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"name": "सुरूर जहानाबादी",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'सुरूर'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> दुर्गा सहाय</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>जहानाबाद, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 03 Dec 1910</bdi> | पीलीभीत, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">LCCN :</span><span>n84048919</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p>सुरूर जहाँनाबादी का नाम दुर्गा सहाय था, सुरूर तख़ल्लुस करते थे। उनका जन्म दिसंबर 1873 में जहाँनाबाद ज़िला पीलीभीत में हुआ। आरम्भिक शिक्षा जहाँनाबाद के तहसील के स्कूल में हुई। सैयद करामत हुसैन से फ़ारसी ज़बान सीखी और उन्हीं के प्रभाव से शे’र-ओ-शायरी से रूचि पैदा हुई और विधिवत शायरी करने लगे। कुछ अर्से बाद सुरूर ने अंग्रेज़ी मिडिल परिक्षा भी पास कर ली। सुरूर पहले ‘वहशत’ तख़ल्लुस करते थे बाद में सुरूर तख़ल्लुस अपनाया।</p><p>सुरूर की नज़्में और ग़ज़लें बहुत अलग वातावरण की थीं इसलिए उनका कलाम ‘अदीब’ और ‘मख़ज़न’ जैसी पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं। सुरूर ने विधिवत रूप से नज़्म विधा में दिलचस्पी ली। नयी नज़्म को विषयगत और शैली के लिहाज़ से समृद्ध करने में उनकी मुख्य भूमिका है।</p><p>सुरूर की ज़िंदगी में एक भयानक पीड़ा भी रही है। उनकी बीवी और इकलौते बेटे की मौत ने उन्हें अंदर से ख़ाली कर दिया, सुरूर ने इस ख़ालीपन के भरने को शराब का सहारा लिया और बेतहाशा शराब पीने लगे। यही मदिरापान की अधिकता उनकी मौत का कारण बनी।<br/></p><p style=\"text-align:justify;\"> </p><p style=\"text-align:justify;\"> </p><p style=\"text-align:justify;\"><span lang=\"EN-US\" style=\"font-size:18.0pt;line-height:115%;font-family:'Kokila','sans-serif';color:red;background:white;\"> </span></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'सुरूर' मूल नाम : दुर्गा सहाय जन्म : जहानाबाद, उत्तर प्रदेश निधन : 03 Dec 1910 | पीलीभीत, उत्तर प्रदेश LCCN : n84048919 सुरूर जहाँनाबादी का नाम दुर्गा सहाय था, सुरूर तख़ल्लुस करते थे। उनका जन्म दिसंबर 1873 में जहाँनाबाद ज़िला पीलीभीत में हुआ। आरम्भिक शिक्षा जहाँनाबाद के तहसील के स्कूल में हुई। सैयद करामत हुसैन से फ़ारसी ज़बान सीखी और उन्हीं के प्रभाव से शे’र-ओ-शायरी से रूचि पैदा हुई और विधिवत शायरी करने लगे। कुछ अर्से बाद सुरूर ने अंग्रेज़ी मिडिल परिक्षा भी पास कर ली। सुरूर पहले ‘वहशत’ तख़ल्लुस करते थे बाद में सुरूर तख़ल्लुस अपनाया। सुरूर की नज़्में और ग़ज़लें बहुत अलग वातावरण की थीं इसलिए उनका कलाम ‘अदीब’ और ‘मख़ज़न’ जैसी पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं। सुरूर ने विधिवत रूप से नज़्म विधा में दिलचस्पी ली। नयी नज़्म को विषयगत और शैली के लिहाज़ से समृद्ध करने में उनकी मुख्य भूमिका है। सुरूर की ज़िंदगी में एक भयानक पीड़ा भी रही है। उनकी बीवी और इकलौते बेटे की मौत ने उन्हें अंदर से ख़ाली कर दिया, सुरूर ने इस ख़ालीपन के भरने को शराब का सहारा लिया और बेतहाशा शराब पीने लगे। यही मदिरापान की अधिकता उनकी मौत का कारण बनी। ",
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"name": "स्वामी श्यामानन्द सरस्वती रौशन",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'रौशन'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 26 Nov 1920</bdi> | पेशावर, ख़ैबर पुख़्तुंख़ुवा</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'रौशन' जन्म : 26 Nov 1920 | पेशावर, ख़ैबर पुख़्तुंख़ुवा ",
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"name": "स्वप्निल तिवारी",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> Swapnil Kumar Tiwari</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 06 Oct 1984</bdi> | ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p><p>नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करनेवाली शायरी की दुनिया में स्वप्निल तिवारी विश्वसनीय भी हैं और लोकप्रिय भी। उन्होंने अपने आधुनिक रंग, अनूठी शैली से उर्दू शायरी में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी पैदाइश 6 अक्तूबर 1984 को ग़ाज़ीपुर, उतर प्रदेश में हुई।</p><p>फ़िलहाल आप मुंबई में रहते हैं और फ़िल्मी दुनिया से सम्बद्ध हैं और शायर के साथ साथ स्क्रिप्ट राईटर भी हैं। आपकी शायरी आधुनिकता का स्पष्ट प्रतिबिंब है। आपकी काव्य विशेषताओं में आधुनिक शब्दों का इस्तेमाल और ठहराव है। अपनी ग़ज़लों में नए विषयों को बहुत ख़ूबसूरती और नफ़ासत के साथ कलमबंद करते हैं, शब्दों का चित्रण या यूं कहा जाये कि चित्रांकन इस तरह करते हैं कि अशआर पढ़ते वक़्त पूरा परिदृश्य हमारी आँखों के सामने आ जाता है। स्वप्निल तिवारी का अंतर्ज्ञान विचारों की जिन वादियों से गुज़रता है वहां का चित्रांकन कर लेता है और फिर उन विचारों को हू-ब-हू उन्हें शब्दों की शक्ल में ढाल देता है। आज के दौर के नौजवान शायरों में लफ़्ज़ों को बरतने का ऐसा सलीक़ा कम ही लोगों के यहां देखने को मिलता है। स्वप्निल तिवारी का पहला काव्य संग्रह “चांद डिनर पर बैठा है” प्रकाशित हो चुका है जिसको अदबी हलक़ों में काफ़ी सराहा गया है। उनका दूसरा काव्य संग्रह “ज़िंदगी इक उदास लड़की है” शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है।<br/></p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " मूल नाम : Swapnil Kumar Tiwari जन्म : 06 Oct 1984 | ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करनेवाली शायरी की दुनिया में स्वप्निल तिवारी विश्वसनीय भी हैं और लोकप्रिय भी। उन्होंने अपने आधुनिक रंग, अनूठी शैली से उर्दू शायरी में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी पैदाइश 6 अक्तूबर 1984 को ग़ाज़ीपुर, उतर प्रदेश में हुई। फ़िलहाल आप मुंबई में रहते हैं और फ़िल्मी दुनिया से सम्बद्ध हैं और शायर के साथ साथ स्क्रिप्ट राईटर भी हैं। आपकी शायरी आधुनिकता का स्पष्ट प्रतिबिंब है। आपकी काव्य विशेषताओं में आधुनिक शब्दों का इस्तेमाल और ठहराव है। अपनी ग़ज़लों में नए विषयों को बहुत ख़ूबसूरती और नफ़ासत के साथ कलमबंद करते हैं, शब्दों का चित्रण या यूं कहा जाये कि चित्रांकन इस तरह करते हैं कि अशआर पढ़ते वक़्त पूरा परिदृश्य हमारी आँखों के सामने आ जाता है। स्वप्निल तिवारी का अंतर्ज्ञान विचारों की जिन वादियों से गुज़रता है वहां का चित्रांकन कर लेता है और फिर उन विचारों को हू-ब-हू उन्हें शब्दों की शक्ल में ढाल देता है। आज के दौर के नौजवान शायरों में लफ़्ज़ों को बरतने का ऐसा सलीक़ा कम ही लोगों के यहां देखने को मिलता है। स्वप्निल तिवारी का पहला काव्य संग्रह “चांद डिनर पर बैठा है” प्रकाशित हो चुका है जिसको अदबी हलक़ों में काफ़ी सराहा गया है। उनका दूसरा काव्य संग्रह “ज़िंदगी इक उदास लड़की है” शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। ",
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"name": "स्वाती सानी रेशम",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 02 Mar 1968</bdi> | नागपुर, महाराष्ट्र</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>स्वाति, नागपूर में 5 मार्च, 1968 को पैदा हुईं और 13 बरस की उम्र से ही शायरी करने लगीं थीं। उन के वालिद ने कम उम्र ही में उन का तआरुफ़ अदब और लिखने पढ़ने से करवा दिया था और फिर जब 1983 में उन के वालिद ने डॉ. ज़रीना सानी की किताब आईना-ए–ग़ज़ल दी तो ये उन के लिए उर्दू शायरी से इश्क़ का बाइस बनी। और इसे किस्मत का खेल समझें कि इस बात के तक्रीबन 11 साल बाद ही स्वाति की शादी डॉ ज़रीना सानी के छोटे बेटे, तारिक़ के साथ हो गई । <br/><br/>साइंस में ग्रेजुएशन करने के बाद 1989 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन, नई दिल्ली, से पोस्ट ग्रेजुएशन किया और फिर उर्दू से बेइंतेहा मुहब्बत होने की वजह से साल 2018 में, 50 साल की उम्र में नागपुर यूनिवर्सिटी से उर्दू अदब में MA भी किया। <br/><br/>दस साल पहले जब स्वाति ने ये फ़ैसला किया की अब वो संजीदगी से उर्दू शायरी करेंगी तो मशहूर शायर, सहाफ़ी और शायर (रिसाला) के एडिटर, जनाब हामिद इक़बाल सिद्दीक़ी से मशवरा-ए-सुखन का आगाज किया। स्वाति की ग़ज़लें राष्ट्रीय सहारा और लोकमत पत्रिका में अक्सर शाए’ होती हैं। <br/><br/>स्वाति ने अपनी कामकाज़ी ज़िंदगी की शुरुवात एक ऐड्वर्टाइज़िंग प्रोफेशनल के तौर पर की थी लेकिन 10 साल बाद ही खुद की सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू कर दी जिसे 22 साल चलाया। मगर उर्दू की मोहब्बत में 2019 में ये फ़ैसला किया की अब वो उर्दू से अंग्रेजी में तर्जुमा करेंगी और शाहकार उर्दू शायरों से उन लोगों को रूनुमास करेंगी जो उर्दू से मोहब्बत तो करते हैं लेकिन ज़बान और उस की बारीकियों को समझ नहीं पाते। उन्होंने इस मक़सद के तहत कई किताबें लिखीं। पिछले एक साल में उन की तीन किताबें शाए हुई हैं जिनके नाम हैं <br/>The Eloquence of Ghalib (मिर्ज़ा ग़ालिब के 100 चुनिंदा शेरों का अंग्रेजी तर्जुमा)<br/>The Fervor of Mir (मीर तक़ी मीर के 100 चुनिंदा शेरों का अंग्रेजी तर्जुमा) और <br/>Verses in Bloom (उर्दू के 150 से ज्यादा यादगार शेरों का अंग्रेजी तर्जुमा)<br/><br/>इस के अलावा उन का प्रोजेक्ट अ शेर अ डे भी काफी कामयाब और मक़बूल है जिस के तहत रोज़ाना एक शेर और उस का अंग्रेजी तर्जुमा शाए किया जाता है। <br/></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " जन्म : 02 Mar 1968 | नागपुर, महाराष्ट्र स्वाति, नागपूर में 5 मार्च, 1968 को पैदा हुईं और 13 बरस की उम्र से ही शायरी करने लगीं थीं। उन के वालिद ने कम उम्र ही में उन का तआरुफ़ अदब और लिखने पढ़ने से करवा दिया था और फिर जब 1983 में उन के वालिद ने डॉ. ज़रीना सानी की किताब आईना-ए–ग़ज़ल दी तो ये उन के लिए उर्दू शायरी से इश्क़ का बाइस बनी। और इसे किस्मत का खेल समझें कि इस बात के तक्रीबन 11 साल बाद ही स्वाति की शादी डॉ ज़रीना सानी के छोटे बेटे, तारिक़ के साथ हो गई । साइंस में ग्रेजुएशन करने के बाद 1989 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन, नई दिल्ली, से पोस्ट ग्रेजुएशन किया और फिर उर्दू से बेइंतेहा मुहब्बत होने की वजह से साल 2018 में, 50 साल की उम्र में नागपुर यूनिवर्सिटी से उर्दू अदब में MA भी किया। दस साल पहले जब स्वाति ने ये फ़ैसला किया की अब वो संजीदगी से उर्दू शायरी करेंगी तो मशहूर शायर, सहाफ़ी और शायर (रिसाला) के एडिटर, जनाब हामिद इक़बाल सिद्दीक़ी से मशवरा-ए-सुखन का आगाज किया। स्वाति की ग़ज़लें राष्ट्रीय सहारा और लोकमत पत्रिका में अक्सर शाए’ होती हैं। स्वाति ने अपनी कामकाज़ी ज़िंदगी की शुरुवात एक ऐड्वर्टाइज़िंग प्रोफेशनल के तौर पर की थी लेकिन 10 साल बाद ही खुद की सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू कर दी जिसे 22 साल चलाया। मगर उर्दू की मोहब्बत में 2019 में ये फ़ैसला किया की अब वो उर्दू से अंग्रेजी में तर्जुमा करेंगी और शाहकार उर्दू शायरों से उन लोगों को रूनुमास करेंगी जो उर्दू से मोहब्बत तो करते हैं लेकिन ज़बान और उस की बारीकियों को समझ नहीं पाते। उन्होंने इस मक़सद के तहत कई किताबें लिखीं। पिछले एक साल में उन की तीन किताबें शाए हुई हैं जिनके नाम हैं The Eloquence of Ghalib (मिर्ज़ा ग़ालिब के 100 चुनिंदा शेरों का अंग्रेजी तर्जुमा) The Fervor of Mir (मीर तक़ी मीर के 100 चुनिंदा शेरों का अंग्रेजी तर्जुमा) और Verses in Bloom (उर्दू के 150 से ज्यादा यादगार शेरों का अंग्रेजी तर्जुमा) इस के अलावा उन का प्रोजेक्ट अ शेर अ डे भी काफी कामयाब और मक़बूल है जिस के तहत रोज़ाना एक शेर और उस का अंग्रेजी तर्जुमा शाए किया जाता है। ",
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"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> 'स्वीटी जोशी'</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> डॉ. भाग्यश्री जोशी</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 18 Dec 1990</bdi> | अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड</span></p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : 'स्वीटी जोशी' मूल नाम : डॉ. भाग्यश्री जोशी जन्म : 18 Dec 1990 | अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड ",
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"name": "सय्यद आबिद अली आबिद",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">उपनाम :</span><span> ''आबिद''</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सय्यद आबिद अली आबिद</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span><bdi id=\"poetDOB\"> 17 Sep 1906</bdi> | डेरा इस्माइल ख़ान, ख़ैबर पुख़्तुंख़ुवा</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">निधन :</span><span><bdi id=\"poetDOD\"> 20 Jan 1971</bdi> | लाहौर, पंजाब</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> संबंधी :</span>\r\n<span> शबनम शकील (बेटी)</span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p>उर्दू में जिन लोगों ने एक व्यापक साहित्यिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक चेतना के साथ समालोचना लिखी है उनमें एक नाम आबिद अली आबिद का भी है. आबिद अली आबिद उर्दू के साथ फ़ारसी व अंग्रेज़ी ज़बान व साहित्य के ज्ञाता भी थे, इसी वजह से उनका समालोचनात्मक डिस्कोर्स उनके दौर में लिखी जानेवाली पारंपरिक आलोचना से भिन्न नज़र आता है.<br/>आबिद अली आबिद 17 सितम्बर 1906 को डेरा इस्माइल खां में पैदा हुए. उनके पिता फ़ौज में मुलाज़िम थे. लाहौर से एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की और गजराब में वकालत करने लगे लेकिन उनकी शैक्षिक और साहित्यिक रुचि उन्हें लाहौर खीँचलाई. पंजाब यूनिवर्सिटी से फ़ारसी में एम.ए. किया और दयाल सिंह कालेज लाहौर में फ़ारसी के प्रोफेसर नियुक्त हुए. 20 जनवरी 1971 को लाहौर में देहांत हुआ.<br/>आबिद अली आबिद की कृतियों के नाम ये हैं: ‘ओसुल-ए-इन्तेक़ाद,’ ‘अदब के उस्लूब,’ ‘शमा,’ ‘यदे बैज़ा,’ ‘सुहाग,’ ‘तल्मिहात-ए-इक़बाल,’ ‘तिलिस्मात,’ ‘मै कभी ग़ज़ल न कहता,’ ‘बरेशाम ऊद,’ ‘इन्तेक़ाद,’ वगैरह.<br/><span lang=\"HI\" style=\"text-align:justify;text-indent:36pt;\"></span></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " उपनाम : ''आबिद'' मूल नाम : सय्यद आबिद अली आबिद जन्म : 17 Sep 1906 | डेरा इस्माइल ख़ान, ख़ैबर पुख़्तुंख़ुवा निधन : 20 Jan 1971 | लाहौर, पंजाब संबंधी : शबनम शकील (बेटी) उर्दू में जिन लोगों ने एक व्यापक साहित्यिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक चेतना के साथ समालोचना लिखी है उनमें एक नाम आबिद अली आबिद का भी है. आबिद अली आबिद उर्दू के साथ फ़ारसी व अंग्रेज़ी ज़बान व साहित्य के ज्ञाता भी थे, इसी वजह से उनका समालोचनात्मक डिस्कोर्स उनके दौर में लिखी जानेवाली पारंपरिक आलोचना से भिन्न नज़र आता है. आबिद अली आबिद 17 सितम्बर 1906 को डेरा इस्माइल खां में पैदा हुए. उनके पिता फ़ौज में मुलाज़िम थे. लाहौर से एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की और गजराब में वकालत करने लगे लेकिन उनकी शैक्षिक और साहित्यिक रुचि उन्हें लाहौर खीँचलाई. पंजाब यूनिवर्सिटी से फ़ारसी में एम.ए. किया और दयाल सिंह कालेज लाहौर में फ़ारसी के प्रोफेसर नियुक्त हुए. 20 जनवरी 1971 को लाहौर में देहांत हुआ. आबिद अली आबिद की कृतियों के नाम ये हैं: ‘ओसुल-ए-इन्तेक़ाद,’ ‘अदब के उस्लूब,’ ‘शमा,’ ‘यदे बैज़ा,’ ‘सुहाग,’ ‘तल्मिहात-ए-इक़बाल,’ ‘तिलिस्मात,’ ‘मै कभी ग़ज़ल न कहता,’ ‘बरेशाम ऊद,’ ‘इन्तेक़ाद,’ वगैरह. ",
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"DOB": "1906-09-17",
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"name": "सय्यद आबिद हुसैन",
"bio": "<div class=\"poetProfileDesc\">\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">मूल नाम :</span><span> सय्यद आबिद हुसैन</span></p>\r\n<p><span class=\"pPDTitle\">जन्म :</span><span>कन्नौज, उत्तर प्रदेश</span></p>\r\n<p>\r\n<span class=\"pPDTitle\"> पुरस्कार :</span>\r\n<span style=\"color:black;\">\r\r\n साहित्य अकादमी अवार्ड(1956)\r\r\n </span>\r\n</p>\r\n</div><div class=\"aboutPoet\">\r\n<p></p>\r\n</div>",
"raw_bio": " मूल नाम : सय्यद आबिद हुसैन जन्म : कन्नौज, उत्तर प्रदेश पुरस्कार : \r\r साहित्य अकादमी अवार्ड(1956)\r\r ",
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