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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'फ़ुग़ाँ'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>दिल्ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> पटना, बिहार</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><div style=\"text-align:left;\">मीर तक़ी मीर और मुहम्मद रफ़ी सौदा अपने ज़माने में शायरी के सुपर पावर थे। उन लोगों ने ईहाम गोई की सलतनत के पतन के बाद भाषा और अभिव्यक्ति के नए क्षेत्रोँ में विजय प्राप्त की थी। इन क़दआवर शख़्सियतों का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था लेकिन कुछ दूसरे शायर अपने काव्य अभिव्यक्ति के लिए नई वादीयों की तलाश में थे। उनमें इनाम उल्लाह ख़ां यक़ीन और अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ पेश पेश थे। दोनों का कार्य क्षेत्र ताज़ा विषयों की तलाश था। यक़ीन की उम्र ने वफ़ा न की लेकिन वो अपने ज़माने में बहुत लोकप्रिय होने के साथ साथ विवादास्पद भी थे। अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ को ज़माने के हालात ने दिल्ली से, जो उत्तर भारत में साहित्य का केंद्र था, उखाड़ कर बहुत दूर ऐसे मुक़ाम पर डाल दिया जहां वो अपनी अंदरूनी ताक़त के बल पर ज़िंदा तो ज़रूर रहे लेकिन उन लोगों की तरह फल-फूल नहीं सके जिनको शायरी के लिए लखनऊ की साज़गार सरज़मीन मिल गई थी। शायरी में मीर-ओ-सौदा का तूती बोलता रहा और उसके बाद जुरअत, इंशा, मुसहफ़ी और नासिख़ के डंके कुछ इस तरह बजे कि फ़ुग़ां उन जैसे दूसरे शायरों को लोगों ने लगभग भुला ही दिया। उनका दीवान पहली बार 1950 ई. में प्रकाशित हो सका। तब तक ज़माने की रूचि कहाँ से कहाँ पहुंच चुकी थी। श्रोताओं व पाठकों के ज़ेहनों पर फ़ानी, फ़िराक़, जोश, अख़तर शीरानी, मजाज़, फ़ैज़ और जिगर राज कर रहे थे। फ़ुग़ां के दीवान को बुज़ुर्गों के तबर्रुक से ज़्यादा अहमियत नहीं मिली और उनके मुल्यांकन का उचित निर्धारण अभी तक बाक़ी है। फ़ुग़ां उन शायरों में से एक हैं जिनकी अहमियत को सभी तज़किरा लेखकों ने स्वीकार किया है। मीर तक़ी मीर ने भी, जो बमुश्किल किसी को ख़ातिर में लाते थे, फ़ुग़ां का उल्लेख अच्छे शब्दों में किया है। सौदा तो उनकी शायरी के बड़े प्रशंसक थे और बक़ौल आज़ाद उनके शे’र मज़े ले-ले कर पढ़ते थे। उन्होंने उनके एक शे’र; <br/>शिकवा तू क्यों करे है मिरे अश्क-ए-सुर्ख़ का<br/>तेरी कब आस्तीं मिरे लहू से भर गई<br/><br/>को आधार बना कर ऐसा लाजवाब क़तअ लिखा कि मीर साहब भी वाह वाह कह उठे। शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ ने फ़ुग़ाँ के दीवान को अपने हाथ से नक़ल किया था। मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने जब उस दीवान को पढ़ा तो उनकी आँखें रोशन हो गईं और आब-ए-हयात में लिखा कि “फ़ुग़ाँ शाइरी के फ़न के एतबार से बहुतही सिद्धांतवादी और अविचारित थे और शब्दों की बंदिश उनकी शायरी के अभ्यास पर गवाही देती है... उनकी तबीयत एशियाई शायरी के लिए बहुत उपयुक्त थी।” और अब्दुस्सलाम नदवी ने तो उन्हें मीर व सौदा के बराबर क़रार दे दिया।<br/><br/>फ़ुग़ां के ज़िंदगी के हालात के बारे में हमारी जानकारी सीमित है। उनकी सही जन्म तिथि भी नहीं मालूम हो सकी है लेकिन इस बुनियाद पर कि वो अहमद बादशाह के दूध शरीक भाई थे, अनुमान से उनकी पैदाइश 1728 ई. दर्ज की गई है। उनके वालिद का नाम मिर्ज़ा अली ख़ां नुक्ता था जिससे अंदाज़ा होता है कि वो भी शायर थे। बादशाह के दूध शरीक भाई होने के सिवा शाही ख़ानदान से उनके रिश्ते की नौईयत मालूम नहीं। लेकिन उनकी गिनती अमीरों में थी और उनको पांच हज़ारी मन्सब के इलावा बादशाह की तरफ़ से ज़रीफ़-उल-मुल्क कोका ख़ां का ख़िताब भी मिला हुआ था। फ़ुग़ाँ के हास्य-व्यंग्य और लतीफ़ेबाज़ी का ज़िक्र सारे तज़किरा लिखनेवालों ने किया है। शायद स्वभाव के इसी संयोग ने उनसे निंदाएं भी लिखवाईं। ख़ुद कहते थे, मैं दिल्ली से अज़ीमाबाद तक हास्य-व्यंग्य और लतीफ़ेबाज़ी में किसी से नहीं हारा सिवाए एक गाने वाली औरत से। एक दिन एक मजलिस में बहुत से शिष्ट थे और मैं अच्छी शायरी व शिष्ट लतीफ़ों से हाज़िरीन-ए-मजलिस को ख़ुश कर रहा था और गाने वालियों को जो इस मजलिस में हाज़िर थीं और हाज़िर जवाबी पर आमादा थीं, हर बात पर शर्मिंदा कर रहा था कि अचानक इस गिरोह की एक औरत वहां आई। जब फ़र्श के किनारे तक आई तो चाहती थी कि पैरों से जूतीयां उतार कर फ़र्श पर आए लेकिन संयोग से एक जूती उसके दामन से उलझ कर फ़र्श पर आ पड़ी। मैंने मज़ाक़ के तौर पर उपस्थित लोगों को संबोधित करके कहा, \"दोस्तो, देखो बीबी साहिबा जब किसी मजलिस में जाती हैं तो अपने जोड़े को जुदा नहीं करतीं, साथ लाती हैं।” वो शर्मिंदा तो हुई लेकिन हाथ जोड़ कहा, “बजा है, कनीज़ का यही हाल है लेकिन आप जब मजलिस में रौनक़ अफ़रोज़ होते हैं तो आप अपने जोड़े को ख़िदमतगारों और ख़वासों के हवाले करके आते हैं। इंसाफ़ कीजिए कि हक़ बजानिब कौन है?” ये जवाब सुनकर मैं बहुत ख़जल और शर्मसार हुआ और मुझसे कोई जवाब न बन पड़ा।” मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने एक और लतीफ़ा लिखा है कि फ़ुग़ां ने अज़ीमाबाद में एक ग़ज़ल कही जिसका क़ाफ़िया लालियाँ, जालियाँ था लेकिन उस ग़ज़ल में तालियाँ का क़ाफ़िया अशिष्ट समझ कर छोड़ दिया था। दरबार में एक मस्ख़रा जुगनू नाम का था। उसने कहा कि नवाब साहिब तालियाँ का क़ाफ़िया रह गया। फ़ुग़ां उसकी बात को टाल गए लेकिन राजा शताब राय ने कहा, “नवाब साहब सुनिए, मियां जुगनू क्या कहते हैं, तब फ़ुग़ां ने फ़िलबदीह कहा;<br/>जुगनू मियां की दुम जो चमकती है रात को<br/>सब देख देख उसको बजाते हैं तालियाँ<br/><br/>अहमद शाह बादशाह के हुकूमत के दौर में फ़ुग़ां दिल्ली में इज़्ज़त-ओ-आराम की ज़िंदगी गुज़ारते रहे लेकिन जब इमादा-उल-मुल्क ने बादशाह को तख़्त से उतार कर उनकी आँखों में सलाईयाँ फेरवा दें तो फ़ुग़ां के लिए ये दोहरा सदमा था। उनको बादशाह से दिली मुहब्बत थी। बादशाह की अपदस्थता के साथ उनके मुसाहिब भी लाभ से वंचित हो गए। उधर सगे भाई ने समस्त पैतृक संपत्तियों पर क़ब्ज़ा कर लिया। कुछ अर्सा हालात का मुक़ाबला करने के बाद फ़ुग़ां अपने चचा ऐरज ख़ान के पास चले गए जो मुर्शिदाबाद में एक उच्च पद पर आसीन थे। सफ़र में वो इलाहाबाद से गुज़रे जो उनको बिल्कुल पसंद नहीं आया और उसकी निंदा लिखी; <br/>ये वो शहर जिसको कहें हैं पराग <br/>मिरा बस चले आज दूं इसको आग<br/><br/>जहां तक तिरी है वहां सेल है<br/>नज़र आई ख़ुशकी तो खपरैल है<br/><br/>लिखूँ ख़ाक नक़्शा मैं इस शहर का<br/>कि ये तो है बैत-उल-ख़ला दह्र का <br/><br/>फ़ुग़ां का दिल मुर्शिदाबाद में भी नहीं लगा और वो दिल्ली वापस आ गए। लेकिन वहां के हालात दिन प्रति दिन ख़राब से ख़राब तर होते जा रहे थे। इस बार उन्होंने अवध का रुख़ किया। नवाब शुजा उद्दौला ने उनकी आव भगत की। नवाब ने एक दिन मज़ाक़ ही मज़ाक़ में एक तप्ता हुआ पैसा उनके हाथ पर रख दिया जिससे उनको सख़्त तकलीफ़ हुई। इसके बाद उनका दिल नवाब की तरफ़ से फीका पड़ गया और वो अज़ीमाबाद चले गए जहां राजा शताब राय ने उनको हाथों-हाथ लिया और अपना मुसाहिब बना कर एक जागीर उनको दे दी। फ़ुग़ाँ ने बाक़ी ज़िंदगी आराम के साथ अज़ीमाबाद में गुज़ारी। फ़ुग़ाँ नाज़ुक-मिज़ाज भी बहुत थे। एक बयान ये भी है कि ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में वो राजा साहब मज़कूर से भी ख़फ़ा हो गए थे और अंग्रेज़ अफ़सरों की इनायात हासिल कर ली थीं। राजा ने एक दिन व्यंग्य से या फिर अपनी सादगी में उनसे पूछ लिया था, “नवाब साहब! नादिर शाह मलिका ज़मानी को क्योंकर साथ ले गया?” फ़ुग़ां को ये बात बहुत नागवार गुज़री और उन्होंने जल कर कहा, “महाराज, उसी तरह जिस तरह रावण सीता को उठा ले गया था।” और उसके बाद दरबार में जाना छोड़ दिया। फ़ुग़ाँ ने ज़िंदगी का बाक़ी हिस्सा अज़ीमाबाद में ही गुज़ारा और 1773 ई. में वहीं उनका स्वर्गवास हुआ। उनकी क़ब्र शेर शाही मस्जिद के क़रीब बावन बुर्ज के इमाम बाड़े के अहाते में है।<br/><br/>शायरी फ़ुग़ाँ के लिए पेशा नहीं थी लेकिन शुरू उम्र से ही शायरी का शौक़ था और तबीयत ऐसी उपयुक्त पाई थी कि जल्द ही मशहूर हो गए। उनकी शायरी गुदाज़ का आईना और मश्शाक़ी का सबूत है। ज़बान इतनी साफ़ है कि अगर उनके शे’र को वर्तमान समय के किसी शायर का कलाम कह कर सुना दिया जाये तो वो शक नहीं करेगा, जैसे; <br/><br/>बिठा गया है कहाँ यार बेवफा मुझको <br/>कोई उठा न सका मिस्ल-ए-नक़श-ए-पा मुझको<br/> या<br/>शब-ए-फ़िराक़ में अक्सर मैं आईना लेकर<br/>ये देखता हूँ कि आँखों में ख़्वाब आता है <br/> और<br/>तू भी हैरत में रहा देख के आईने को<br/>जो तुझे देख के हैराँ न हुआ था सो हुआ<br/> या फिर<br/>दस्त-बरदार नहीं ख़ून-ए-शहीदाँ से हनूज़<br/>कब हुए सुर्ख़ हिना से मिरे दिलदार के हाथ <br/> और<br/>आलम को जलाती है तिरी गर्मी-ए-मजलिस<br/>मरते हम अगर साया-ए-दीवार न होता<br/><br/>इन सभी अशआर में ज़बान की सफ़ाई के साथ विषय का नयापन उल्लेखनीय है। मीर तक़ी मीर का ये लाजवाब शे’र;<br/>शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में<br/>ऐब भी करने को हुनर चाहिए<br/><br/>सभी ने सुन रखा है, उसी ज़मीन में फ़ुग़ाँ का शे’र भी सुन लीजिए; <br/>पास रहा क्या जिसे बर्बाद दूं<br/>ख़ाना-ख़राबी को भी घर चाहिए<br/><br/>(दूसरा मिसरा ज़रा ध्यान से पढ़िए। ख़ाना-ख़राबी को भी अपने लिए इक घर की ज़रूरत है)। क़तअ बंद अशआर पुरानों के कलाम की एक विशेषता रही है। लेकिन फ़ुग़ाँ ने उसे दूसरों के मुक़ाबले में ज़्यादा बरता है। सोच का नयापन, नए विषयों की तलाश और ज़बान की सफ़ाई फ़ुग़ाँ की वो विशेषताएं हैं जो उन्हें उनके समकालीनों से अलग करती हैं।<br/></div> </p>\r\n</div>",
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शिकवा तू क्यों करे है मिरे अश्क-ए-सुर्ख़ का तेरी कब आस्तीं मिरे लहू से भर गई को आधार बना कर ऐसा लाजवाब क़तअ लिखा कि मीर साहब भी वाह वाह कह उठे। शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ ने फ़ुग़ाँ के दीवान को अपने हाथ से नक़ल किया था। मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने जब उस दीवान को पढ़ा तो उनकी आँखें रोशन हो गईं और आब-ए-हयात में लिखा कि “फ़ुग़ाँ शाइरी के फ़न के एतबार से बहुतही सिद्धांतवादी और अविचारित थे और शब्दों की बंदिश उनकी शायरी के अभ्यास पर गवाही देती है... उनकी तबीयत एशियाई शायरी के लिए बहुत उपयुक्त थी।” और अब्दुस्सलाम नदवी ने तो उन्हें मीर व सौदा के बराबर क़रार दे दिया। फ़ुग़ां के ज़िंदगी के हालात के बारे में हमारी जानकारी सीमित है। उनकी सही जन्म तिथि भी नहीं मालूम हो सकी है लेकिन इस बुनियाद पर कि वो अहमद बादशाह के दूध शरीक भाई थे, अनुमान से उनकी पैदाइश 1728 ई. दर्ज की गई है। उनके वालिद का नाम मिर्ज़ा अली ख़ां नुक्ता था जिससे अंदाज़ा होता है कि वो भी शायर थे। बादशाह के दूध शरीक भाई होने के सिवा शाही ख़ानदान से उनके रिश्ते की नौईयत मालूम नहीं। लेकिन उनकी गिनती अमीरों में थी और उनको पांच हज़ारी मन्सब के इलावा बादशाह की तरफ़ से ज़रीफ़-उल-मुल्क कोका ख़ां का ख़िताब भी मिला हुआ था। फ़ुग़ाँ के हास्य-व्यंग्य और लतीफ़ेबाज़ी का ज़िक्र सारे तज़किरा लिखनेवालों ने किया है। शायद स्वभाव के इसी संयोग ने उनसे निंदाएं भी लिखवाईं। ख़ुद कहते थे, मैं दिल्ली से अज़ीमाबाद तक हास्य-व्यंग्य और लतीफ़ेबाज़ी में किसी से नहीं हारा सिवाए एक गाने वाली औरत से। एक दिन एक मजलिस में बहुत से शिष्ट थे और मैं अच्छी शायरी व शिष्ट लतीफ़ों से हाज़िरीन-ए-मजलिस को ख़ुश कर रहा था और गाने वालियों को जो इस मजलिस में हाज़िर थीं और हाज़िर जवाबी पर आमादा थीं, हर बात पर शर्मिंदा कर रहा था कि अचानक इस गिरोह की एक औरत वहां आई। जब फ़र्श के किनारे तक आई तो चाहती थी कि पैरों से जूतीयां उतार कर फ़र्श पर आए लेकिन संयोग से एक जूती उसके दामन से उलझ कर फ़र्श पर आ पड़ी। मैंने मज़ाक़ के तौर पर उपस्थित लोगों को संबोधित करके कहा, \"दोस्तो, देखो बीबी साहिबा जब किसी मजलिस में जाती हैं तो अपने जोड़े को जुदा नहीं करतीं, साथ लाती हैं।” वो शर्मिंदा तो हुई लेकिन हाथ जोड़ कहा, “बजा है, कनीज़ का यही हाल है लेकिन आप जब मजलिस में रौनक़ अफ़रोज़ होते हैं तो आप अपने जोड़े को ख़िदमतगारों और ख़वासों के हवाले करके आते हैं। इंसाफ़ कीजिए कि हक़ बजानिब कौन है?” ये जवाब सुनकर मैं बहुत ख़जल और शर्मसार हुआ और मुझसे कोई जवाब न बन पड़ा।” मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने एक और लतीफ़ा लिखा है कि फ़ुग़ां ने अज़ीमाबाद में एक ग़ज़ल कही जिसका क़ाफ़िया लालियाँ, जालियाँ था लेकिन उस ग़ज़ल में तालियाँ का क़ाफ़िया अशिष्ट समझ कर छोड़ दिया था। दरबार में एक मस्ख़रा जुगनू नाम का था। उसने कहा कि नवाब साहिब तालियाँ का क़ाफ़िया रह गया। फ़ुग़ां उसकी बात को टाल गए लेकिन राजा शताब राय ने कहा, “नवाब साहब सुनिए, मियां जुगनू क्या कहते हैं, तब फ़ुग़ां ने फ़िलबदीह कहा; 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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'आसिफ़'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 21 Sep 1797</bdi> | लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> मीर सोज़ (गुरु)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>अवध के चौथे नवाब आसिफ़ उद्दौला लखनवी सभ्यता व संस्कृति और उर्दू शायरी के उस शैली के संस्थापक थे जिसे बाद में दबिस्तान-ए-लखनऊ के नाम से जाना गया। अवध के पहले तीन नवाब बुरहान-उल-मलिक, सफदरजंग और शुजा उद्दौला अपनी ज़िंदगी में जंगी मुहिमों और सलतनत के स्थायित्व में व्यस्त और दिल्ली हुकूमत के अधीन थे। उनके ज़माने में अवध की राजधानी फ़ैज़ाबाद था और लखनऊ एक मामूली क़स्बा से ज़्यादा कुछ नहीं था। सन् 1775 में शुजा उद्दौला की मौत के बाद आसिफ़ उद्दौला तख़्त नशीन हुए तो उन्होंने अवध को दिल्ली से अलग सियासी, सांस्कृतिक और सभ्यता की पहचान देने के लिए कई उपाय किए। ये और बात है कि दिल्ली का जुआ पूरी तरह उतार फेंकने और अपनी बादशाहत का ऐलान करने का काम उनके जांनशीनों ने किया। आसिफ़ उद्दौला के ज़माने में दिल्ली सियासी और आर्थिक बदहाली का शिकार थी। उन्होंने वहां से तर्क-ए-सुकूनत करते वाले अहल-ए-कमाल का लखनऊ में स्वागत किया बल्कि सफ़र ख़र्च भेज कर उनको लखनऊ बुलाया। उन्होंने समस्त कला विशेषज्ञों को लखनऊ में एकत्र कर लिया और लखनऊ को ऐसा चुम्बक बना दिया कि जिसकी तरफ़ हिन्दोस्तान के ही नहीं ईरान व इराक़ के भी अहल-ए-कमाल खिंचे चले आए। आसिफ़ उद्दौला लखनऊ को वो बनाना चाहते थे जो शाहजहाँ ने दिल्ली को बनाया था।<br/><br/>आसिफ़ उद्दौला का नाम मोहम्मद यहिया मिर्ज़ा ज़मानी था। वो 1748 ई. में पैदा हुए। उनकी शिक्षा-दीक्षा का इंतज़ाम शहज़ादों की तरह किया गया। और उन्होंने उर्दू-फ़ारसी में अच्छी महारत के साथ अन्य कलाओं में भी दक्षता हासिल कर ली। आसिफ़ उद्दौला साहिब-ए-ज़ौक़ थे और शायरी का शौक़ रखते थे। उन्होंने उर्दू के अलावा एक फ़ारसी दीवान भी संकलित किया। पिता के देहांत के बाद उनके सम्बंध अपनी माँ से तनावपूर्ण हो गए थे। उनके पिता शुजा उद्दौला को बक्सर की जंग के बाद एक बड़ी रक़म अंग्रेज़ों को जंग के तावान के रूप में अदा करनी पड़ी थी। उस वक़्त उनकी माँ ने बड़े त्याग का प्रदर्शन करते हुए अपने तन के ज़ेवरात भी शौहर के हवाले कर दिए थे। उनकी इस क़ुर्बानी से शुजा उद्दौला इतने प्रभावित हुए थे कि बाद में उन्होंने ने अपनी तमाम निजी दौलत बीवी की तहवील में दे दी थी। बाप की मौत के बाद जब आसिफ़ उद्दौला ने अपनी विरासत की मांग की तो माँ ने देने से इनकार कर दिया। आसिफ़ उद्दौला की माँ के स्वभाव में अभिमान और हुक्मरानी थी और आसिफ़ उद्दौला किसी के अधीन रहना पसंद नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने अपनी राजधानी लखनऊ स्थानांतरित कर दिया। लखनऊ आकर उन्होंने सबसे पहले शहर की तामीर पर तवज्जो की और लखनऊ में दिन-रात नई नई इमारतें खड़ी होने लगीं। निर्माण की रफ़्तार उसी ज़माने में फैले अकाल ने और भी तेज़ कर दी और ये तामीराती काम राहत रसानी का भी एक काम बन गया जिसने हज़ारों लोगों को रोज़गार दिया। बहुत से संभ्रांत अकाल की वजह से मेहनत मज़दूरी पर मजबूर हो गए थे। उनकी पर्दादारी के लिए कुछ इमारतें केवल रात के वक़्त तामीर की जाती थीं। उनके ज़माने में कहावत थी \"जिसे न दे मौला, उसको दें आसिफ़ उद्दौला।” उनका उसी ज़माने का शे’र है, “जहां में जहां तक जगह पाइए/ इमारत बनाते चले जाइए।”<br/><br/>जहां तक सलतनत के मामलों का सवाल है सियासी और फ़ौजी सतह पर अंग्रेज़ों ने एक संधि के रूप में उनके हाथ बांध रखे थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी अंग्रेज़ों से दब कर या झुक कर बात नहीं की, उनके साथ उनके सम्बंध दोस्ताना थे। वो एक नवाब की तरह उनको और उनकी बेगमात को तोहफ़ा तहाइफ़ से नवाज़ते थे और सलतनत के मामलों में उनसे ख़ुद बात करने के बजाय अपने वज़ीरों को भेजते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज किसी बाहरी आक्रमण के ख़िलाफ़ उनकी सलतनत की सुरक्षा की ज़िम्मेदार थी। इस तरफ़ से मुतमइन हो कर उन्होंने अपनी सारी तवज्जो सलतनत की अलग पहचान निर्माण पर लगा दी। वो अपनी सलतनत को हर तरह से आदर्श बनाना चाहते थे और उनको किसी भी तरह से किसी के प्रभाव में रहना पसंद नहीं था। महल की साज़िशों से बचने और रिआया से ख़ुशगवार ताल्लुक़ात क़ायम करने के मक़सद से उन्होंने कम रुत्बा लोगों को वज़ारतें और ओहदे दिए। ताकि वो उनके एहसान तले दबे रह कर किसी षड्यंत्र या उग्रवाद में शामिल न हों। उनके अहम वज़ीर शिया थे या हिंदू। इस रणनीति का नतीजा ये था कि अवध में मिली-जुली हिंदू-मुस्लिम तहज़ीब ने जड़ें पकड़ीं जो गंगा जमुनी तहज़ीब कहलाती है। रियासत में हिन्दुओं की भारी बहुमत देखते हुए उन्होंने रिआया का दिल जीतने की हर मुम्किन कोशिश की। उनके ज़माने में बड़े पैमाने पर मंदिरों का निर्माण हुआ। अलीगंज का मशहूर हनुमान मंदिर उनके ही ज़माने में राजा जाट मल ने निर्माण कराया। राजा टिकैत राय उनके वित्त मंत्री थे। राजा ने बहुत से तालाब और मंदिर बनवाए। लखनऊ का मशहूर जगननाथ मंदिर भी आसिफ़ उद्दौला के ज़माने में निर्माण हुआ जिसके लिए नवाब ने ज़मीन दी। उस मंदिर की चोटी पर त्रिशूल की जगह हिलाल(चाँद) नस्ब किया जाना उस ज़माने के हिंदू-मुस्लिम भाई चारे का एक बड़ा प्रतीक है। वो हिंदू संतों और फ़क़ीरों की बड़ी इज़्ज़त-ओ-तकरीम करते थे। बाबा कल्याण गिरी हरिद्वार छोड़कर उनके ज़माने में लखनऊ आ गए थे और वहीं उन्होंने कल्याण गिरी मंदिर का निर्माण किया। आसिफ़ उद्दौला के क़रीबी मुसाहिबीन में भिवानी मेहरा थे जो ज़ात के कहार थे और राजा मेहरा कहलाते थे। वो नवाब के ख़ज़ाना के ग़ैर सरकारी मुहाफ़िज़ थे। जब अंग्रेज़ों ने राजा टिकैत राय को हटाने की मांग की तो नवाब ने उनकी जगह एक दूसरे हिंदू झाऊ मल का इंतिख़ाबचुनाव किया। आसिफ़ उद्दौला के दरबार में सूरत सिंह और थापर सिंह को भी उरूज हासिल हुआ। उनकी पालकी बर्दारों मेकू सिंह, शोभा सिंह, भोला सिंह और मोती सिंह को ख़ास दर्जा हासिल था और वो दरबार में हाज़िर हो सकते थे।<br/><br/>आसिफ़ उद्दौला की बदौलत लखनऊ, दिल्ली और आगरा के साथ पुरातत्व और स्थापत्य के शौक़ीन सैलानियों के लिए पर्यटन स्थल बना। उनके द्वारा निर्मित इमारतें, विशेष रूप से रूमी दरवाज़ा और इमाम बाड़ा स्थापत्य कला का अछूता नमूना हैं जिन्हें देखकर आज भी लोग अश अश करते हैं। आसिफ़ उद्दौला ने अपनी उदारता और दरिया-दिली के साथ फ़ैज़ाबाद, दिल्ली और प्राच्य सभ्यता के दूसरे स्रोतों से आब-ए-ज़ि़ंदगानी की नहरों का रुख लखनऊ की तरफ़ मोड़ा। उन ही के ज़माने में मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा, मीर तक़ी मीर और मीर सोज़ जैसे अहल-ए-कमाल लखनऊ आए। सोज़ को उन्होंने शायरी में अपना उस्ताद बनाया। आसिफ़ उद्दौला ने जिस सांस्कृतिक स्वायत्ता की बुनियाद रखी उस पर नई उर्दू ज़बान की इमारत का निर्माण हुआ। उर्दू शायरी शोक और सहानुभूति के मातमकदा से निकल कर शोख़ी और रंगीनी की तरफ़ माइल हुई जिसने अंततः दबिस्तान-ए-लखनऊ की शक्ल इख़्तियार की। आसिफ़ उद्दौला के ज़माने तक उर्दू शायरी मूल रूप से ग़ज़ल या क़सीदा की शायरी थी। उनके ज़माने में मसनवी और मर्सिया की तरफ़ ख़ास तवज्जो दी गई। मीर हसन की सह्र उल बयान समेत उर्दू की बेहतरीन मसनवियाँ उनके ही ज़माने में लिखी गईं। साथ ही मर्सिया निगारी और मर्सिया-ख़्वानी की ऐसी फ़िज़ा तैयार हुई जिसने मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर जैसे अद्वितीय मर्सिया निगार पैदा किए। आसिफ़ उद्दौला को एक उदार और दरियादिल शासक, कला का क़द्रदान और संरक्षक, अज़ीमुश्शान इमारतों के निर्माता और हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब के अलमबरदार के तौर पर याद किया जाता है।</p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'आसिफ़' जन्म : फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश निधन : 21 Sep 1797 | लखनऊ, उत्तर प्रदेश संबंधी : मीर सोज़ (गुरु) अवध के चौथे नवाब आसिफ़ उद्दौला लखनवी सभ्यता व संस्कृति और उर्दू शायरी के उस शैली के संस्थापक थे जिसे बाद में दबिस्तान-ए-लखनऊ के नाम से जाना गया। अवध के पहले तीन नवाब बुरहान-उल-मलिक, सफदरजंग और शुजा उद्दौला अपनी ज़िंदगी में जंगी मुहिमों और सलतनत के स्थायित्व में व्यस्त और दिल्ली हुकूमत के अधीन थे। उनके ज़माने में अवध की राजधानी फ़ैज़ाबाद था और लखनऊ एक मामूली क़स्बा से ज़्यादा कुछ नहीं था। सन् 1775 में शुजा उद्दौला की मौत के बाद आसिफ़ उद्दौला तख़्त नशीन हुए तो उन्होंने अवध को दिल्ली से अलग सियासी, सांस्कृतिक और सभ्यता की पहचान देने के लिए कई उपाय किए। ये और बात है कि दिल्ली का जुआ पूरी तरह उतार फेंकने और अपनी बादशाहत का ऐलान करने का काम उनके जांनशीनों ने किया। आसिफ़ उद्दौला के ज़माने में दिल्ली सियासी और आर्थिक बदहाली का शिकार थी। उन्होंने वहां से तर्क-ए-सुकूनत करते वाले अहल-ए-कमाल का लखनऊ में स्वागत किया बल्कि सफ़र ख़र्च भेज कर उनको लखनऊ बुलाया। उन्होंने समस्त कला 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और उनकी बेगमात को तोहफ़ा तहाइफ़ से नवाज़ते थे और सलतनत के मामलों में उनसे ख़ुद बात करने के बजाय अपने वज़ीरों को भेजते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी की फ़ौज किसी बाहरी आक्रमण के ख़िलाफ़ उनकी सलतनत की सुरक्षा की ज़िम्मेदार थी। इस तरफ़ से मुतमइन हो कर उन्होंने अपनी सारी तवज्जो सलतनत की अलग पहचान निर्माण पर लगा दी। वो अपनी सलतनत को हर तरह से आदर्श बनाना चाहते थे और उनको किसी भी तरह से किसी के प्रभाव में रहना पसंद नहीं था। महल की साज़िशों से बचने और रिआया से ख़ुशगवार ताल्लुक़ात क़ायम करने के मक़सद से उन्होंने कम रुत्बा लोगों को वज़ारतें और ओहदे दिए। ताकि वो उनके एहसान तले दबे रह कर किसी षड्यंत्र या उग्रवाद में शामिल न हों। उनके अहम वज़ीर शिया थे या हिंदू। इस रणनीति का नतीजा ये था कि अवध में मिली-जुली हिंदू-मुस्लिम तहज़ीब ने जड़ें पकड़ीं जो गंगा जमुनी तहज़ीब कहलाती है। रियासत में हिन्दुओं की भारी बहुमत देखते हुए उन्होंने रिआया का दिल जीतने की हर मुम्किन कोशिश की। उनके ज़माने में बड़े पैमाने पर मंदिरों का निर्माण हुआ। अलीगंज का मशहूर हनुमान मंदिर उनके ही ज़माने में राजा जाट मल ने निर्माण कराया। राजा 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शौक़ीन सैलानियों के लिए पर्यटन स्थल बना। उनके द्वारा निर्मित इमारतें, विशेष रूप से रूमी दरवाज़ा और इमाम बाड़ा स्थापत्य कला का अछूता नमूना हैं जिन्हें देखकर आज भी लोग अश अश करते हैं। आसिफ़ उद्दौला ने अपनी उदारता और दरिया-दिली के साथ फ़ैज़ाबाद, दिल्ली और प्राच्य सभ्यता के दूसरे स्रोतों से आब-ए-ज़ि़ंदगानी की नहरों का रुख लखनऊ की तरफ़ मोड़ा। उन ही के ज़माने में मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा, मीर तक़ी मीर और मीर सोज़ जैसे अहल-ए-कमाल लखनऊ आए। सोज़ को उन्होंने शायरी में अपना उस्ताद बनाया। आसिफ़ उद्दौला ने जिस सांस्कृतिक स्वायत्ता की बुनियाद रखी उस पर नई उर्दू ज़बान की इमारत का निर्माण हुआ। उर्दू शायरी शोक और सहानुभूति के मातमकदा से निकल कर शोख़ी और रंगीनी की तरफ़ माइल हुई जिसने अंततः दबिस्तान-ए-लखनऊ की शक्ल इख़्तियार की। आसिफ़ उद्दौला के ज़माने तक उर्दू शायरी मूल रूप से ग़ज़ल या क़सीदा की शायरी थी। उनके ज़माने में मसनवी और मर्सिया की तरफ़ ख़ास तवज्जो दी गई। मीर हसन की सह्र उल बयान समेत उर्दू की बेहतरीन मसनवियाँ उनके ही ज़माने में लिखी गईं। साथ ही मर्सिया निगारी और मर्सिया-ख़्वानी की ऐसी फ़िज़ा 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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'लाएक़'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> लाला लाडली लाल श्रीवास्तव</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 04 Sep 1894</bdi> | मैनपुरी, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'लाएक़' मूल नाम : लाला लाडली लाल श्रीवास्तव जन्म : 04 Sep 1894 | मैनपुरी, उत्तर प्रदेश ",
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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मुंशी बाल मुकुंद सिकंदराबादी</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>सिकंदराबाद, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " मूल नाम : मुंशी बाल मुकुंद सिकंदराबादी जन्म : सिकंदराबाद, उत्तर प्रदेश ",
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"raw_bio": " उपनाम : 'आगाह' मूल नाम : Baqir Agah ",
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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'बर्क़'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मुंशी महाराज बहादुर</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>दिल्ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 09 Feb 1936</bdi> | पानीपत, हरयाना</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>मुंशी महाराज बर्क़ का जन्म जुलाई 1884 में देहली के एक कायस्थ परिवार में हुआ उनके पूर्वजों का पुराना वतन संकट ज़िला एटा उ0 प्र0 था। परिवार के मुखिया राय जागरूप बहादुर की एटा के प्रसिद्ध बुज़ुर्गों में गिनती होती थी और उनके अग्रज जो कई पीढ़ियों से दिल्ली में निवास करते थे और नाना दौलत राम इबरत साहिब-ए-दीवान शायर थे और उस्ताद ज़ौक़ के शागिर्दों में से थे। बर्क़ हज़रत आग़ा शायर क़ज़िलबाश से इस्लाह लिया करते थे। ‘कृष्ण दर्पण’, ‘मतला-ए-अनवर’ और ‘हर्फ़-ए-नातमाम’ उनके काव्य संग्रह हैं। शायरी के अलावा आरम्भ में उन्होंने ड्रामे भी लिखे जिनमें से ‘कृष्ण अवतार’ और ‘सावित्री’ का कई बार मंचन भी हुआ।<p style=\"text-align:justify;\"> </p><span lang=\"HI\" style=\"font-size:18.0pt;line-height:115%;font-family:'Kokila','sans-serif';\"></span><span lang=\"HI\" style=\"font-size:18.0pt;line-height:115%;font-family:'Kokila','sans-serif';\"></span><p style=\"text-align:justify;\"><span lang=\"HI\" style=\"font-size:18.0pt;line-height:115%;font-family:'Kokila','sans-serif';background:white;\"> </span></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'बर्क़' मूल नाम : मुंशी महाराज बहादुर जन्म : दिल्ली निधन : 09 Feb 1936 | पानीपत, हरयाना मुंशी महाराज बर्क़ का जन्म जुलाई 1884 में देहली के एक कायस्थ परिवार में हुआ उनके पूर्वजों का पुराना वतन संकट ज़िला एटा उ0 प्र0 था। परिवार के मुखिया राय जागरूप बहादुर की एटा के प्रसिद्ध बुज़ुर्गों में गिनती होती थी और उनके अग्रज जो कई पीढ़ियों से दिल्ली में निवास करते थे और नाना दौलत राम इबरत साहिब-ए-दीवान शायर थे और उस्ताद ज़ौक़ के शागिर्दों में से थे। बर्क़ हज़रत आग़ा शायर क़ज़िलबाश से इस्लाह लिया करते थे। ‘कृष्ण दर्पण’, ‘मतला-ए-अनवर’ और ‘हर्फ़-ए-नातमाम’ उनके काव्य संग्रह हैं। शायरी के अलावा आरम्भ में उन्होंने ड्रामे भी लिखे जिनमें से ‘कृष्ण अवतार’ और ‘सावित्री’ का कई बार मंचन भी हुआ। ",
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"name": "बशीरुद्दीन अहमद देहलवी",
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"name": "बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'बयाँ'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> ख़्वाजा अहसनुल्लाह ख़ान</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>आगरा, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'बयाँ' मूल नाम : ख़्वाजा अहसनुल्लाह ख़ान जन्म : आगरा, उत्तर प्रदेश ",
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"name": "बेखुद बदायुनी",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मोलवी अब्दुल हई</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 17 Sep 1857</bdi> | बदायूँ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 10 Nov 1912</bdi> | बदायूँ, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> अल्ताफ़ हुसैन हाली (गुरु), </span>\r\n<span> दाग़ देहलवी (गुरु)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>बेख़ुद बदायूनी, अब्दुल हई (1857-1912) बेख़ुद ख़ुद अपने बक़ौल नौजवानी में हुस्न-परस्त और आ’शिक़-मिज़ाज थे। जवानी के जोश में किसी को उस्ताद नहीं बनाया मगर बाद में मौलाना ‘हाली’ की शागिर्दी में आए। लेकिन जब ‘हाली’ आ’शिक़ाना रंग छोड़ कर ग़ज़ल को सुधारने में लग गए तो ‘बेख़ुद’ ने उन्हें छोड़़ कर ‘दाग़’ देहलवी का दामन थाम लिया, और उनके शागिर्दों में मुम्ताज़ मक़ाम हासिल किया। पेशे से वकील थे। रियासत जोधपुर में स्पेशल मजिस्ट्रेट भी रहे।<br/></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " मूल नाम : मोलवी अब्दुल हई जन्म : 17 Sep 1857 | बदायूँ, उत्तर प्रदेश निधन : 10 Nov 1912 | बदायूँ, उत्तर प्रदेश संबंधी : अल्ताफ़ हुसैन हाली (गुरु), दाग़ देहलवी (गुरु) बेख़ुद बदायूनी, अब्दुल हई (1857-1912) बेख़ुद ख़ुद अपने बक़ौल नौजवानी में हुस्न-परस्त और आ’शिक़-मिज़ाज थे। जवानी के जोश में किसी को उस्ताद नहीं बनाया मगर बाद में मौलाना ‘हाली’ की शागिर्दी में आए। लेकिन जब ‘हाली’ आ’शिक़ाना रंग छोड़ कर ग़ज़ल को सुधारने में लग गए तो ‘बेख़ुद’ ने उन्हें छोड़़ कर ‘दाग़’ देहलवी का दामन थाम लिया, और उनके शागिर्दों में मुम्ताज़ मक़ाम हासिल किया। पेशे से वकील थे। रियासत जोधपुर में स्पेशल मजिस्ट्रेट भी रहे। ",
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"name": "कप्तान एलेग्जेंडर हैड्रली आज़ाद",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
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"name": "चंदू लाल बहादुर शादान",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'शादान'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> Maharaja Chandu Lal</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>बुरहानपुर, मध्य प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 15 Apr 1845</bdi></span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>‘<span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\">शादाँ</span>’ <span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\">चंदू</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Arial, sans-serif;\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Mangal, serif;\">लाल</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:Arial, sans-serif;\"> (</span>1763-1845)<p>‘<span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">शादाँ</span>’ <span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">चंदू</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">लाल</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">हैदराबाद</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">में</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">निज़ामुल</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">मुल्क</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">आसिफ़</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">जाह</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">के</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">दरबार</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">में</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">पेशकार</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">थे</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">जो</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">धीरे</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">धीरे</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">तरक़्क़ी</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">करके</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">बहुत</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">ऊँचे</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">पदों</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">तक</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">पहुँचे।</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">उन्हें</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span>‘<span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">राजा</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">राजायान</span>’ <span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">और</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span>‘<span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">महाराज</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">बहादुर</span>’ <span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">के</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">खिताब</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">मिले।</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">फ़ारसी</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">और</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">उर्दू</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">दोनों</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">ज़बानों</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">में</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">शाइ</span>’<span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">री</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">करते</span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Arial','sans-serif';\"> </span><span lang=\"HI\" style=\"font-family:'Mangal','serif';\">थे।</span></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'शादान' मूल नाम : Maharaja Chandu Lal जन्म : बुरहानपुर, मध्य प्रदेश निधन : 15 Apr 1845 ‘ शादाँ ’ चंदू लाल ( 1763-1845) ‘ शादाँ ’ चंदू लाल हैदराबाद में निज़ामुल मुल्क आसिफ़ जाह के दरबार में पेशकार थे जो धीरे धीरे तरक़्क़ी करके बहुत ऊँचे पदों तक पहुँचे। उन्हें ‘ राजा राजायान ’ और ‘ महाराज बहादुर ’ के खिताब मिले। फ़ारसी और उर्दू दोनों ज़बानों में शाइ ’ री करते थे। ",
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"description": "<p style=\"text-align: center; font-size: 24px;\"> The Great Poets and Writers in Indian and World History! </p>",
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