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            "name": "आबरू शाह मुबारक",
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नाजी और शाह मुबारक आबरू सर्वोपरि थे। उनके इलावा, यकरंग एहसान उल्लाह ख़ां और हातिम भी फ़ारसी को छोड़कर उर्दू में शायरी करने लगे थे। लेकिन इन सब में आबरू का एक विशेष स्थान था। वो अपने ज़माने में ज़बान रेख़्ता के सिद्ध शायर और साहिब-ए-ईजाद नज़्म-ए-उर्दू शुमार होते थे। शोधकर्ताओं ने प्राथमिकता के मुद्दे पर महत्वपूर्ण चर्चा की है जिनका विश्लेषण करने के बाद डाक्टर मुहम्मद हुसैन कहते हैं, “इस बहस से ये नतीजा निकालना ग़लत न होगा कि फ़ाइज़ की मौजूदा कुल्लियात जो संशोधन के बाद संकलित हुई, उत्तर भारत में उर्दू का पहला दीवान क़रार देने के लिए हमारे पास निर्णायक और ठोस तर्क मौजूद नहीं हैं। फ़ाइज़ के बाद प्राथमिकता का विशेष अधिकार आबरू और हातिम को मिलता है। हातिम का दीवान उपलब्ध नहीं, सिर्फ़ संशोधन के बाद संकलित किया गया ‘दीवान ज़ादा’ मिलता है। इस सूरत में आबरू का दीवान निश्चित उत्तर भारत में उर्दू का पहला प्रमाणिक दीवान है।” आबरू ने शे’र कहना  उस वक़्त शुरू किया था जब शायरी में फ़ारसी का सिक्का चलता था और बाद के फ़ारसी के शायरों का कलाम मक़बूल था। आबरू ने फ़ारसी और बृज दोनों के रंग-ओ-आहंग के प्रभाव 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कुछ अर्सा के लिए आगरा चले गए तो आबरू ने कहा, <br/>भूलोगे तुम अगर जो सदा रंग जी हमें<br/>तो नाँव बीन-बीन के तुमको धरेंगे हम <br/><br/>औरतों के साथ उनके सम्बंध यौन से अधिक उनके सौंदर्य बोध को संतुष्ट करने के लिए था। वो उन औरतों की तारीफ़ उनके फ़न के हवाले से करते नज़र आते हैं;<br/>मीठे बचन सुना दे, तूती को तब लजा दे<br/>जब नाचने पे आवे तब मोर है ममोला <br/>       या <br/>ख़ुदा तुझे भी करे, बाग़ बीच रंग के, सब्ज़ <br/>तिरी सदा ने किया है हमें निहाल जमाल <br/>     या <br/>क़ियामत राग, ज़ालिम भाव,काफ़िर गत है ऐ पन्ना <br/>तुम्हारी चीज़ सो देखी सो इक आफ़त है ऐ पन्ना<br/><br/>आबरू की सारी शख़्सियत और कलाम मुहम्मद शाही दौर की सरमस्ती में डूबा हुआ है। खेलों में गंजिंफ़ा और कबूतरबाज़ी का शौक़ था। अच्छे लिबास और क़ीमती पोशाकों के शौक़ीन थे। अपनी महबूबाओं के जिस्म पर उन क़ीमती कपड़ों का तज़किरा भी उनके कलाम में जगह जगह मिलता है। कहा जाता है कि आख़िरी उम्र में सब कुछ छोड़ छाड़ कर दरवेश बन गए थे लेकिन आख़िरी उम्र को बुढ़ापे पर संदेह करना ग़लत होगा क्योंकि आबरू ने सिर्फ़ पच्चास बरस की उम्र पाई और मुसहफ़ी के मुताबिक़ 1733 ई. में घोड़े के लात मार देने से उनका देहांत हुआ। उनकी क़ब्र दिल्ली में सय्यद हसन रसूल नुमा के नज़दीक है।<br/><br/>आबरू की शायरी अपने दौर की तर्जुमान है और नज़्म में एक तारीख़ी दस्तावेज़ है। उनकी शायरी पढ़ कर इस पतनशील समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर आँखों के सामने घूम जाती है। इश्क़ जो ग़ज़ल का ख़ास मौज़ू है, उनके दौर में महबूब की जुदाई में रोने कुढ़ने का नाम नहीं था। न ये छुपाने और दिल में रखने की चीज़ था। मुख़्तलिफ़ दर्जात की बाज़ारी औरतें आम थीं और जितना संभव हो उनसे लाभ उठाया जा सकता था। अम्रद परस्ती(बच्चा बाज़ी) को इशक़-ए-मजाज़ी और इस तरह इशक़-ए-हक़ीक़ी की पहली मंज़िल क़रार देते हुए तक़द्दुस हासिल था। ख़ूबसूरत लौंडे किसी का माशूक़ बनने के इच्छुक रहते थे, इसलिए आबरू ने एक मसनवी “दर मौइज़ा मा’शूकां”  इसी विषय पर लिखी जिसमें माशूक़ बनने के अनिवार्य तत्वों को बताया गया है। अपने दौर के हवाले से ये मसनवी उर्दू में एक अनोखी और अलग मसनवी है। आबरू और रेख़्ता में उनके समकालीन शायरों का ख़ास कारनामा ये है कि उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को फ़ारसी के शिकंजे से आज़ाद किया। उनकी कोशिश थी कि उर्दू शायरी को हिंदुस्तानी रंग में रंगा जाये। इसके मज़ामीन और अंदाज़-ए-बयान हिंदुस्तानी हों। कुछ शायरों जैसे यकरंग ने शे’र में फ़ारसी इज़ाफ़तों का इस्तेमाल भी तर्क कर दिया। ये लोग उर्दू शायरी को एक अलग और विशिष्ट पहचान देना चाहते थे जिसमें ईरानियत के बजाय हिंदुस्तानियत हो;<br/>ख़ुश यूँ ही क़दम शेख़ का है मो’तक़िदाँ को<br/>जूं किशन को कब्जा का लगे कूब प्यारा<br/>       या <br/>मिरा ऐ माहरू क्यों ख़ून अपने सर चढ़ाते हो<br/>रक्त चंदन का यूं किस वास्ते टीका लगाते हो<br/>       या<br/>तेरे ज़नान पन की नाज़ुक है शक्ल बंधनी<br/>तस्वीर पद्मिनी की अब चाहिए चतुरनी<br/><br/>रेख़्ता में फ़ारसी शब्द व क्रिया के इस्तेमाल को बुरा जानते थे। इसलिए आबरू ने कहा,<br/>वक़्त जिनका रेख़्ता की शायरी में सर्फ़ है<br/>उन सती कहता हूँ बूझो सिर्फ़ मेरा झर्फ़ है<br/><br/>जो कि लावे रेख़्ता में फ़ारसी के फे़’ल-ओ-हर्फ़<br/>लग़व हैंगे फे़’ल उसके रेख़्ता में हर्फ़ है <br/><br/>ये वो लोग थे जिन्होंने शायरी को अवाम पसंद बनाया और शायरी का चर्चा घर-घर हो गया। आबरू पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने ईहाम गोई को बढ़ावा दिया लेकिन इस बात को भुला दिया जाता है कि ये उनकी ज़रूरत या मजबूरी थी। आबरू और उनके समकालीन रेख़्ता को हिंदुस्तानी रँग देना चाहते थे और हिंदी का श्लेष अलंकार (उर्दू में ईहाम) अवाम को उस शायरी की तरफ़ मुतवज्जा करने का अच्छा माध्यम था। ठीक यही स्थिति हमें बहुत बाद में लखनवी शायरी में मिलती है कि जब लखनऊ के शायरों ने देहलवी शायरी का जुआ अपने सर से उतार फेंकने की कोशिश की तो रिआयत-ए-लफ़्ज़ी में पनाह ली और उनको बेपनाह मक़बूलियत मिली लेकिन ऐसा भी नहीं कि आबरू में ईहाम के सिवा कुछ न हो। आबरू की शायरी की ख़ुसूसियत ख़ुशवक़्ती और मज़ेदारी है। उन्होंने ज़माने के उतार-चढ़ाव देखे और उनके निशानात उनकी शायरी में जगह जगह मिलते हैं। उनकी शायरी की फ़िज़ा तमामतर मजलिसी है। डाक्टर मुहम्मद हसन के शब्दों में आबरू सिर्फ़ तर्ज़-ए-बयान का नहीं बल्कि एक शख़्सियत, एक मिज़ाज और एक दौर का नाम है और उस दौर में उस शख़्सियत और उस मिज़ाज का एक अपना नशा है, उसमें अज़मत न सही मज़ा ज़रूर है, परिपक्वता न सही चाशनी ज़रूर है।<br/></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'आबरू'   मूल नाम :  नजम्मुद्दीन शाह मुबारक   जन्म : ग्वालियर, मध्य प्रदेश   निधन :  20 Dec 1733  | दिल्ली, भारत     रेख़्ता में उत्तर भारत का पहला साहब-ए-दीवान शायर उत्तर भारत में उर्दू शायरी को रिवाज देने वालों में आबरू को प्राथमिकता का सम्मान प्राप्त है। उनसे पहले वली और दकन के कुछ दूसरे शायर उर्दू में शायरी कर रहे थे लेकिन उत्तर भारत में शायरी की असल ज़बान फ़ारसी थी। उर्दू शायरी महज़ तफ़रीहन मुँह का मज़ा बदलने के लिए की जाती थी। फिर जब 1720 ई. में वली का दीवान दिल्ली पहुंचा और उसके अशआर ख़ास-ओ-आम की ज़बान पर जारी हुए तो जिन लोगों ने सबसे पहले रेख़्ता को अपने काव्य अभिव्यक्ति का ख़ास माध्यम बनाया उनमें फ़ाइज़, शरफ़ उद्दीन मज़मून, मुहम्मद शाकिर नाजी और शाह मुबारक आबरू सर्वोपरि थे। उनके इलावा, यकरंग एहसान उल्लाह ख़ां और हातिम भी फ़ारसी को छोड़कर उर्दू में शायरी करने लगे थे। लेकिन इन सब में आबरू का एक विशेष स्थान था। वो अपने ज़माने में ज़बान रेख़्ता के सिद्ध शायर और साहिब-ए-ईजाद नज़्म-ए-उर्दू शुमार होते थे। शोधकर्ताओं ने प्राथमिकता के मुद्दे पर महत्वपूर्ण चर्चा की है जिनका विश्लेषण करने के बाद डाक्टर मुहम्मद हुसैन कहते हैं, “इस बहस से ये नतीजा निकालना ग़लत न होगा कि फ़ाइज़ की मौजूदा कुल्लियात जो संशोधन के बाद संकलित हुई, उत्तर भारत में उर्दू का पहला दीवान क़रार देने के लिए हमारे पास निर्णायक और ठोस तर्क मौजूद नहीं हैं। फ़ाइज़ के बाद प्राथमिकता का विशेष अधिकार आबरू और हातिम को मिलता है। हातिम का दीवान उपलब्ध नहीं, सिर्फ़ संशोधन के बाद संकलित किया गया ‘दीवान ज़ादा’ मिलता है। इस सूरत में आबरू का दीवान निश्चित उत्तर भारत में उर्दू का पहला प्रमाणिक दीवान है।” आबरू ने शे’र कहना  उस वक़्त शुरू किया था जब शायरी में फ़ारसी का सिक्का चलता था और बाद के फ़ारसी के शायरों का कलाम मक़बूल था। आबरू ने फ़ारसी और बृज दोनों के रंग-ओ-आहंग के प्रभाव को स्वीकार किया और अपने दौर के मिज़ाज को पूरी तरह अपनाया और उसको रेख़्ता में अभिव्यक्त किया और ये अभिव्यक्ति उस बेसाख़्तगी और बांकपन से हुई जो मुहम्मद शाही दौर की विशेषता है। समस्त तज़किरा लेखक इस बात से सहमत हैं कि आबरू उर्दू में ईहामगोई के आविष्कारक न सही उसको रिवाज देने और उसे सिक्का-ए-राइज-उल-वक़्त बनाने वालों में उनका नाम सर्वोपरि है। उर्दू में पहला वासोख़्त लिखने का शरफ़ भी आबरू को हासिल है। आबरू की ज़िंदगी के हालात के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं हैं। बस इतना मालूम है कि उनका नाम नज्म उद्दीन उर्फ़ शाह मुबारक था। मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग मुहम्मद ग़ौस गवालियारी के पोते थे और इस वास्ते से मशहूर फ़ारसी के विशेषज्ञ और विद्वान ख़ान आरज़ू के रिश्तेदार और शागिर्द थे। आबरू 1683 ई. में गवालियार में पैदा हुए और जवानी में 1706 ई. के आस-पास दिल्ली आकर शाही मुलाज़मत से समबद्ध हो गए। इसी मुलाज़मत के सिलसिले में कुछ अर्सा फ़तह अली गर्देज़ी, साहिब-ए-तज़किरा गर्देज़ी के वालिद की संगत में नारनौल में भी रहे। इसके बाद वो दिल्ली आ गए। आबरू ने मुलाज़मत के दौरान इज़्ज़त और दौलत हासिल की और उनका शुमार ख़ुशहाल लोगों में होता था। एक आँख से विकलांग थे। दाढ़ी लंबी थी और हाथ में छड़ी लेकर चलते थे। आख़िरी उम्र में दरवेश और क़लंदर मशहूर थे। समकालीन शायरों में मज़हर जान जानां और बेनवा से उनकी नोक-झोंक चलती थी। उनके विरोधी प्रायः उनकी शायरी की बजाय उनकी आँख की ख़राबी को उपहास का निशाना बनाते थे। मज़हर जान जानां ने कहा,  आबरू की आँख में इक गाँठ है आबरू सब शायरों की गाँड है इसके जवाब में आबरू ने कहा, जब सती सत पर चढ़े तो पान खाना रस्म है आबरू जग में रहे तो जान जाना पश्म है इसी तरह इक शायर ‘बेनवा’ थे इलाहाबाद से दिल्ली वारिद हुए थे। एक मुशायरे में उनकी मुलाक़ात आबरू से हुई तो आबरू ने उन पर कोई ख़ास तवज्जो न दी जिससे ‘बेनवा’ की अना को चोट पहुंची और उन्होंने आबरू से कहा, ''मियां आबरू साहिब, आप मुख़लिसों के अहवाल से इस क़दर तग़ाफ़ुल करते हैं जैसे आपकी आँख में हमारी कोई जगह नहीं।” इस पर हाज़िरीन-ए-मजलिस हंस पड़े। यही नहीं आबरू के इस शे’र पर,  तुम्हारे लोग कहते हैं कमर है कहाँ है किस तरह की है किधर है  पर चोट करते हुए ‘बेनवा’ ने कहा, “काने ने क्या अंधा शे’र कहा है।” ये वही ‘बेनवा’ हैं जिन्होंने मीर तक़ी मीर पर अपने “दो आबे” वाले मज़मून के सरक़ा का इल्ज़ाम लगाया था और उन्हें बुरा-भला कहा था। आबरू हुस्नपरस्त और आशिक़ मिज़ाज थे। सय्यद शाह कमाल के बेयर मियां मक्खन पाक बाज़ पर ख़ास नज़र थी। दीवान आबरू में उनके हवाले से कई शे’र मिलते हैं, जैसे;  मक्खन मियां ग़ज़ब हैं फ़क़ीरों के हाल पर आता है उनको जोश-ए-जमाली कमाल पर अपनी लतीफ़ेबाज़ी के लिए मशहूर मुहम्मद हुसैन आज़ाद ने आब-ए-हयात में यहां तक लिख दिया कि “इन (आबरू) के शे’र जब तक मक्खन मियां पाकबाज़ के कलाम से ना चुपड़े जाएं, मज़ा न देंगे।” पाकबाज़ के इलावा भी उन्होंने सुबहान राय, रमज़ानी, साहिब राय, क़साई, सुनार और मुख़्तलिफ़ पेशों से सम्बंध रखने वाले महबूबों का ज़िक्र अपने कलाम में किया है। औरतों में अपने वक़्त की मशहूर तवाएफ़ों, जैसे पन्ना ममोला, जमाल वग़ैरा का जो उस ज़माने में Celebrity का दर्जा रखती थीं, तज़किरा उनके अशआर में मिलता है। नृत्य व संगीत से आबरू को ख़ास लगाव था। सदारंग दरबार-ए-शाही के ख़ास बीन नवाज़ थे जिनसे आबरू को दिली ताल्लुक़ था। सदारंग कुछ अर्सा के लिए आगरा चले गए तो आबरू ने कहा,  भूलोगे तुम अगर जो सदा रंग जी हमें तो नाँव बीन-बीन के तुमको धरेंगे हम  औरतों के साथ उनके सम्बंध यौन से अधिक उनके सौंदर्य बोध को संतुष्ट करने के लिए था। वो उन औरतों की तारीफ़ उनके फ़न के हवाले से करते नज़र आते हैं; मीठे बचन सुना दे, तूती को तब लजा दे जब नाचने पे आवे तब मोर है ममोला         या  ख़ुदा तुझे भी करे, बाग़ बीच रंग के, सब्ज़  तिरी सदा ने किया है हमें निहाल जमाल       या  क़ियामत राग, ज़ालिम भाव,काफ़िर गत है ऐ पन्ना  तुम्हारी चीज़ सो देखी सो इक आफ़त है ऐ पन्ना आबरू की सारी शख़्सियत और कलाम मुहम्मद शाही दौर की सरमस्ती में डूबा हुआ है। खेलों में गंजिंफ़ा और कबूतरबाज़ी का शौक़ था। अच्छे लिबास और क़ीमती पोशाकों के शौक़ीन थे। अपनी महबूबाओं के जिस्म पर उन क़ीमती कपड़ों का तज़किरा भी उनके कलाम में जगह जगह मिलता है। कहा जाता है कि आख़िरी उम्र में सब कुछ छोड़ छाड़ कर दरवेश बन गए थे लेकिन आख़िरी उम्र को बुढ़ापे पर संदेह करना ग़लत होगा क्योंकि आबरू ने सिर्फ़ पच्चास बरस की उम्र पाई और मुसहफ़ी के मुताबिक़ 1733 ई. में घोड़े के लात मार देने से उनका देहांत हुआ। उनकी क़ब्र दिल्ली में सय्यद हसन रसूल नुमा के नज़दीक है। आबरू की शायरी अपने दौर की तर्जुमान है और नज़्म में एक तारीख़ी दस्तावेज़ है। उनकी शायरी पढ़ कर इस पतनशील समाज की सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर आँखों के सामने घूम जाती है। इश्क़ जो ग़ज़ल का ख़ास मौज़ू है, उनके दौर में महबूब की जुदाई में रोने कुढ़ने का नाम नहीं था। न ये छुपाने और दिल में रखने की चीज़ था। मुख़्तलिफ़ दर्जात की बाज़ारी औरतें आम थीं और जितना संभव हो उनसे लाभ उठाया जा सकता था। अम्रद परस्ती(बच्चा बाज़ी) को इशक़-ए-मजाज़ी और इस तरह इशक़-ए-हक़ीक़ी की पहली मंज़िल क़रार देते हुए तक़द्दुस हासिल था। ख़ूबसूरत लौंडे किसी का माशूक़ बनने के इच्छुक रहते थे, इसलिए आबरू ने एक मसनवी “दर मौइज़ा मा’शूकां”  इसी विषय पर लिखी जिसमें माशूक़ बनने के अनिवार्य तत्वों को बताया गया है। अपने दौर के हवाले से ये मसनवी उर्दू में एक अनोखी और अलग मसनवी है। आबरू और रेख़्ता में उनके समकालीन शायरों का ख़ास कारनामा ये है कि उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को फ़ारसी के शिकंजे से आज़ाद किया। उनकी कोशिश थी कि उर्दू शायरी को हिंदुस्तानी रंग में रंगा जाये। इसके मज़ामीन और अंदाज़-ए-बयान हिंदुस्तानी हों। कुछ शायरों जैसे यकरंग ने शे’र में फ़ारसी इज़ाफ़तों का इस्तेमाल भी तर्क कर दिया। ये लोग उर्दू शायरी को एक अलग और विशिष्ट पहचान देना चाहते थे जिसमें ईरानियत के बजाय हिंदुस्तानियत हो; ख़ुश यूँ ही क़दम शेख़ का है मो’तक़िदाँ को जूं किशन को कब्जा का लगे कूब प्यारा        या  मिरा ऐ माहरू क्यों ख़ून अपने सर चढ़ाते हो रक्त चंदन का यूं किस वास्ते टीका लगाते हो        या तेरे ज़नान पन की नाज़ुक है शक्ल बंधनी तस्वीर पद्मिनी की अब चाहिए चतुरनी रेख़्ता में फ़ारसी शब्द व क्रिया के इस्तेमाल को बुरा जानते थे। इसलिए आबरू ने कहा, वक़्त जिनका रेख़्ता की शायरी में सर्फ़ है उन सती कहता हूँ बूझो सिर्फ़ मेरा झर्फ़ है जो कि लावे रेख़्ता में फ़ारसी के फे़’ल-ओ-हर्फ़ लग़व हैंगे फे़’ल उसके रेख़्ता में हर्फ़ है  ये वो लोग थे जिन्होंने शायरी को अवाम पसंद बनाया और शायरी का चर्चा घर-घर हो गया। आबरू पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने ईहाम गोई को बढ़ावा दिया लेकिन इस बात को भुला दिया जाता है कि ये उनकी ज़रूरत या मजबूरी थी। आबरू और उनके समकालीन रेख़्ता को हिंदुस्तानी रँग देना चाहते थे और हिंदी का श्लेष अलंकार (उर्दू में ईहाम) अवाम को उस शायरी की तरफ़ मुतवज्जा करने का अच्छा माध्यम था। ठीक यही स्थिति हमें बहुत बाद में लखनवी शायरी में मिलती है कि जब लखनऊ के शायरों ने देहलवी शायरी का जुआ अपने सर से उतार फेंकने की कोशिश की तो रिआयत-ए-लफ़्ज़ी में पनाह ली और उनको बेपनाह मक़बूलियत मिली लेकिन ऐसा भी नहीं कि आबरू में ईहाम के सिवा कुछ न हो। आबरू की शायरी की ख़ुसूसियत ख़ुशवक़्ती और मज़ेदारी है। उन्होंने ज़माने के उतार-चढ़ाव देखे और उनके निशानात उनकी शायरी में जगह जगह मिलते हैं। उनकी शायरी की फ़िज़ा तमामतर मजलिसी है। डाक्टर मुहम्मद हसन के शब्दों में आबरू सिर्फ़ तर्ज़-ए-बयान का नहीं बल्कि एक शख़्सियत, एक मिज़ाज और एक दौर का नाम है और उस दौर में उस शख़्सियत और उस मिज़ाज का एक अपना नशा है, उसमें अज़मत न सही मज़ा ज़रूर है, परिपक्वता न सही चाशनी ज़रूर है।  ",
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“अजाइब-उल-क़सस” और नज़्म में “नादिरात-ए-शाही” इमला करवाने का मौक़ा दिया। “अजाइब-उल-क़सस” उत्तर भारत में उर्दू नस्र के प्रथम नमूनों में से एक और अपनी ज़बान के लिहाज़ से बिल्कुल अलग है। तज़किरा लेखकों ने उनके उर्दू दीवान का भी ज़िक्र किया है जो कहीं नहीं मिलता। उर्दू, हिन्दी और फ़ारसी के शायरी के नमूने उनकी किताब “नादिरात-ए-शाही” में मिलते हैं जो उर्दू के साथ साथ देवनागरी लिपि में है और जिससे हमें उनके मिज़ाज और उनकी दिलचस्पियों का अंदाज़ा होता है।</p><p>शाह आलम सानी, आलमगीर सानी के बेटे और वलीअहद थे। उनकी पैदाइश ऐसी हालत में हुई जब आलमगीर सानी लाल क़िले में ऩजरबंदी के दिन गुज़ार रहे थे। शाह आलम का असल नाम मिर्ज़ा अबदुल्लाह उर्फ़ आली गुहर (या अली गौहर) था और बचपन में लाल मियां और मिर्ज़ा बुलाकी भी कहे जाते थे। बादशाह बनने के बाद उन्होंने अबुल मुज़फ्फ़र जलाल उद्दीन मुहम्मद शाह आलम सानी का लक़ब इख़्तियार किया। क़ैद के बावजूद उनकी शिक्षा शाही रीति के अनुसार हुई। वो फ़ारसी, उर्दू और हिंदी के इलावा तुर्की ज़बान भी जानते थे। जवान हुए तो क़िस्मत ने पल्टा खाया और उनके वालिद को बादशाह बना दिया गया। उस वक़्त बादशाह क़िले के अमीरों के हाथ में कठपुतली बन चुका था। वो जिसे चाहते हुकूमत से अपदस्थ कर देते या क़त्ल करते और जिसे चाहते बादशाह बना देते थे। आलमगीर सानी बादशाह और हमारे मिर्ज़ा अबदुल्लाह वलीअहद ज़रूर थे लेकिन इमाद-उल-मुल्क हुकूमत में स्याह-ओ-सफ़ेद का मालिक था। वलीअहद इस घुटन, बेबसी और अविश्वास से मुक्ति पाना चाहते थे। बाप आलमगीर सानी ने भी बेटे की मुहब्बत में यही पसंद किया कि उनको एक जागीर देकर क़िले से दूर कर दिया जाए। लेकिन इमाद-उल-मुल्क ने इसमें अपने लिए ख़तरा महसूस किया। उसने आलमगीर को मजबूर किया कि वो बेटे को दिल्ली वापस बुलाएं। शाहआलम ख़तरे को भाँप गए और घेराबंदी के बावजूद अवध की तरफ़ फ़रार होने में कामयाब हो गए। अवध के नवाब शुजा उद्दौला ने उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। कुछ अर्सा लखनऊ में रहने के बाद इलाहाबाद के हाकिम मुहम्मद क़ुली ख़ान ने उनको इलाहाबाद बुला लिया। वो बहुत दिनों से बंगाल पर हुकूमत करने का ख़्वाब देख रहा था। उसने शाह आलम को बिहार और बंगाल पर लश्कर कशी के लिए तैयार कर लिया, शुजा उद्दौला ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया। लेकिन इस मुहिम में उन्हें कामयाबी नहीं मिली और मुहम्मद क़ुली ख़ान निराश दिल हो कर इलाहाबाद वापस चला गया। लेकिन वलीअहद इस नाकामी से निराश नहीं हुए और अक्तूबर 1759 ई. में दुबारा बिहार का रुख़ किया। जब वो बिहार के क़स्बा खतौली में थे उसी वक़्त उनको बाप के क़त्ल किए जाने की ख़बर मिली। उन्होंने वहीं अपनी बादशाहत का ऐलान कर दिया। ताजपोशी की प्रक्रिया के बाद उन्होंने बिहार में आगे बढ़ना शुरू किया। राजा राम नरायन ने आगे बढ़कर मुक़ाबला किया लेकिन ज़ख़्मी हो कर पटना के क़िले में छुप गया। इतने में अंग्रेज़ी फ़ौज राजा की मदद को पहुंच गई और अत्यधिक रक्तपात के बाद बादशाह को शिकस्त हुई। अंग्रेज़ उन्हें लेकर पटना आ गए और क़िले में रखा। इसी अर्से में मीर जाफ़र के दामाद मीर क़ासिम जिसको उन्होंने मीर जाफ़र की जगह बंगाल का हाकिम बना रखा था, बादशाह के पास आया और 24 लाख रुपये के बदले बंगाल की निज़ामत की सनद हासिल कर ली। कुछ अर्सा बाद मीर क़ासिम की अंग्रेज़ों से बिगड़ गई और लड़ाई में उसे शिकस्त हुई। वो भाग कर इलाहाबाद आया और बादशाह को जो अंग्रेज़ों की क़ैद जैसी मेहमानदारी से तंग आकर इलाहाबाद शुजा उद्दौला के पास चला आया था, बंगाल पर 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रोहेला था जिसको बादशाह ने ख़स्सी करा दिया और ज़नाना कपड़े पहनने पर मजबूर किया। उसी ग़ुलाम क़ादिर ने आख़िर बादशाह की आँखें निकालीं। वो ख़ुद भी आख़िरकार मरहटों के हाथों बेदर्दी से मारा गया। अंधा होने के बाद भी मरहटों ने शाह आलम को बादशाहत पर बरक़रार रखा। आख़िर अंग्रेज़ों ने आकर उन्हें दिल्ली से भगाया। अब बादशाह एक लाख रुपये माहवार पर अंग्रेज़ों का वज़ीफ़ा-ख़्वार था। उस ज़माने का मशहूर कथन है; “सलतनत शाह आलम अज़ दिल्ली ता पालम।” उसी हालत में 19 नवंबर 1896 में उसकी मौत हुई।</p><p>बक्सर की जंग में शिकस्त के बाद बादशाह के पास अय्याशी के सिवा करने को कुछ नहीं था। दिल्ली में चौतरफ़ा विद्रोहों के बावजूद ये सिलसिला आँखों से महरूम होने तक जारी रहा। शायरी और संगीत से दिल बहलाते थे। फ़ारसी और उर्दू में आफ़ताब और भाषा में शाह आलम तख़ल्लुस करते थे। फ़ारसी में मिर्ज़ा मुहम्मद फ़ाखिर मकीं से मश्वरा करते थे। उर्दू में सौदा को उनका उस्ताद बताया जाता है जो क़रीन-ए-क़ियास नहीं, सौदा उनके दिल्ली आमद से पहले फ़र्रुखाबाद जा चुके थे। शाह आलम के दौर में सलतनत बिगड़ती जा रही थी मगर उर्दू ज़बान सँवर रही थी। मुहम्मद हुसैन आज़ाद कहते हैं, “आलमगीर के अह्द में वली ने उस नज़्म का चराग़ रौशन किया जो मुहम्मद शाह के अह्द में आसमान पर सितारा बन के चमका और शाह-आलम के अह्द में सूरज बन कर शिखर पर आया। शाह आलम के मिज़ाज में यूं भी स्थायित्व की कमी थी फिर ऐश में तो जादू का सा असर है। दिन रात नाच-गाने और शे’र-ओ-शायरी में गुज़ारने लगे। उन ही के ज़माने में सय्यद इंशा दिल्ली आए और दरबार से सम्बद्ध हो गए। बादशाह को उनके बग़ैर चैन नहीं आता था। शाह आलम बड़े अभ्यस्त शायर थे। उनके अशआर में पेचदार ख़्यालात, मुश्किल वाक्यांश या शब्द और कोई दूरस्थ रूपक नहीं मिलते। जो कुछ दिल में होता सीधे शब्दों में बयान कर देते थे। उनके कलाम में शान-ओ-शौकत कम मगर असर ज़्यादा है।</p><p>शायरी से हट कर शाह आलम का एक अहम कारनामा उनकी गद्य रचना “अजाइब-उल-क़सस” है। ये दावा तो नहीं किया जाता कि ये हिंदुस्तान या उत्तर भारत में उर्दू गद्य की पहली रचना है लेकिन यह 18वीं सदी की गद्य रचनाओं में से एक ज़रूर है और इसकी ज़बान दूसरी रचनाओं के मुक़ाबले में ज़्यादा निखरी हुई है। अगर नस्री दास्तानों को तारीख़ी क्रम से देखा जाये तो “अजाइब-उल-क़सस”, क़िस्सा मेह्र अफ़रोज़ दिलबर (1759 ई.), नौ तर्ज़-ए- मुरस्सा(1775 ई.), नौ आईन-ए-हिन्दी क़िस्सा मलिक मुहम्मद और गेती अफ़रोज़ (1788 ई.) के बाद चौथी गद्य रचना है जो 1792 ई. में लिखी गई। ये एक ना-मुकम्मल दास्तान है लेकिन इससे उस दौर के बारे में बहुत सी मालूमात हासिल होती हैं। शाह आलम के हिंदी कलाम पर जैसा कि उसका हक़ है अभी तक तवज्जो नहीं दी गई है।<br/></p></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'आफ़ताब'   मूल नाम :  अब्दुल्लाह   जन्म : दिल्ली         शाह आलम सानी मुग़लिया सलतनत के ऐसे बादशाह थे जिनके बारे में ये कहना मुश्किल है कि वो ज़्यादा बदनसीब थे या ज़्यादा पीड़ित। अपने 48 साल की हुकूमत में बारह साल तक वो जान के ख़तरे की वजह से राजधानी दिल्ली में क़दम नहीं रख सके। दिल्ली आने के बाद सत्रह साल तक उन्होंने चौतरफ़ा विद्रोहों में घिरे रह कर अपनी आँखों से मुग़लिया सलतनत के पतन का तमाशा देखा जिसके बाद क़ुदरत को मंज़ूर न हुआ कि वो अपनी आँखों से और कुछ देखते। उनके अमीर-उल-उमरा ग़ुलाम क़ादिर रोहेला ने उनकी आँखें निकाल कर उन्हें अंधा कर दिया और ज़िंदगी के बाक़ी 19 साल उन्होंने उसी हालत में हुकूमत की। ये उनकी निजी ज़िंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी थी जिसका दूसरा पहलू ये था कि उसी विकलांगता ने उनको नस्र(गद्य) में “अजाइब-उल-क़सस” और नज़्म में “नादिरात-ए-शाही” इमला करवाने का मौक़ा दिया। “अजाइब-उल-क़सस” उत्तर भारत में उर्दू नस्र के प्रथम नमूनों में से एक और अपनी ज़बान के लिहाज़ से बिल्कुल अलग है। तज़किरा लेखकों ने उनके उर्दू दीवान का भी ज़िक्र किया है जो कहीं नहीं मिलता। उर्दू, हिन्दी और फ़ारसी के शायरी के नमूने उनकी किताब “नादिरात-ए-शाही” में मिलते हैं जो उर्दू के साथ साथ देवनागरी लिपि में है और जिससे हमें उनके मिज़ाज और उनकी दिलचस्पियों का अंदाज़ा होता है। शाह आलम सानी, आलमगीर सानी के बेटे और वलीअहद थे। उनकी पैदाइश ऐसी हालत में हुई जब आलमगीर सानी लाल क़िले में ऩजरबंदी के दिन गुज़ार रहे थे। शाह आलम का असल नाम मिर्ज़ा अबदुल्लाह उर्फ़ आली गुहर (या अली गौहर) था और बचपन में लाल मियां और मिर्ज़ा बुलाकी भी कहे जाते थे। बादशाह बनने के बाद उन्होंने अबुल मुज़फ्फ़र जलाल उद्दीन मुहम्मद शाह आलम सानी का लक़ब इख़्तियार किया। क़ैद के बावजूद उनकी शिक्षा शाही रीति के अनुसार हुई। वो फ़ारसी, उर्दू और हिंदी के इलावा तुर्की ज़बान भी जानते थे। जवान हुए तो क़िस्मत ने पल्टा खाया और उनके वालिद को बादशाह बना दिया गया। उस वक़्त बादशाह क़िले के अमीरों के हाथ में कठपुतली बन चुका था। वो जिसे चाहते हुकूमत से अपदस्थ कर देते या क़त्ल करते और जिसे चाहते बादशाह बना देते थे। आलमगीर सानी बादशाह और हमारे मिर्ज़ा अबदुल्लाह वलीअहद ज़रूर थे लेकिन इमाद-उल-मुल्क हुकूमत में स्याह-ओ-सफ़ेद का मालिक था। वलीअहद इस घुटन, बेबसी और अविश्वास से मुक्ति पाना चाहते थे। बाप आलमगीर सानी ने भी बेटे की मुहब्बत में यही पसंद किया कि उनको एक जागीर देकर क़िले से दूर कर दिया जाए। लेकिन इमाद-उल-मुल्क ने इसमें अपने लिए ख़तरा महसूस किया। उसने आलमगीर को मजबूर किया कि वो बेटे को दिल्ली वापस बुलाएं। शाहआलम ख़तरे को भाँप गए और घेराबंदी के बावजूद अवध की तरफ़ फ़रार होने में कामयाब हो गए। अवध के नवाब शुजा उद्दौला ने उनका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। कुछ अर्सा लखनऊ में रहने के बाद इलाहाबाद के हाकिम मुहम्मद क़ुली ख़ान ने उनको इलाहाबाद बुला लिया। वो बहुत दिनों से बंगाल पर हुकूमत करने का ख़्वाब देख रहा था। उसने शाह आलम को बिहार और बंगाल पर लश्कर कशी के लिए तैयार कर लिया, शुजा उद्दौला ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया। लेकिन इस मुहिम में उन्हें कामयाबी नहीं मिली और मुहम्मद क़ुली ख़ान निराश दिल हो कर इलाहाबाद वापस चला गया। लेकिन वलीअहद इस नाकामी से निराश नहीं हुए और अक्तूबर 1759 ई. में दुबारा बिहार का रुख़ किया। जब वो बिहार के क़स्बा खतौली में थे उसी वक़्त उनको बाप के क़त्ल किए जाने की ख़बर मिली। उन्होंने वहीं अपनी बादशाहत का ऐलान कर दिया। ताजपोशी की प्रक्रिया के बाद उन्होंने बिहार में आगे बढ़ना शुरू किया। राजा राम नरायन ने आगे बढ़कर मुक़ाबला किया लेकिन ज़ख़्मी हो कर पटना के क़िले में छुप गया। इतने में अंग्रेज़ी फ़ौज राजा की मदद को पहुंच गई और अत्यधिक रक्तपात के बाद बादशाह को शिकस्त हुई। अंग्रेज़ उन्हें लेकर पटना आ गए और क़िले में रखा। इसी अर्से में मीर जाफ़र के दामाद मीर क़ासिम जिसको उन्होंने मीर जाफ़र की जगह बंगाल का हाकिम बना रखा था, बादशाह के पास आया और 24 लाख रुपये के बदले बंगाल की निज़ामत की सनद हासिल कर ली। कुछ अर्सा बाद मीर क़ासिम की अंग्रेज़ों से बिगड़ गई और लड़ाई में उसे शिकस्त हुई। वो भाग कर इलाहाबाद आया और बादशाह को जो अंग्रेज़ों की क़ैद जैसी मेहमानदारी से तंग आकर इलाहाबाद शुजा उद्दौला के पास चला आया था, बंगाल पर फ़ौजकशी के लिए उभारा, शुजा उद्दौला ने उसका समर्थन किया। बादशाह मीर क़ासिम और शुजा उद्दौला के टिड्डी दल जैसे लश्कर ने बंगाल पर चढ़ाई की और अंग्रेज़ों की मुट्ठी भर फ़ौज से बक्सर में 23 अक्तूबर 1764 ई. को ऐसी शिकस्त खाई जो हिंदुस्तान की क़िस्मत का फ़ैसला कर गई। अंग्रेज़ जो अभी तक सिर्फ़ व्यापारी थे अब मुल्क पर हुक्मरानी की तरफ़ चल पड़े। उन्होंने बादशाह से बिहार, बंगाल और उड़ीसा के दीवानी इख़्तियारात 26 लाख रुपये के इवज़ हासिल कर लिये। बादशाह को इलाहाबाद और कौड़ा जहानाबाद जागीर में दिए गए और हिफ़ाज़त पर अंग्रेज़ फ़ौज नियुक्त हुई। अर्थात अब बादशाह अंग्रेज़ों की क़ैद में थे। बादशाह अंग्रेज़ों की क़ैद से परेशान थे, दिल्ली जाना चाहते थे लेकिन वहां के हालात बहुत ख़राब थे। आख़िर मरहटों ने हिफ़ाज़त का वादा करके उन्हें दिल्ली बुला लिया और उन्हें अपने इशारों पर नचाने लगे। उनसे रूहेलखंड पर हमला कराया, जहां मरहटों ने ख़ूब लूट मचाई और बादशाह को कुछ न दिया। बादशाह रोहेला हाकिम ज़ाबता ख़ां(जो बादशाह के मुहसिन नजीब उद्दौला का बेटा था) के बाल बच्चों को पकड़ कर दिल्ली ले आए। इन ही लड़कों में ग़ुलाम क़ादिर रोहेला था जिसको बादशाह ने ख़स्सी करा दिया और ज़नाना कपड़े पहनने पर मजबूर किया। उसी ग़ुलाम क़ादिर ने आख़िर बादशाह की आँखें निकालीं। वो ख़ुद भी आख़िरकार मरहटों के हाथों बेदर्दी से मारा गया। अंधा होने के बाद भी मरहटों ने शाह आलम को बादशाहत पर बरक़रार रखा। आख़िर अंग्रेज़ों ने आकर उन्हें दिल्ली से भगाया। अब बादशाह एक लाख रुपये माहवार पर अंग्रेज़ों का वज़ीफ़ा-ख़्वार था। उस ज़माने का मशहूर कथन है; “सलतनत शाह आलम अज़ दिल्ली ता पालम।” उसी हालत में 19 नवंबर 1896 में उसकी मौत हुई। बक्सर की जंग में शिकस्त के बाद बादशाह के पास अय्याशी के सिवा करने को कुछ नहीं था। दिल्ली में चौतरफ़ा विद्रोहों के बावजूद ये सिलसिला आँखों से महरूम होने तक जारी रहा। शायरी और संगीत से दिल बहलाते थे। फ़ारसी और उर्दू में आफ़ताब और भाषा में शाह आलम तख़ल्लुस करते थे। फ़ारसी में मिर्ज़ा मुहम्मद फ़ाखिर मकीं से मश्वरा करते थे। उर्दू में सौदा को उनका उस्ताद बताया जाता है जो क़रीन-ए-क़ियास नहीं, सौदा उनके दिल्ली आमद से पहले फ़र्रुखाबाद जा चुके थे। शाह आलम के दौर में सलतनत बिगड़ती जा रही थी मगर उर्दू ज़बान सँवर रही थी। मुहम्मद हुसैन आज़ाद कहते हैं, “आलमगीर के अह्द में वली ने उस नज़्म का चराग़ रौशन किया जो मुहम्मद शाह के अह्द में आसमान पर सितारा बन के चमका और शाह-आलम के अह्द में सूरज बन कर शिखर पर आया। शाह आलम के मिज़ाज में यूं भी स्थायित्व की कमी थी फिर ऐश में तो जादू का सा असर है। दिन रात नाच-गाने और शे’र-ओ-शायरी में गुज़ारने लगे। उन ही के ज़माने में सय्यद इंशा दिल्ली आए और दरबार से सम्बद्ध हो गए। बादशाह को उनके बग़ैर चैन नहीं आता था। शाह आलम बड़े अभ्यस्त शायर थे। उनके अशआर में पेचदार ख़्यालात, मुश्किल वाक्यांश या शब्द और कोई दूरस्थ रूपक नहीं मिलते। जो कुछ दिल में होता सीधे शब्दों में बयान कर देते थे। उनके कलाम में शान-ओ-शौकत कम मगर असर ज़्यादा है। शायरी से हट कर शाह आलम का एक अहम कारनामा उनकी गद्य रचना “अजाइब-उल-क़सस” है। ये दावा तो नहीं किया जाता कि ये हिंदुस्तान या उत्तर भारत में उर्दू गद्य की पहली रचना है लेकिन यह 18वीं सदी की गद्य रचनाओं में से एक ज़रूर है और इसकी ज़बान दूसरी रचनाओं के मुक़ाबले में ज़्यादा निखरी हुई है। अगर नस्री दास्तानों को तारीख़ी क्रम से देखा जाये तो “अजाइब-उल-क़सस”, क़िस्सा मेह्र अफ़रोज़ दिलबर (1759 ई.), नौ तर्ज़-ए- मुरस्सा(1775 ई.), नौ आईन-ए-हिन्दी क़िस्सा मलिक मुहम्मद और गेती अफ़रोज़ (1788 ई.) के बाद चौथी गद्य रचना है जो 1792 ई. में लिखी गई। ये एक ना-मुकम्मल दास्तान है लेकिन इससे उस दौर के बारे में बहुत सी मालूमात हासिल होती हैं। शाह आलम के हिंदी कलाम पर जैसा कि उसका हक़ है अभी तक तवज्जो नहीं दी गई है।  ",
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            "raw_bio": "  उपनाम :  'हज्जू'   मूल नाम :  सय्यद जलालुद्दीन हैदर खान'   जन्म : लखनऊ, उत्तर प्रदेश     शरफ़, सयादत हसन सय्यद जलालुद्दीन हैदर ख़ाँ, आग़ा हज्जू (1812-1887)लखनऊ में पैदाइश। ख़्वाजा हैदर अ’ली के लाइ’क़ शागिर्द थे। नवाब वाजिद अ’ली शाह से रिश्तेदारी थी। 1857 की जंग-ए-आज़ादी के बा’द, नवाब को ज़िलावतन करके कलकत्ता भेजा गया तो शरफ़ भी उनके साथ रहे।  ",
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            "bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'अनवर'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सय्यद शुजाउद्दीन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>दिल्ली</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> दिल्ली, भारत</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ (गुरु), </span>\r\n<span> ज़हीर देहलवी (भाई)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>अनवर देहलवी, सय्यद शुजाउद्दीन, उमराव मिर्ज़ा (1847-1885) मिर्ज़ा ग़ालिब, ‘जौक़’ और ‘मोमिन’ के बा’द के देहलवी शाइ’रों में शामिल प्रमुख शाइ’र और ‘ज़हीर’ देहलवी के छोटे भाई। पहले ‘ज़ौक़’ और फिर ग़ालिब के शागिर्द रहे। 1857 की तबाही में लुटपिट कर राजा जयपुर का दामन थामा और वहीं आख़िरी साँस ली।<br/></p>\r\n</div>",
            "raw_bio": "  उपनाम :  'अनवर'   मूल नाम :  सय्यद शुजाउद्दीन   जन्म : दिल्ली   निधन :  दिल्ली, भारत      संबंधी :    शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ (गुरु),     ज़हीर देहलवी (भाई)       अनवर देहलवी, सय्यद शुजाउद्दीन, उमराव मिर्ज़ा (1847-1885) मिर्ज़ा ग़ालिब, ‘जौक़’ और ‘मोमिन’ के बा’द के देहलवी शाइ’रों में शामिल प्रमुख शाइ’र और ‘ज़हीर’ देहलवी के छोटे भाई। पहले ‘ज़ौक़’ और फिर ग़ालिब के शागिर्द रहे। 1857 की तबाही में लुटपिट कर राजा जयपुर का दामन थामा और वहीं आख़िरी साँस ली।  ",
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            "raw_bio": "  उपनाम :  'असग़र'   मूल नाम :  आग़ा सैयद असग़र अली      ",
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