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"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">ओड़िया भाषा के सुपरिचित रूमानी कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।</p> ",
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"name": "फणीश्वरनाथ रेणु",
"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">समादृत कथाकार। कुछ कविताएँ भी लिखीं। समाजवादी और आंचलिक संवेदना के लिए उल्लेखनीय। पद्मश्री से सम्मानित।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 04/03/1921 </bdi> | पूर्णिया, बिहार</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 11/04/1977</bdi> | पूर्णिया, बिहार</span\r\n</div> <br> <p><p>स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य में प्रबल उपस्थिति रखने वाले उपन्यासकार-कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ज़िले के औराही हिंगना नामक गाँव में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शिलानाथ और माता का नाम पानो देवी था। उनकी आरंभिक शिक्षा पहले अररिया, फिर फारबिसगंज में हुई। मैट्रिकुलेशन परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्हें आगे की शिक्षा के लिए बनारस भेजा गया। लेकिन वहाँ अधिक समय टिक नहीं सके और बिहार लौट आए। उन्होंने भागलपुर के एक कॉलेज में दाख़िला लिया और सक्रिय राजनीति से संलग्न होने लगे। यहीं वह समाजवादी आंदोलन के प्रभाव में भी आए। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में इन्होंने खुलकर भाग लिया था और इस कारण जेल भी गए। इनका जन्म स्थान भारत-नेपाल सीमा के निकट था। इस कारण उनकी स्वाभाविक रुचि नेपाल की सशस्त्र क्रांति में भी रही। 1950 में जब नेपाल की एकतंत्रीय राजशाही के विरुद्ध संघर्ष छिड़ा तो एक क्रांतिकारी के रूप में वह भी विद्रोही सेना के साथ रहे। वह विद्रोहियों द्वारा परिचालित नेपाल रेडियो के प्रथम डायरेक्टर जनरल भी बने। वह लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे थे। उनके व्यक्तित्व का विकास एक सजग नागिरक और देशभक्त के साथ ही एक सृजनात्मक लेखक के रूप में होने लगा था।</p><p>रेणु 1952-53 में दीर्घकाल तक रोगग्रस्त रहे थे। इस कारण वह सक्रिय राजनीति से दूर हटकर साहित्य सृजन की ओर प्रवृत्त हुए। यद्यपि उनकी राजनीतिक सजगता अंतिम समय तक भी बनी रही थी और देश में आपातकाल का उन्होंने कड़ा विरोध किया था। 1954 में प्रकाशित हुए उनके पहले उपन्यास ‘मैला आंचल’ ने ही उन्हें हिंदी साहित्यिक जगत में स्थापित कर दिया।</p><p>फणीश्वरनाथ रेणु को हिंदी साहित्य में एक आँचलिक युग की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। यद्यपि आँचलिकता की प्रवृति का आरंभ प्रेमचंद युग से ही दृष्टिगोचर होने लगा था और आँचलिक उपन्यासों की विधा का सूत्रपात भी हो चुका था, लेकिन रेणु के उपन्यासों और कहानियों के साथ इसका पूर्ण विकास हुआ। उन्होंने अपने उपन्यास और कहानियों में ग्रामीण जीवन का गहन रागात्मक और रसपूर्ण चित्र खींचा है। उनकी विशिष्ट भाषा-शैली ने हिंदी कथा-साहित्य को एक नया आयाम प्रदान किया।</p><p>‘परती परिकथा’ उपन्यास और ‘मारे गये गुलफाम’ कहानी, जिस पर राजकपूर अभिनीत प्रसिद्ध फ़िल्म बनी, के साथ उनकी ख्याति और बढ़ गई। उपन्यास और कहानी के अतिरिक्त उन्होंने निबंध, रिपोर्ताज़, संस्मरण आदि गद्य विधाओं में भी लेखन किया और व्यापक रूप से सराहे जाते हैं।</p><p> <br/>भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया और उन पर डाक टिकट भी ज़ारी किया गया है। <br/><br/>प्रमुख कृतियाँ</p><p>उपन्यास : मैला आँचल, परती परिकथा, जुलूस, पल्टू बाबू रोड, दीर्घतपा, कितने चौराहे।</p><p>कहानी-संग्रह : ठुमरी, एक आदिम रात्रि की महक, अग्निखोर, मेरी प्रिय कहानियाँ, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी।</p><p>चर्चित कहानियाँ : मारे गए गुलफाम, एक आदिम रात्रि की महक, लाल पान की बेगम, पंचलाइट, तबे एकला चलो रे, ठेस, संवदिया।</p><p>रिपोर्ताज़/संस्मरण/निबंध : ऋणजल-धनजल, श्रुत-अश्रुत पूर्व, आत्म परिचय, वन तुलसी की गंध, समय की शिला पर, नेपाली क्रांतिकथा।<br/</p>",
"raw_bio": "समादृत कथाकार। कुछ कविताएँ भी लिखीं। समाजवादी और आंचलिक संवेदना के लिए उल्लेखनीय। पद्मश्री से सम्मानित। जन्म : 04/03/1921 | पूर्णिया, बिहार निधन : 11/04/1977 | पूर्णिया, बिहार स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य में प्रबल उपस्थिति रखने वाले उपन्यासकार-कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ज़िले के औराही हिंगना नामक गाँव में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शिलानाथ और माता का नाम पानो देवी था। उनकी आरंभिक शिक्षा पहले अररिया, फिर फारबिसगंज में हुई। मैट्रिकुलेशन परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्हें आगे की शिक्षा के लिए बनारस भेजा गया। लेकिन वहाँ अधिक समय टिक नहीं सके और बिहार लौट आए। उन्होंने भागलपुर के एक कॉलेज में दाख़िला लिया और सक्रिय राजनीति से संलग्न होने लगे। यहीं वह समाजवादी आंदोलन के प्रभाव में भी आए। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में इन्होंने खुलकर भाग लिया था और इस कारण जेल भी गए। इनका जन्म स्थान भारत-नेपाल सीमा के निकट था। इस कारण उनकी स्वाभाविक रुचि नेपाल की सशस्त्र क्रांति में भी रही। 1950 में जब नेपाल की एकतंत्रीय राजशाही के विरुद्ध संघर्ष छिड़ा तो एक क्रांतिकारी के रूप में वह भी विद्रोही सेना के साथ रहे। वह विद्रोहियों द्वारा परिचालित नेपाल रेडियो के प्रथम डायरेक्टर जनरल भी बने। वह लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे थे। उनके व्यक्तित्व का विकास एक सजग नागिरक और देशभक्त के साथ ही एक सृजनात्मक लेखक के रूप में होने लगा था। रेणु 1952-53 में दीर्घकाल तक रोगग्रस्त रहे थे। इस कारण वह सक्रिय राजनीति से दूर हटकर साहित्य सृजन की ओर प्रवृत्त हुए। यद्यपि उनकी राजनीतिक सजगता अंतिम समय तक भी बनी रही थी और देश में आपातकाल का उन्होंने कड़ा विरोध किया था। 1954 में प्रकाशित हुए उनके पहले उपन्यास ‘मैला आंचल’ ने ही उन्हें हिंदी साहित्यिक जगत में स्थापित कर दिया। फणीश्वरनाथ रेणु को हिंदी साहित्य में एक आँचलिक युग की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। यद्यपि आँचलिकता की प्रवृति का आरंभ प्रेमचंद युग से ही दृष्टिगोचर होने लगा था और आँचलिक उपन्यासों की विधा का सूत्रपात भी हो चुका था, लेकिन रेणु के उपन्यासों और कहानियों के साथ इसका पूर्ण विकास हुआ। उन्होंने अपने उपन्यास और कहानियों में ग्रामीण जीवन का गहन रागात्मक और रसपूर्ण चित्र खींचा है। उनकी विशिष्ट भाषा-शैली ने हिंदी कथा-साहित्य को एक नया आयाम प्रदान किया। ‘परती परिकथा’ उपन्यास और ‘मारे गये गुलफाम’ कहानी, जिस पर राजकपूर अभिनीत प्रसिद्ध फ़िल्म बनी, के साथ उनकी ख्याति और बढ़ गई। उपन्यास और कहानी के अतिरिक्त उन्होंने निबंध, रिपोर्ताज़, संस्मरण आदि गद्य विधाओं में भी लेखन किया और व्यापक रूप से सराहे जाते हैं। भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया और उन पर डाक टिकट भी ज़ारी किया गया है। प्रमुख कृतियाँ उपन्यास : मैला आँचल, परती परिकथा, जुलूस, पल्टू बाबू रोड, दीर्घतपा, कितने चौराहे। कहानी-संग्रह : ठुमरी, एक आदिम रात्रि की महक, अग्निखोर, मेरी प्रिय कहानियाँ, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी। चर्चित कहानियाँ : मारे गए गुलफाम, एक आदिम रात्रि की महक, लाल पान की बेगम, पंचलाइट, तबे एकला चलो रे, ठेस, संवदिया। रिपोर्ताज़/संस्मरण/निबंध : ऋणजल-धनजल, श्रुत-अश्रुत पूर्व, आत्म परिचय, वन तुलसी की गंध, समय की शिला पर, नेपाली क्रांतिकथा।",
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"raw_bio": "राजस्थान के किसान परिवार में जन्म। आडंबरहीन, सरल व सीधी भाषा में ज्ञान मार्ग के गूढ़ तथ्यों को जनमानस के सामने रखा जिससे साधारण व बिना पढ़ा व्यक्ति भी मुक्ति का मार्ग अपना सके। ",
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"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">चंबल के बीहड़ों का पड़ोस रखने वाले कवि-पत्रकार। जनवादी विचारों के लिए उल्लेखनीय।</p> ",
"raw_bio": "चंबल के बीहड़ों का पड़ोस रखने वाले कवि-पत्रकार। जनवादी विचारों के लिए उल्लेखनीय। ",
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"bio": " <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> फ़्रांस एमिल सिलांपा</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 16/09/1888</bdi></span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 03/06/1964</bdi> | फिनलैंड</span\r\n</div> <br> <p",
"raw_bio": " मूल नाम : फ़्रांस एमिल सिलांपा जन्म : 16/09/1888 निधन : 03/06/1964 | फिनलैंड ",
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"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">मराठी और कोंकणी के सुप्रसिद्ध कवि-कादंबरीकार। पद्मश्री से सम्मानित।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> बाळकृष्ण भगवंत बोरकर</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 30/11/1910</bdi> | गोवा</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 08/07/1984</bdi> | पुणे, महाराष्ट्र</span\r\n</div> <br> <p",
"raw_bio": "मराठी और कोंकणी के सुप्रसिद्ध कवि-कादंबरीकार। पद्मश्री से सम्मानित। मूल नाम : बाळकृष्ण भगवंत बोरकर जन्म : 30/11/1910 | गोवा निधन : 08/07/1984 | पुणे, महाराष्ट्र ",
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"name": "बा. सी. मर्ढेकर",
"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">मराठी नवकाव्य के अग्रणी कवि और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> बाळ सीताराम मर्ढेकर</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 01/12/1909</bdi> | फैज़पुर, महाराष्ट्र</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 20/03/1956</bdi> | देहली, दिल्ली</span\r\n</div> <br> <p",
"raw_bio": "मराठी नवकाव्य के अग्रणी कवि और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बाळ सीताराम मर्ढेकर जन्म : 01/12/1909 | फैज़पुर, महाराष्ट्र निधन : 20/03/1956 | देहली, दिल्ली ",
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"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">मधुर उपासना से संबंधित रीतिकालीन भक्त कवि।</p> ",
"raw_bio": "मधुर उपासना से संबंधित रीतिकालीन भक्त कवि। ",
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"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">पंजाबी भाषा के सुपरिचित कवि और निबंधकार। पंजाबी कविता के प्रगतिशील आंदोलन में\r\r\nयोगदान।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> मंगल सेन</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>अमृतसर, पंजाब</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span> नई दिल्ली, दिल्ली</span\r\n</div> <br> <p",
"raw_bio": "पंजाबी भाषा के सुपरिचित कवि और निबंधकार। पंजाबी कविता के प्रगतिशील आंदोलन में\r\r योगदान। मूल नाम : मंगल सेन जन्म : अमृतसर, पंजाब निधन : नई दिल्ली, दिल्ली ",
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"name": "बाबा रामदेव",
"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">राजस्थान के पाँच पीरों में से एक। जाति से क्षत्रिय और वृत्ति से संत। हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के सबसे बड़े पक्षधर। दोनों धर्मों में समान रूप से पूज्य।</p> ",
"raw_bio": "राजस्थान के पाँच पीरों में से एक। जाति से क्षत्रिय और वृत्ति से संत। हिंदू-मुस्लिम सौहार्द के सबसे बड़े पक्षधर। दोनों धर्मों में समान रूप से पूज्य। ",
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"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">नई पीढ़ी की सुपरिचित-सम्मानित बांग्ला कवि-गद्यकार-अनुवादक। बारह से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी में भी कविताएँ लिखती हैं।</p> ",
"raw_bio": "नई पीढ़ी की सुपरिचित-सम्मानित बांग्ला कवि-गद्यकार-अनुवादक। बारह से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी में भी कविताएँ लिखती हैं। ",
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"name": "बच्चा लाल 'उन्मेष'",
"bio": "<p class=\"poetDetailPara\">सुपरिचित कवि। 'कौन जात हो भाई', 'छिछले प्रश्न गहरे उत्तर' और 'बहार के पतझड़' शीर्षक से तीन कविता-संग्रह प्रकाशित।</p> ",
"raw_bio": "सुपरिचित कवि। 'कौन जात हो भाई', 'छिछले प्रश्न गहरे उत्तर' और 'बहार के पतझड़' शीर्षक से तीन कविता-संग्रह प्रकाशित। ",
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"description": "<p style=\"text-align: center; font-size: 24px;\"> The Great Poets and Writers in Indian and World History! </p>",
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