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            "raw_bio": "नई पीढ़ी के कवि-लेखक और अनुवादक    जन्म :  09/06/1995  | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश       धर्मेश इलाहाबाद में रहते हैं और अपने दोस्तों से मिलने के लिए हर दूसरे दिन गंगा नदी पार करते हैं। वह बतौर लेखक, संपादक और अनुवादक सक्रिय हैं, और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रेज़ी में एमए किया है। वह सेफ़ एक्सेस और इंडिया फ़ेलो रह चुके हैं",
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            "bio": "<p class=\"poetDetailPara\">हिंदी भाषा के पहले वैज्ञानिक इतिहासकार के रूप में समादृत। ‘हिंदी विश्वकोश’ और ‘हिंदी साहित्य कोश’ के संपादन में योगदान <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'धीरेन्द्र वर्मा'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> धीरेन्द्र वर्मा</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 01/05/1897</bdi> | बरेली, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 01/04/1973</bdi></span></p>\r\n</div> <br> <p>हिंदी और ब्रजभाषा के समादृत कवि और लेखक धीरेन्द्र वर्मा का जन्म 17 मई, 1897 को बरेली (उत्तर प्रदेश) के भूड़ मोहल्ले में हुआ था। उनके परिवार पर आर्य समाज का प्रभाव था और बचपन में उनपर भी यही संस्कार पड़ा। म्योर सेंट्रल कॉलेज से संस्कृत भाषा में स्नातकोत्तर के साथ ही उन्होंने पेरिस विश्वविद्यालय से डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की थी। वह वर्ष 1924 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रथम अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने यहीं हिंदी विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी योगदान दिया और कालांतर में सागर विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान विभागाध्यक्ष और फिर जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में सेवा दी। <br/><br/>हिंदी में उनके योगदान की परख में कहा जाता है कि हिंदी समीक्षा में जैसा महत्त्वपूर्ण योगदान आचार्य रामचंद्र शुक्ल का रहा, वैसा ही योगदान हिंदी शोध के क्षेत्र में धीरेन्द्र वर्मा का रहा। उनके निबंधों के आधार पर अनेक गंभीर शोध कार्य हुए हैं। भारतीय भाषाओं से संबद्ध समस्त शोध कार्यों के आधार पर इन्होंने 1933 में हिंदी भाषा का प्रथम वैज्ञानिक इतिहास लिखा था। यह अपने समय तक के आधुनिक भाषाओं से संबंधित खोज कार्य के गंभीर अनुशीलन के आधार पर रचित हिंदी भाषा का प्रथम वैज्ञानिक इतिहास है।  वह हिन्दुस्तानी अकादमी के मंत्री रहे थे। उन्होंने ‘लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष के रूप में भी सेवा दी। वह प्रथम 'हिंदी विश्वकोश' के प्रधान संपादक रहे हैं।<br/>'ब्रजभाषा व्याकरण', 'अष्टछाप', 'सूरसागर-सार', 'मेरी कालिज डायरी', 'मध्यदेश', 'ब्रजभाषा', 'हिंदी साहित्य कोश', 'हिंदी साहित्य', 'कंपनी के पत्र',<span style=\"white-space:pre;\"> </span>'ग्रामीण हिंदी', 'हिंदी राष्ट्र', 'विचार धारा', 'यूरोप के पत्र' आदि उनके द्वारा रचित और संपादित-संकलित प्रमुख कृतियाँ हैं।<span style=\"white-space:pre;\"> </span><br/>23 अप्रैल, 1973 को उनका निधन हुआ",
            "raw_bio": "हिंदी भाषा के पहले वैज्ञानिक इतिहासकार के रूप में समादृत। ‘हिंदी विश्वकोश’ और ‘हिंदी साहित्य कोश’ के संपादन में योगदान    उपनाम :  'धीरेन्द्र वर्मा'   मूल नाम :  धीरेन्द्र वर्मा   जन्म :  01/05/1897  | बरेली, उत्तर प्रदेश   निधन :  01/04/1973       हिंदी और ब्रजभाषा के समादृत कवि और लेखक धीरेन्द्र वर्मा का जन्म 17 मई, 1897 को बरेली (उत्तर प्रदेश) के भूड़ मोहल्ले में हुआ था। उनके परिवार पर आर्य समाज का प्रभाव था और बचपन में उनपर भी यही संस्कार पड़ा। म्योर सेंट्रल कॉलेज से संस्कृत भाषा में स्नातकोत्तर के साथ ही उन्होंने पेरिस विश्वविद्यालय से डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की थी। वह वर्ष 1924 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रथम अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। उन्होंने यहीं हिंदी विभाग के अध्यक्ष के रूप में भी योगदान दिया और कालांतर में सागर विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान विभागाध्यक्ष और फिर जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में सेवा दी।  हिंदी में उनके योगदान की परख में कहा जाता है कि हिंदी समीक्षा में जैसा महत्त्वपूर्ण योगदान आचार्य रामचंद्र शुक्ल का रहा, वैसा ही योगदान हिंदी शोध के क्षेत्र में धीरेन्द्र वर्मा का रहा। उनके निबंधों के आधार पर अनेक गंभीर शोध कार्य हुए हैं। भारतीय भाषाओं से संबद्ध समस्त शोध कार्यों के आधार पर इन्होंने 1933 में हिंदी भाषा का प्रथम वैज्ञानिक इतिहास लिखा था। यह अपने समय तक के आधुनिक भाषाओं से संबंधित खोज कार्य के गंभीर अनुशीलन के आधार पर रचित हिंदी भाषा का प्रथम वैज्ञानिक इतिहास है।  वह हिन्दुस्तानी अकादमी के मंत्री रहे थे। उन्होंने ‘लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष के रूप में भी सेवा दी। वह प्रथम 'हिंदी विश्वकोश' के प्रधान संपादक रहे हैं। 'ब्रजभाषा व्याकरण', 'अष्टछाप', 'सूरसागर-सार', 'मेरी कालिज डायरी', 'मध्यदेश', 'ब्रजभाषा', 'हिंदी साहित्य कोश', 'हिंदी साहित्य', 'कंपनी के पत्र',   'ग्रामीण हिंदी', 'हिंदी राष्ट्र', 'विचार धारा', 'यूरोप के पत्र' आदि उनके द्वारा रचित और संपादित-संकलित प्रमुख कृतियाँ हैं।   23 अप्रैल, 1973 को उनका निधन हुआ",
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            "name": "धूमिल",
            "bio": "<p class=\"poetDetailPara\">‘अकविता’ आंदोलन के समय उभरे हिंदी के चर्चित कवि। मरणोपरांत साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।</p> <div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'धूमिल'</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सुदामा पांडेय धूमिल</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 09/11/1936</bdi> | वाराणसी, उत्तर प्रदेश</span\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 10/02/1975</bdi> | लखनऊ, उत्तर प्रदेश</span\r\n</div> <br> <p>साठोत्तरी कविता में ‘धूमिल’ का उदय एक महत्त्वपूर्ण घटना की तरह हुआ। धूमिल के रूप में नई कविता और अकविता के किसी संक्रमण सुरंग से हाथ में औज़ार लिए हिंदी कविता का एक वास्तविक मज़दूर-किसान सामने आया था जिसने अपने औज़ार हथियार की तरह समकालीन कविता-विमर्श पर तान दिए थे। लेकिन उसके औज़ार हथियार नहीं हैं। वह स्वयं आगाह करते हुए कहते हैं कि ‘‘शब्द और शस्त्र के व्यवहार का व्याकरण अलग-अलग है। शब्द अपने वर्ग-मित्रों में कारगर होते हैं और शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु पर।’’ उनका आक्रोश अकविता, क्रुद्ध युवा पीढ़ी, श्मशानी या भूखी पीढ़ी के आक्रोश से इस मायने में भिन्न था कि इसके मूल में शोषण से मुक्ति की प्रबल आकांक्षा मौजूद थी। उनका आक्रोश एक पूरी पीढ़ी, वर्ग और युग का आक्रोश भी था जो कविता, विमर्श, राजनीति में मुखर हो रहा था। <br/><br/>‘धूमिल’ उपनाम उन्होंने ख़ुद चुना था। उनका मूल नाम सुदामा पांडेय था। उनका जन्म 9 नवंबर 1936 को वाराणसी के खेवली ग्राम में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। परिवार का जीविकोपार्जन किसानी और दुकानी पर निर्भर था। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में ही हुई। तेरह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह भी संपन्न हो गया। वह उच्च शिक्षा का कुछ सोचते, तभी पिता की मृत्यु से परिवार का उत्तरदायित्व उनके कँधे पर आ गया। उन्होंने कलकत्ता के एक लोहे के कारख़ाने में मज़दूरी की, फिर कुछ समय बाद एक ट्रेड कंपनी की नौकरी करने लगे। बाद में उन्होंने आईटीआई से इलेक्ट्रिक डिप्लोमा किया और अनुदेशक की नौकरी करने लगे। इन कुछ रोज़गार अवसरों से गुज़रते व्यवस्था और पूँजीवादी संरचना के प्रति उनका आक्रोश गहरा ही होता गया। व्यवस्था-विरोध उनके स्वभाव और उनकी कविता की एक विशेष प्रवृत्ति ही रही। उनकी कविताओं में यहाँ-वहाँ नज़र आती ‘अराजकता’ युगीन प्रभाव की देन भी है। नक्सलबाड़ी स्वच्छंदता का प्रभाव उस दौर के कई निम्नमध्यमवर्गीय कवियों में प्रकट हुआ है। ‘धूमिल’ के दृष्टिकोण की कुछ सीमितता उच्च शिक्षा और एक्सपोज़र के अभाव के कारण भी है। <br/><br/>धूमिल की अपनी विशिष्ट काव्य-भाषा है जिसमें आमफ़हम शब्दों का बहुलता से प्रयोग हुआ है। उनकी कविताओं की सफलता और लोकप्रियता में बिंबों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जो प्रखर और ताज़े हैं। उनकी काव्य-भाषा की एक अन्य विशेषता बार-बार प्रकट होने वाले सामान्यीकरण हैं जो उनकी कविता में ‘ड्रामा’ के तत्वों का प्रवेश कराते हैं। देश की आज़ादी से मोहभंग उनकी कविताओं में अत्यंत तीक्ष्णता से अभिव्यक्त हुआ है और ये कविताएँ उन तमाम नैतिकताओं, भद्रताओं से लोहा लेती हैं जिनका इस्तिमाल शासन अपनी रक्षा के लिए करता है। उनकी भाषा की सरलता और प्रवाह उन्हें लोकप्रिय कविताओं में शुमार कराती है। उनके विषयों में आम जीवन, उसके संघर्ष और प्रतिरोध के सभी चित्र मौजूद हैं। <br/><br/>धूमिल का 39 वर्ष की अल्पायु में ब्रेन ट्यूमर से निधन हो गया। उनके जीवनकाल में उनका एक ही काव्य-संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ (1972) प्रकाशित हो सका था। मरणोपरांत उनके दो अन्य संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ (1977) और ‘सुदामा पाँडे का प्रजातंत्र’ (1984) संकलित हुए। गद्य विधा में उनकी सात कहानियाँ और दर्जनाधिक निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उनकी डायरी, पत्रों और उनपर लिखे गए संस्मरणों से उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश पड़ता है। इसके साथ ही ये उनकी कविताओं तक पहुँच के ‘टूल्स’ के रूप में भी काम आते हैं। इसके साथ ही उन्होंने अनुवाद और नाट्यलेखन में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। <br/><br/>उनके मरणोपरांत ‘कल सुनना मुझे’ काव्य संग्रह के लिए उन्हें वर्ष 1979 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।<br/",
            "raw_bio": "‘अकविता’ आंदोलन के समय उभरे हिंदी के चर्चित कवि। मरणोपरांत साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।     उपनाम :  'धूमिल' मूल नाम :  सुदामा पांडेय धूमिल जन्म :  09/11/1936  | वाराणसी, उत्तर प्रदेश निधन :  10/02/1975  | लखनऊ, उत्तर प्रदेश     साठोत्तरी कविता में ‘धूमिल’ का उदय एक महत्त्वपूर्ण घटना की तरह हुआ। धूमिल के रूप में नई कविता और अकविता के किसी संक्रमण सुरंग से हाथ में औज़ार लिए हिंदी कविता का एक वास्तविक मज़दूर-किसान सामने आया था जिसने अपने औज़ार हथियार की तरह समकालीन कविता-विमर्श पर तान दिए थे। लेकिन उसके औज़ार हथियार नहीं हैं। वह स्वयं आगाह करते हुए कहते हैं कि ‘‘शब्द और शस्त्र के व्यवहार का व्याकरण अलग-अलग है। शब्द अपने वर्ग-मित्रों में कारगर होते हैं और शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु पर।’’ उनका आक्रोश अकविता, क्रुद्ध युवा पीढ़ी, श्मशानी या भूखी पीढ़ी के आक्रोश से इस मायने में भिन्न था कि इसके मूल में शोषण से मुक्ति की प्रबल आकांक्षा मौजूद थी। उनका आक्रोश एक पूरी पीढ़ी, वर्ग और युग का आक्रोश भी था जो कविता, विमर्श, राजनीति में मुखर हो रहा था।  ‘धूमिल’ उपनाम उन्होंने ख़ुद चुना था। उनका मूल नाम सुदामा पांडेय था। उनका जन्म 9 नवंबर 1936 को वाराणसी के खेवली ग्राम में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। परिवार का जीविकोपार्जन किसानी और दुकानी पर निर्भर था। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में ही हुई। तेरह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह भी संपन्न हो गया। वह उच्च शिक्षा का कुछ सोचते, तभी पिता की मृत्यु से परिवार का उत्तरदायित्व उनके कँधे पर आ गया। उन्होंने कलकत्ता के एक लोहे के कारख़ाने में मज़दूरी की, फिर कुछ समय बाद एक ट्रेड कंपनी की नौकरी करने लगे। बाद में उन्होंने आईटीआई से इलेक्ट्रिक डिप्लोमा किया और अनुदेशक की नौकरी करने लगे। इन कुछ रोज़गार अवसरों से गुज़रते व्यवस्था और पूँजीवादी संरचना के प्रति उनका आक्रोश गहरा ही होता गया। व्यवस्था-विरोध उनके स्वभाव और उनकी कविता की एक विशेष प्रवृत्ति ही रही। उनकी कविताओं में यहाँ-वहाँ नज़र आती ‘अराजकता’ युगीन प्रभाव की देन भी है। नक्सलबाड़ी स्वच्छंदता का प्रभाव उस दौर के कई निम्नमध्यमवर्गीय कवियों में प्रकट हुआ है। ‘धूमिल’ के दृष्टिकोण की कुछ सीमितता उच्च शिक्षा और एक्सपोज़र के अभाव के कारण भी है।  धूमिल की अपनी विशिष्ट काव्य-भाषा है जिसमें आमफ़हम शब्दों का बहुलता से प्रयोग हुआ है। उनकी कविताओं की सफलता और लोकप्रियता में बिंबों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जो प्रखर और ताज़े हैं। उनकी काव्य-भाषा की एक अन्य विशेषता बार-बार प्रकट होने वाले सामान्यीकरण हैं जो उनकी कविता में ‘ड्रामा’ के तत्वों का प्रवेश कराते हैं। देश की आज़ादी से मोहभंग उनकी कविताओं में अत्यंत तीक्ष्णता से अभिव्यक्त हुआ है और ये कविताएँ उन तमाम नैतिकताओं, भद्रताओं से लोहा लेती हैं जिनका इस्तिमाल शासन अपनी रक्षा के लिए करता है। उनकी भाषा की सरलता और प्रवाह उन्हें लोकप्रिय कविताओं में शुमार कराती है। उनके विषयों में आम जीवन, उसके संघर्ष और प्रतिरोध के सभी चित्र मौजूद हैं।  धूमिल का 39 वर्ष की अल्पायु में ब्रेन ट्यूमर से निधन हो गया। उनके जीवनकाल में उनका एक ही काव्य-संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ (1972) प्रकाशित हो सका था। मरणोपरांत उनके दो अन्य संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ (1977) और ‘सुदामा पाँडे का प्रजातंत्र’ (1984) संकलित हुए। गद्य विधा में उनकी सात कहानियाँ और दर्जनाधिक निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उनकी डायरी, पत्रों और उनपर लिखे गए संस्मरणों से उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश पड़ता है। इसके साथ ही ये उनकी कविताओं तक पहुँच के ‘टूल्स’ के रूप में भी काम आते हैं। इसके साथ ही उन्होंने अनुवाद और नाट्यलेखन में भी अपनी प्रतिभा दिखाई।  उनके मरणोपरांत ‘कल सुनना मुझे’ काव्य संग्रह के लिए उन्हें वर्ष 1979 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।",
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