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            "raw_bio": "‘मिले बस इतना ही’ शीर्षक कविता-संग्रह के कवि। कम आयु में दिवंगत।     जन्म :  09/02/1961  | जयपुर, राजस्थान निधन :  28/01/2007  | जयपुर, राजस्थान     संजीव मिश्र का जन्म 9 फ़रवरी 1961 को लखनऊ में हुआ। स्कूल से लेकर हिंदी में एम.ए. तक की शिक्षा जयपुर में पाई। शिक्षा पूरी कर आरंभ में पूर्णकालिक पत्रकारिता से संलग्न रहे, बाद में स्वतंत्र लेखन करने लगे। देश-विदेश के टीवी प्रोडक्शनों के साथ बतौर फ्रीलांसर भी कार्य किया। कविताओं के अतिरिक्त कहानियाँ, व्यंग्य, समीक्षा, अनुवाद, फीचर-लेखन के साथ ही राजस्थान पत्रिका में लंबे समय तक ‘शब्द-पहेली’ का लेखन किया। भाषा और जीवन दोनों में एक सहज सरलता और संपृक्ति की तलाश में वह अध्यात्म की विभिन्न परंपराओं का अन्वेषण करते रहे जिसका असर उनकी कविताओं में भी नज़र आता है। ‘मिले बस इतना ही’, ‘कुछ शब्द जैसे मेज़’ और ‘लहर भर समय’ उनके तीन काव्य-संग्रह हैं। कैथरीन मेन्सफ़ील्ड की कहानियों और पैट्रीशिया कीनी की कविताओं के उनके हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित हैं। एक अन्य पुस्तक ‘मरीया मोन्तेस्सोरी: जीवनी एवं शिक्षा-दर्शन’ शीर्षक से प्रकाशित है। कम आयु में ही दिवंगत हो जाने से पूर्व उन्होंने कुछ चित्र भी बनाए।    ",
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            "raw_bio": "नवें दशक के कवि। जनवादी लेखक संघ से संबद्ध।     मूल नाम :  सत्येंद्र कुमार   जन्म :  05/01/1961  | गया, बिहार       नवें दशक के कवि सत्येंद्र कुमार की गिनती हिंदी-पट्टी के एक्टिविस्ट कवियों में होती है। वह गया (बिहार) में रहते हैं और जनवादी लेखक संघ से संबद्ध रहे हैं। उन्हें अपने ढंग का हरफनमौला कवि कहा जाता है जो कविता और समाज के लिए पूरी तरह सतत मुस्तैद रहे हैं।  उनकी कविताओं के दो संग्रह ‘आशा इतिहास से संवाद है’ और ‘हे गार्गी’ शीर्षक से शाया हो चुके हैं। उनकी कविताएँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कुछ कविताओं के बांग्ला और उर्दू अनुवाद हुए हैं। उनका एक कहानी-संग्रह ‘इंतज़ार’ शीर्षक से प्रकाशित है। ",
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            "bio": "<p class=\"poetDetailPara\">सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 11/08/1968</bdi> | पिथौरागढ़, उत्तराखंड</span></p>\r\n</div> <br> <p>सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक सुंदर चंद ठाकुर का जन्म 11 अगस्त 1968 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में हुआ। विज्ञान में स्नातक के बाद वह 1992 में भारतीय सेना में कमीशन-अधिकारी के रूप में शामिल हुए और इस दौरान सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के सदस्य के रूप में भी सेवा दी। पाँच वर्षों की सैन्य-सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर साहित्य और पत्रकारिता में सक्रिय हुए और संप्रति नवभारत टाइम्स, मुंबई के स्थानीय संपादक के रूप में कार्यरत हैं।  <br/>प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लेख, समीक्षा, अनुवाद आदि के प्रकाशन के साथ उनका पहला काव्य-संग्रह ‘किसी रंग की छाया’ 2001 में प्रकाशित हुआ। कविताओं में अपने विशिष्ट स्वर के लिए आरंभ से ही चिह्नित किए गए और इस क्रम में भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार (2001) और भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2003) से सम्मानित किए गए। उनका दूसरा काव्य-संग्रह ‘एक दुनिया है असंख्य’ 2008 में प्रकाशित हुआ। संग्रह की भूमिका में मंगलेश डबराल ने उनके सरोकारों को मुक्तिबोध शैली के ज्ञानात्मक संवेदन तक विस्तृत होता दर्ज किया है। जर्मन, बांग्ला, मराठी, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद हुए हैं। उनका एक उपन्यास ‘पत्थर पर दूब’ भी प्रकाशित है। इसके अतिरिक्त वह अख़बार के लिए स्तंभ लेखन भी करते हैं।   ",
            "raw_bio": "सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित।     जन्म :  11/08/1968  | पिथौरागढ़, उत्तराखंड       सुपरिचित कवि-लेखक और संपादक सुंदर चंद ठाकुर का जन्म 11 अगस्त 1968 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में हुआ। विज्ञान में स्नातक के बाद वह 1992 में भारतीय सेना में कमीशन-अधिकारी के रूप में शामिल हुए और इस दौरान सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के सदस्य के रूप में भी सेवा दी। पाँच वर्षों की सैन्य-सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर साहित्य और पत्रकारिता में सक्रिय हुए और संप्रति नवभारत टाइम्स, मुंबई के स्थानीय संपादक के रूप में कार्यरत हैं।   प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लेख, समीक्षा, अनुवाद आदि के प्रकाशन के साथ उनका पहला काव्य-संग्रह ‘किसी रंग की छाया’ 2001 में प्रकाशित हुआ। कविताओं में अपने विशिष्ट स्वर के लिए आरंभ से ही चिह्नित किए गए और इस क्रम में भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार (2001) और भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2003) से सम्मानित किए गए। उनका दूसरा काव्य-संग्रह ‘एक दुनिया है असंख्य’ 2008 में प्रकाशित हुआ। संग्रह की भूमिका में मंगलेश डबराल ने उनके सरोकारों को मुक्तिबोध शैली के ज्ञानात्मक संवेदन तक विस्तृत होता दर्ज किया है। जर्मन, बांग्ला, मराठी, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद हुए हैं। उनका एक उपन्यास ‘पत्थर पर दूब’ भी प्रकाशित है। इसके अतिरिक्त वह अख़बार के लिए स्तंभ लेखन भी करते हैं।   ",
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