओं में इज़ाफ़ा किया और रिआया से क़रीब होने की कोशिश की। सल्तनत के दो ही साल हुए थे कि वो सख़्त बीमार हो गए और उनके स्वस्थ होने में दस माह लग गए। चिकित्सकों ने उनको निर्देश दिया कि वे सल्तनत के इंतिज़ाम की व्यस्तताओं को छोड़कर अपना ज़्यादा वक़्त सैर-ओ-तफ़रीह में गुज़ारें। इस तरह वे सल्तनत का कार्य-भार वो अपनी नई बीवी रोशन आरा बेगम के वालिद नवाब अली नक़ी को सौंप कर किताबों के अध्ययन, शायरी, सृजन-संकलन और कलाओं के संरक्षण में व्यस्त हो गए और इतने व्यस्त हुए कि वक़्त ने उनको वो बना दिया जिसके लिए वे मशहूर 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मिहतरानी नवाब मसफ़यार बेगम थी। ये बातें ऐसी थीं जिनके लिए वो निंदा के नहीं बल्कि ईलाज के हक़दार थे लेकिन उस ज़माने में उनका ईलाज कौन करता और वो क्यों करवाते, लेकिन आज तो उनसे हमदर्दी बरती ही जा सकती है। वाजिद अली शाह पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने सारी तवज्जो रहस् बाज़ी, परी ख़ाना, महलात और राग व नृत्य की महफ़िलों पर केन्द्रित कर दी थी लेकिन उनके पास करने को था ही क्या। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरी तरह उनके हाथ बांध रखे थे। वे बस नाम मात्र के बादशाह थे। उनको छोटी से छोटी बात के लिए बी रेज़िडेंट की मंज़ूरी हासिल करनी पड़ती थी। लोगों की नज़र में रेज़िडेंट की ख़ुशी बादशाह की ख़ुशी से बढ़कर थी। सल्तनत की राजनीतिक और आर्थिक हालात अंग्रेज़ों की तरफ़ से जान-बूझ कर ख़राब किए जा रहे थे और वाजिद अली पर इल्ज़ाम था कि उनको गवय्यों और ख़्वाजा सराओं की संगत पसंद है। अमन-ओ-क़ानून की हालत ख़राब थी। अंग्रेज़ सिर्फ़ वक़्त के इंतिज़ार में थे और अख़तर पिया की सरगर्मियों ने रेज़िडेंट को मौक़ा दे दिया कि वो दुर्व्यवस्था का इल्ज़ाम उन पर थोप कर उन्हें पद से हटा दे। इस तरह 1856 में वाजिद अली शाह को अपदस्थ कर दिया गया, वो किसी प्रतिरोध या ख़ूनख़राबे के बिना हुकूमत से अलग हो गए और अपनी ज़िंदगी के आख़िरी 31 साल मटियाबुर्ज में गुज़ारे। 1887 ई. में उनकी मौत हुई। बर्ख़ास्तगी के बाद वाजिद अली शाह एक बुझे हुए इन्सान थे। लेकिन ज़िंदगी का ये दौर सृजनात्मक रूप से उनके लिए वरदान साबित हुआ। वे उस ज़माने में ज़्यादातर वक़्त सृजन और संकलन में व्यतीत करते। उन्होंने विभिन्न विषयों पर छोटी-बड़ी लगभग सौ किताबें लिखीं, जिनमें छंद जैसे निरस विषय पर भी उनके दो रिसाले मौजूद हैं। कहा जाता है कि उन्होंने इकसठ नई बहरों की खोज की और उनके नाम रखे। लखनऊ के ज़माने में, पारंपरिक छंदोबद कलाम के साथ साथ उन्होंने सैकड़ों गीत बनाए जो घर-घर गाए जाते थे। क्लासिकी संगीत को आसान और आम पसंद बनाना उनका एक बड़ा कारनामा है और लखनवी ठुमरी और भैरवीं की लोकप्रियता में इन ही का एहसान है। उनकी भैरवीं ठुमरी “बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए” अनगिनत गायकों ने गाया है लेकिन कुन्दन लाल सहगल ने इसमें जो दर्द भरा है इसकी कोई मिसाल नहीं है। नाटक के कला पर उनका एहसान संगीत से भी ज़्यादा है। उन्होंने इस कला को जो मुल्क में बिल्कुल अपमानित हो गया था, गलियों से उठा कर महलों तक पहुंचाया। उनके ज़माने तक उर्दू ड्रामे का कोई वुजूद नहीं था। उन्होंने वलीअहदी के ज़माने में ही एक नाटक “राधा-कन्हैया” लिखा था जिसे उर्दू का पहला ड्रामा कहा जाता है। उन्होंने अपनी मसनवियों “अफ़साना-ए-इशक़”, “दरया-ए-ताश्शुक़” और “बह्र-ए-उल्फ़त” के रहस् तैयार किए और उनको दिखने-दिखाने के लिए कैसरबाग, रहस् मंज़िल और दूसरी इमारतें तामीर कराईं। वाजिद अली की इल्म दोस्ती का पता इस बात से चलता है कि उन्होंने शाही कुतुबख़ाने की सूची बनवाई और उसमें इज़ाफ़े के लिए इश्तिहार दे देकर नई किताबें मुँह-माँगे दामों खरीदीं।  वाजिद अली को बर्ख़ास्तगी के बाद 12 लाख रुपये सालाना वज़ीफ़ा मिलता था। उन्होंने मटिया बुर्ज को छोटा लखनऊ बनाने की कोशिश की और लखनऊ की तर्ज़ की इमारतें बनवाईं। इमाम बाड़ा सिब्तैन, रईस मंज़िल, तमाम बाग़ात और इमारतें जिनसे लखनऊ की यादें जुड़ी थीं, मटिया बुर्ज में प्रकट हुईं। मटिया बुर्ज में उनकी रातें मुशायरों, मजलिसों और महफ़िलों को समर्पित थीं। वाजिद अली शाह के आख़िरी पाँच बरसों की कमाई उनकी मसनवी “सबात-उल-क़ुलूब” है जिसमें उनकी सलाहियतें खुल कर सामने आई हैं। वाजिद अली बुनियादी तौर पर मसनवी के शायर थे। उनका दूसरा 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'आरिफ़'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>दिल्ली</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>","raw_bio":"  उपनाम :  'आरिफ़'   जन्म : दिल्ली      ","slug":"zainula-abdina-kham-arifa","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"दिल्ली, भारत","url":"/sootradhar/zainula-abdina-kham-arifa","tags":null,"created":"2023-10-27T17:06:22.664685","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":21}],"description":"<p style=\"text-align: center; font-size: 24px;\"> The Great Poets and Writers in Indian and World History! </p>","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_description/black.jpg"}