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"name": "मियाँ दाद ख़ां सय्याह",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'सय्याह'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मियाँ दाद ख़ां</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> सूरत, गुजरात</span></p>\r\n<p>\r\n</p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">LCCN :</span><span>n89263063</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span><span style=\"font-size:12px;\">सय्याह, मियाँदाद ख़ाँ </span><span style=\"font-size:12px;\">(1829-1907) </span><span style=\"font-size:12px;\">सूरत (गुजरात) के रहने वाले थे। मिर्ज़ा ग़ालिब से दोस्ती और शागिर्दी का रिश्ता था। सैर-सपाटे का बहुत शौक़ था और इस पर दिल खोल कर ख़र्च करते थे। बा’द में खुला कि जा’ली नोट छापते थे, और इसी सिलसिले में क़ैद की सज़ा काटी। कै़द के दौरान ही मलिका विक्टोरिया का क़सीदा लिखा जिससे सज़ा की मुद्दत कई साल कम हो गई। आख़िरी ज़माना बहुत सख़्ती में गुज़रा।</span><p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\"></span></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'सय्याह' मूल नाम : मियाँ दाद ख़ां निधन : सूरत, गुजरात LCCN : n89263063 सय्याह, मियाँदाद ख़ाँ (1829-1907) सूरत (गुजरात) के रहने वाले थे। मिर्ज़ा ग़ालिब से दोस्ती और शागिर्दी का रिश्ता था। सैर-सपाटे का बहुत शौक़ था और इस पर दिल खोल कर ख़र्च करते थे। बा’द में खुला कि जा’ली नोट छापते थे, और इसी सिलसिले में क़ैद की सज़ा काटी। कै़द के दौरान ही मलिका विक्टोरिया का क़सीदा लिखा जिससे सज़ा की मुद्दत कई साल कम हो गई। आख़िरी ज़माना बहुत सख़्ती में गुज़रा। ",
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"name": "मोहम्मद अली ख़ाँ रश्की",
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"raw_bio": " उपनाम : 'रश्की' मूल नाम : नवाब मोहम्मद अली ख़ाँ जन्म : दिल्ली निधन : 20 May 1899 | दिल्ली, भारत रश्की, नवाब मोहम्मद अ’ली ख़ाँ (1844-1899)मुस्तफ़ा ख़ाँ ‘शेफ़्ता’ के बेटे थे और उनके बा’द उनकी रियासत जहाँगीराबाद के नवाब हुए। अच्छी शिक्षा मिली। अंग्रेज़ी में ख़ासी महारत थी। शाइ’री में ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ के शागिर्द थे। वाइसराय की काउंसिल, के मेम्बर नियुक्त हुए और ‘ख़ान बहादुर’ का ख़िताब भी मिला। ",
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"name": "मोहम्मद हुसैन आज़ाद",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मोहम्मद हुसैन आज़ाद</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 05 May 1830</bdi> | दिल्ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 22 Jan 1910</bdi> | लाहौर, पंजाब</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ (गुरु), </span>\r\n<span> किशन लाल तालिब देहलवी (शिष्य)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p>उर्दू अदब में एक ऐसी शख्सीयत भी है जिसने दीवानगी और जूनून की स्थिति में भी वह कारनामे अंजाम दिये हैं कि होश व हवास में बहुत से लोग उसके बारे में सोच भी नहीं सकते.उसने न सिर्फ़ उर्दू नस्र को नया अंदाज़ दिया बल्कि उर्दू नज़्म को भी नया रूप प्रदान किया. उसी व्यक्ति ने नयी आलोचना का द्वीप प्रज्वलित किया.विषयगत मुशायरे की बुनियाद डाली,सभागत आलोचना की परम्परा को आरम्भ किया.सबसे पहले उर्दू ज़बान की पैदाइश का नज़रिया पेश किया और ब्रज भाषा को उर्दू भाषा का स्रोत बताया.जिसने उर्दू की तरक्क़ी के लिए बिदेसी भाषाओं विशेषतः अंग्रेज़ी से लाभ उठाने पर ज़ोर दिया.उसने उर्दू शायेरी के मिज़ाज को बदला और आशय,उपादेयता से इसका रिश्ता जोड़ा.जिसने अदबी इतिहास लेखन को एक नया आयाम दिया.और “आबे हयात” के उन्वान से एक ऐसा इतिहास लिखा कि उसकी अनन्त जीवन की ज़मानत बन गयी . उस व्यक्तित्व का नाम मुहम्मद हुसैन आज़ाद है.</p><p>मुहम्मद हुसैन आज़ाद की पैदाइश 05 सितम्बर 1830 को देहली में हुई.उनके पिता मौलवी मुहम्मद बाक़र उत्तर भारत के पहले उर्दू अख़बार “देहली उर्दू अख़बार” के सम्पादक थे.उनका अपना प्रेस था,अपना इमामबाड़ा, मस्जिद और सराय थी.यह उर्दू के पहले शहीद पत्रकार थे.उन्हें मि. टेलर के क़त्ल के इल्ज़ाम में फांसी की सज़ा दी गयी थी.मौलवी मुहम्मद हुसैन आज़ाद जब चार वर्ष के थे तभी उनकी ईरानी मूल की माता का देहांत हो गया था.उनकी फूफी ने उनकी परवरिश की,उनका भी शीघ्र ही देहांत हो गया.मुहम्मद हुसैन आज़ाद के ज़ेहन पर इन मुसीबतों का गहरा प्रभाव पड़ा.आज़ाद दिल्ली कालेज में तालीम हासिल कर रहे थे कि मुल्क के हालात बिगड़ने लगे.अपने पिता मौलवी मुहम्मद बाक़र की गिरफ़्तारी के बाद मुहम्मद हुसैन आज़ाद की हालत और ख़राब होने लगी.वह इधर उधर छुपते छुपाते रहे. लगभग दो ढाई वर्ष बड़ी मुसीबतों से काटे.कुछ दिनों अपने परिवार के साथ लखनऊ में भी रहे.फिर किसी तरह लाहोर पहुंचे जहाँ जनरल पोस्ट आफ़िस में नौकरी कर ली.तीन साल काम करने के बाद डायरेक्टर पब्लिक इंस्ट्रक्टर के दफ़्तर में उन्हें नौकरी मिल गयी.उसके बाद “अंजुमन पंजाब” की स्थापना हुई तो मुहम्मद हुसैन आज़ाद की क़िस्मत के दरवाज़े खुल गये.डाक्टर लायेंज़ की कोशिशों और मुहब्बतों की वजह से आज़ाद अंजुमन पंजाब के सेक्रेटरी नियुक्त कर दिये गये. यहाँ उनकी योग्यताओं को उभरने का पूरा मौक़ा मिला.अंजुमन पंजाब के प्लेटफ़ॉर्म से उन्होंने बड़े अहम कारनामे अंजाम दिये.गवर्नमेंट कालेज लाहोर में अरबी के प्रोफेसर के रूप में अस्थायी नियुक्ति हुई और फिर उसी पद पर स्थाई रूप से नियुक्त कर दिये गये. </p><p>एक अच्छी नौकरी ने आज़ाद को ज़ेह्नी सुकून अता किया और फिर उनके सफ़र का सिलसिला शुरू हुआ.उन्होंने मध्य एशिया की यात्रा की,वहां उन्हें बहुत कुछ नया सीखने और समझने का मौक़ा मिला. विदेश यात्राओं से उनके मानसिक क्षितिज को बहुत विस्तार दिया. उन्होंने अपनी यात्राओं के अनुभवों को क़लमबंद भी किया.’ सैर ए ईरान” उनका ऐसा ही एक यात्रावृतांत है जिसमें ख्वाजा हाफ़िज़ और शेख़ सा’दी के वतन के बारे में अपनी कड़वी और मीठी यादों को एकत्र कर दिया है. </p><p>मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने उर्दू दुनिया को बहुत बहुमूल्य रचनाएँ दी हैं.उनमें सुखंदाने फ़ारस ,क़ससे हिन्द ,दरबारे अकबरी,निगारिस्ताने फ़ारस,सैर ईरान,दीवाने जौक और नैरंगे खयाल बहुत महत्वपूर्ण हैं. इनके अलावा पाठ्य पुस्तकों में उर्दू की पहली किताब ,उर्दू की दूसरी किताब,उर्दू की तीसरी किताब,क़वाएदे उर्दू बहुत अहम हैं.मगर मुहम्मद हुसैन आज़ाद को सबसे ज़्यादा शोहरत “आबे हयात” से मिली कि यह अकेली ऐसी किताब है जिसमें उर्दू शायेरी का मात्र इतिहास या तज़किरा नहीं है बल्कि अहम भाषाई तर्कों के साथ उसमें उर्दू ज़बान के आरम्भ व विकास के बारे में बात की गयी है.इस किताब ने उर्दू आलोचना का आरम्भिक आधार उपलब्ध कराया है.इसमें प्राचीन तज़किरों के प्रचलित अंदाज़ की अवहेलना की गयी है. इसके अलावा यह नस्र का उकृष्ट नमूना भी है.</p><p>आज़ाद एक अहम निबन्धकार,आलोचक, और शोधकर्ता भी थे.उन्होंने उर्दू ज़बान का इतिहास,उत्पत्ति एवं विकास और भाषा की असलियत पर शोधपूर्ण आलेख लिखे .</p><p>मुहम्मद हुसैन आज़ाद नज़्म के पहले शायरों में भी हैं जिन्होंने न सिर्फ़ नज़्में लिखीं बल्कि नज़्म निगारी को एक नया आयाम भी दिया.उर्दू नज़्म व नस्र को नया अंदाज़ देनेवाले मुहम्मद हुसैन आज़ाद पर आख़िरी वक़्त में जूनून व दीवानगी की स्थिति पैदा हो गयी थी.जूनून की स्थिति में ही उनकी अर्धांगिनी का देहांत हो गया.इसकी वजह से आज़ाद की बेचैनी और बढ़ती गयी.आख़िरकार 22 जनवरी 1910 को देहांत हो गया.उनका मज़ार दातागंज के पास है. मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अंग्रेज़ों के विरोध से शुरू किया था .वह अपने पिता के अख़बार में अंग्रेज़ों के विरुद्ध आलेख लिखते रहे थे.विरोध के प्रतिकार में जब अंग्रेज़ों ने उनके पिता को मौत के घाट उतार दिया वहीँ विचारों में परिवर्तन की वजह से शिक्षा मित्र अंग्रेज़ों ने मुहम्मद हुसैन आज़ाद को मआफ़ कर दिया और उन्हें शम्सुल उलमा के ख़िताब से भी नवाज़ा.<br/></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " मूल नाम : मोहम्मद हुसैन आज़ाद जन्म : 05 May 1830 | दिल्ली निधन : 22 Jan 1910 | लाहौर, पंजाब संबंधी : शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ (गुरु), किशन लाल तालिब देहलवी (शिष्य) उर्दू अदब में एक ऐसी शख्सीयत भी है जिसने दीवानगी और जूनून की स्थिति में भी वह कारनामे अंजाम दिये हैं कि होश व हवास में बहुत से लोग उसके बारे में सोच भी नहीं सकते.उसने न सिर्फ़ उर्दू नस्र को नया अंदाज़ दिया बल्कि उर्दू नज़्म को भी नया रूप प्रदान किया. उसी व्यक्ति ने नयी आलोचना का द्वीप प्रज्वलित किया.विषयगत मुशायरे की बुनियाद डाली,सभागत आलोचना की परम्परा को आरम्भ किया.सबसे पहले उर्दू ज़बान की पैदाइश का नज़रिया पेश किया और ब्रज भाषा को उर्दू भाषा का स्रोत बताया.जिसने उर्दू की तरक्क़ी के लिए बिदेसी भाषाओं विशेषतः अंग्रेज़ी से लाभ उठाने पर ज़ोर दिया.उसने उर्दू शायेरी के मिज़ाज को बदला और आशय,उपादेयता से इसका रिश्ता जोड़ा.जिसने अदबी इतिहास लेखन को एक नया आयाम दिया.और “आबे हयात” के उन्वान से एक ऐसा इतिहास लिखा कि उसकी अनन्त जीवन की ज़मानत बन गयी . उस व्यक्तित्व का नाम मुहम्मद हुसैन आज़ाद है. मुहम्मद हुसैन आज़ाद की पैदाइश 05 सितम्बर 1830 को देहली में हुई.उनके पिता मौलवी मुहम्मद बाक़र उत्तर भारत के पहले उर्दू अख़बार “देहली उर्दू अख़बार” के सम्पादक थे.उनका अपना प्रेस था,अपना इमामबाड़ा, मस्जिद और सराय थी.यह उर्दू के पहले शहीद पत्रकार थे.उन्हें मि. टेलर के क़त्ल के इल्ज़ाम में फांसी की सज़ा दी गयी थी.मौलवी मुहम्मद हुसैन आज़ाद जब चार वर्ष के थे तभी उनकी ईरानी मूल की माता का देहांत हो गया था.उनकी फूफी ने उनकी परवरिश की,उनका भी शीघ्र ही देहांत हो गया.मुहम्मद हुसैन आज़ाद के ज़ेहन पर इन मुसीबतों का गहरा प्रभाव पड़ा.आज़ाद दिल्ली कालेज में तालीम हासिल कर रहे थे कि मुल्क के हालात बिगड़ने लगे.अपने पिता मौलवी मुहम्मद बाक़र की गिरफ़्तारी के बाद मुहम्मद हुसैन आज़ाद की हालत और ख़राब होने लगी.वह इधर उधर छुपते छुपाते रहे. लगभग दो ढाई वर्ष बड़ी मुसीबतों से काटे.कुछ दिनों अपने परिवार के साथ लखनऊ में भी रहे.फिर किसी तरह लाहोर पहुंचे जहाँ जनरल पोस्ट आफ़िस में नौकरी कर ली.तीन साल काम करने के बाद डायरेक्टर पब्लिक इंस्ट्रक्टर के दफ़्तर में उन्हें नौकरी मिल गयी.उसके बाद “अंजुमन पंजाब” की स्थापना हुई तो मुहम्मद हुसैन आज़ाद की क़िस्मत के दरवाज़े खुल गये.डाक्टर लायेंज़ की कोशिशों और मुहब्बतों की वजह से आज़ाद अंजुमन पंजाब के सेक्रेटरी नियुक्त कर दिये गये. यहाँ उनकी योग्यताओं को उभरने का पूरा मौक़ा मिला.अंजुमन पंजाब के प्लेटफ़ॉर्म से उन्होंने बड़े अहम कारनामे अंजाम दिये.गवर्नमेंट कालेज लाहोर में अरबी के प्रोफेसर के रूप में अस्थायी नियुक्ति हुई और फिर उसी पद पर स्थाई रूप से नियुक्त कर दिये गये. एक अच्छी नौकरी ने आज़ाद को ज़ेह्नी सुकून अता किया और फिर उनके सफ़र का सिलसिला शुरू हुआ.उन्होंने मध्य एशिया की यात्रा की,वहां उन्हें बहुत कुछ नया सीखने और समझने का मौक़ा मिला. विदेश यात्राओं से उनके मानसिक क्षितिज को बहुत विस्तार दिया. उन्होंने अपनी यात्राओं के अनुभवों को क़लमबंद भी किया.’ सैर ए ईरान” उनका ऐसा ही एक यात्रावृतांत है जिसमें ख्वाजा हाफ़िज़ और शेख़ सा’दी के वतन के बारे में अपनी कड़वी और मीठी यादों को एकत्र कर दिया है. मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने उर्दू दुनिया को बहुत बहुमूल्य रचनाएँ दी हैं.उनमें सुखंदाने फ़ारस ,क़ससे हिन्द ,दरबारे अकबरी,निगारिस्ताने फ़ारस,सैर ईरान,दीवाने जौक और नैरंगे खयाल बहुत महत्वपूर्ण हैं. इनके अलावा पाठ्य पुस्तकों में उर्दू की पहली किताब ,उर्दू की दूसरी किताब,उर्दू की तीसरी किताब,क़वाएदे उर्दू बहुत अहम हैं.मगर मुहम्मद हुसैन आज़ाद को सबसे ज़्यादा शोहरत “आबे हयात” से मिली कि यह अकेली ऐसी किताब है जिसमें उर्दू शायेरी का मात्र इतिहास या तज़किरा नहीं है बल्कि अहम भाषाई तर्कों के साथ उसमें उर्दू ज़बान के आरम्भ व विकास के बारे में बात की गयी है.इस किताब ने उर्दू आलोचना का आरम्भिक आधार उपलब्ध कराया है.इसमें प्राचीन तज़किरों के प्रचलित अंदाज़ की अवहेलना की गयी है. इसके अलावा यह नस्र का उकृष्ट नमूना भी है. आज़ाद एक अहम निबन्धकार,आलोचक, और शोधकर्ता भी थे.उन्होंने उर्दू ज़बान का इतिहास,उत्पत्ति एवं विकास और भाषा की असलियत पर शोधपूर्ण आलेख लिखे . मुहम्मद हुसैन आज़ाद नज़्म के पहले शायरों में भी हैं जिन्होंने न सिर्फ़ नज़्में लिखीं बल्कि नज़्म निगारी को एक नया आयाम भी दिया.उर्दू नज़्म व नस्र को नया अंदाज़ देनेवाले मुहम्मद हुसैन आज़ाद पर आख़िरी वक़्त में जूनून व दीवानगी की स्थिति पैदा हो गयी थी.जूनून की स्थिति में ही उनकी अर्धांगिनी का देहांत हो गया.इसकी वजह से आज़ाद की बेचैनी और बढ़ती गयी.आख़िरकार 22 जनवरी 1910 को देहांत हो गया.उनका मज़ार दातागंज के पास है. मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने अपनी ज़िन्दगी का सफ़र अंग्रेज़ों के विरोध से शुरू किया था .वह अपने पिता के अख़बार में अंग्रेज़ों के विरुद्ध आलेख लिखते रहे थे.विरोध के प्रतिकार में जब अंग्रेज़ों ने उनके पिता को मौत के घाट उतार दिया वहीँ विचारों में परिवर्तन की वजह से शिक्षा मित्र अंग्रेज़ों ने मुहम्मद हुसैन आज़ाद को मआफ़ कर दिया और उन्हें शम्सुल उलमा के ख़िताब से भी नवाज़ा. ",
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"name": "मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'आज़ुर्दा'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मुफ़्ती मोहम्मद सदरुद्दीन ख़ान</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 12 Dec 1789</bdi> | दिल्ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 16 Jul 1868</bdi></span></p>\r\n<p>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p>मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा ग़ालिब युग के एक प्रमुख और सम्मानित व्यक्ति थे। मुल्क पर अंग्रेज़ों के अधिकार करने से से पहले वो दिल्ली और आस-पास के इलाक़ों के मुफ़्ती थे और बर्तानवी दौर-ए-हकूमत में उन्हें सदर-उस-सुदूर के ओहदे से नवाज़ा गया,जो उस ज़माने में अंग्रेज़ों की तरफ़ से किसी हिंदुस्तानी को दिया जाने वाला सबसे बड़ा अदालती पद था। अपने सरकारी कर्तव्यों के इलावा मुफ़्ती साहब पठन-पाठन का सिलसिला भी जारी रखे हुए थे और उनके नामवर शागिर्दों में सर सय्यद अहमद ख़ां, यूसुफ़ अली ख़ां नाज़िम(नवाब रामपुर), मौलाना अबुलकलाम आज़ाद के वालिद मौलाना ख़ैर उद्दीन, नवाब सिद्दीक़ हसन ख़ान(भोपाल) और मौलाना फ़ैज़-उल-हसन ख़ान जैसे लोग शामिल थे। वो ग़ालिब के दोस्त होने के बावजूद ग़ालिब के कलाम को, उनकी मुश्किल-पसंदी की वजह से, पसंद नहीं करते थे। दोनों में अक्सर दिलचस्प नोक झोंक होती रहती थी लेकिन दोनों एक दूसरे से मुहब्बत भी करते थे। ग़ालिब पर जब क़र्ज़-ख़्वाहों ने उनकी अदालत में मुक़द्दमा दायर किया तो उन्होंने ख़ुद ग़ालिब का क़र्ज़ अदा किया और उनको मुक्ति दिलाई। इसी तरह जब शेफ़्ता के तज़किरा में आज़ुर्दा का नाम शामिल होने से रह गया तो ग़ालिब ने शेफ़्ता को उसकी तरफ़ तवज्जो दिलाई और उनका नाम शामिल कराया। आज़ुर्दा का व्यक्तित्व विशेषताओं और गुणों का संयोजन था। वो लब्द्प्रतिष्ठ विद्वान, छंद व व्याकरण, तर्क, दर्शन, गणित और अंकगणित, शब्दार्थ, अदब और निबंधों में महारत रखते थे। वो विद्वानों की मजलिस में सदर नशीं, शायरों की महफ़िल में मीर-ए-मजलिस, हुक्काम के जलसों में प्रतिष्ठित व प्रिय और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतें पूरी करने वाले थे। वो अपने छात्रों के शिक्षक ही नहीं संरक्षक भी थे। सभी तज़किरा लेखकों ने उनका नाम आदर से लिया है।</p><p>आज़ुर्दा का नाम मोहम्मद सदर उद्दीन था। उनके वालिद मौलवी लुत्फ़ उल्लाह थे। आज़ुर्दा 1789 ई. में दिल्ली में पैदा हुए। इस्लामी क़ानून, सिद्धांत आदि धार्मिक ज्ञान की शिक्षा शाह वलीउल्लाह के बेटे मौलाना रफ़ी उद्दीन से हासिल की, जबकि शेष विषयों की किताबें मौलाना फ़ज़ल इमाम ख़ैराबादी से पढ़ीं। इस विद्वता और फ़तवा देने में उनकी शोहरत की वजह से ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत ने 1827 ई. में उनको सदर-उस-सुदूर का पद दिया। दिल्ली और आस-पास के इलाक़ों के शरई मामलों के फ़ैसले, स्कूलों के इम्तिहानात और अदालते दीवानी की सदारत उनके ज़िम्मे थी। इसके साथ ही वो अपने मकान पर छात्रों को छंद व व्याकरण, तर्क, अदब, गणित, न्यायशास्त्र और भाष्य की शिक्षा भी देते थे। जामा मस्जिद के नीचे मदरसा दारुल बक़ा के छात्रों को मुफ़्ती साहब वज़ीफ़े देते थे और उनकी ज़रूरियात पूरी करते थे। लेखन व भाषण की उत्कृष्टता और गंभीरता के साथ साथ मरव्वत, नैतिकता और एहसान उनकी खूबियां थीं। हर तरह के विद्वानों और शायरों की महफ़िल उनके यहां जमती थी। उर्दू-फ़ारसी और कभी कभी अरबी में शे’र कहते थे। मुशायरों में बाक़ायदगी से शरीक होते थे। मौलाना हाली समेत उनका कलाम सुनने वालों का बयान है कि वो बहुत दिलकश ऊंची, ग़मनाक और दर्द अंगेज़ आवाज़ से शे’र पढ़ते थे। उनका अपना बयान है कि “बहुत ज़्यादा व्यस्तताएं शे’र कहने की फ़ुर्सत नहीं देती लेकिन कभी कभी शे’र कहे बग़ैर नहीं रह सकता।” दीवान मुकम्मल नहीं हो सका या 1857 ई. के हंगामे में नष्ट हो गया, ये कहना मुश्किल है, लेकिन तज़किरों के चयन से अंदाज़ा होता है कि अक्सर हुरूफ़ की रदीफ़ में उर्दू और फ़ारसी की ग़ज़लें लिखीं। एक छोटा सा मुसद्दस भी उनकी यादगार है जिसमें उन्होंने 1857 ई. की घटना के बाद बेगुनाह क़त्ल किए जाने वालों के ग़म में आँसू बहाए हैं। 1857 ई. की जंग में उल्मा से जिहाद का फ़तवा लिया गया तो आज़ुर्दा को भी दस्तख़त करने पड़े। इस आधार पर अंग्रेज़ों ने, जीत पाने के बाद उनको गिरफ़्तार कर के सारी जायदाद ज़ब्त कर ली। चंद माह जेल में रहे, फिर पंजाब के चीफ़ कमिशनर जान लॉरेंस ने, जो दिल्ली में मुफ़्ती साहब पर मेहरबान था, उनको जुर्म से बरी कर दिया। कहा जाता है कि जिहाद के फ़तवे पर अपने दस्तख़त के नीचे उन्होंने “कतसिबत बिलजब्र” इस तरह लिखा था कि नुक़्ते नहीं लगाए थे, जिसे “ख़ैर’ भी पढ़ा जा सकता था और “जब्र” भी। बहरहाल उनका सामान और क़ीमती कुतुबख़ाना ग़ारत हो चुका था। अचल संपत्ति नष्ट हो गई। कुछ दिन बस्ती निज़ाम उद्दीन में रह कर पुरानी दिल्ली के अपने मकान में वापस आगए। वापसी पर उन्होंने पठन-पाठन का सिलसिला जारी रखा। उस ज़माने में बहुत ज़्यादा आर्थिक परेशानियों के शिकार रहे क्योंकि छात्रों के इलावा बहुत से दूसरे लोगों की ज़रूरतें अपने ज़िम्मे ले रखी थी। आख़िरी उम्र में फ़ालिज का हमला हुआ और एक दो साल तक इसी हालत में रहने के बाद 1868 ई. में 81 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। उनकी कोई संतान नहीं थी। अपने एक भांजे को गोद ले लिया था।<br/><br/>लब्द्प्रतिष्ठ विद्वान होने के साथ साथ आज़ुर्दा एक उच्च श्रेणी के शायर भी थे। उन्होंने जवानी में ही शायरी शुरू कर दी थी और शाह नसीर के शागिर्द हो गए थे। कभी कभी निज़ाम उद्दीन ममनून और मुजरिम मुरादाबादी से भी मश्वरा-ए-सुख़न करते थे। आज़ुर्दा का कोई संकलित दीवान मौजूद न होने के बावजूद विभिन्न तज़किरों में उनके जो अशआर मिलते हैं, वो उनका शायराना मर्तबा निर्धारित करने के लिए काफ़ी हैं। आज़ुर्दा ने सरल और सामान्य भाषा को अपनी काव्य अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। वो उच्च विषयों को फ़ारसी, अरबी तकनीकों और कठिन शब्दों का सहारा लिए बिना दिलचस्प अंदाज़ में व्यक्त करने में महारत रखते थे। आज़ुर्दा का काव्य सिद्धांत उनके ही शब्दों में ये था:<br/><br/>रेख़्ता ये है कि जूं आयत-ए-मुहकम है साफ़<br/>मानी-ए-दूर नहीं लफ़्ज़ भी महजूर नहीं<br/><br/>उनके अशआर में दर्द, ख़्याल की बुलंदी, ज़बान की सफ़ाई और भावनाओं की सच्चाई स्पष्ट है।<br/><br/>आज़ुर्दा ने पढ़ी ग़ज़ल इक मैकदे में कल<br/>वो साफ़ तर कि सीना-ए-पीर-ए-मुग़ां नहीं<br/><br/>आरज़ू के कलाम का सोज़-ओ-गुदाज़ उस सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति को दर्शाता है जिससे उस ज़माने की ज़िंदगी दो-चार थी। इस सम्बंध में उन्होंने एक दर्दनाक शहर-ए-आशोब भी लिखा है। आज़ुर्दा के यहां विषय आमतौर पर पारंपरिक हैं जिनमें वो अपनी फ़नकारी से नई रूह फूंक देते हैं: <br/>कामिल उस फ़िर्क़ा-ए-ज़ह्हाद से कोई न उठा<br/>कुछ हुए तो यही रिन्दान-ए-क़दहख़वार हुए<br/><br/>उनके कलाम में उत्साह व ताज़गी भी है और प्रवाह व सहसापन भी, तर्ज़-ए-दिलबरी भी है और अंदाज़ दिलरुबाई भी। आज़ुर्दा के अशआर ख़ास-ओ-आम सब के लिए दिलकश और दिलचस्प हैं। उनका जो भी कलाम उपलब्ध है सब का सब चयन है:<br/>जूं सरापा-ए-यार आज़ुर्दा <br/>तेरे दीवाँ का इंतख़ाब नहीं।<br/></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'आज़ुर्दा' मूल नाम : मुफ़्ती मोहम्मद सदरुद्दीन ख़ान जन्म : 12 Dec 1789 | दिल्ली निधन : 16 Jul 1868 मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा ग़ालिब युग के एक प्रमुख और सम्मानित व्यक्ति थे। मुल्क पर अंग्रेज़ों के अधिकार करने से से पहले वो दिल्ली और आस-पास के इलाक़ों के मुफ़्ती थे और बर्तानवी दौर-ए-हकूमत में उन्हें सदर-उस-सुदूर के ओहदे से नवाज़ा गया,जो उस ज़माने में अंग्रेज़ों की तरफ़ से किसी हिंदुस्तानी को दिया जाने वाला सबसे बड़ा अदालती पद था। अपने सरकारी कर्तव्यों के इलावा मुफ़्ती साहब पठन-पाठन का सिलसिला भी जारी रखे हुए थे और उनके नामवर शागिर्दों में सर सय्यद अहमद ख़ां, यूसुफ़ अली ख़ां नाज़िम(नवाब रामपुर), मौलाना अबुलकलाम आज़ाद के वालिद मौलाना ख़ैर उद्दीन, नवाब सिद्दीक़ हसन ख़ान(भोपाल) और मौलाना फ़ैज़-उल-हसन ख़ान जैसे लोग शामिल थे। वो ग़ालिब के दोस्त होने के बावजूद ग़ालिब के कलाम को, उनकी मुश्किल-पसंदी की वजह से, पसंद नहीं करते थे। दोनों में अक्सर दिलचस्प नोक झोंक होती रहती थी लेकिन दोनों एक दूसरे से मुहब्बत भी करते थे। ग़ालिब पर जब क़र्ज़-ख़्वाहों ने उनकी अदालत में मुक़द्दमा दायर किया तो उन्होंने ख़ुद ग़ालिब का क़र्ज़ अदा किया और उनको मुक्ति दिलाई। इसी तरह जब शेफ़्ता के तज़किरा में आज़ुर्दा का नाम शामिल होने से रह गया तो ग़ालिब ने शेफ़्ता को उसकी तरफ़ तवज्जो दिलाई और उनका नाम शामिल कराया। आज़ुर्दा का व्यक्तित्व विशेषताओं और गुणों का संयोजन था। वो लब्द्प्रतिष्ठ विद्वान, छंद व व्याकरण, तर्क, दर्शन, गणित और अंकगणित, शब्दार्थ, अदब और निबंधों में महारत रखते थे। वो विद्वानों की मजलिस में सदर नशीं, शायरों की महफ़िल में मीर-ए-मजलिस, हुक्काम के जलसों में प्रतिष्ठित व प्रिय और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतें पूरी करने वाले थे। वो अपने छात्रों के शिक्षक ही नहीं संरक्षक भी थे। सभी तज़किरा लेखकों ने उनका नाम आदर से लिया है। आज़ुर्दा का नाम मोहम्मद सदर उद्दीन था। उनके वालिद मौलवी लुत्फ़ उल्लाह थे। आज़ुर्दा 1789 ई. में दिल्ली में पैदा हुए। इस्लामी क़ानून, सिद्धांत आदि धार्मिक ज्ञान की शिक्षा शाह वलीउल्लाह के बेटे मौलाना रफ़ी उद्दीन से हासिल की, जबकि शेष विषयों की किताबें मौलाना फ़ज़ल इमाम ख़ैराबादी से पढ़ीं। इस विद्वता और फ़तवा देने में उनकी शोहरत की वजह से ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत ने 1827 ई. में उनको सदर-उस-सुदूर का पद दिया। दिल्ली और आस-पास के इलाक़ों के शरई मामलों के फ़ैसले, स्कूलों के इम्तिहानात और अदालते दीवानी की सदारत उनके ज़िम्मे थी। इसके साथ ही वो अपने मकान पर छात्रों को छंद व व्याकरण, तर्क, अदब, गणित, न्यायशास्त्र और भाष्य की शिक्षा भी देते थे। जामा मस्जिद के नीचे मदरसा दारुल बक़ा के छात्रों को मुफ़्ती साहब वज़ीफ़े देते थे और उनकी ज़रूरियात पूरी करते थे। लेखन व भाषण की उत्कृष्टता और गंभीरता के साथ साथ मरव्वत, नैतिकता और एहसान उनकी खूबियां थीं। हर तरह के विद्वानों और शायरों की महफ़िल उनके यहां जमती थी। उर्दू-फ़ारसी और कभी कभी अरबी में शे’र कहते थे। मुशायरों में बाक़ायदगी से शरीक होते थे। मौलाना हाली समेत उनका कलाम सुनने वालों का बयान है कि वो बहुत दिलकश ऊंची, ग़मनाक और दर्द अंगेज़ आवाज़ से शे’र पढ़ते थे। उनका अपना बयान है कि “बहुत ज़्यादा व्यस्तताएं शे’र कहने की फ़ुर्सत नहीं देती लेकिन कभी कभी शे’र कहे बग़ैर नहीं रह सकता।” दीवान मुकम्मल नहीं हो सका या 1857 ई. के हंगामे में नष्ट हो गया, ये कहना मुश्किल है, लेकिन तज़किरों के चयन से अंदाज़ा होता है कि अक्सर हुरूफ़ की रदीफ़ में उर्दू और फ़ारसी की ग़ज़लें लिखीं। एक छोटा सा मुसद्दस भी उनकी यादगार है जिसमें उन्होंने 1857 ई. की घटना के बाद बेगुनाह क़त्ल किए जाने वालों के ग़म में आँसू बहाए हैं। 1857 ई. की जंग में उल्मा से जिहाद का फ़तवा लिया गया तो आज़ुर्दा को भी दस्तख़त करने पड़े। इस आधार पर अंग्रेज़ों ने, जीत पाने के बाद उनको गिरफ़्तार कर के सारी जायदाद ज़ब्त कर ली। चंद माह जेल में रहे, फिर पंजाब के चीफ़ कमिशनर जान लॉरेंस ने, जो दिल्ली में मुफ़्ती साहब पर मेहरबान था, उनको जुर्म से बरी कर दिया। कहा जाता है कि जिहाद के फ़तवे पर अपने दस्तख़त के नीचे उन्होंने “कतसिबत बिलजब्र” इस तरह लिखा था कि नुक़्ते नहीं लगाए थे, जिसे “ख़ैर’ भी पढ़ा जा सकता था और “जब्र” भी। बहरहाल उनका सामान और क़ीमती कुतुबख़ाना ग़ारत हो चुका था। अचल संपत्ति नष्ट हो गई। कुछ दिन बस्ती निज़ाम उद्दीन में रह कर पुरानी दिल्ली के अपने मकान में वापस आगए। वापसी पर उन्होंने पठन-पाठन का सिलसिला जारी रखा। उस ज़माने में बहुत ज़्यादा आर्थिक परेशानियों के शिकार रहे क्योंकि छात्रों के इलावा बहुत से दूसरे लोगों की ज़रूरतें अपने ज़िम्मे ले रखी थी। आख़िरी उम्र में फ़ालिज का हमला हुआ और एक दो साल तक इसी हालत में रहने के बाद 1868 ई. में 81 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया। उनकी कोई संतान नहीं थी। अपने एक भांजे को गोद ले लिया था। लब्द्प्रतिष्ठ विद्वान होने के साथ साथ आज़ुर्दा एक उच्च श्रेणी के शायर भी थे। उन्होंने जवानी में ही शायरी शुरू कर दी थी और शाह नसीर के शागिर्द हो गए थे। कभी कभी निज़ाम उद्दीन ममनून और मुजरिम मुरादाबादी से भी मश्वरा-ए-सुख़न करते थे। आज़ुर्दा का कोई संकलित दीवान मौजूद न होने के बावजूद विभिन्न तज़किरों में उनके जो अशआर मिलते हैं, वो उनका शायराना मर्तबा निर्धारित करने के लिए काफ़ी हैं। आज़ुर्दा ने सरल और सामान्य भाषा को अपनी काव्य अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। वो उच्च विषयों को फ़ारसी, अरबी तकनीकों और कठिन शब्दों का सहारा लिए बिना दिलचस्प अंदाज़ में व्यक्त करने में महारत रखते थे। आज़ुर्दा का काव्य सिद्धांत उनके ही शब्दों में ये था: रेख़्ता ये है कि जूं आयत-ए-मुहकम है साफ़ मानी-ए-दूर नहीं लफ़्ज़ भी महजूर नहीं उनके अशआर में दर्द, ख़्याल की बुलंदी, ज़बान की सफ़ाई और भावनाओं की सच्चाई स्पष्ट है। आज़ुर्दा ने पढ़ी ग़ज़ल इक मैकदे में कल वो साफ़ तर कि सीना-ए-पीर-ए-मुग़ां नहीं आरज़ू के कलाम का सोज़-ओ-गुदाज़ उस सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति को दर्शाता है जिससे उस ज़माने की ज़िंदगी दो-चार थी। इस सम्बंध में उन्होंने एक दर्दनाक शहर-ए-आशोब भी लिखा है। आज़ुर्दा के यहां विषय आमतौर पर पारंपरिक हैं जिनमें वो अपनी फ़नकारी से नई रूह फूंक देते हैं: कामिल उस फ़िर्क़ा-ए-ज़ह्हाद से कोई न उठा कुछ हुए तो यही रिन्दान-ए-क़दहख़वार हुए उनके कलाम में उत्साह व ताज़गी भी है और प्रवाह व सहसापन भी, तर्ज़-ए-दिलबरी भी है और अंदाज़ दिलरुबाई भी। आज़ुर्दा के अशआर ख़ास-ओ-आम सब के लिए दिलकश और दिलचस्प हैं। उनका जो भी कलाम उपलब्ध है सब का सब चयन है: जूं सरापा-ए-यार आज़ुर्दा तेरे दीवाँ का इंतख़ाब नहीं। ",
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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'मुनीर'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सैयद इस्माईल हुसैन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>शिकोहाबाद, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 10 Aug 1880</bdi> | रामपुर, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> इमाम बख़्श नासिख़ (गुरु)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p>मुनीर की पैदाइश शिकोहाबाद में 1814 को हुई। उनका नाम सैयद इस्माईल हुसैन था, ‘मुनीर’ तख़ल्लुस था। आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा अकबराबाद में हुई जहाँ उनके पिता नौकरी के सिलसिले में रहते थे। फिर वह लखनऊ आ गये। लखनऊ के शे’री माहौल ने मुनीर को शायरी की तरफ़ उन्मुख किया। पहले नासिख़ से अपना कलाम संशोधित कराया फिर रश्क की शागिर्दी इख़्तियार की। यहाँ वह नवाब बाँदा के आश्रितों में शामिल हो गये जो अंग्रेज़ों से बदला लेना चाहता था लेकिन यह गिरोह गिरफ़्तार कर लिया गया। और एक लम्बे समय तक क़ैद व बंद की पीड़ा बर्दाश्त किया। आख़िर में मुनीर दरबार रामपुर से सम्बद्ध हो गये और 1880 में रामपुर में ही देहांत हुआ।</p><p>मुनीर की शायरी पर नासिख़ का प्रभाव बहुत स्पष्ट है। उन्होंने बहुत कठोर ज़मीनों में लम्बी-लम्बी ग़ज़लें कही हैं। शब्दालंकार उनकी ग़ज़लों की ख़ास पहचान है। उन्होंने ग़ज़ल में भी क़सीदे की भव्यता व एहसास पैदा करने की कोशिश की।<br/></p><p style=\"text-align:justify;\"> </p><p style=\"text-align:justify;\"><br/></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'मुनीर' मूल नाम : सैयद इस्माईल हुसैन जन्म : शिकोहाबाद, उत्तर प्रदेश निधन : 10 Aug 1880 | रामपुर, उत्तर प्रदेश संबंधी : इमाम बख़्श नासिख़ (गुरु) मुनीर की पैदाइश शिकोहाबाद में 1814 को हुई। उनका नाम सैयद इस्माईल हुसैन था, ‘मुनीर’ तख़ल्लुस था। आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा अकबराबाद में हुई जहाँ उनके पिता नौकरी के सिलसिले में रहते थे। फिर वह लखनऊ आ गये। लखनऊ के शे’री माहौल ने मुनीर को शायरी की तरफ़ उन्मुख किया। पहले नासिख़ से अपना कलाम संशोधित कराया फिर रश्क की शागिर्दी इख़्तियार की। यहाँ वह नवाब बाँदा के आश्रितों में शामिल हो गये जो अंग्रेज़ों से बदला लेना चाहता था लेकिन यह गिरोह गिरफ़्तार कर लिया गया। और एक लम्बे समय तक क़ैद व बंद की पीड़ा बर्दाश्त किया। आख़िर में मुनीर दरबार रामपुर से सम्बद्ध हो गये और 1880 में रामपुर में ही देहांत हुआ। मुनीर की शायरी पर नासिख़ का प्रभाव बहुत स्पष्ट है। उन्होंने बहुत कठोर ज़मीनों में लम्बी-लम्बी ग़ज़लें कही हैं। शब्दालंकार उनकी ग़ज़लों की ख़ास पहचान है। उन्होंने ग़ज़ल में भी क़सीदे की भव्यता व एहसास पैदा करने की कोशिश की। ",
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"raw_bio": " मूल नाम : मुनीर ख़ान जन्म : भोजपुर, बिहार निधन : 23 Jul 1996 | गया, बिहार ",
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"raw_bio": " उपनाम : 'शोला' मूल नाम : मुंशी बनवारी लाल जन्म : हिसार, हरयाना निधन : अलीगढ़, उत्तर प्रदेश ",
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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'नज़र'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मुंशी नौबत राय</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 10 Apr 1923</bdi></span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>नज़र, मुन्शी नौबत राय (1866-1923)लखनऊ के एक संभ्रांत कायस्थ घराने में आँखें खोलीं। कम-उ’म्री में ही शे’र कहने लगे और मशहूर हुए। 1897 में ‘ख़दंग-ए-नज़र’ नाम की पत्रिका जारी की और इस के बा’द ‘अदीब’, ‘ज़माना’, ‘अवध अख़बार’ जैसी कई पत्रिकाओं और अख़बारों के संपादन से वाबस्ता रह कर पत्रकारिता में नाम कमाया। अच्छे मुसव्विर और शतरंज की माहिर भी थे।<br/></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'नज़र' मूल नाम : मुंशी नौबत राय जन्म : लखनऊ, उत्तर प्रदेश निधन : 10 Apr 1923 नज़र, मुन्शी नौबत राय (1866-1923)लखनऊ के एक संभ्रांत कायस्थ घराने में आँखें खोलीं। कम-उ’म्री में ही शे’र कहने लगे और मशहूर हुए। 1897 में ‘ख़दंग-ए-नज़र’ नाम की पत्रिका जारी की और इस के बा’द ‘अदीब’, ‘ज़माना’, ‘अवध अख़बार’ जैसी कई पत्रिकाओं और अख़बारों के संपादन से वाबस्ता रह कर पत्रकारिता में नाम कमाया। अच्छे मुसव्विर और शतरंज की माहिर भी थे। ",
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"name": "मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'मुसहफ़ी'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> शेख़ ग़ुलाम हमदानी</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>अमरोहा, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), </span>\r\n<span> हैदर अली आतिश (शिष्य)</span>\r\n</p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">LCCN :</span><span>n85030564</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span>ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं;<br/>शब-ए-हिज्र सहरा-ए-ज़ुलमात निकली<br/>मैं जब आँख खोली बड़ी रात निकली<br/> <br/>आस्तीं उसने जो कुहनी तक उठाई वक़्त-ए-सुब्ह<br/>आ रही सारे बदन की बेहिजाबी हाथ में<br/> <br/>शब इक झलक दिखा कर वो मह चला गया था<br/>अब तक वही समां है गुर्फ़ा की जालियों पर <br/>और <br/>मुसहफ़ी हम तो ये समझे थे कि होगा कोई ज़ख़्म<br/>तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला<br/><br/>ग़ुलाम हमदानी नाम, मुसहफ़ी तख़ल्लुस था। अक्सर तज़किरा लिखनेवालों ने उनका जन्म स्थान अमरोहा लिखा है लेकिन मुहज़्ज़ब लखनवी मीर हसन के हवाले से कहते हैं कि वो दिल्ली के क़रीब अकबरपुर में पैदा हुए। उनका बचपन बहरहाल अमरोहा में गुज़रा। मुसहफ़ी के बाप-दादा ख़ुशहाल थे और हुकूमत के उच्च पदों पर नियुक्त थे लेकिन सलतनत के पतन के साथ ही उनकी ख़ुशहाली भी रुख़सत हो गई और मुसीबतों ने आ घेरा। मुसहफ़ी की सारी ज़िंदगी आर्थिक तंगी में गुज़री और रोज़गार की चिंता उनको कई जगह भटकाती रही। वो दिल्ली आए जहां उन्होंने आजीविका की तलाश के साथ साथ विद्वानों की संगत से फ़ायदा उठाया। आजीविका की तलाश में वो आँवला गए फिर कुछ अर्सा टांडे और एक साल लखनऊ में रहे। वहीं उनकी मुलाक़ात सौदा से हुई जो फ़र्रुख़ाबाद से लखनऊ चले गए थे। सौदा से वो बहुत प्रभावित हुए। इसके बाद वो दिल्ली वापस आ गए। मुसहफ़ी के पास शैक्षिक योग्यता ज़्यादा नहीं थी लेकिन तबीयत उपुक्त पाई थी और शायरी के ज़रिये अपना कोई मुक़ाम बनाना चाहते थे। वो नियमित रूप से मुशायरों में शिरकत करते और अपने घर पर भी मुशायरे आयोजित करते। दिल्ली में उन्होंने दो दीवान संकलित कर लिए थे जिनमें से एक चोरी हो गया; <br/>ऐ मुसहफ़ी शायर नहीं पूरब में हवा में <br/>दिल्ली में भी चोरी मिरा दीवान गया है<br/>बारह साल दिल्ली में रह कर जब वो दुबारा लखनऊ पहुंचे तो शहर का नक़्शा ही कुछ और था।<br/><br/>आसिफ़उद्दौला का दौर दौरा था जिनकी उदारता के डंके बज रहे थे। हर कला के माहिर लखनऊ में जमा थे। सौदा मर चुके थे, मीर तक़ी मीर लखनऊ आ चुके थे। मीर हसन लखनऊ में आबाद थे। मीर सोज़ और जुरअत के सिक्के जमे हुए थे। उन लोगों के होते मुसहफ़ी को दरबार से कोई लाभ नहीं पहुंचा। वो दिल्ली के शहज़ादे सुलेमान शिकोह की सरकार से सम्बद्ध हो गए। सुलेमान शिकोह ने लखनऊ में ही रिहाइश इख़्तियार कर ली थी। शायरी में उन्होंने मुसहफ़ी को उस्ताद बना लिया और 25 रुपये माहवार वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया। लेकिन उसी ज़माने में सय्यद इंशा लखनऊ आ गए और सुलेमान शिकोह को शीशे में उतार लिया और वो इंशा से ही इस्लाह लेने लगे।<br/><br/>इंशा लखनऊ में मुसहफ़ी के विरोधी और प्रतिद्वंद्वी थे। उनकी नोक झोंक मुशायरों से निकल कर सड़कों तक आ गई थी। मुसहफ़ी ने लखनऊ में शागिर्दों की बड़ी तादाद जमा कर ली थी। दूसरी तरफ़ इंशा की प्रवृति लतीफ़ागोई, हाज़िर जवाबी, शोख़ी और हास्य की प्रतिमा थी। मुसहफ़ी उनकी चुटकियों का, जो विरोधी को रुला दें, मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। साल दर साल दोनों में नोक झोंक जारी रही और जब बात ज़्यादा बढ़ी तो सुलेमान शिकोह खुल कर इंशा के तरफ़दार बन गए। जब मुसहफ़ी के शागिर्दों ने एक स्वाँग (उपहासात्मक जलूस) इंशा के ख़िलाफ़ निकालने की योजना बनाई तो उन्होंने कोतवाल से कह कर उसे रुकवा दिया और नाराज़ हो कर मुसहफ़ी का वज़ीफ़ा भी घटा कर पाँच रुपये माहाना कर दिया। ये मुसहफ़ी के लिए बड़े अपमान की बात थी जिसका शिकवा उन्होंने अपने इन अशआर में किया है;<br/>ऐ वाए कि पच्चीस से अब पाँच हुए हैं<br/>हम भी थे किन्हों वक़्तों में पच्चीस के लायक़<br/>उस्ताद का करते हैं अमीर अब के मुक़र्रर<br/>होता है जो दर माहा कि साईस के लायक़ ۔<br/>यहां तक कि दुखी हो कर मुसहफ़ी ने लखनऊ छोड़ देने का इरादा किया और कहा; <br/>जाता हूँ तिरे दर से कि तौक़ीर नहीं याँ<br/>कुछ उसके सिवा अब कोई तदबीर नहीं याँ<br/>ए मुसहफ़ी बे लुत्फ़ है इस शहर में रहना <br/>सच है कि कुछ इन्सान की तौक़ीर नहीं याँ <br/>लेकिन लखनऊ से निकलना तक़दीर में नहीं था, वहीं देहांत हुआ।<br/> <br/>मुसहफ़ी ने अपने पीछे आठ दीवान उर्दू के, एक दीवान फ़ारसी का, एक तज़किरा फ़ारसी शायरों का और दो तज़किरे उर्दू शायरों के छोड़े। मुसहफ़ी का बहुत सा कलाम हम तक नहीं पहुंचा क्योंकि एक वक़्त उन पर ऐसा भी आया कि वो आर्थिक तंगी से परेशान हो कर शे’र बेचने लगे थे। हर मुशायरे के लिए बहुत सी ग़ज़लें कहते और लोग आठ आने एक रुपया या इससे ज़्यादा देकर अच्छे अच्छे शे’र छांट ले जाते, जो बचता ख़ुद अपने लिए रख लेते। मुहम्मद हुसैन आज़ाद के मुताबिक़ जब एक मुशायरे में बिल्कुल दाद न मिली तो उन्होंने तंग आकर ग़ज़ल ज़मीन पर दे मारी और कहा कि \"वाए फ़लाकत स्याह, जिसकी बदौलत कलाम की ये नौबत पहुंची कि अब कोई सुनता नहीं।\" <br/>शहर में इस बात की चर्चा हुई तो खुला कि उनकी ग़ज़लें बिकती हैं। शागिर्दों की तादाद इतनी ज़्यादा थी कि उनको उस्तादों का उस्ताद कहा जाये तो ग़लत नहीं। आतिश, असीर, मीर ख़लीक़ वग़ैरा सब इन ही के शागिर्द थे।<br/>मुसहफ़ी मीर और सौदा के बाद ख़ुद को सबसे बड़ा शायर समझते थे और अपनी उस्तादी का सिक्का जमाना उनकी आदत थी। ख़्वाजा हैदर अली आतिश उनके शागिर्द थे। एक दिन आतिश ने एक मुशायरे में ग़ज़ल पढ़ी जिसकी तरह “दहन बिगड़ा”, “कफ़न बिगड़ा” थी और उस्ताद के सामने जब ये शे’र पढ़ा, <br/>लगे मुँह भी चिढ़ाने देते-देते गालियां साहिब<br/>ज़बां बिगड़ी तो बिगड़ी थी ख़बर लीजे दहन बिगड़ा<br/><br/>तो ये भी कह बैठे कि ऐसा शे’र कोई दूसरा निकाले तो कलेजा मुँह को आ जाये। मुसहफ़ी ने हंसकर कहा, \"मियां, सच कहते हो,” और इसके बाद इक नौ मश्क़ शागिर्द की ग़ज़ल में ये शे’र बढ़ा दिया, <br/>“न हो महसूस जो शय किस तरह नक़्शे में ठीक उतरे<br/>शबीह-ए-यार खिंचवाई, कमर बिगड़ी दहन बिगड़ा”<br/><br/>जब लड़के ने मुशायरे में शे’र पढ़ा तो आतिश ने मुसहफ़ी के क़रीब आकर ग़ज़ल फेंक दी और कहा, \"आप कलेजे पर छुरियां मारते हैं, इस लड़के की क्या हैसियत कि ऐसा शे’र कहे।” इस वाक़िया से मुसहफ़ी की कलाम पर महारत ज़ाहिर होती है।<br/>मुसहफ़ी के बारे में आम तौर पर कहा जाता है कि उनका अपना कोई ख़ास रंग नहीं। कभी वो मीर की तरह, कभी सौदा की तरह और कभी जुरअत की तरह शे’र कहने की कोशिश करते हैं लेकिन अपने शे’रों में वो इन सबसे पीछे रह जाते हैं। बात ये है कि अपना रंग तलाश करने के लिए जिस निश्चिंतता और एकाग्रता की ज़रूरत है वो उनको कभी नसीब ही नहीं हुई। कहने की अधिकता ने उनके क़ीमती नगीनों को ढक लिया फिर भी जिन लोगों ने उनके कलाम को ध्यान से पढ़ा है वो उनसे प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रहे।<br/>हसरत मोहानी ने कहा है, “मीर तक़ी के रंग में मुसहफ़ी मीर हसन के हम पल्ला हैं, सौदा के अंदाज़ में इंशा के हम पल्ला और जाफ़र अली हसरत की तर्ज़ में जुरअत के हमनवा हैं लेकिन बहैसियत मजमूई इन सब हमअसरों से ब एतबार कमाल सुख़नदानी-ओ-मश्शाक़ी बरतर हैं... मीर व मीरज़ा के बाद कोई उस्ताद उनके मुक़ाबले में नहीं जचता।”<br/>गुल-ए-राना के संपादक हकीम अब्दुल्लाह के अनुसार, “उनकी हमागीर शख़्सियत ने किसी ख़ास रंग पर क़नाअत नहीं की। उनके कलाम में कहीं मीर का दर्द है, कहीं सौदा का अंदाज़, कहीं सोज़ की सादगी और जहां कहीं उनकी कुहना मश्की और उस्तादी अपने पूर्ववर्तियों की ख़ूबीयों को यकजा कर देती है वहां वो उर्दू शायरी का बेहतरीन नमूना क़रार दिए जा सकते हैं।”<br/><br/>निसार अहमद फ़ारूक़ी बहरहाल मुसहफ़ी के बारे में इस आम ख़्याल से कि उनका अपना कोई रंग, कोई व्यक्तिगत शैली नहीं, विरोध करते हुए कहते हैं, “अगर हम इस मर्कज़ी और स्थायी विशेषता का वर्णन करना चाहें जो मीर व सौदा के मुख़्तलिफ़ अंदाज़ों को उड़ाते हुए भी, मुसहफ़ी के अंतर्ज्ञान व वाणी में जारी व सारी है, तो उसे हम एक रचा हुआ मध्यम कह सकते हैं, एक गेय अवस्था। अगर मीर के यहां मध्याह्न के सूर्य की पिघला देने वाली आँच है तो सौदा के यहां उसकी सार्वभौमिक रोशनी है। लेकिन सूरज ढल जाने के बाद तीसरे पहर को गर्मी और रोशनी के एक नए संयोजन से जो मध्यम स्थिति पैदा होती है वो मुसहफ़ी के कलाम की विशेषता है। मुसहफ़ी के यहां शबनम की नर्मी और और शोला-ए-गुल की गर्मी का ऐसा संयोजन है जो उसकी ख़ास अपनी चीज़ है। उसके नग़मों की शबनम से धुली हुई पंखुड़ियां उन रंग बिरंगे फूलों का नज़ारा कराती हैं जिनकी रगें दुखी हुई हैं और जिनकी चटियल मुस्कुराहट से भीनी भीनी दर्द की महक आती है।<br/>समग्ररूप से मुसहफ़ी ऐसे शायर हैं जिनको ज़िंदगी ने खुल कर हँसने का मौक़ा दिया न खुल कर रोने का, फिर भी वो अपने पीछे शायरी का वो सरमाया छोड़ गए, जो उनके शाश्वत जीवन का ज़मनातदार है।<br/><p> </p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'मुसहफ़ी' मूल नाम : शेख़ ग़ुलाम हमदानी जन्म : अमरोहा, उत्तर प्रदेश निधन : लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मुज़फ़्फ़र अली असीर (शिष्य), हैदर अली आतिश (शिष्य) LCCN : n85030564 ये हैं ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी, जिनके काव्य परिचय के लिए ये अशआर काफ़ी हैं; शब-ए-हिज्र सहरा-ए-ज़ुलमात निकली मैं जब आँख खोली बड़ी रात निकली आस्तीं उसने जो कुहनी तक उठाई वक़्त-ए-सुब्ह आ रही सारे बदन की बेहिजाबी हाथ में शब इक झलक दिखा कर वो मह चला गया था अब तक वही समां है गुर्फ़ा की जालियों पर और मुसहफ़ी हम तो ये समझे थे कि होगा कोई ज़ख़्म तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला ग़ुलाम हमदानी नाम, मुसहफ़ी तख़ल्लुस था। अक्सर तज़किरा लिखनेवालों ने उनका जन्म स्थान अमरोहा लिखा है लेकिन मुहज़्ज़ब लखनवी मीर हसन के हवाले से कहते हैं कि वो दिल्ली के क़रीब अकबरपुर में पैदा हुए। उनका बचपन बहरहाल अमरोहा में गुज़रा। मुसहफ़ी के बाप-दादा ख़ुशहाल थे और हुकूमत के उच्च पदों पर नियुक्त थे लेकिन सलतनत के पतन के साथ ही उनकी ख़ुशहाली भी रुख़सत हो गई और मुसीबतों ने आ घेरा। मुसहफ़ी की सारी ज़िंदगी आर्थिक तंगी में गुज़री और रोज़गार की चिंता उनको कई जगह भटकाती रही। वो दिल्ली आए जहां उन्होंने आजीविका की तलाश के साथ साथ विद्वानों की संगत से फ़ायदा उठाया। आजीविका की तलाश में वो आँवला गए फिर कुछ अर्सा टांडे और एक साल लखनऊ में रहे। वहीं उनकी मुलाक़ात सौदा से हुई जो फ़र्रुख़ाबाद से लखनऊ चले गए थे। सौदा से वो बहुत प्रभावित हुए। इसके बाद वो दिल्ली वापस आ गए। मुसहफ़ी के पास शैक्षिक योग्यता ज़्यादा नहीं थी लेकिन तबीयत उपुक्त पाई थी और शायरी के ज़रिये अपना कोई मुक़ाम बनाना चाहते थे। वो नियमित रूप से मुशायरों में शिरकत करते और अपने घर पर भी मुशायरे आयोजित करते। दिल्ली में उन्होंने दो दीवान संकलित कर लिए थे जिनमें से एक चोरी हो गया; ऐ मुसहफ़ी शायर नहीं पूरब में हवा में दिल्ली में भी चोरी मिरा दीवान गया है बारह साल दिल्ली में रह कर जब वो दुबारा लखनऊ पहुंचे तो शहर का नक़्शा ही कुछ और था। आसिफ़उद्दौला का दौर दौरा था जिनकी उदारता के डंके बज रहे थे। हर कला के माहिर लखनऊ में जमा थे। सौदा मर चुके थे, मीर तक़ी मीर लखनऊ आ चुके थे। मीर हसन लखनऊ में आबाद थे। मीर सोज़ और जुरअत के सिक्के जमे हुए थे। उन लोगों के होते मुसहफ़ी को दरबार से कोई लाभ नहीं पहुंचा। वो दिल्ली के शहज़ादे सुलेमान शिकोह की सरकार से सम्बद्ध हो गए। सुलेमान शिकोह ने लखनऊ में ही रिहाइश इख़्तियार कर ली थी। शायरी में उन्होंने मुसहफ़ी को उस्ताद बना लिया और 25 रुपये माहवार वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया। लेकिन उसी ज़माने में सय्यद इंशा लखनऊ आ गए और सुलेमान शिकोह को शीशे में उतार लिया और वो इंशा से ही इस्लाह लेने लगे। इंशा लखनऊ में मुसहफ़ी के विरोधी और प्रतिद्वंद्वी थे। उनकी नोक झोंक मुशायरों से निकल कर सड़कों तक आ गई थी। मुसहफ़ी ने लखनऊ में शागिर्दों की बड़ी तादाद जमा कर ली थी। दूसरी तरफ़ इंशा की प्रवृति लतीफ़ागोई, हाज़िर जवाबी, शोख़ी और हास्य की प्रतिमा थी। मुसहफ़ी उनकी चुटकियों का, जो विरोधी को रुला दें, मुक़ाबला नहीं कर सकते थे। साल दर साल दोनों में नोक झोंक जारी रही और जब बात ज़्यादा बढ़ी तो सुलेमान शिकोह खुल कर इंशा के तरफ़दार बन गए। जब मुसहफ़ी के शागिर्दों ने एक स्वाँग (उपहासात्मक जलूस) इंशा के ख़िलाफ़ निकालने की योजना बनाई तो उन्होंने कोतवाल से कह कर उसे रुकवा दिया और नाराज़ हो कर मुसहफ़ी का वज़ीफ़ा भी घटा कर पाँच रुपये माहाना कर दिया। ये मुसहफ़ी के लिए बड़े अपमान की बात थी जिसका शिकवा उन्होंने अपने इन अशआर में किया है; 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