{"count":17752,"next":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=json&page=660","previous":"http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=json&page=658","results":[{"id":28003,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"बनादास","bio":"<p class=\"poetDetailPara\">मधुरोपासक रामभक्त कवि। काव्य-सौष्ठव, प्रबंध-पटुता और शैलियों की विविधता के लिए ख्यात।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> बनादास</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>गोंडा, उत्तर प्रदेश</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> अयोध्या, उत्तर प्रदेश</span\r\n</div> <br> <p","raw_bio":"मधुरोपासक रामभक्त कवि। काव्य-सौष्ठव, प्रबंध-पटुता और शैलियों की विविधता के लिए ख्यात।     मूल नाम :  बनादास जन्म : गोंडा, उत्तर प्रदेश निधन :  अयोध्या, उत्तर प्रदेश    ","slug":"banadasa","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"गोंडा, उत्तर प्रदेश","url":"/sootradhar/banadasa","tags":"ब्रजी","created":"2024-01-11T16:40:15.069745","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28004,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"बनारसी दास","bio":"<p class=\"poetDetailPara\">भक्तिकालीन कवि और गद्यकार। हिंदी की पहली आत्मकथा 'अर्द्धकथानक' के लिए स्मरणीय।</p>  ","raw_bio":"भक्तिकालीन कवि और गद्यकार। हिंदी की पहली आत्मकथा 'अर्द्धकथानक' के लिए स्मरणीय।  ","slug":"banarasi-dasa","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"जौनपुर, उत्तर प्रदेश","url":"/sootradhar/banarasi-dasa","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:15.485885","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28005,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"बनारसीदास","bio":" ","raw_bio":null,"slug":"banarasidasa","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/banarasidasa","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:15.901115","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28006,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8_%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%A6.png","name":"बनारसीदास चतुर्वेदी","bio":"<p class=\"poetDetailPara\">समादृत लेखक और संपादक। हिंदी में संस्मरण विधा के उभार में योगदान। छायावाद के विरोध के लिए चर्चित।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 24/12/1892</bdi> | फ़िरोज़ाबाद, उत्तर प्रदेश</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 02/05/1985</bdi></span\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> पुरस्कार :</span>\r\n<span style=\"color:black;\">\r\r\n                                पद्म भूषण पुरस्कार(1973)\r\r\n                            </span>\r\n</p>\r\n</div> <br> <p","raw_bio":"समादृत लेखक और संपादक। हिंदी में संस्मरण विधा के उभार में योगदान। छायावाद के विरोध के लिए चर्चित।     जन्म :  24/12/1892  | फ़िरोज़ाबाद, उत्तर प्रदेश निधन :  02/05/1985    पुरस्कार :   \r\r                                 पद्म भूषण पुरस्कार(1973)\r\r                                     ","slug":"banarasidasa-caturvedi","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"फ़िरोज़ाबाद, उत्तर प्रदेश","url":"/sootradhar/banarasidasa-caturvedi","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:16.516895","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28007,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"बंग महिला (राजेंद्रबाला घोष)","bio":" <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> राजेंद्रबाला घोष</span\r\n</div> <br> <p","raw_bio":"  मूल नाम :  राजेंद्रबाला घोष    ","slug":"banga-mahila-rajendrabala-ghosa","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/banga-mahila-rajendrabala-ghosa","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:16.896814","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28008,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"बंशी","bio":"<p class=\"poetDetailPara\">फाग के लिए स्मरणीय कवि।</p>  ","raw_bio":"फाग के लिए स्मरणीय कवि।  ","slug":"bansi","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/bansi","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:17.440204","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28009,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"बावरी साहिबा","bio":"<p class=\"poetDetailPara\">भक्तिकालीन निर्गुण मत की स्त्री संत। 'बावरी संप्रदाय' की संस्थापिका।</p>  ","raw_bio":"भक्तिकालीन निर्गुण मत की स्त्री संत। 'बावरी संप्रदाय' की संस्थापिका।  ","slug":"bavari-sahiba","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"दिल्ली","url":"/sootradhar/bavari-sahiba","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:18.051268","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28010,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"बेनी बंदीजन","bio":"<p class=\"poetDetailPara\">रीतिबद्ध कवि। उपहास-काव्य के अंतर्गत आने वाले ‘भँड़ौवों’ से विख्यात हुए।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>रायबरेली, उत्तर प्रदेश</span\r\n</div> <br> <p><p>ये बेंती (जिला रायबरेली) के निवासी और अवध के प्रसिद्ध वजीर टिकैतराय के दरबारी कवि थे। कहा जाता है एक बार सन् 1817 ई. में इनमें और लखनऊ के प्रसिद्ध कवि बेनी बाजपेयी में टक्कर हो गयी, जिसमें इन्होंने बाजपेयी के महत्त्व को स्वीकारा और उन्हें 'प्रवीन' की उपाधि से विभूषित किया।</p><p>'शिवसिंह सरोज' के अनुसार इनका निधन 1835 ई. में हुआ। इन्होंने <strong>'टिकैतराय प्रकाश' (अलंकार शिरोमणि'), 'रस-विलास' तथा अनेक भँड़ौवा की रचना की।</strong> इनके अतिरिक्त <strong>हाल की खोज से कवि के 'यश लहरी' नामक ग्रंथ का पता चला है।</strong> <strong>'टिकैतराय प्रकाश' एक अलंकार ग्रंथ है।</strong> इसकी रचनाएँ उत्कृष्ट नहीं कही जा सकतीं किंतु इनका असाधारण महत्त्व है। यह ग्रंथ सन् 1792 ई. में रचा गया। दूसरे ग्रंथ 'रस-विलास' का निर्माण-काल 'मिश्रबंधु विनोद' के अनुसार सन् 1817 ई. है। इसमें रस-भेद तथा भाव-भेद के साथ-साथ नायक-नायिका एवं नौ रसों का वर्णन भी बड़े ही विस्तार से किया गया है। शास्त्रीय और कवित्व दोनों ही दृष्टियों से यह सुंदर रीति-ग्रंथ है। इसकी रचना लछिमनदास के नाम से हुई थी।</p><p><strong>भँड़ौवा की रचना कवि के समस्त कृतित्व में एक अनोखी उपलब्धि है।</strong> इससे कवि को जितना यश मिला है, उतना उसकी अन्य रचनाओं से नहीं। उसके 36 भँड़ौवे हस्तलिखित रूप में और शेष 'भँड़ौवा-संग्रह', में जो ‘भारत जीवन प्रेस’ काशी से बहुत दिनों पहले प्रकाशित हो चुका है, पाये जाते हैं। 'यश लहरी' में देवी-देवताओं का यश गान किया गया है। इस कारण उसका 'यश लहरी' नाम उचित ही है। कवित्व की दृष्टि से उसके भँड़ौवों का स्थान महत्त्व का है। इससे पूर्व भँड़ौवा-शैली की रचनाओं की कोई स्थिति नहीं थी, इस कारण मौलिकता के विचार से भी ऐसी रचनाओं का महत्त्व बढ़ जाता है। भँड़ौवा बड़ी ही मनोरंजनात्मक शैली में उपहास की सृष्टि करता है। इस तरह की कविता में अक्सर किसी वस्तु, व्यक्ति आदि की निंदा को प्रधानता दी जाती है। इसी नाते इसे व्यंग्यकाव्य कहा जाय तो उचित होगा। इसी को उर्दू में 'हजो' तथा अँग्रेज़ी में 'सटायर' कहते हैं। इस शैली में दयाराम के आमों, लखनऊ के ललकदास और किसी से पाई हुई रजाई की अच्छी खिल्ली उड़ाई गयी है। ये प्रसंग इतने रोचक बन पड़े हैं कि लगभग सभी प्राचीन काव्य-रसिकों की जबान पर देखे जाते हैं। यमक और अनुप्रास का भी ध्यान रखा गया है। कलात्मक चारुता और सुकुमार भाव-व्यंजना की भी कमी नहीं है। मिश्रबंधुओं ने इन्हें पद्माकर-श्रेणी का कवि माना है।<br/</p>","raw_bio":"रीतिबद्ध कवि। उपहास-काव्य के अंतर्गत आने वाले ‘भँड़ौवों’ से विख्यात हुए।     जन्म : रायबरेली, उत्तर प्रदेश     ये बेंती (जिला रायबरेली) के निवासी और अवध के प्रसिद्ध वजीर टिकैतराय के दरबारी कवि थे। कहा जाता है एक बार सन् 1817 ई. में इनमें और लखनऊ 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वर्मा था जो पेशे से वकील थे। 1908 में फैली प्लेग महामारी में उनकी मृत्यु हो गई जिससे घर की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई। इसका उनकी शिक्षा-दीक्षा पर असर पड़ा।<p>वह बचपन से ही कविता लिखने लगे थे। कविता लिखने का शौक़ बढ़ा तो अपने स्कूल की हस्तलिखित पत्रिका के नियमित लेखक बन गए। ‘प्रताप’ और ‘शारदा’ जैसी पत्रिकाओं में छपने भी लगे थे। 15 वर्ष की अवस्था में ही उन्हें कानपुर के एक विशिष्ट साहित्यिक गुट में स्थान मिल गया जहाँ वह विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, रमाशंकर अवस्थी, चंडीकाप्रसाद मिश्र आदि के संपर्क में रहे। साहित्य में डूबे रहने के कारण हाईस्कूल और इंटर दोनों ही परीक्षाओं में दूसरे प्रयास में पास हो सके। आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह इलाहाबाद गए। हिंदी, अँग्रेज़ी और इतिहास विषय से 1926 में स्नातक किया फिर एल.एल.बी की परीक्षा पास की।</p><p>1928 में एल.एल.बी करने के पश्चात जीविकोपार्जन के लिए वकालत करने लगे लेकिन उनकी वकालत चल न सकी। हमीरपुर में वकालत के दौरान भद्री राजा बजरंगबहादुर सिंह के संपर्क में आए और कुछ समय उनके संरक्षण में रहे। इसी समय वह ‘चित्रलेखा’ के लेखन-कार्य में ज़ोर-शोर से जुट गए थे। ‘चित्रलेखा’ के प्रकाशन और उसकी बिक्री से उनका भाग्य कुछ बदला। अगले कुछ वर्ष कलकत्ता फ़िल्म कॉर्पोरेशन और ‘विचार’ पत्रिका से संबद्ध रहे, फिर फ़िल्म निर्देशक केदार शर्मा ने ‘चित्रलेखा’ फ़िल्म का निर्माण शुरू किया तो सिनेरियो लेखक के रूप में ‘बम्बई टाकीज़’ से जुड़ गए। अब वह पत्रकारिता भी करने लगे थे। 1950 तक ‘पतन’, ‘चित्रलेखा’ और ‘तीन वर्ष’ आदि उपन्यासों के प्रकाशन के साथ वह हिंदी उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। लखनऊ और दिल्ली के आकाशवाणी केंद्रों से भी उनकी संबद्धता रही। बाद के दिनों में उन्होंने अन्य कार्यों से विराम ले लिया और पूर्णकालिक साहित्य सृजन में रत हो गए।   <br/>भगवतीचरण वर्मा ने अपने साहित्यिक जीवन का आरंभ एक कवि के रूप में किया था। उनकी आरंभिक कविताएँ छायावाद से प्रभावित हैं, जबकि कुछ कविताओं में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की भी झलक मिलती है। उनकी कविताओं का केंद्र-बिंदु ‘अस्मिता की खोज’ है और उनकी कविताओं में आत्म-दर्शन भी बहुधा अभिव्यक्त हुआ है। दार्शनिकता, कौतूहल, विशिष्ट चरित्र-चित्रण, हास्य-व्यंग्य, सरस भाषा-शैली जैसी विशेषताएँ रखने वाली कहानियों के साथ उन्होंने हिंदी कहानी-धारा में योगदान किया है। उनके निबंधों के दो वर्ग है, जहाँ एक में उन्होंने साहित्य की विधाओं पर लेखनी चलाई है तो दूसरे में सामाजिक समस्याओं पर विचार किया है। उनके एकांकी और नाटकों में समाज की गंभीर समस्याओं पर हास्य के पुट के साथ टिप्पणी की गई है और इस रूप में उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता प्रकट हुई है।</p><p>उपन्यासकार के रूप में अधिक ख्यातिलब्ध भगवती चरण वर्मा ने कई सशक्त एवं बहुचर्चित औपन्यासिक कृतियों की रचना की है। इन कृतियों में युगीन चित्रण के साथ ही सामाजिक यथार्थ को उद्घाटित किया गया है। पाप और पुण्य जैसे विषय पर ‘चित्रलेखा’ के साथ ही उन्हें ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’, ‘आख़िरी दाँव’, ‘अपने खिलौने’ और ‘भूले-बिसरे चित्र’ के रूप में चार वृहत उपन्यासों के लिए हिंदी उपन्यास परंपरा में अत्यंत सम्मान से रखा जाता है।<p>उन्हें ‘भूले-बिसरे’ चित्र के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया जबकि वह राज्यसभा सदस्य के रूप में भी मनोनीत किए गए। <br/><br/>प्रमुख कृतियाँ</p><p>उपन्यास :  पतन, चित्रलेखा, तीन वर्ष, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, अपने खिलौने, भूले-बिसरे चित्र, सामर्थ्य और सीमा, थके पाँव, रेखा, सबहिं नचावत राम गोंसाईं, प्रश्न और मरीचिका, धुप्पल, क्या निराश हुआ जाए।</p><p>कहानी-संग्रह : दो बाँके, मोर्चाबंदी, राख़ और चिंगारी, इनस्टॉलमेंट।</p><p>काव्य-संग्रह : मधुकण, प्रेम-संगीत, मानव।</p><p>नाटक : वसीहत, रुपया तुम्हें खा गया, सबसे बड़ा आदमी।</p><p>संस्मरण : अतीत के गर्त से।</p><p>साहित्यालोचन : साहित्य के सिद्धांत तथा रूप।<br/><br/><br/><br/><br/><br/></p>   ","raw_bio":"प्रेमचंद युग के समादृत उपन्यासकार-कहानीकार। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।     जन्म :  01/08/1903  | शफ़ीपुर, उत्तर प्रदेश   निधन :  01/10/1981  | उत्तर प्रदेश       छायावादी कवि और प्रेमचंदोत्तर युग के प्रमुख उपन्यासकार भगवती चरण वर्मा का जन्म उन्नाव जिले के सफीपुर क़स्बे में 30 अगस्त 1903 को एक विखंडित होते ज़मींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम देवीचरण वर्मा था जो पेशे से वकील थे। 1908 में फैली प्लेग महामारी में उनकी मृत्यु हो गई जिससे घर की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई। इसका उनकी शिक्षा-दीक्षा पर असर पड़ा। वह बचपन 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समस्याओं पर विचार किया है। उनके एकांकी और नाटकों में समाज की गंभीर समस्याओं पर हास्य के पुट के साथ टिप्पणी की गई है और इस रूप में उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता प्रकट हुई है। उपन्यासकार के रूप में अधिक ख्यातिलब्ध भगवती चरण वर्मा ने कई सशक्त एवं बहुचर्चित औपन्यासिक कृतियों की रचना की है। इन कृतियों में युगीन चित्रण के साथ ही सामाजिक यथार्थ को उद्घाटित किया गया है। पाप और पुण्य जैसे विषय पर ‘चित्रलेखा’ के साथ ही उन्हें ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’, ‘आख़िरी दाँव’, ‘अपने खिलौने’ और ‘भूले-बिसरे चित्र’ के रूप में चार वृहत उपन्यासों के लिए हिंदी उपन्यास परंपरा में अत्यंत सम्मान से रखा जाता है। उन्हें ‘भूले-बिसरे’ चित्र के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया जबकि वह राज्यसभा सदस्य के रूप में भी मनोनीत किए गए।  प्रमुख कृतियाँ उपन्यास :  पतन, चित्रलेखा, तीन वर्ष, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, अपने खिलौने, भूले-बिसरे चित्र, सामर्थ्य और सीमा, थके पाँव, रेखा, सबहिं नचावत राम गोंसाईं, प्रश्न और मरीचिका, धुप्पल, क्या निराश हुआ जाए। कहानी-संग्रह : दो बाँके, मोर्चाबंदी, राख़ और चिंगारी, इनस्टॉलमेंट। काव्य-संग्रह : मधुकण, प्रेम-संगीत, मानव। नाटक : वसीहत, रुपया तुम्हें खा गया, सबसे बड़ा आदमी। संस्मरण : अतीत के गर्त से। साहित्यालोचन : साहित्य के सिद्धांत तथा रूप।    ","slug":"bhagavati-carana-varma","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"शफ़ीपुर, उत्तर प्रदेश","url":"/sootradhar/bhagavati-carana-varma","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:19.060164","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28012,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"भगवंत सिंह","bio":" ","raw_bio":null,"slug":"bhagavanta-sinha","DOB":null,"DateOfDemise":null,"location":"","url":"/sootradhar/bhagavanta-sinha","tags":"","created":"2024-01-11T16:40:19.464023","is_has_special_post":false,"is_special_author":false,"language":4},{"id":28013,"image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png","name":"भगवत रसिक","bio":"<p class=\"poetDetailPara\">'टट्टी संप्रदाय' से संबद्ध। कविता में वैराग्य और प्रेम दोनों को एक साथ साधने के लिए स्मरणीय।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> भगवत रसिक</span\r\n</div> <br> <p><p>भगवत रसिक बहुत निर्भीक, निस्पृह, सत्यवादी और त्यागी स्वभाव के महात्मा थे। ललित मोहिनीदास के निधन के उपरांत गद्दी का अधिकार भी आपने स्वीकार नहीं किया और एकांत में रहकर भजन में लीन रहते थे। इनके काव्य को पढ़कर दो तथ्य बड़े स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। एक तो इनकी वाणी में सत्य कथन की प्रबल शक्ति है। पाखंड और दंभ से इन्हें बहुत ही चिढ़ थी। ये अपने साथियों को भी फटकारने और उनकी कमजोरियों को छुड़ाने के लिए कठोर वचन कहने में नहीं चूकते थे।</p><p><span style=\"font-size:12px;\">भगवत रसिक के जन्म स्थान, जाति, वंश आदि का विवरण कहीं प्राप्त नहीं होता। <strong>ये ‘टट्टी संप्रदाय’ के महात्मा स्वामी ललित मोहिनीदास के शिष्य थे।</strong> ललित मोहिनीदास संवत् 1766 ई. से 1801 ई. तक टट्टी संस्थान की गद्दी पर आसीन रहे, अतः इस काल में भगवत रसिक भी जीवित थे। हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथों तथा ‘निंबार्क संप्रदाय’ के ग्रंथों में इसी आधार पर इनका जन्म सन् 1738 ई. में स्थिर किया गया है।</span<p><span style=\"font-size:12px;\"></span><span style=\"font-size:12px;\"><em>रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें ‘सच्चा प्रेमयोगी महात्मा’ लिखा है।</em> यथार्थ में इनका काव्य इसका पूरा-पूरा प्रमाण है। इनके काव्य की दूसरी उल्लेख्य विशेषता है कला समन्वित होना। साधुओं की वाणी प्रायः कलाविहीन और सीधी-सादी ही पायी जाती है किंतु भगवत रसिक की वाणी में कला के अनुरूप अलंकार, लक्षण, व्यंजना, माधुर्य, ओज, व्यंग्य आदि सभी उपकरण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है आपने संस्कृत काव्य-शास्त्र का विधिवत् अध्ययन करके हिन्दी काव्य क्षेत्र में प्रवेश किया था। इनका एक ग्रंथ 'अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ’ संवत् 1914 ई. में लखनऊ से प्रकाशित हुआ था। इनकी एक ‘ध्यान मंजरी’ और कुछ स्फुट छंद भी उपलब्ध हुए हैं। इनके पदों में प्रेमलक्षणा भक्ति के साथ व्यावहारिक दृष्टि से जीवन-निर्माण के उपाय भी मिलते हैं। अर्थ-संचय में लीन लोभी मनुष्यों को सामने रखकर इन्होंने कहा है :</span<p><span style=\"font-size:12px;\"></span><span style=\"font-size:12px;\"><em>\"जगत में पैसन ही की मांड।</em></span><br/><span style=\"font-size:12px;\"><em>पैसन बिना गुरु को चेला, खसमें छोड़े रांड॥\"</em></span<p><span style=\"font-size:12px;\"></span><span style=\"font-size:12px;\">भगवत रसिक ने सांप्रदायिक दृष्टि से भी बड़ी निःस्पृहता का रुख स्वीकार किया है। वे चतुःसंप्रदाय की सीमाओं में अपने को बाँधना नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा है :</span<p><span style=\"font-size:12px;\"></span><span style=\"font-size:12px;\"><em>‘आचारज ललिता सखी, रसिक हमारी आप।</em></span><br/><em><span style=\"font-size:12px;\">नित्य किशोर उपासनी, बुगल मंत्र का जाप॥</span></em><br/><em><span style=\"font-size:12px;\">नाहीं द्वैताद्वैत हरि, नहीं विशिष्टाद्वैत।</span></em><br/><span style=\"font-size:12px;\"><em>बंधे नहीं मतवाद में, ईश्वर इच्छा द्वैत॥'</em></span</p>","raw_bio":"'टट्टी संप्रदाय' से संबद्ध। कविता में वैराग्य और प्रेम दोनों को एक साथ साधने के लिए स्मरणीय।     मूल नाम :  भगवत रसिक     भगवत रसिक बहुत निर्भीक, निस्पृह, सत्यवादी और त्यागी स्वभाव के महात्मा थे। ललित मोहिनीदास के निधन के उपरांत गद्दी का अधिकार भी आपने स्वीकार नहीं किया और एकांत में रहकर भजन में लीन रहते थे। इनके काव्य को पढ़कर दो तथ्य बड़े स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। एक तो इनकी वाणी में सत्य कथन की प्रबल शक्ति है। पाखंड और दंभ से इन्हें बहुत ही चिढ़ थी। ये अपने साथियों को भी फटकारने और उनकी कमजोरियों को छुड़ाने के लिए कठोर वचन कहने में नहीं चूकते थे। भगवत रसिक के जन्म स्थान, जाति, वंश आदि का विवरण कहीं प्राप्त नहीं होता।  ये ‘टट्टी संप्रदाय’ के महात्मा स्वामी ललित मोहिनीदास के शिष्य थे।  ललित मोहिनीदास संवत् 1766 ई. से 1801 ई. तक टट्टी संस्थान की गद्दी पर आसीन रहे, अतः इस काल में भगवत रसिक भी जीवित थे। हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथों तथा ‘निंबार्क संप्रदाय’ के ग्रंथों में इसी आधार पर इनका जन्म सन् 1738 ई. में स्थिर किया गया है। रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें ‘सच्चा प्रेमयोगी महात्मा’ लिखा है।  यथार्थ में इनका काव्य इसका पूरा-पूरा प्रमाण है। इनके काव्य की दूसरी उल्लेख्य विशेषता है कला समन्वित होना। साधुओं की वाणी प्रायः कलाविहीन और सीधी-सादी ही पायी जाती है किंतु भगवत रसिक की वाणी में कला के अनुरूप अलंकार, लक्षण, व्यंजना, माधुर्य, ओज, व्यंग्य आदि सभी उपकरण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है आपने संस्कृत काव्य-शास्त्र का विधिवत् अध्ययन करके हिन्दी काव्य क्षेत्र में प्रवेश किया था। इनका एक ग्रंथ 'अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ’ संवत् 1914 ई. में लखनऊ से प्रकाशित हुआ था। इनकी एक ‘ध्यान मंजरी’ और कुछ स्फुट छंद भी उपलब्ध हुए हैं। इनके पदों में प्रेमलक्षणा भक्ति के साथ व्यावहारिक दृष्टि से जीवन-निर्माण के उपाय भी मिलते हैं। अर्थ-संचय में लीन लोभी मनुष्यों को सामने रखकर इन्होंने कहा है : \"जगत में पैसन ही की मांड। पैसन बिना गुरु को चेला, खसमें छोड़े रांड॥\" भगवत रसिक ने सांप्रदायिक दृष्टि से भी बड़ी निःस्पृहता का रुख स्वीकार किया है। वे चतुःसंप्रदाय की सीमाओं में अपने को बाँधना नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा है : ‘आचारज ललिता सखी, रसिक हमारी आप। नित्य किशोर उपासनी, बुगल मंत्र का जाप॥ नाहीं द्वैताद्वैत हरि, नहीं विशिष्टाद्वैत। बंधे नहीं मतवाद में, ईश्वर इच्छा 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style=\"text-align: center; font-size: 24px;\"> The Great Poets and Writers in Indian and World History! </p>","image":"https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_description/black.jpg"}