GET /sootradhar/authors/?format=api&page=944
HTTP 200 OK
Allow: GET, HEAD, OPTIONS
Content-Type: application/json
Vary: Accept

{
    "count": 17752,
    "next": "http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=api&page=945",
    "previous": "http://admin.kavishala.in/sootradhar/authors/?format=api&page=943",
    "results": [
        {
            "id": 24511,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "इमदाद अली बहर",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'बहर'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> शेख़ इमदाद अ’ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> इमाम बख़्श नासिख़ (गुरु)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span>बह्र, शेख़ इमदाद अ’ली(1810-1878)लखनऊ के बाशिंदे और लखनवी शाइ’री की पहचान, ‘नासिख़’, के शागिर्द। भाषा और छंद विघान के विद्वान थे। कुछ दिन रामपुर में रहे। अफ़ीम का शौक़ था। ज़िंदगी में बिखराव बहुत था, इस लिए अपनी शाइ’री यकजा नहीं रखी। दीवान मौत के बा’द संकलित और प्रकाशित हुआ।<br/><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'बहर'   मूल नाम :  शेख़ इमदाद अ’ली   जन्म : लखनऊ, उत्तर प्रदेश   निधन :  लखनऊ, उत्तर प्रदेश      संबंधी :    इमाम बख़्श नासिख़ (गुरु)       बह्र, शेख़ इमदाद अ’ली(1810-1878)लखनऊ के बाशिंदे और लखनवी शाइ’री की पहचान, ‘नासिख़’, के शागिर्द। भाषा और छंद विघान के विद्वान थे। कुछ दिन रामपुर में रहे। अफ़ीम का शौक़ था। ज़िंदगी में बिखराव बहुत था, इस लिए अपनी शाइ’री यकजा नहीं रखी। दीवान मौत के बा’द संकलित और प्रकाशित हुआ।  ",
            "slug": "imadada-ali-bahara",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": null,
            "location": "लखनऊ, भारत",
            "url": "/sootradhar/imadada-ali-bahara",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:27.748106",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24512,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%87%E0%A4%B6_%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A4%B2%E0%A4%B9_%E0%A4%96%E0%A4%A8_%E0%A4%87%E0%A4%B6.png",
            "name": "इंशा अल्लाह ख़ान इंशा",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'इंशा'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सय्यद इंशा अल्लाह ख़ान</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 01 May 1817</bdi> | लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n</p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">LCCN :</span><span>n82054839</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p><strong>उर्दू की ख़ुद मुख़्तारी के अग्रदूत</strong><br/><br/>“हर लफ़्ज़ जो उर्दू में मशहूर हो गया, अरबी हो या फ़ारसी, तुर्की हो या सुरयानी, पंजाबी हो या पूरबी असल के अनुसार ग़लत हो या सही वो लफ़्ज़ उर्दू का लफ़्ज़ है। अगर असल के अनुसार उपयोग किया गया है तो भी सही है और असल के विरुद्ध उपयोग किया गया है तो भी सही है, इसकी सेहत व ग़लती उर्दू के इस्तेमाल पर निर्भर है क्योंकि जो कुछ उर्दू के ख़िलाफ़ है ग़लत है चाहे असल में वो सही हो और जो कुछ मुवाफ़िक़ उर्दू है सही है चाहे असल में सेहत न रखता<br/>हो।” इंशा अल्लाह ख़ां</p><p>इंशा उर्दू के दूसरे शायरों की तरह महज़ एक शायर नहीं बल्कि उर्दू ज़बान के विकास के सफ़र में एक संग-ए-मील की हैसियत रखते हैं। उनको क़ुदरत ने ऐसी सलाहियतों से नवाज़ा था कि बदक़िस्मती से वो उनको सँभाल नहीं सके। मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने उनको उर्दू का अमीर ख़ुसरो कहा जबकि उनके बारे में बेताब का ये क़ौल भी मशहूर है कि “इंशा के फ़ज़ल-ओ-कमाल को उनकी शायरी ने खोया और उनकी शायरी को सआदत अली ख़ां की मुसाहिबत ने डुबोया।” इसमें शक नहीं कि इंशा अपने मिज़ाज की सीमाबियत और ग़ैर संजीदगी की बिना पर अपनी सलाहियतों को पूरी तरह कम में नहीं ला सके, उसके बावजूद शायरी के हवाले से कम और ज़बान के हवाले से ज़्यादा, उन्होंने ज़बान-ओ-अदब की जो ख़िदमत अंजाम दी उसकी कोई मिसाल उर्दू में नहीं मिलती। शायरी में तरह तरह के भाषायी प्रयोग के साथ उनका सबसे बड़ा कारनामा किसी हिंदुस्तानी की लिखी हुई उर्दू ग्रामर की पहली किताब “दरियाए फ़साहत” है जो क़वाइद की आम किताबों की तरह ख़ुश्क और बेमज़ा न हो कर किसी नॉवेल की तरह पुरलुत्फ़ है जिसमें विभिन्न पात्र अपनी अपनी बोलियाँ बोलते सुनाई देते हैं। उनकी दूसरी अहम किताब “रानी केतकी की कहानी” है जिसमें अरबी फ़ारसी का एक भी लफ़्ज़ इस्तेमाल नहीं हुआ है। अगर इंशा के अदबी रवय्ये को एक जुमले में बयान करना हो तो कहा जा सकता है कि इंशा किसी भी परंपरा या समकालिक तरीक़े का अनुकरण अपने लिए हराम समझते थे और हमेशा कुछ ऐसा करने की धुन में रहते थे जो पहले कभी किसी ने न किया हो। उन्होंने उर्दू में “सिलक गौहर” लिखी जिसमें एक भी नुक़्ता नहीं है। उन्होंने ऐसा क़सीदा लिखा जिसमें पूरे के पूरे मिसरे अरबी, फ़ारसी, तुर्की, पुश्तो, पंजाबी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, पूरबी और उस ज़माने की तमाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र ज़बानों में हैं। ऐसी संगलाख़ ज़मीनों में ग़ज़लें लिखीं कि प्रतिद्वंद्वी मुँह छुपाते फिरे। ऐसे शे’र कहे जिनको मायनी के मतभेद के बिना, उर्दू के अलावा, महज़ नुक़्तों की तबदीली के बाद अरबी, फ़ारसी और हिन्दी में पढ़ा जा सकता है या ऐसे शे’र जिनका एक मिसरा बिना नुक्ते और दूसरे मिसरे के तमाम अलफ़ाज़ नुक्ते वाले हैं। अपने अशआर में सनअतों के अंबार लगा देना इंशा के बाएं हाथ का खेल था। अगर कोई इंशा से दिल में उतर जानेवाले शे’र सुनना चाहता है तो उसे जान लेना चाहिए कि ये दरबार मुख़्तलिफ़ है। यहां रेवड़ियों और मोतीचूर के लड्डूओं का नहीं तेज़ मिर्च वाली बारह मसाले की चाट का प्रसाद तक़सीम होता है लेकिन कभी कभी मुँह का मज़ा बदलने के लिए, “ना छेड़ ए निकहत बाद-ए-बहारी राह लग अपनी/ तुझे अठखेलियाँ सूझी हैं हम बेज़ार बैठे हैं” और “नज़ाकत उस गुल-ए-राना की क्या कहूं इंशा/  नसीम -ए-सुब्ह जो छू जाए रंग हो मेला” जैसे अशआर भी मिल जाते हैं।<br/><br/>इंशा 1752 ई. को मुर्शिदाबाद में पैदा हुए। ये वो वक़्त था जब बहुत से शायरों की रूहें पतनशील सल्तनत दिल्ली से दुखी हो कर मुर्शिदाबाद या अज़ीमाबाद में पार्थिव शरीर इख़्तियार करती थीं। ये ख़ानदान नजफ़ अशरफ़ से और बा’ज़ दूसरी रवायात के मुताबिक़ समरक़ंद से प्रवास कर के दिल्ली में आबाद हुआ था और चिकित्साकर्म में अपनी असाधारण योग्यता के आधार पर दरबार-ए-शाही से संबद्ध था। इंशा के वालिद सय्यद माशा अल्लाह दिल्ली की दुर्दशा को देखते हुए मुर्शिदाबाद चले गए थे जहां उनका ख़ूब मान-सम्मान हुआ। लेकिन जब बंगाल के हालात भी ख़राब हुए तो शुजा उद्दौला के पास फ़ैज़ाबाद चले गए। इंशा अपने कम उम्री के बावजूद शुजा उद्दौला के मुसाहिबों में शामिल हो गए थे। शुजा उद्दौला की वफ़ात के बाद वो नजफ़ ख़ान के लश्कर में शामिल हो कर बुंदेलखंड में जाटों के ख़िलाफ़ मुहिम में शरीक रहे। इस मुहिम के समापन के बाद वो नजफ़ ख़ान के साथ दिल्ली आ गए। उजड़ी पजड़ी दिल्ली में शाह-आलम “अज़ दिल्ली ता पालम” की मुख़्तसर सी बिसात बिछाए बैठे थे। इंशा के वालिद ने बेटे की शिक्षा-दीक्षा पर ख़ूब तवज्जो दी थी और बेपनाह प्रतिभा और ज्ञान व विद्वता के हवाले से दिल्ली में इंशा का कोई मुक़ाबिल नहीं था वो हफ़्त ज़बान और विभिन्न ज्ञान और कलाओं से परिचित थे। क़िला से अपने ख़ानदान के पुराने सम्बंधों की बदौलत इंशा को दरबार तक रसाई मिली और वो अपनी तर्रारी और भाँड पन की हद तक पहुंची हुई मस्ख़रगी की बदौलत शाह-आलम की आँख का तारा बन गए कि उनके बग़ैर बादशाह को चैन नहीं आता था। इसे भाग्य की विडंबना ही कहेंगे कि इंशा जैसे ज़हीन और योग्य व्यक्ति को अपने ज्ञान और विद्वता का, अकबर जैसा क़द्रदान नहीं मिला जो अबुल फ़ज़ल और फ़ैज़ी की तरह उनकी असल सलाहियतों की क़दर करता। उनको अपने अस्तित्व के लिए एक मसखरे मुसाहिब का किरदार अदा करना पड़ा जिसने बाद में,ज़रूरत की जगह, आदत की शक्ल इख़्तियार करली। जब इंशा दिल्ली पहुंचे, बड़े बड़े शायर,सौदा, मीर, जुरअत, सोज़ वग़ैरा दिल्ली को छोड़कर ऐश-ओ-निशात के नौ दरयाफ़्त जज़ीरे लखनऊ का रख कर चुके थे और छुट भय्ये अपने अभिमान में ख़ातिम-उल-शोअरा बने हुए थे। ये लोग इंशा को नया आया हुआ लौंडा समझते थे और उन्हें ख़ातिर में नहीं लाते थे। ऐसे में लाज़िम था कि इंशा उनको उनकी औक़ात बताएं और यहीं से इंशा की अदबी विवादों का वो सिलसिला शुरू हुआ कि इंशा को अपने सामने सर उठाने वाले किसी भी शख़्स को दो-चार ज़ोरदार पटख़नियां दिए बग़ैर चैन नहीं आया।<br/><br/>दिल्ली में इंशा का पहला विवाद मिर्ज़ा अज़ीम बेग से हुआ। उनकी शैक्षिक योग्यता बहुत मामूली थी। सौदा के शागिर्द होने के मुद्दई और ख़ुद को साइब का हम मर्तबा समझते थे। इंशा की आम चलन से हटी हुई शायरी के नुक्ताचीनों में ये पेश पेश थे और अपने मक़ताओं में सौदा पर चोटें करते थे। एक दिन वो सय्यद इंशा से मिलने आए और अपनी एक ग़ज़ल सुनाई जो बह्र-ए-रजज़ में थी लेकिन अज्ञानता के सबब उसके कुछ शे’र बह्र-ए-रमल में चले गए थे। इंशा भी मौजूद थे। उन्होंने तै किया की हज़रत को मज़ा चखाना चाहिए। ग़ज़ल की बहुत तारीफ़ की मुकर्रर पढ़वाया और आग्रह किया कि इस ग़ज़ल को वो मुशायरे में ज़रूर पढ़ें। अज़ीम बेग उनके फंदे में आ गए और जब उन्होंने मुशायरे में ग़ज़ल पढ़ी तो इंशा ने भरे मुशायरे मैं उनसे ग़ज़ल की तक़ती की फ़र्माइश कर दी। मुशायरे में सबको साँप सूंघ गया। इंशा यहीं नहीं रुके बल्कि दूसरों की नसीहत के लिए एक मुख़म्मस(पांच पांच चरणों की एक प्रकार की कविता) भी सुना दिया। “गर तू मुशायरे में सबा आजकल चले/ कहियो अज़ीम से कि ज़रा वो सँभल चले/ इतना भी अपनी हद से न बाहर निकल चले/ पढ़ने को शब जो यार ग़ज़ल दर ग़ज़ल चले/ बह्र-ए-रजज़ में डाल के बह्र-ए-रमल चले।” अज़ीम बेग अपने ज़ख़्म चाटते हुए मुशायरे से रुख़्सत हुए और अपनी झेंप मिटाने के लिए जवाबी मुख़म्मस लिखा जिसमें इंशा को जी भर के बुरा-भला कहा और दावा किया कि बहर की तबदीली अनजाने में नहीं थी बल्कि शऊरी थी जिसका संकेत उनके अनुसार कल के छोकरे नहीं समझ सकते। “मौज़ूनी-ओ-मआनी में पाया न तुमने फ़र्क़/ तबदील बहर से हुए बह्र-ए-ख़ुशी में ग़र्क़/ रोशन है मिस्ल-ए-मेहर ये अज़ ग़र्ब ता ब शर्क़/ शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़/ वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले (आख़िरी मिसरा माक़ब्ल के मिसरे में शब्द परिवर्तन के साथ शे’र “गिरते हैं शह सवार ही मैदान-ए-जंग में/ वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले” की शक्ल में मशहूर होगया)। उसके बाद जंग की पंक्तियां सज गईँ। इंशा के कहने पर बादशाह ने मुशायरे में अपनी ग़ज़ल भेजना बंद कर दी। अगली बार जो मुशायरा हुआ वो एक ख़तरनाक संग्राम था। आज़ाद के बक़ौल प्रतिद्वंदीयों ने तलवार और बंदूक और जंग के हथियार सँभाले थे, भाई बंद और दोस्तों को साथ लिया था और दीन के बुज़ुर्गों की नियाज़ें मांग मांग कर मुशायरे में गए थे। इंशा विरोधियों को भड़काने के लिए अक्सर फ़ख़्रिया अशआर कहते। विरोधियों के कलाम को अपने कलाम के सामने ऐसा गरदानते जैसे कलाम-ए-इलाही के सामने मुसलिमा कज़्ज़ाब की “अलफ़ील मालफ़ील।” अगले मुशायरे में भी वो अपनी फ़ख़्रिया ग़ज़ल “एक तिफ़्ल-ए-दबिस्ताँ है फ़लातूँ मिरे आगे/ क्या मुँह है अरस्तू जो करे चूँ मिरे आगे” लेकर गए। इस संग्राम में जीत इंशा की ज़रूर हुई लेकिन उनका विरोध बहुत बढ़ गया। उस ज़माने में उनके क़रीबी दोस्तों में सआदत यार ख़ान रंगीन शामिल थे जिन्होंने आख़िरी वक़्त तक दोस्ती निभाई। दिल्ली के हालात बद से बदतर होते जा रहे थे, शहर में लूट मार का दौर दौरा था। दरबार से भी उनका दिल उचाट हो गया। लखनऊ में हातिम सानी आसिफ़ उद्दौला के दानशीलता की धूम थी। क़िस्मत आज़माने के लिए लखनऊ की राह ली। आते ही वहां के मुशायरों में धूम मचाई। कुछ दिन फ़ैज़ाबाद के अपने करम फ़र्मा अल्मास ख़ान के पास रहे फिर शाह आलम के बेटे सुलेमान शिकोह के मुलाज़िम हो गए।। सुलेमान शिकोह, इंशा से इस्लाह लेने लगे। मुसहफ़ी पहले से लखनऊ में मौजूद थे लेकिन अमीरों तक उनकी रसाई नहीं थी। इंशा ने सिफ़ारिश कर के उनको सुलेमान शिकोह के मुसाहिबों में शामिल करा दिया। उन दिनों लखनऊ में शायरी की एक नई बिसात बिछ रही थी जिसे बाद में दबिस्तान-ए-लखनऊ का नाम दिया गया। इंशा के अलावा जुरअत, रंगीन, राग़िब वग़ैरा एक से बढ़ कर एक तमाशे दिखा रहे थे। संगलाख़ ज़मीनों में उस्तादी दिखाने और चूमा-चाटी के विषयों को अश्लीलता की सीमा तक ले जाने की एक होड़ लगी थी। </p><p>आसिफ़ उद्दौला के बाद जब सआदत अली ख़ान ने हुकूमत संभाली तो आसिफ़ उद्दौला जैसी उदारता ख़त्म हो गई थी वो कंजूस मशहूर थे और स्वभावतः गंभीर थे। सआदत अली ख़ान के दरबार में इंशा अल्लाह बहुत दिनों बाद किसी तरह पहुंच तो गए लेकिन उनकी कोई इज़्ज़त नहीं थी। उनकी भूमिका बस दिल बहलाने वाले एक मसखरे जैसी थी। नवाब रात के वक़्त सुरूर के आलम में दरिया की सैर कर रहे हैं। अचानक दरिया के किनारे एक इमारत नज़र आती है जिसका तारीख़ी नाम “हवेली अली नक़ी ख़ां बहादुर की” है। इंशा से फ़र्माइश होती है इस इतिहास सामग्री को नज़्म के रूप में छंदोबद्ध करें और इंशा तामील करते हैं। “न अरबी न फ़ारसी न तुर्की/ न सम की न ताल की न सुर की/ ये तारीख़ कही है किसी लुर की/ हवेली अली नक़ी ख़ान बहादुर की।” नवाब को जब किसी की पगड़ी उछालनी होती इंशा को उसके पीछे लगा देते। आज़ाद ने इंशा की ज़बानी एक वाक़िया बयान किया है, “क्या कहूं, लोग जानते हैं कि मैं शायरी कर के नौकरी बजा लाता हूँ मगर ख़ुद नहीं जानता कि क्या कर रहा हूँ। देखो सुबह का गया शाम को आया था कमर खोल रहा था कि चोबदार आया कि जनाब आली फिर याद फ़रमाते हैं गया तो देखा कि कोठे पर फ़र्श है, चाँदनी-रात है, पाएदार छप़्पर कट में आप बैठे हैं, फूलों का गहना सामने धरा है, एक गजरा हाथ में है उसे उछालते हैं और पाँव के इशारे से छप्पर खट आगे बढ़ता जाता है। मैंने सलाम किया, हुक्म हुआ इंशा कोई शे’र तो पढ़ो। अब फ़रमाइए ऐसी हालत में कि अपना ही क़ाफ़िया तंग हो, शे’र क्या ख़ाक याद आए। ख़ैर उस वक़्त यही समझ में आया, वहीं कह कर पढ़ दिया, लगा छप्पर खट में चार पहिए, उछाला तू ने जो ले के गजरा/ तो मौज दरयाए चांदनी में वो ऐसा चलता था जैसे बजरा। यही मतला सुनकर ख़ुश हुए। बतलाइए शायरी इसे कहते हैं?”<br/><br/>इन बातों के बावजूद इंशा के अहम अदबी कारनामे उसी ज़माने में वजूद में आए जब वो सआदत अली ख़ान की सरकार से सम्बद्ध थे। “दरयाए लताफ़त” का प्रस्ताव नवाब ने ही पेश किया था। इंशा की आख़िरी उम्र बड़ी बेबसी में गुज़री। हंसी हंसी में कही गई इंशा की कुछ बातों से नवाब के दिल में गिरह पड़ गई और वो कोपपात्र हो गए और ज़िंदगी के बाक़ी दिन मुफ़लिसी और बेचारगी में गुज़ारे।<br/>इंशा की शायरी निरंतर अनुभवों के बारे में है, इसलिए इसमें कोई विशेष रंग उभर कर सामने नहीं आता। उनकी तमाम शायरी में जो सिफ़त मुश्तर्क है वो ये कि उनका कलाम आकर्षित और आनंदित करता है। उनकी शायरी की अहमियत ऐतिहासिक और भाषाई है। अरबी, फ़ारसी का एक भी लफ़्ज़ इस्तेल किए बिना एक दास्तान लिख कर उन्होंने इस दावे की व्यवहारिक रूप से रद्द कर दिया कि उर्दू खड़ी बोली में अरबी, फ़ारसी के शब्दों के मिश्रण से पैदा होने वली ज़बान है। दूसरे शब्दों में वो उर्दू के पहले अदीब हैं जिसने उर्दू की ख़ुद मुख़्तारी का ऐलान किया।<br/></p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'इंशा'   मूल नाम :  सय्यद इंशा अल्लाह ख़ान   जन्म : मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल   निधन :  01 May 1817  | लखनऊ, उत्तर प्रदेश       LCCN : n82054839     उर्दू की ख़ुद मुख़्तारी के अग्रदूत “हर लफ़्ज़ जो उर्दू में मशहूर हो गया, अरबी हो या फ़ारसी, तुर्की हो या सुरयानी, पंजाबी हो या पूरबी असल के अनुसार ग़लत हो या सही वो लफ़्ज़ उर्दू का लफ़्ज़ है। अगर असल के अनुसार उपयोग किया गया है तो भी सही है और असल के विरुद्ध उपयोग किया गया है तो भी सही है, इसकी सेहत व ग़लती उर्दू के इस्तेमाल पर निर्भर है क्योंकि जो कुछ उर्दू के ख़िलाफ़ है ग़लत है चाहे असल में वो सही हो और जो कुछ मुवाफ़िक़ उर्दू है सही है चाहे असल में सेहत न रखता हो।” इंशा अल्लाह ख़ां इंशा उर्दू के दूसरे शायरों की तरह महज़ एक शायर नहीं बल्कि उर्दू ज़बान के विकास के सफ़र में एक संग-ए-मील की हैसियत रखते हैं। उनको क़ुदरत ने ऐसी सलाहियतों से नवाज़ा था कि बदक़िस्मती से वो उनको सँभाल नहीं सके। मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने उनको उर्दू का अमीर ख़ुसरो कहा जबकि उनके बारे में बेताब का ये क़ौल भी मशहूर है कि “इंशा के फ़ज़ल-ओ-कमाल को उनकी शायरी ने खोया और उनकी शायरी को सआदत अली ख़ां की मुसाहिबत ने डुबोया।” इसमें शक नहीं कि इंशा अपने मिज़ाज की सीमाबियत और ग़ैर संजीदगी की बिना पर अपनी सलाहियतों को पूरी तरह कम में नहीं ला सके, उसके बावजूद शायरी के हवाले से कम और ज़बान के हवाले से ज़्यादा, उन्होंने ज़बान-ओ-अदब की जो ख़िदमत अंजाम दी उसकी कोई मिसाल उर्दू में नहीं मिलती। शायरी में तरह तरह के भाषायी प्रयोग के साथ उनका सबसे बड़ा कारनामा किसी हिंदुस्तानी की लिखी हुई उर्दू ग्रामर की पहली किताब “दरियाए फ़साहत” है जो क़वाइद की आम किताबों की तरह ख़ुश्क और बेमज़ा न हो कर किसी नॉवेल की तरह पुरलुत्फ़ है जिसमें विभिन्न पात्र अपनी अपनी बोलियाँ बोलते सुनाई देते हैं। उनकी दूसरी अहम किताब “रानी केतकी की कहानी” है जिसमें अरबी फ़ारसी का एक भी लफ़्ज़ इस्तेमाल नहीं हुआ है। अगर इंशा के अदबी रवय्ये को एक जुमले में बयान करना हो तो कहा जा सकता है कि इंशा किसी भी परंपरा या समकालिक तरीक़े का अनुकरण अपने लिए हराम समझते थे और हमेशा कुछ ऐसा करने की धुन में रहते थे जो पहले कभी किसी ने न किया हो। उन्होंने उर्दू में “सिलक गौहर” लिखी जिसमें एक भी नुक़्ता नहीं है। उन्होंने ऐसा क़सीदा लिखा जिसमें पूरे के पूरे मिसरे अरबी, फ़ारसी, तुर्की, पुश्तो, पंजाबी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, पूरबी और उस ज़माने की तमाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र ज़बानों में हैं। ऐसी संगलाख़ ज़मीनों में ग़ज़लें लिखीं कि प्रतिद्वंद्वी मुँह छुपाते फिरे। ऐसे शे’र कहे जिनको मायनी के मतभेद के बिना, उर्दू के अलावा, महज़ नुक़्तों की तबदीली के बाद अरबी, फ़ारसी और हिन्दी में पढ़ा जा सकता है या ऐसे शे’र जिनका एक मिसरा बिना नुक्ते और दूसरे मिसरे के तमाम अलफ़ाज़ नुक्ते वाले हैं। अपने अशआर में सनअतों के अंबार लगा देना इंशा के बाएं हाथ का खेल था। अगर कोई इंशा से दिल में उतर जानेवाले शे’र सुनना चाहता है तो उसे जान लेना चाहिए कि ये दरबार मुख़्तलिफ़ है। यहां रेवड़ियों और मोतीचूर के लड्डूओं का नहीं तेज़ मिर्च वाली बारह मसाले की चाट का प्रसाद तक़सीम होता है लेकिन कभी कभी मुँह का मज़ा बदलने के लिए, “ना छेड़ ए निकहत बाद-ए-बहारी राह लग अपनी/ तुझे अठखेलियाँ सूझी हैं हम बेज़ार बैठे हैं” और “नज़ाकत उस गुल-ए-राना की क्या कहूं इंशा/  नसीम -ए-सुब्ह जो छू जाए रंग हो मेला” जैसे अशआर भी मिल जाते हैं। इंशा 1752 ई. को मुर्शिदाबाद में पैदा हुए। ये वो वक़्त था जब बहुत से शायरों की रूहें पतनशील सल्तनत दिल्ली से दुखी हो कर मुर्शिदाबाद या अज़ीमाबाद में पार्थिव शरीर इख़्तियार करती थीं। ये ख़ानदान नजफ़ अशरफ़ से और बा’ज़ दूसरी रवायात के मुताबिक़ समरक़ंद से प्रवास कर के दिल्ली में आबाद हुआ था और चिकित्साकर्म में अपनी असाधारण योग्यता के आधार पर दरबार-ए-शाही से संबद्ध था। इंशा के वालिद सय्यद माशा अल्लाह दिल्ली की दुर्दशा को देखते हुए मुर्शिदाबाद चले गए थे जहां उनका ख़ूब मान-सम्मान हुआ। लेकिन जब बंगाल के हालात भी ख़राब हुए तो शुजा उद्दौला के पास फ़ैज़ाबाद चले गए। इंशा अपने कम उम्री के बावजूद शुजा उद्दौला के मुसाहिबों में शामिल हो गए थे। शुजा उद्दौला की वफ़ात के बाद वो नजफ़ ख़ान के लश्कर में शामिल हो कर बुंदेलखंड में जाटों के ख़िलाफ़ मुहिम में शरीक रहे। इस मुहिम के समापन के बाद वो नजफ़ ख़ान के साथ दिल्ली आ गए। उजड़ी पजड़ी दिल्ली में शाह-आलम “अज़ दिल्ली ता पालम” की मुख़्तसर सी बिसात बिछाए बैठे थे। इंशा के वालिद ने बेटे की शिक्षा-दीक्षा पर ख़ूब तवज्जो दी थी और बेपनाह प्रतिभा और ज्ञान व विद्वता के हवाले से दिल्ली में इंशा का कोई मुक़ाबिल नहीं था वो हफ़्त ज़बान और विभिन्न ज्ञान और कलाओं से परिचित थे। क़िला से अपने ख़ानदान के पुराने सम्बंधों की बदौलत इंशा को दरबार तक रसाई मिली और वो अपनी तर्रारी और भाँड पन की हद तक पहुंची हुई मस्ख़रगी की बदौलत शाह-आलम की आँख का तारा बन गए कि उनके बग़ैर बादशाह को चैन नहीं आता था। इसे भाग्य की विडंबना ही कहेंगे कि इंशा जैसे ज़हीन और योग्य व्यक्ति को अपने ज्ञान और विद्वता का, अकबर जैसा क़द्रदान नहीं मिला जो अबुल फ़ज़ल और फ़ैज़ी की तरह उनकी असल सलाहियतों की क़दर करता। उनको अपने अस्तित्व के लिए एक मसखरे मुसाहिब का किरदार अदा करना पड़ा जिसने बाद में,ज़रूरत की जगह, आदत की शक्ल इख़्तियार करली। जब इंशा दिल्ली पहुंचे, बड़े बड़े शायर,सौदा, मीर, जुरअत, सोज़ वग़ैरा दिल्ली को छोड़कर ऐश-ओ-निशात के नौ दरयाफ़्त जज़ीरे लखनऊ का रख कर चुके थे और छुट भय्ये अपने अभिमान में ख़ातिम-उल-शोअरा बने हुए थे। ये लोग इंशा को नया आया हुआ लौंडा समझते थे और उन्हें ख़ातिर में नहीं लाते थे। ऐसे में लाज़िम था कि इंशा उनको उनकी औक़ात बताएं और यहीं से इंशा की अदबी विवादों का वो सिलसिला शुरू हुआ कि इंशा को अपने सामने सर उठाने वाले किसी भी शख़्स को दो-चार ज़ोरदार पटख़नियां दिए बग़ैर चैन नहीं आया। दिल्ली में इंशा का पहला विवाद मिर्ज़ा अज़ीम बेग से हुआ। उनकी शैक्षिक योग्यता बहुत मामूली थी। सौदा के शागिर्द होने के मुद्दई और ख़ुद को साइब का हम मर्तबा समझते थे। इंशा की आम चलन से हटी हुई शायरी के नुक्ताचीनों में ये पेश पेश थे और अपने मक़ताओं में सौदा पर चोटें करते थे। एक दिन वो सय्यद इंशा से मिलने आए और अपनी एक ग़ज़ल सुनाई जो बह्र-ए-रजज़ में थी लेकिन अज्ञानता के सबब उसके कुछ शे’र बह्र-ए-रमल में चले गए थे। इंशा भी मौजूद थे। उन्होंने तै किया की हज़रत को मज़ा चखाना चाहिए। ग़ज़ल की बहुत तारीफ़ की मुकर्रर पढ़वाया और आग्रह किया कि इस ग़ज़ल को वो मुशायरे में ज़रूर पढ़ें। अज़ीम बेग उनके फंदे में आ गए और जब उन्होंने मुशायरे में ग़ज़ल पढ़ी तो इंशा ने भरे मुशायरे मैं उनसे ग़ज़ल की तक़ती की फ़र्माइश कर दी। मुशायरे में सबको साँप सूंघ गया। इंशा यहीं नहीं रुके बल्कि दूसरों की नसीहत के लिए एक मुख़म्मस(पांच पांच चरणों की एक प्रकार की कविता) भी सुना दिया। “गर तू मुशायरे में सबा आजकल चले/ कहियो अज़ीम से कि ज़रा वो सँभल चले/ इतना भी अपनी हद से न बाहर निकल चले/ पढ़ने को शब जो यार ग़ज़ल दर ग़ज़ल चले/ बह्र-ए-रजज़ में डाल के बह्र-ए-रमल चले।” अज़ीम बेग अपने ज़ख़्म चाटते हुए मुशायरे से रुख़्सत हुए और अपनी झेंप मिटाने के लिए जवाबी मुख़म्मस लिखा जिसमें इंशा को जी भर के बुरा-भला कहा और दावा किया कि बहर की तबदीली अनजाने में नहीं थी बल्कि शऊरी थी जिसका संकेत उनके अनुसार कल के छोकरे नहीं समझ सकते। “मौज़ूनी-ओ-मआनी में पाया न तुमने फ़र्क़/ तबदील बहर से हुए बह्र-ए-ख़ुशी में ग़र्क़/ रोशन है मिस्ल-ए-मेहर ये अज़ ग़र्ब ता ब शर्क़/ शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़/ वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले (आख़िरी मिसरा माक़ब्ल के मिसरे में शब्द परिवर्तन के साथ शे’र “गिरते हैं शह सवार ही मैदान-ए-जंग में/ वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले” की शक्ल में मशहूर होगया)। उसके बाद जंग की पंक्तियां सज गईँ। इंशा के कहने पर बादशाह ने मुशायरे में अपनी ग़ज़ल भेजना बंद कर दी। अगली बार जो मुशायरा हुआ वो एक ख़तरनाक संग्राम था। आज़ाद के बक़ौल प्रतिद्वंदीयों ने तलवार और बंदूक और जंग के हथियार सँभाले थे, भाई बंद और दोस्तों को साथ लिया था और दीन के बुज़ुर्गों की नियाज़ें मांग मांग कर मुशायरे में गए थे। इंशा विरोधियों को भड़काने के लिए अक्सर फ़ख़्रिया अशआर कहते। विरोधियों के कलाम को अपने कलाम के सामने ऐसा गरदानते जैसे कलाम-ए-इलाही के सामने मुसलिमा कज़्ज़ाब की “अलफ़ील मालफ़ील।” अगले मुशायरे में भी वो अपनी फ़ख़्रिया ग़ज़ल “एक तिफ़्ल-ए-दबिस्ताँ है फ़लातूँ मिरे आगे/ क्या मुँह है अरस्तू जो करे चूँ मिरे आगे” लेकर गए। इस संग्राम में जीत इंशा की ज़रूर हुई लेकिन उनका विरोध बहुत बढ़ गया। उस ज़माने में उनके क़रीबी दोस्तों में सआदत यार ख़ान रंगीन शामिल थे जिन्होंने आख़िरी वक़्त तक दोस्ती निभाई। दिल्ली के हालात बद से बदतर होते जा रहे थे, शहर में लूट मार का दौर दौरा था। दरबार से भी उनका दिल उचाट हो गया। लखनऊ में हातिम सानी आसिफ़ उद्दौला के दानशीलता की धूम थी। क़िस्मत आज़माने के लिए लखनऊ की राह ली। आते ही वहां के मुशायरों में धूम मचाई। कुछ दिन फ़ैज़ाबाद के अपने करम फ़र्मा अल्मास ख़ान के पास रहे फिर शाह आलम के बेटे सुलेमान शिकोह के मुलाज़िम हो गए।। सुलेमान शिकोह, इंशा से इस्लाह लेने लगे। मुसहफ़ी पहले से लखनऊ में मौजूद थे लेकिन अमीरों तक उनकी रसाई नहीं थी। इंशा ने सिफ़ारिश कर के उनको सुलेमान शिकोह के मुसाहिबों में शामिल करा दिया। उन दिनों लखनऊ में शायरी की एक नई बिसात बिछ रही थी जिसे बाद में दबिस्तान-ए-लखनऊ का नाम दिया गया। इंशा के अलावा जुरअत, रंगीन, राग़िब वग़ैरा एक से बढ़ कर एक तमाशे दिखा रहे थे। संगलाख़ ज़मीनों में उस्तादी दिखाने और चूमा-चाटी के विषयों को अश्लीलता की सीमा तक ले जाने की एक होड़ लगी थी।  आसिफ़ उद्दौला के बाद जब सआदत अली ख़ान ने हुकूमत संभाली तो आसिफ़ उद्दौला जैसी उदारता ख़त्म हो गई थी वो कंजूस मशहूर थे और स्वभावतः गंभीर थे। सआदत अली ख़ान के दरबार में इंशा अल्लाह बहुत दिनों बाद किसी तरह पहुंच तो गए लेकिन उनकी कोई इज़्ज़त नहीं थी। उनकी भूमिका बस दिल बहलाने वाले एक मसखरे जैसी थी। नवाब रात के वक़्त सुरूर के आलम में दरिया की सैर कर रहे हैं। अचानक दरिया के किनारे एक इमारत नज़र आती है जिसका तारीख़ी नाम “हवेली अली नक़ी ख़ां बहादुर की” है। इंशा से फ़र्माइश होती है इस इतिहास सामग्री को नज़्म के रूप में छंदोबद्ध करें और इंशा तामील करते हैं। “न अरबी न फ़ारसी न तुर्की/ न सम की न ताल की न सुर की/ ये तारीख़ कही है किसी लुर की/ हवेली अली नक़ी ख़ान बहादुर की।” नवाब को जब किसी की पगड़ी उछालनी होती इंशा को उसके पीछे लगा देते। आज़ाद ने इंशा की ज़बानी एक वाक़िया बयान किया है, “क्या कहूं, लोग जानते हैं कि मैं शायरी कर के नौकरी बजा लाता हूँ मगर ख़ुद नहीं जानता कि क्या कर रहा हूँ। देखो सुबह का गया शाम को आया था कमर खोल रहा था कि चोबदार आया कि जनाब आली फिर याद फ़रमाते हैं गया तो देखा कि कोठे पर फ़र्श है, चाँदनी-रात है, पाएदार छप़्पर कट में आप बैठे हैं, फूलों का गहना सामने धरा है, एक गजरा हाथ में है उसे उछालते हैं और पाँव के इशारे से छप्पर खट आगे बढ़ता जाता है। मैंने सलाम किया, हुक्म हुआ इंशा कोई शे’र तो पढ़ो। अब फ़रमाइए ऐसी हालत में कि अपना ही क़ाफ़िया तंग हो, शे’र क्या ख़ाक याद आए। ख़ैर उस वक़्त यही समझ में आया, वहीं कह कर पढ़ दिया, लगा छप्पर खट में चार पहिए, उछाला तू ने जो ले के गजरा/ तो मौज दरयाए चांदनी में वो ऐसा चलता था जैसे बजरा। यही मतला सुनकर ख़ुश हुए। बतलाइए शायरी इसे कहते हैं?” इन बातों के बावजूद इंशा के अहम अदबी कारनामे उसी ज़माने में वजूद में आए जब वो सआदत अली ख़ान की सरकार से सम्बद्ध थे। “दरयाए लताफ़त” का प्रस्ताव नवाब ने ही पेश किया था। इंशा की आख़िरी उम्र बड़ी बेबसी में गुज़री। हंसी हंसी में कही गई इंशा की कुछ बातों से नवाब के दिल में गिरह पड़ गई और वो कोपपात्र हो गए और ज़िंदगी के बाक़ी दिन मुफ़लिसी और बेचारगी में गुज़ारे। इंशा की शायरी निरंतर अनुभवों के बारे में है, इसलिए इसमें कोई विशेष रंग उभर कर सामने नहीं आता। उनकी तमाम शायरी में जो सिफ़त मुश्तर्क है वो ये कि उनका कलाम आकर्षित और आनंदित करता है। उनकी शायरी की अहमियत ऐतिहासिक और भाषाई है। अरबी, फ़ारसी का एक भी लफ़्ज़ इस्तेल किए बिना एक दास्तान लिख कर उन्होंने इस दावे की व्यवहारिक रूप से रद्द कर दिया कि उर्दू खड़ी बोली में अरबी, फ़ारसी के शब्दों के मिश्रण से पैदा होने वली ज़बान है। दूसरे शब्दों में वो उर्दू के पहले अदीब हैं जिसने उर्दू की ख़ुद मुख़्तारी का ऐलान किया।  ",
            "slug": "insa-allaha-khana-insa",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": "1817-05-01",
            "location": "दिल्ली, भारत",
            "url": "/sootradhar/insa-allaha-khana-insa",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:31.109221",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24513,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "इश्क़ औरंगाबादी",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'इश्क़'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मिर्ज़ा जमालुल्लाह</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>औरंगाबाद, महाराष्ट्र</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'इश्क़'   मूल नाम :  मिर्ज़ा जमालुल्लाह   जन्म : औरंगाबाद, महाराष्ट्र      ",
            "slug": "isqa-aurangabadi",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": null,
            "location": "औरंगाबाद, भारत",
            "url": "/sootradhar/isqa-aurangabadi",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:33.578753",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24514,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/%E0%A4%9C%E0%A5%9E%E0%A4%B0_%E0%A4%85%E0%A4%B2_%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%A4.png",
            "name": "जाफ़र अली हसरत",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'हसरत'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> जाफ़र अली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>दिल्ली</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> जुरअत क़लंदर बख़्श (शिष्य)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'हसरत'   मूल नाम :  जाफ़र अली   जन्म : दिल्ली      संबंधी :    जुरअत क़लंदर बख़्श (शिष्य)        ",
            "slug": "jafara-ali-hasarata",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": null,
            "location": "लखनऊ, भारत",
            "url": "/sootradhar/jafara-ali-hasarata",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:36.854661",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24515,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "जोशिश अज़ीमाबादी",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'जोशिश'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> शैख़ मोहम्मद रौशन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>पटना, बिहार</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> पटना, बिहार</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'जोशिश'   मूल नाम :  शैख़ मोहम्मद रौशन   जन्म : पटना, बिहार   निधन :  पटना, बिहार      ",
            "slug": "josisa-azimabadi",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": null,
            "location": "",
            "url": "/sootradhar/josisa-azimabadi",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:39.277567",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24516,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "कैफ़ी काकोरवी",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'कैफ़ी'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> नूरुद्दीन अहमद</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>काकोरी, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 18 May 1928</bdi> | काकोरी, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'कैफ़ी'   मूल नाम :  नूरुद्दीन अहमद   जन्म : काकोरी, उत्तर प्रदेश   निधन :  18 May 1928  | काकोरी, उत्तर प्रदेश      ",
            "slug": "kaifi-kakoravi",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": "1928-05-18",
            "location": "",
            "url": "/sootradhar/kaifi-kakoravi",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:41.649103",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24517,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "ख़ान आरज़ू सिराजुद्दीन अली",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'आरज़ू'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सिराजुद्दीन अली ख़ान</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>ग्वालियर, मध्य प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 27 Jan 1756</bdi></span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p>उर्दू शायरी में उस्तादों के उस्ताद<br/><br/>“ख़ान आरज़ू को उर्दू पर वही दावा पहुंचता है जो कि <br/>अरस्तू को दर्शनशास्त्र और तर्कशास्त्र पर है। जब तक कि कुल<br/>तर्कशास्त्री अरस्तू के परिवार के कहलाएंगे तब तक उर्दू वाले <br/>ख़ान आरज़ू के प</p><p>रिवार कहलाते रहेंगे।” <br/>मुहम्मद हुसैन आज़ाद<br/><br/>सिराज उद्दीन अली ख़ान आरज़ू उर्दू और फ़ारसी भाषाओं के विद्वान, शायर, भाषा शास्त्री, आलोचक, कोशकार और तज़्किरा लेखक थे। मसनवी सह्र-उल-बयान के लेखक मीर हसन ने अपने तज़्किरे में कहा है कि “अमीर ख़ुसरो के बाद आरज़ू जैसा साहब-ए-कमाल शख़्स हिंदुस्तान में नहीं पैदा हुआ।” और मुहम्मद हुसैन आज़ाद समस्त उर्दू वालों को ख़ान आरज़ू के परिवार में शुमार करते हैं। आज़ाद की श्रद्धा शक्ति को एक तरफ़ रख दें तब भी ये हक़ीक़त है कि ख़ान आरज़ू वही शख़्स हैं जिनकी संगति और प्रशिक्षण से मज़हर जान जानां, मीर तक़ी मीर, मुहम्मद रफ़ी सौदा और मीर दर्द जैसे शायरों को मार्गदर्शन मिला। आरज़ू के ज़माने तक फ़ारसी के मुक़ाबले में उर्दू शायरी को कमतर और तुच्छ जाना जाता था। आज़ाद उर्दू के लिए ख़ान आरज़ू की सेवाओं का उल्लेख करते हुए लिखते हैं, “उनके बारे में इतना लिखना काफ़ी है कि ख़ान आरज़ू वही शख़्स हैं जिनके कुशल प्रशिक्षण से ऐसे शाइस्ता फ़र्ज़ंद परवरिश पा कर उठे जिन्हें उर्दू भाषा का सुधारक कहा जासकता है। सौदा ख़ान आरज़ू के शागिर्द नहीं थे मगर उनकी संगति से बहुत फ़ायदे हासिल किए, पहले फ़ारसी में शे’र कहा करते थे, ख़ान आरज़ू ने कहा, “मिर्ज़ा फ़ारसी अब तुम्हारी ज़बान मादरी(मातृ भाषा) नहीं। इसमें ऐसे नहीं हो सकते कि तुम्हारा कलाम भाषाविदों के मुक़ाबिल में काबिल-ए-तारीफ़ हो। स्वभाव उपयुक्त है, शे’र के लिए भी उपयुक्त है, तुम उर्दू में कहा करो तो ज़माने में अद्वितीय होगे।” ख़ान आरज़ू मीर तक़ी मीर के सौतेले मामूं थे और पिता के निधन के बाद कुछ दिन आरज़ू के पास गुज़ारे थे। मीर के कलाम में आरज़ू की “चराग-ए-हिदायत” के निशान जगह जगह मिलते हैं। ख़ान आरज़ू मूलतः फ़ारसी के विद्वान और शायर थे। उन्होंने उर्दू में कोई दीवान नहीं छोड़ा। उनके अशआर तज़्किरों में मिलते हैं जिनकी तादाद ज़्यादा नहीं लेकिन जो भी कलाम उपलब्ध है वो उर्दू शायरी के विकास क्रम को समझने के संदर्भ में  एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। उर्दू में उनके अशआर की तादाद पंद्रह-बीस सही लेकिन उन्होंने अपने साथियों और शागिर्दों को उर्दू की तरफ़ आकर्षित कर के उर्दू की प्रतिष्ठा बढ़ाई और उर्दू पर से अविश्वास के दाग़ को हमेशा के लिए धो डाला।<br/><br/>आरज़ू का एक बड़ा कारनामा ये है कि उन्होंने हिंदुस्तानी ज़बान की भाषाई शोध की बुनियाद रखी और जर्मन प्राच्याविदों से बहुत पहले बताया कि संस्कृत और फ़ारसी जुड़वां भाषाएं हैं। वो आज के संदर्भ में पक्के राष्ट्रवादी थे। उनका कहना था कि जब ईरान के फ़ारसी जानने वाले अरबी और दूसरी भाषाओं के शब्दों को फ़ारसी में दाख़िल कर सकते हैं तो हिंदुस्तान के फ़ारसी जानने वाले हिन्दी शब्दों को इसमें क्यों नहीं शामिल कर सकते। इस सिलसिले में अली हज़ीं के साथ उनका विवाद बहुत मशहूर है। अली हज़ीं एक ईरानी शायर थे जो दिल्ली में बस गए थे। वो बहुत हि घमंडी थे और हिंदुस्तानी शायरों का उपहास करते थे। एक बार उन्होंने हिंदुस्तानियों के महबूब फ़ारसी शायर बेदिल का परिहास उड़ाते हुए कहा कि अगर बेदिल के शे’र इस्फ़हान में पढ़े जाएं तो कोई न समझेगा। इससे हिंदुस्तानी शायरों को दुख पहुँचा लेकिन ख़ामोश रह गए, लेकिन आरज़ू ने बेदिल का डट कर बचाव किया और हज़ीं के 400 अशआर की बख़ीया उधेड़ कर रख दी, हज़ीं को दिल्ली से भागना पड़ा। इससे आरज़ू की विद्वता और साहित्यिक कौशल का अंदाज़ा होता है। उन्होंने एक पारंपरिक शायर होने के बावजूद परंपरा तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और अद्भुत आलोचनात्मक प्रतिभा का सबूत दिया। आरज़ू पहले शख़्स थे जिन्होंने दिल्ली में बोली जाने वाली खड़ी बोली को उर्दू का नाम दिया। उनके ज़माने तक उर्दू का मतलब लश्कर था। शाहजहाँ आबाद को भी लश्कर कहा जाता था। उर्दू भाषा से तात्पर्य फ़ारसी भी लिया जाता था। ख़ान आरज़ू ने पहली बार उर्दू शब्द का इस्तेमाल उन विलक्षण शब्दों के लिए किया जो दिल्ली में बोली जाती थी।<br/><br/>नवादिर-उल-अलफ़ाज़ मीर अब्दुल वासे हांसवी की “ग़राइब-उल-लुग़ात” का संशोधित संस्करण है। “ग़राइब-उल-लुग़ात” गैर उर्दू भाषियों के लिए एक उर्दू-फ़ारसी शब्दकोश है। आरज़ू ने ख़ामोशी से इसकी गलतियां दुरुस्त करके उसे “नवादिर-उल-अलफ़ाज़” का नाम दिया। दूसरी तरफ़ मिर्ज़ा ग़ालिब ने मीर अब्दुल वासे की एक ग़लती पकड़ कर उसे स्कैंडल बना दिया। मीर मज़कूर ने कहीं लिखा था कि लफ़्ज़ “ना-मुराद” ग़लत है, उसे “बे-मुराद” लिखा जाना चाहिए। ग़ालिब ने इसकी पकड़ किस तरह की देखिए। “वो मियां साहब हांसी वाले, बहुत चौड़े चकले, जनाब अब्दुल वासे फ़रमाते हैं कि “बे-मुराद” सही “ना-मुराद” ग़लत। अरे तेरा सत्यानास जाये। बे-मुराद और ना-मुराद में वो फ़र्क़ है जो ज़मीन-ओ-आसमान में है। ना-मुराद वो शख़्स है जिसकी कोई मुराद, कोई ख्वाहिश, कोई आरज़ू बर न आवे। बे-मुराद वो कि जिसका सफ़हा-ए-ज़मीर नुक़ूश मुद्दआ से सादा हो।” (पत्र बनाम साहिब-ए-आलम मारहरवी)। हरगोपाल तफ़्ता और ग़ुलाम ग़ौस बेख़बर के नाम पत्रों में भी उन्होंने उस ग़लती को उछाला। इस संदर्भ का उद्देश्य एक विद्वान और एक शायर के दृष्टिकोण के बीच अंतर दिखाना है।</p><p>सिराज उद्दीन अली ख़ां आरज़ू सन्1786 में ग्वालियार में पैदा हुए। उनका बचपन ग्वालियार में गुज़रा। जवानी में वो आगरा चले गए जहाँ उनको बाइज़्ज़त जगह मिली। कुछ अरसा आगरा में रहने के बाद वो दिल्ली स्थानांतरित हो गए जहाँ उन्होंने ज़िंदगी का अधिकतर हिस्सा गुज़ारा। उन्होंने बारह बादशाहों के पतन को देखा। दिल्ली में उन्हें बौद्धिक और सांसारिक तरक़्क़ी मिली। वो मुहम्मद शाह के दरबार के अहम मंसबदार थे। उम्र के आख़िरी हिस्से में वो फ़ैज़ाबाद चले गए और वहीं उनका देहांत हुआ। बाद में उनके आसार दिल्ली ला कर दफ़न किए गए। आरज़ू की ज़िंदगी का बेशतर हिस्सा लेखन व रचना और पठन-पाठन में गुज़रा। आरज़ू का अध्यापन उस ज़माने में मशहूर था। कोई छात्र अपने आपको ज्ञान और साहित्य का दक्ष नहीं समझता था जब तक वो आरज़ू के शागिर्दों की टोली में शामिल न हो। उनके दोस्तों में बिंद्राबन खुशगो, टेक चंद बहार और आनंद राम मुख्लिस के नाम खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। आरज़ू ने छः दीवान संपादित किए, इसके अलावा व्याख्या “गुलिस्तान-ए-खियाबाँ” के नाम से, फ़ारसी शायरों का तज़्किरा “मजमा-उल-नफ़ाइस” के नाम से और “नवादिर-उल-लुगात” उर्दू-फ़ारसी शब्दकोश संकलित किया। उनकी दूसरी रचनाओं में “सिराज-उल-लुग़ात” (फ़ारसी शब्दकोश), “चराग़-ए-हिदायत”(फ़ारसी अलफ़ाज़-ओ-मुहावरे)अतिया -ए-किबरी, मेयार-उल-अफ़कार(व्याकरण), पयाम-ए-शौक़(पत्रों का संकलन), जोश-ओ-ख़रोश (मसनवी) मेहर-ओ-माह, इबरत फ़साना और गुलकारी-ए-ख़्याल(होली पर लम्बी कविता)  शामिल हैं।<br/><br/>उर्दू के संदर्भ से आरज़ू की उपलब्धि यह है कि उन्होंने अपने ज़माने के दूसरे शायरों को संरक्षण दिया और उर्दू शायरी की कला का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी हैसियत एक वास्तुकार  की है। फ़ारसी भाषा के दबदबे के सामने उर्दू शायरी का चराग़ रौशन करना आरज़ू का बड़ा कारनामा है। उन्हें उर्दू भाषा के स्वाभाविक गुणों का अंदाज़ा और भविष्य में उसके व्यापक संभावनाओं की अपेक्षा थी। उनकी दूरदर्शिता सही साबित हुई और वो भाषा जिसका बीजारोपण उन्होंने दिल्ली में किया था, एक फलदार वृक्ष में तब्दील होगई।<br/></p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'आरज़ू'   मूल नाम :  सिराजुद्दीन अली ख़ान   जन्म : ग्वालियर, मध्य प्रदेश   निधन :  27 Jan 1756     उर्दू शायरी में उस्तादों के उस्ताद “ख़ान आरज़ू को उर्दू पर वही दावा पहुंचता है जो कि  अरस्तू को दर्शनशास्त्र और तर्कशास्त्र पर है। जब तक कि कुल तर्कशास्त्री अरस्तू के परिवार के कहलाएंगे तब तक उर्दू वाले  ख़ान आरज़ू के प रिवार कहलाते रहेंगे।”  मुहम्मद हुसैन आज़ाद सिराज उद्दीन अली ख़ान आरज़ू उर्दू और फ़ारसी भाषाओं के विद्वान, शायर, भाषा शास्त्री, आलोचक, कोशकार और तज़्किरा लेखक थे। मसनवी सह्र-उल-बयान के लेखक मीर हसन ने अपने तज़्किरे में कहा है कि “अमीर ख़ुसरो के बाद आरज़ू जैसा साहब-ए-कमाल शख़्स हिंदुस्तान में नहीं पैदा हुआ।” और मुहम्मद हुसैन आज़ाद समस्त उर्दू वालों को ख़ान आरज़ू के परिवार में शुमार करते हैं। आज़ाद की श्रद्धा शक्ति को एक तरफ़ रख दें तब भी ये हक़ीक़त है कि ख़ान आरज़ू वही शख़्स हैं जिनकी संगति और प्रशिक्षण से मज़हर जान जानां, मीर तक़ी मीर, मुहम्मद रफ़ी सौदा और मीर दर्द जैसे शायरों को मार्गदर्शन मिला। आरज़ू के ज़माने तक फ़ारसी के मुक़ाबले में उर्दू शायरी को कमतर और तुच्छ जाना जाता था। आज़ाद उर्दू के लिए ख़ान आरज़ू की सेवाओं का उल्लेख करते हुए लिखते हैं, “उनके बारे में इतना लिखना काफ़ी है कि ख़ान आरज़ू वही शख़्स हैं जिनके कुशल प्रशिक्षण से ऐसे शाइस्ता फ़र्ज़ंद परवरिश पा कर उठे जिन्हें उर्दू भाषा का सुधारक कहा जासकता है। सौदा ख़ान आरज़ू के शागिर्द नहीं थे मगर उनकी संगति से बहुत फ़ायदे हासिल किए, पहले फ़ारसी में शे’र कहा करते थे, ख़ान आरज़ू ने कहा, “मिर्ज़ा फ़ारसी अब तुम्हारी ज़बान मादरी(मातृ भाषा) नहीं। इसमें ऐसे नहीं हो सकते कि तुम्हारा कलाम भाषाविदों के मुक़ाबिल में काबिल-ए-तारीफ़ हो। स्वभाव उपयुक्त है, शे’र के लिए भी उपयुक्त है, तुम उर्दू में कहा करो तो ज़माने में अद्वितीय होगे।” ख़ान आरज़ू मीर तक़ी मीर के सौतेले मामूं थे और पिता के निधन के बाद कुछ दिन आरज़ू के पास गुज़ारे थे। मीर के कलाम में आरज़ू की “चराग-ए-हिदायत” के निशान जगह जगह मिलते हैं। ख़ान आरज़ू मूलतः फ़ारसी के विद्वान और शायर थे। उन्होंने उर्दू में कोई दीवान नहीं छोड़ा। उनके अशआर तज़्किरों में मिलते हैं जिनकी तादाद ज़्यादा नहीं लेकिन जो भी कलाम उपलब्ध है वो उर्दू शायरी के विकास क्रम को समझने के संदर्भ में  एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। उर्दू में उनके अशआर की तादाद पंद्रह-बीस सही लेकिन उन्होंने अपने साथियों और शागिर्दों को उर्दू की तरफ़ आकर्षित कर के उर्दू की प्रतिष्ठा बढ़ाई और उर्दू पर से अविश्वास के दाग़ को हमेशा के लिए धो डाला। आरज़ू का एक बड़ा कारनामा ये है कि उन्होंने हिंदुस्तानी ज़बान की भाषाई शोध की बुनियाद रखी और जर्मन प्राच्याविदों से बहुत पहले बताया कि संस्कृत और फ़ारसी जुड़वां भाषाएं हैं। वो आज के संदर्भ में पक्के राष्ट्रवादी थे। उनका कहना था कि जब ईरान के फ़ारसी जानने वाले अरबी और दूसरी भाषाओं के शब्दों को फ़ारसी में दाख़िल कर सकते हैं तो हिंदुस्तान के फ़ारसी जानने वाले हिन्दी शब्दों को इसमें क्यों नहीं शामिल कर सकते। इस सिलसिले में अली हज़ीं के साथ उनका विवाद बहुत मशहूर है। अली हज़ीं एक ईरानी शायर थे जो दिल्ली में बस गए थे। वो बहुत हि घमंडी थे और हिंदुस्तानी शायरों का उपहास करते थे। एक बार उन्होंने हिंदुस्तानियों के महबूब फ़ारसी शायर बेदिल का परिहास उड़ाते हुए कहा कि अगर बेदिल के शे’र इस्फ़हान में पढ़े जाएं तो कोई न समझेगा। इससे हिंदुस्तानी शायरों को दुख पहुँचा लेकिन ख़ामोश रह गए, लेकिन आरज़ू ने बेदिल का डट कर बचाव किया और हज़ीं के 400 अशआर की बख़ीया उधेड़ कर रख दी, हज़ीं को दिल्ली से भागना पड़ा। इससे आरज़ू की विद्वता और साहित्यिक कौशल का अंदाज़ा होता है। उन्होंने एक पारंपरिक शायर होने के बावजूद परंपरा तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और अद्भुत आलोचनात्मक प्रतिभा का सबूत दिया। आरज़ू पहले शख़्स थे जिन्होंने दिल्ली में बोली जाने वाली खड़ी बोली को उर्दू का नाम दिया। उनके ज़माने तक उर्दू का मतलब लश्कर था। शाहजहाँ आबाद को भी लश्कर कहा जाता था। उर्दू भाषा से तात्पर्य फ़ारसी भी लिया जाता था। ख़ान आरज़ू ने पहली बार उर्दू शब्द का इस्तेमाल उन विलक्षण शब्दों के लिए किया जो दिल्ली में बोली जाती थी। नवादिर-उल-अलफ़ाज़ मीर अब्दुल वासे हांसवी की “ग़राइब-उल-लुग़ात” का संशोधित संस्करण है। “ग़राइब-उल-लुग़ात” गैर उर्दू भाषियों के लिए एक उर्दू-फ़ारसी शब्दकोश है। आरज़ू ने ख़ामोशी से इसकी गलतियां दुरुस्त करके उसे “नवादिर-उल-अलफ़ाज़” का नाम दिया। दूसरी तरफ़ मिर्ज़ा ग़ालिब ने मीर अब्दुल वासे की एक ग़लती पकड़ कर उसे स्कैंडल बना दिया। मीर मज़कूर ने कहीं लिखा था कि लफ़्ज़ “ना-मुराद” ग़लत है, उसे “बे-मुराद” लिखा जाना चाहिए। ग़ालिब ने इसकी पकड़ किस तरह की देखिए। “वो मियां साहब हांसी वाले, बहुत चौड़े चकले, जनाब अब्दुल वासे फ़रमाते हैं कि “बे-मुराद” सही “ना-मुराद” ग़लत। अरे तेरा सत्यानास जाये। बे-मुराद और ना-मुराद में वो फ़र्क़ है जो ज़मीन-ओ-आसमान में है। ना-मुराद वो शख़्स है जिसकी कोई मुराद, कोई ख्वाहिश, कोई आरज़ू बर न आवे। बे-मुराद वो कि जिसका सफ़हा-ए-ज़मीर नुक़ूश मुद्दआ से सादा हो।” (पत्र बनाम साहिब-ए-आलम मारहरवी)। हरगोपाल तफ़्ता और ग़ुलाम ग़ौस बेख़बर के नाम पत्रों में भी उन्होंने उस ग़लती को उछाला। इस संदर्भ का उद्देश्य एक विद्वान और एक शायर के दृष्टिकोण के बीच अंतर दिखाना है। सिराज उद्दीन अली ख़ां आरज़ू सन्1786 में ग्वालियार में पैदा हुए। उनका बचपन ग्वालियार में गुज़रा। जवानी में वो आगरा चले गए जहाँ उनको बाइज़्ज़त जगह मिली। कुछ अरसा आगरा में रहने के बाद वो दिल्ली स्थानांतरित हो गए जहाँ उन्होंने ज़िंदगी का अधिकतर हिस्सा गुज़ारा। उन्होंने बारह बादशाहों के पतन को देखा। दिल्ली में उन्हें बौद्धिक और सांसारिक तरक़्क़ी मिली। वो मुहम्मद शाह के दरबार के अहम मंसबदार थे। उम्र के आख़िरी हिस्से में वो फ़ैज़ाबाद चले गए और वहीं उनका देहांत हुआ। बाद में उनके आसार दिल्ली ला कर दफ़न किए गए। आरज़ू की ज़िंदगी का बेशतर हिस्सा लेखन व रचना और पठन-पाठन में गुज़रा। आरज़ू का अध्यापन उस ज़माने में मशहूर था। कोई छात्र अपने आपको ज्ञान और साहित्य का दक्ष नहीं समझता था जब तक वो आरज़ू के शागिर्दों की टोली में शामिल न हो। उनके दोस्तों में बिंद्राबन खुशगो, टेक चंद बहार और आनंद राम मुख्लिस के नाम खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। आरज़ू ने छः दीवान संपादित किए, इसके अलावा व्याख्या “गुलिस्तान-ए-खियाबाँ” के नाम से, फ़ारसी शायरों का तज़्किरा “मजमा-उल-नफ़ाइस” के नाम से और “नवादिर-उल-लुगात” उर्दू-फ़ारसी शब्दकोश संकलित किया। उनकी दूसरी रचनाओं में “सिराज-उल-लुग़ात” (फ़ारसी शब्दकोश), “चराग़-ए-हिदायत”(फ़ारसी अलफ़ाज़-ओ-मुहावरे)अतिया -ए-किबरी, मेयार-उल-अफ़कार(व्याकरण), पयाम-ए-शौक़(पत्रों का संकलन), जोश-ओ-ख़रोश (मसनवी) मेहर-ओ-माह, इबरत फ़साना और गुलकारी-ए-ख़्याल(होली पर लम्बी कविता)  शामिल हैं। उर्दू के संदर्भ से आरज़ू की उपलब्धि यह है कि उन्होंने अपने ज़माने के दूसरे शायरों को संरक्षण दिया और उर्दू शायरी की कला का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी हैसियत एक वास्तुकार  की है। फ़ारसी भाषा के दबदबे के सामने उर्दू शायरी का चराग़ रौशन करना आरज़ू का बड़ा कारनामा है। उन्हें उर्दू भाषा के स्वाभाविक गुणों का अंदाज़ा और भविष्य में उसके व्यापक संभावनाओं की अपेक्षा थी। उनकी दूरदर्शिता सही साबित हुई और वो भाषा जिसका बीजारोपण उन्होंने दिल्ली में किया था, एक फलदार वृक्ष में तब्दील होगई।  ",
            "slug": "khana-arazu-sirajuddina-ali",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": "1756-01-27",
            "location": "दिल्ली, भारत",
            "url": "/sootradhar/khana-arazu-sirajuddina-ali",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:44.110962",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24518,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "ख़ंजर अजमेरी",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'शैख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> shaiKH mohammad abdullaah</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>अजमेर, राजस्थान</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'शैख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह'   मूल नाम :  shaiKH mohammad abdullaah   जन्म : अजमेर, राजस्थान      ",
            "slug": "khanjara-ajameri",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": null,
            "location": "अजमेर, भारत",
            "url": "/sootradhar/khanjara-ajameri",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:46.537123",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24519,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'ज़ीर'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 11 Aug 1854</bdi> | लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\"></span>वज़ीर, ख़्वाजा मोहम्मद वज़ीर(1795-1854)लखनवी उर्दू शाइ’री के नुमायाँ हस्ताक्षर। सूफ़ी घराने से संबंध। ‘नासिख़’ की शार्गिदी के कारण लखनवी शाइ’री के ख़ास रंग के नुमाइंदे।<p><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\"> </span></p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'ज़ीर'   मूल नाम :  ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर   जन्म : लखनऊ, उत्तर प्रदेश   निधन :  11 Aug 1854  | लखनऊ, उत्तर प्रदेश         वज़ीर, ख़्वाजा मोहम्मद वज़ीर(1795-1854)लखनवी उर्दू शाइ’री के नुमायाँ हस्ताक्षर। सूफ़ी घराने से संबंध। ‘नासिख़’ की शार्गिदी के कारण लखनवी शाइ’री के ख़ास रंग के नुमाइंदे।    ",
            "slug": "khvaza-mohammada-vazira",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": "1854-08-11",
            "location": "लखनऊ, भारत",
            "url": "/sootradhar/khvaza-mohammada-vazira",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:49.036031",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24520,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "मातम फ़ज़ल मोहम्मद",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'मातम'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> फ़ज़ल-ए-मोहम्मद तय्यब हैदराबादी</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>हैदराबाद, सिंध</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> हैदराबाद, सिंध</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'मातम'   मूल नाम :  फ़ज़ल-ए-मोहम्मद तय्यब हैदराबादी   जन्म : हैदराबाद, सिंध   निधन :  हैदराबाद, सिंध      ",
            "slug": "matama-fazala-mohammada",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": null,
            "location": "हैदराबाद, पाकिस्तान",
            "url": "/sootradhar/matama-fazala-mohammada",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:51.808458",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24521,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "महाराजा सर किशन परसाद शाद",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'शाद'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> किशन परशाद</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 28 Jan 1864</bdi> | हैदराबाद, तिलंगाना</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 09 May 1940</bdi> | हैदराबाद, तिलंगाना</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>शाद, राजा किशन प्रसाद (1864-1940) उर्दू और फ़ारसी के शाइ’र चंदू लाल शादाँ के घराने से थे जिन्हें निज़ाम हैदराबाद के दरबार में बहुत बुलंद मक़ाम हासिल था। राजा किशन प्रसाद को 1901 में निज़ाम हैदाराबाद ने अपना प्रधान मंत्री बनाया और ‘यमीनुस्सल्तनत’ का ख़िताब दिया। उर्दू और फ़ारसी दोनों ज़बानों में शे’र कहते थे, और शाइ’रों, फ़नकारों के बहुत बड़े सरपरस्त थे।<br/></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'शाद'   मूल नाम :  किशन परशाद   जन्म :  28 Jan 1864  | हैदराबाद, तिलंगाना   निधन :  09 May 1940  | हैदराबाद, तिलंगाना     शाद, राजा किशन प्रसाद (1864-1940) उर्दू और फ़ारसी के शाइ’र चंदू लाल शादाँ के घराने से थे जिन्हें निज़ाम हैदराबाद के दरबार में बहुत बुलंद मक़ाम हासिल था। राजा किशन प्रसाद को 1901 में निज़ाम हैदाराबाद ने अपना प्रधान मंत्री बनाया और ‘यमीनुस्सल्तनत’ का ख़िताब दिया। उर्दू और फ़ारसी दोनों ज़बानों में शे’र कहते थे, और शाइ’रों, फ़नकारों के बहुत बड़े सरपरस्त थे।  ",
            "slug": "maharaja-sara-kisana-parasada-sada",
            "DOB": "1864-01-28",
            "DateOfDemise": "1940-05-09",
            "location": "हैदराबाद, भारत",
            "url": "/sootradhar/maharaja-sara-kisana-parasada-sada",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:54.422654",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        },
        {
            "id": 24522,
            "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_author/kavishala_logo.png",
            "name": "महमूद रामपुरी",
            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'महमूद'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> महमूद अली खान</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>रामपुर, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> रामपुर, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> दाग़ देहलवी (गुरु)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'महमूद'   मूल नाम :  महमूद अली खान   जन्म : रामपुर, उत्तर प्रदेश   निधन :  रामपुर, उत्तर प्रदेश      संबंधी :    दाग़ देहलवी (गुरु)        ",
            "slug": "mahamuda-ramapuri",
            "DOB": null,
            "DateOfDemise": null,
            "location": "रामपुर, भारत",
            "url": "/sootradhar/mahamuda-ramapuri",
            "tags": null,
            "created": "2023-10-27T17:01:57.082069",
            "is_has_special_post": false,
            "is_special_author": false,
            "language": 21
        }
    ],
    "description": "<p style=\"text-align: center; font-size: 24px;\"> The Great Poets and Writers in Indian and World History! </p>",
    "image": "https://kavishalalab.s3.ap-south-1.amazonaws.com/sootradhar_description/black.jpg"
}